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पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation

महर्षि पराशर द्वारा

स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished170 पृष्ठ

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१८ पाराशरस्मृतिः [ प्रथमो-
कुलपरम्परा से समागत लक्ष्मी भी, बिना पराक्रम के स्थिर नहीं
रहती और न भूषणादि धारण से ही लक्ष्मी की शोभा होती है। इस-
लिए पराक्रमपूर्वक तलवार से जीतकर लक्ष्मी का उपभोग करना
चाहिए। यह पृथ्वी वीरों से ही भोगने योग्य है ॥६८॥
पुष्पं पुष्पं विचिनुयान् मूलच्छेदं न कारयेत् ।
मालाकार इवारामे न यथाऽङ्गारकारकः ॥६९॥
बुद्धिमान् पुरुष माली की तरह वृक्षरूपी प्रजा से धीरे-धीरे पुष्पों
का संचय करे, उसका मूलच्छेदन न करे। जिस प्रकार आग लगा देने-
वाला, वृक्ष की जड़ जला देता है, फिर उसे पुष्प-प्राप्ति की सम्भावना
नहीं रहती ॥६९॥
लाभकर्म तथा रत्नं गवां च परिपालनम् ।
कृषिकर्म च वाणिज्यं वैश्यवृत्तिरुदाहृता ॥७०॥
ब्याज लेना, रत्नों का क्रय-विक्रय, गो-पालन, खेती तथा व्यापार-
ये वैश्य की जीविका कही गयी हैं ॥७०॥
शूद्रस्य द्विज-शुश्रूषा परमो धर्म उच्यते ।
अन्यथा कुरुते किञ्चित् तद् भवेदस्य निष्फलम् ॥७१॥
द्विजाति की सेवा ही शूद्र का सबसे बड़ा धर्म है। जो शूद्र द्विज-
शुश्रूषा को छोड़कर अन्य कार्य करता है, उसका किया गया सभी कर्म
निष्फल है ॥७१।
लवणं मधु तैलं च दधि तक्रं घृतं पयः ।
न दुष्येच्छूद्रजातीनां कुर्यात् सर्वेषु विक्रयम् ॥७२॥
नमक, मधु, तेल, दही, मठ्ठा, घी तथा दूध शूद्र के हाथ से भी
दूषित नहीं होता । इसलिए शूद्र इन सभी वस्तुओं का विक्रय सबके
लिए कर सकता है ॥७२॥