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सर्वकोश
पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation

महर्षि पराशर द्वारा

स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished170 पृष्ठ

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द्वारा पञ्चावयवों की पद्धति से एकवाक्यता कर धर्म का निर्णय किया है।
धर्म का स्वरूप सनातन है। इसमें कभी कोई परिवर्त्तन नहीं होता। सृष्टि के
प्रारम्भ में अरबों वर्ष पहले सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान् परमेश्वर ने पूर्वपूर्वकल्पानुसार
मन्त्रब्राह्मणात्मक वेदों का उपदेश अनुग्रह शरीर के द्वारा महर्षियों को दिया।
वहाँ से यह परम्परा चली और यावत्संसार चलती रहेगी। इससे यथापूर्व जो
टकरायेगा वह चूर्ण-विचूर्ण हो जायेगा। रावण, वेन रगड़े गये। हजारों वर्ष वह
धर्म विधर्मियों से लड़ता रहा, उसका बाल बाँका नहीं हुआ। उसके साथ खेल
करना अच्छा नहीं। उसका रक्षक परमेश्वर है, उसके पास अपार बल है, सोते
सिंह को जगाना कल्याणकर नहीं।
अस्तु, पराशरस्मृति सामने है। यह कलि के लिए अन्तिम स्मृति है।
'कृते तु मानवा धर्मास्त्रेतायां गौतमाः स्मृताः।
द्वापरे शंख-लिखिताः कलौ पाराशरा स्मृताः॥'
( पराशरस्मृति )
सत्ययुग में मनु, त्रेता में गौतम, द्वापर में शंख, लिखित और कलि में
पराशर अधिक सम्मान-भाजन हैं। इसका तात्पर्य यह कदापि नहीं कि दूसरे
महर्षि उपेक्षणीय हैं। पराशरस्मृति में सभी वेदोक्त धर्म सन्निविष्ट हैं। ब्राह्मण,
क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, अन्त्यज, सभी वर्ण, उपवर्ण, ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ,
संन्यासी, नर, नारी, राजा, प्रजा आदि के धर्म निरूपित हुए हैं। पातक,
उपपातक, महापातकों का यथावत् विवेचन किया गया है। उनके प्रायश्चित्त
निस्तार का उपाय कहा गया है। जननाशौच, मरणाशौच के नियम कहे गये हैं।
किस समय कौन स्पृश्य या अस्पृश्य होता है इसका स्पष्ट विधान किया गया है।
रजस्वला माता ही क्यों न हो चार दिन के लिए वह अस्पृश्य है। मेला, यात्रा,
नौका, कृषि, विवाहादि के समय अस्पृश्यता नहीं ग्राह्य है। पूजा, भोजन के
समय अनुपनीत सभी अस्पृश्य कहे गये हैं। स्वपाक की बड़ी महिमा है। स्व स्व
वर्णों के साथ ही विवाह का विधान है। अन्यथा वर्णसंकर होकर भ्रष्ट सन्तान
उत्पन्न होती है। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य के यज्ञोपवीत संस्कार का पवित्र विधान
है। बलिष्ठ, बुद्धिमान्, दीर्घायु सन्तानोत्पत्ति की विधि कही गयी है। चारित्र्य-