पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation
महर्षि पराशर द्वारा
स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)
वामपादकरः स्थित्वा तद् वै रक्षांसि भुञ्जते ॥५९॥
१६ पराशरस्मृतिः [ प्रथमो-
शिरो वेष्ट्य तु यो भुङ्क्ते दक्षिणाभिमुखस्तु यः।
वामपादकरः स्थित्वा तद् वै रक्षांसि भुञ्जते ॥५९॥
जो मनुष्य शिर पर पगड़ी या टोपी रखकर अथवा बायें पैर पर
हाथ रखकर दक्षिणाभिमुख हो भोजन करता है, सह भोजन राक्षस
लोग खा जाते हैं ॥ ५९ ॥
यतये काञ्चनं दत्त्वा ताम्बूलं ब्रह्मचारिणे ।
चोरेभ्योऽप्यभयं दत्त्वा दाताऽपि नरकं व्रजेत् ॥६०॥
संन्यासी को सोना आदि देनेवाला, ब्रह्मचारी को ताम्बूल देने-
वाला तथा चोर को अभय देनेवाला-ये तीनों प्रकार के दाता नरक-
गामी होते हैं अर्थात् इनको नरक प्राप्त होता है ॥ ६० ॥
शुक्लवस्त्रं च यानं च ताम्बूलं धातुमेव च ।
प्रतिगृह्य कुलं हन्यात् प्रतिगृह्णाति यस्य च ॥६१॥
जो संन्यासी श्वेत वस्त्र, सवारी, ताम्बूल तथा धातु आदि का
प्रतिग्रह लेते हैं वे अपने कुल का तथा उस देनेवाले के भी कुल का
नाश करते हैं ॥ ६१ ॥
चोरो वा यदि चाण्डालः शत्रुव पितृघातकः ।
वैश्वदेवे तु सम्प्राप्ते सोऽतिथिः स्वर्गसङ्क्रमः ॥६२॥
चोर, चाण्डाल, शत्रु अथवा स्वयं पिता का वध करनेवाला यदि
वैश्वदेव काल में घर पर उपस्थित हो जाये, तो उस अतिथि को स्वर्ग-
प्राप्ति का साधन मानना चाहिए ॥ ६२ ॥
न गृह्णाति तु यो विप्रो ह्यतिथिं वेदपारगम् ।
अदत्तं चाऽन्नपात्रं तु भुक्त्वा भुङ्क्ते तु किल्विषम् ॥६३॥
जो ब्राह्मण वेदपारंगत अतिथि के घर आने पर सत्कार नहीं
करता तथा उसे अन्नादि बिना दिये ही स्वयं भोजन कर लेता है, वह
पाप का भोजन करता है ॥ ६३ ॥
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ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता १७
ब्राह्मणस्य मुखं क्षेत्रं निरुपममकण्टकम् ।
वापयेत् सर्वबीजानि सा कृषिः सर्वकामिका ॥६४॥
ब्राह्मण का मुख सुन्दर क्षेत्र-खेत के समान है, जिसमें कंटक नहीं
रहत। उस ब्राह्मण के मुखरूपी क्षेत्र में बीजों को बोने से सम्पूर्ण
कामनाओं की सिद्धि होती है। अतः ब्राह्मण को भोजन आदि से सन्तुष्ट
करना चाहिए। ६४॥
सुक्षेत्रे वापयेद् बीजं सुपात्रे निक्षिपेद्धनम् ।
सुक्षेत्रे च सुपात्रे च ह्युप्तं तन्न विनश्यति ॥६५॥
बुद्धिमान् पुरुष, सुन्दर ब्राह्मण के मुखरूपी क्षेत्र में बीज बोये और
सुपात्र में धन का धरोहर रखे। क्योंकि सुन्दर खेत में बोये गये बीज
और सत्पात्र मे रखा गया निक्षेप (धरोहर) का नाश नहीं
होता ॥६५॥
अव्रता ह्यनधीयाना यत्र भैक्ष्यचरा द्विजाः ।
तं ग्रामं दण्डयेद् राजा चोरभयप्रदो हि सः ॥६६॥
अध्ययन-शून्य ब्रह्मचर्यादि व्रत का अनुष्ठान न करनेवाले ब्राह्मण
जिस गाँव से भिक्षा से अपनी जीविका करते हों। राजा को उचित है
कि वह उस गाँव को दण्ड दे, क्योंकि वह गाँव चोरों को आश्रय देने-
वाला है ॥६६॥
क्षत्रियो हि प्रजा रक्षन् शस्त्रपाणिः प्रदण्डयान् ।
निर्जित्य परसैन्यानि क्षितिं धर्मेण पालयेत् ॥६७॥
क्षत्रिय हाथ में शस्त्र लेकर दुष्टों को दंड देता हुआ प्रजा की रक्षा
करे। अपने शत्रुओं पर विजय प्राप्त करे तथा धर्मपूर्वक पृथ्वी का
पालन करे ॥६७॥
न श्रीः कुलक्रमायाता भूषणोल्लिखिताऽपि वा ।
खड्गेनाक्रम्य भुञ्जीत वीरभोग्यां वसुन्धराम् ॥६८॥
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१८ पाराशरस्मृतिः [ प्रथमो-
कुलपरम्परा से समागत लक्ष्मी भी, बिना पराक्रम के स्थिर नहीं
रहती और न भूषणादि धारण से ही लक्ष्मी की शोभा होती है। इस-
लिए पराक्रमपूर्वक तलवार से जीतकर लक्ष्मी का उपभोग करना
चाहिए। यह पृथ्वी वीरों से ही भोगने योग्य है ॥६८॥
पुष्पं पुष्पं विचिनुयान् मूलच्छेदं न कारयेत् ।
मालाकार इवारामे न यथाऽङ्गारकारकः ॥६९॥
बुद्धिमान् पुरुष माली की तरह वृक्षरूपी प्रजा से धीरे-धीरे पुष्पों
का संचय करे, उसका मूलच्छेदन न करे। जिस प्रकार आग लगा देने-
वाला, वृक्ष की जड़ जला देता है, फिर उसे पुष्प-प्राप्ति की सम्भावना
नहीं रहती ॥६९॥
लाभकर्म तथा रत्नं गवां च परिपालनम् ।
कृषिकर्म च वाणिज्यं वैश्यवृत्तिरुदाहृता ॥७०॥
ब्याज लेना, रत्नों का क्रय-विक्रय, गो-पालन, खेती तथा व्यापार-
ये वैश्य की जीविका कही गयी हैं ॥७०॥
शूद्रस्य द्विज-शुश्रूषा परमो धर्म उच्यते ।
अन्यथा कुरुते किञ्चित् तद् भवेदस्य निष्फलम् ॥७१॥
द्विजाति की सेवा ही शूद्र का सबसे बड़ा धर्म है। जो शूद्र द्विज-
शुश्रूषा को छोड़कर अन्य कार्य करता है, उसका किया गया सभी कर्म
निष्फल है ॥७१।
लवणं मधु तैलं च दधि तक्रं घृतं पयः ।
न दुष्येच्छूद्रजातीनां कुर्यात् सर्वेषु विक्रयम् ॥७२॥
नमक, मधु, तेल, दही, मठ्ठा, घी तथा दूध शूद्र के हाथ से भी
दूषित नहीं होता । इसलिए शूद्र इन सभी वस्तुओं का विक्रय सबके
लिए कर सकता है ॥७२॥
ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता १९
विक्रीणन् मद्य-मांसानि ह्यभक्ष्यस्य च भक्षणम् ।
कुर्वन्नगम्यागमनं शूद्रः पतति तत्क्षणात् ॥७३॥
मद्य तथा मांस का विक्रय करने से, अभक्ष्य वस्तु का भक्षण करने
से तथा अगम्या स्त्री से गमन करने पर शूद्र तत्क्षण ही पतित हो जाता
है । इसलिए इन कर्मों को शूद्र त्याग दे ॥७३॥
कपिलाक्षीरपानेन ब्राह्मणीगमनेन च ।
वेदाक्षरविचारेण शूद्रस्य नरकं ध्रुवम् ॥७४॥
इति पराशरीय-धर्मशास्त्रे चातुर्वर्ण्यचारो नाम प्रथमोऽध्यायः ॥१॥
कपिला गौ का दूध पीने से, ब्राह्मणी के साथ संगम करने से तथा
वेद के अक्षर का विचार करने ( अर्थात् वेद पढ़ने ) से शूद्र को निश्चय
ही नरक होता है ॥७४॥
इस प्रकार 'शिवदत्ती' भाषाटीका में पाराशरप्रोक्त धर्मशास्त्र में
चारों वर्णों के धर्माचार नामक प्रथम अध्याय समाप्त ॥१॥
२. द्वितीयोऽध्यायः
अतः परं गृहस्थस्य कर्माचारं कलौ युगे ।
धर्मं साधारणं शक्त्या चातुर्वर्ण्यश्रियागतम्¹ ॥ १ ॥
तं प्रवक्ष्याम्यहं पूर्वं पराशरवचो यथा ।
प्रथमाध्याय में विशेष एवं साधारण धर्म कहकर ग्रन्थकार इस द्वितीय
अध्याय में कहते हैं कि अब इसके अनन्तर गृहस्थ के कर्म एवं आचार
तथा उनसे शक्ति के अनुसार किये जानेवाले साधारण धर्म को मैं
कहूँगा । यह कर्म आचार तथा सामान्य धर्म, कलि में चारों वर्णों का
क्रमपूर्वक चला आया है, ऐसा पराशर का मत है ॥१॥
षट्कर्मनिरतो विप्रः कृषिकर्म च कारयेत् ॥ २ ॥
१. '-सहितो' इत्यपि पाठः ।
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२० पराशरस्मृतिः [ द्वितीयो-
अध्ययन, अध्यापन, यजन, याजन, दान तथा प्रतिग्रह इन छः
कर्मों में लगा हुआ ब्राह्मण कृषि-कर्म ( खेती ) भी करावे ॥२॥
क्षुधितं तृषितं श्रान्तं बलीवर्दं न योजयेत् ।
हीनाङ्गं व्याधितं क्लीवं वृषं विप्रो न वाहयेत् ॥ ३ ॥
भूखे, प्यासे, थके हुए, अंगहीन, रोगी तथा बधिया ( क्लीब ) बैल
को ब्राह्मण हल में न जोते ॥३॥
स्थिराङ्गं नीरुजं दृप्तं सुनर्दं षण्ढवर्जितम् ।
वाहयेद् दिवसस्याऽर्द्धं पश्चात् स्नानं समाचरेत् ॥ ४ ॥
जिस बैल का अंग पुष्ट हो तथा जो नीरोग हो, ऐसे अहंकार से
भरे हुए तथा सुन्दर हँडकनेवाले बैल को, जो बधिया न हो, ब्राह्मण
आधा दिन जोतकर अनन्तर स्नान करे ॥४॥
जप्यं देवार्चनं होमं स्वाध्यायं चैवमभ्यसेत् ।
एक-द्वि-त्रि-चतुर्विप्रान् भोजयेत् स्नातकान् द्विजाः ॥५॥
ब्राह्मण को प्रतिदिन जप, देव पूजन, होम तथा वेदों का स्वाध्याय
करना चाहिए । और एक, दो, तीन अथवा चार स्नातक ब्रह्मचारी को
प्रतिदिन भोजन भी कराना चाहिए ॥५॥
स्वयं कृष्टे तथा क्षेत्रे धान्यैश्च स्वयमर्जितैः ।
निर्वपेत् पञ्चयज्ञांश्च¹ क्रतुदीक्षां च कारयेत् ॥ ६ ॥
अपने खेत में अपनी कमाई के द्वारा उत्पन्न किये गये धान्य से
गृहस्थ ब्राह्मण प्रतिदिन पंचयज्ञ (बलिवैश्वदेवादि) तथा यज्ञ-दीक्षादि
भी करावे ॥६॥
१. '-यज्ञानि' इति पा० ।
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ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता २१
तिला रसा न विक्रेया विक्रेया धान्यतः समाः ।
विप्रस्यैवंविधा वृत्तिस्तृण-काष्ठादि-विक्रयः ॥ ७ ॥
कलि में भूम्यादि के अभाव में यदि ब्राह्मण कृषि न कर सके, तो
उसे वाणिज्य करना चाहिए, परन्तु तिल और रस (नमक, गुड़ आदि)
का विक्रय कदापि नहीं करना चाहिए। यदि तिल और रस का
विक्रय (बेचना) आवश्यक हो तो उसका नकद विक्रय न कर अन्न से
बदला करे। उसे तृण (भूसा आदि) तथा काष्ठ (लकड़ी) आदि
का विक्रय कर अपनी जीविका चलानी चाहिए ॥७॥
ब्राह्मणश्चेत् कृषिं कुर्यात्तन्महादोषमाप्नुयात् ।
अष्टगव्यं धर्महलं षड्गवं वृत्तिलक्षणम् ॥ ८ ॥
ब्राह्मण को कृषि कर्म करने से बहुत बड़ा पाप लगता है। यदि
कृषि के बिना निर्वाह न हो सके, तो धर्महल से खेती करे, जो दो-दो
बैलों को एक-एक प्रहर जुते रहने के कारण आठ बैलों से सम्पन्न होता
है। तथा धर्महल (आठ बैलों) के अभाव में अपनी वृत्ति के लिए छः
बैलों की भी खेती कर सकता है। इसे वृत्तिहल भी कहते हैं ॥८॥
चतुर्गवं नृशंसानां द्विगवं गोजिघांसुवत् ।
द्विगवं वाहयेत् पादं मध्याह्ने तु चतुर्गवम् ॥ ९ ॥
निर्दयी पुरुष ही चार बैलों को आठ पहर तक तथा गोहत्यारा
दो बैलों को आठ पहर तक जोतता है। इसलिए चार तथा दो बैलों को
पूरे दिन जोतकर ब्राह्मण कृषि कर्म न करे। दो बैलों को एक प्रहर
तक, फिर दो बैलों (इस प्रकार कुल चार बैलों) को मध्याह्न (दूसरे
प्रहर) तक ॥९॥
षड्गवं तु त्रियामाहेऽष्टभिः पूर्णं तु वाहयेत् ।
नाऽऽप्नोति¹ नरकेष्वेवं वर्त्तमानस्तु वै द्विजः ॥१०॥
१. 'याति' इति पाठान्तरम् ।
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२२ पाराशरस्मृतिः [ द्वितीयो-
फिर दो बैलों अर्थात् कुल छः बैलों को तीसरे प्रहर तक तथा फिर
दो बैलों को ( इस प्रकार कुल आठ बैलों को ) चौथे प्रहर तक । इस
प्रकार आठ बैलों के द्वारा पूरे दिन धर्महल चलाकर ब्राह्मण नरक का
भागी नहीं होता ॥१०॥
दानं दद्याच्च वै तेषां प्रशस्तं स्वर्गसाधनम् ।
संवत्सरेण यत्पापं मत्स्यघाती समाप्नुयात् ॥११॥
खेती करनेवाला दान भी करे, इस प्रकार गृहस्थ द्विज का यह
अत्युत्तम स्वर्ग साधन है। मछली मारनेवाला एक वर्ष में जितना पाप
कर सकता है ॥११॥
अयोमुखेन काष्ठेन ददेकाहेन लाङ्गली।
पाशका मत्स्यघाती च व्याधः शाकुनिकस्तथा ॥१२॥
हल जोतनेवाला उतना पाप लोहे जड़े हुए काठ के हल से बैलों
को जोतकर एक ही दिन में प्राप्त कर लेता है। १. फाँसी लगानेवाला,
२. मछली मारनेवाला, ३. व्याध, ४. चिड़ीमार ॥१२॥
अदाता कर्षकश्चैव पञ्चैते समभागिनः ।
कण्डनी पेषणी चुल्ली उदकुम्भोऽथ मार्जनी ॥१३॥
तथा ५. हल जोतकर अन्न का दान करनेवाला कृषक इन पाँचों
को समान पाप लगता है। गृहस्थ को ओखली, चक्की, चूल्ही, जल का
घड़ा तथा झाडू ॥१३॥
पञ्चसूना गृहस्थस्य अहन्यहनि वर्त्तते ।
वैश्वदेवो बलिर्भिक्षा गोग्रासो हन्तकारकः¹ ॥१४॥
१. ग्रासमात्रं तु भिक्षा स्याद् अग्रं ग्रासचतुष्टयम् ।
अग्रं चतुर्गुणीकृत्य हन्तकारो विधीयते ॥ —इति मनुः
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ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता २३
इन पाँचों के द्वारा प्रतिदिन जीवहत्या होने से पाप लगता रहता
है। इसलिए उसे प्रतिदिन वैश्वदेव, बलि, भिक्षा, गोग्रास तथा हन्त-
कार करना चाहिए ॥१४॥
गृहस्थः प्रत्यहं कुर्यात् सूनादोषैर्न लिप्यते ।
वृक्षांश्छित्त्वा महीं भित्त्वा हत्वा च कृमि-कीटकान् ॥१५॥
ऐसा करनेवाले गृहस्थ को उपर्युक्त पाँचों स्थान की जीव-हत्या का
दोष नहीं लगता । खेती में वृक्षों के काटने से, पृथ्वी को हल से फाड़ने
में तथा अधोमुख हल से जोतने में, कृमि, कीट के मरने से गृहस्थ को
बहुत बड़ा पाप लगता है ॥१५॥
कर्षकः खलयज्ञेन सर्वपापैः प्रमुच्यते ।
यो न दद्याद् द्विजातिभ्यो राशिमूलमुपागतः ॥१६॥
उन सभी पापों की निवृत्ति के लिए गृहस्थ को खलयज्ञ करना
चाहिए। जो अन्न की राशि हो जाने पर ब्राह्मणों को दान नहीं
देता, ॥१६॥
स चौरः स च पापिष्ठो ब्रह्मघ्नं तं विनिर्दिशेत् ।
राज्ञे दत्त्वा तु षड्भागं देवानां चैकविंशतिम् ॥१७॥
वह चोर तथा पापी है, उसे ब्रह्महत्यारा कहना चाहिए। इसलिए
गृहस्थ को अन्न की राशि प्राप्त होने पर उसका छठा भाग राजा को,
इक्कीसवाँ भाग देवताओं को, ॥१७॥
विप्राणां त्रिंशकं भागं सर्वपापैः प्रमुच्यते ।
क्षत्रियोऽपि कृषिं कृत्वा देवान् विप्रांश्च पूजयेत् ॥१८॥
तीसवाँ भाग ब्राह्मणों को अवश्य देना चाहिए। ऐसा करनेवाला
गृहस्थ द्विज सभी प्रकार के पापों से छुटकारा पा जाता है। यह तो
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२४ पाराशरस्मृतिः [ तृतीयो-
गृहस्थ ब्राह्मण की बात कही। क्षत्रिय इसी प्रकार खेती कर ब्राह्मण
तथा देवताओं का पूजन करे ॥१८॥
वैश्यः शूद्रस्तथा कुर्यात् कृषि-वाणिज्य-शिल्पकान् ।
वि कर्म कुर्वते शूद्रा द्विजसेवा-विवर्जिताः ॥१९॥
वैश्य तथा शूद्र भी खेती, व्यापार तथा कारीगरी का काम करे।
परन्तु यदि शूद्र ब्राह्मण की सेवा को छोड़कर कोई अन्य कार्य करे, तो
वह अपने कर्म से विरुद्ध कर्म करनेवाला होता है ॥१९॥
भवन्त्यल्पायुषस्ते वै निरयं यान्त्यसंशयम् ।
चतुर्णामपि वर्णानामेष धर्मः सनातनः ॥२०॥
इति पाराशरीये धर्मशास्त्रे गृहस्थधर्माचारो नाम
द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥
वे अल्पायु तथा मरने पर नरक के भागी होते हैं। यह धर्म चारों
वर्णों का सदैव से चला आया है, इसलिए यही सनातन धर्म
है ॥ २० ॥
इस प्रकार पण्डित शिवदत्तमिश्रशास्त्रिकृत 'शिवदत्ती' भाषाटीका में पाराशर-
प्रोक्त धर्मशास्त्र में गृहस्थधर्माचार नामक द्वितीय अध्याय समाप्त ॥२॥
•
३. तृतीयोऽध्यायः
अतः शुद्धिं² प्रवक्ष्यामि जनने मरणे तथा ।
दिनत्रयेण शुद्ध्यन्ति ब्राह्मणाः³ प्रेतसूतके ॥ १ ॥
गृहस्थ का धर्माचार कहकर, ग्रन्थाकार कहते हैं कि अब जन्म तथा
मरण में जितने दिनों के अनन्तर गृहस्थ की शुद्धि होती है, उसे मैं
कहूँगा। ब्राह्मण लोग मरणाशौच में तीन दिनों में शुद्ध होते हैं।
१. '-शुश्रूष-' इति क्वचित्पुस्तके । २. 'परं' इति पा० । ३. 'जन्म' इति ।