पलटू साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - अमर कुण्डलियाँ व पद)
Paltoo Sahib Ki Bani Part 1: Belvedere Press Allahabad
सन्त पलटू साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
पलटू साहिब की बानी भाग-१ ६६
( २४७ )
आगि लागि मसि जरि गई कागद जरै न कोय ॥
कागद जरै न कोय कागद है बहुत पुराना ।
अक्खर¹ आवै जाय अखर को नाहिं ठिकाना ॥
वो भी जरै बनाय अखर का लिखनेहारा ।
बाँचै सो जरि जाय जरै जो करै बिचारा ॥
कोटिन अक्खर बाद अन्त कागद भी जरता ।
कागद जरै के बाद रहै कागद का करता ॥
पलटू जब कागद जरै वा दिन मेरा होय ।
आगि लागि मसि जरि गई कागद जरै न कोय ॥
( २४८ )
तबक चारदह अन्दर है अस्थल बे दरियाव ॥
अस्थल बे दरियाव अर्श कुर्सी खुद दीदन ।
तूबा दरखत अज् हद शीरीं मेवा खुर्दन ॥
नूर तजल्ली रूह लाहूत रसीदा नादिर ।
रौशन-जमीर बेचूँ सीना-साफ़ काजी क़ादिर ॥
हूहू गुफ़्तन फ़ना रूह की सोई बातिन ।
पाक अल्लाह मकान तहाँ को भी वो साकिन ॥
पलटू आरिफ़ से कहै तू भी चाहो जाव ।
तबक चारदह अन्दर है अस्थल बे दरियाव ॥
(१) अक्षर। (२) कुण्डलिया नं० २४८ चौदहवें भुवन में बिना पानी के धरती
है जहाँ खुदा का तख्त [अर्श व कुर्सी] दीख पड़ता है और कल्प बृक्ष [तूबा दरख्त]
का अत्यन्त स्वादिष्ट फल खाने को मिलता है [खुर्दन]। उस शून्य लोक [लाहूत]
में पहुँची हुई [रसीदा] सूरत का प्रकाश विचित्र हो जाता है और वह अंतर-यामी,
अद्वितीय [बेचूँ] निर्मल हृदय [रौशन जमीर] अधिष्ठाता [काजी] और सर्ब
शक्तिमान [क़ादिर] हो जाती है। वहो पावन स्थान अल्लाह का है जहाँ ॐ ॐ का
शब्द गाजता है [हूहू गुफ़्तन और सुरत विदेह होने पर वहीं बासा पाती है
[साकिन]।
१०० कुंडलिया
( २४६ )
बस्ती माहिं चमार की बाम्हन करत बेगार ॥
बाम्हन करत बेगार लोग सब गैर-बिचारी ।
मूरख है परधान देहि ज्ञानी को गारी ॥
अद्वैता को मेटि द्वैत कै करते थापन ।
दौलत के सम्बन्ध अमल वे करते आपन ॥
ज्ञानि महरसी¹ सन्त ताहि की निन्दा करते ।
अज्ञानी के मध्य सिफत वे अपनी धरते ॥
पलटू पीतर कनक को कोउ न करै विचार ।
बस्ती माहिं चमार की बाम्हन करत बेगार ॥
( २५० )
कुत्ता हाँड़ी फँसि मुवा दोस परोसि क देय ॥
दोस परोसि क देय आपनौ हठ नहिं मानै ।
न्योत रही लगवार खसम से परदा तानै ॥
कपड़ा की सुधि नाहिं नंगी है पड़ी उतानी ।
कोऊ मने जो करै बोलती करकस बानी ॥
माया कै लग भूत खसम कौ नाहिं डेराती ।
घर की सम्पति छाड़ि और की जोगवै थाती ॥
पलटू कूसंगति पड़ी पिउ कै नाम न लेय ।
कुत्ता हाँड़ी फँसि मुवा दोस परोसि क देय ॥
( २५१ )
जा के रथ पर राम हैं को करि सकै अकाज ॥
को करि सकै अकाज बोर नहीं वा कौ बाँकै ।
चक्र सुदर्सन छुटै कोऊ कुनजर से ताकै ॥
लोहू ढारैं राम सन्त कौ ढरै पसोना ।
का बालक पहलाद भया हरिनाकुस पीना² ॥
(१) महर्षि = मह ऋषि । (२) मोटा ।
पलटू साहिब की बानी भाग—१ १०१
करि पंडौ की पैज भरथ१ कौ दिया जिताई ॥
अम्बरीक के हेतु दुर्बासै नाच नचाई ॥
पलटू मारयौ ग्राह कौ हाँक२ दियौ गजराज ।
जा के रथ पर राम हैं को करि सकै अकाज ॥
( २५२ )
होनी रही सो है गई रोइ मरै संसार ॥
रोइ मरै संसार काज कुछ उन से नाहीं ।
गये हाथ से निबुकि३ तेही सब पछिताहीं ॥
भये काग से हंस काग सब निन्दा करते ।
लोहा से भये कनक सोच सब लोहा मरते ॥
ज्ञानी अब हम भये रोवैं सब मूरख संगी ।
तिल से भये फुलेल तेल सब मार तिलंगी ॥
पलटू उतरे पार हम भाड़ झोकि सब भार ।
होनी रही सो है गई रोइ मरै संसार ॥
( २५३ )
सिव सक्ती के मिलन में मो कौ भयौ अनन्द ॥
मो कौ भयौ अनन्द मिल्यौ पानी में पानी ।
होऊ से भा सूत नहीं मिलि कै अलगानी ॥
मुलुक भयौ सलतन्त मिल्यौ हाकिम कौ राजा ।
रैयत करै अराम खोलि कै दस दरवाजा ॥
छूटी सकल बियाधि मिटी इन्द्रिन की दुतिया ।
को अब करै उपाधि चोर से मिलि गइ कुतिया ॥
पलटू सतगुरु साहिब काटौ मेरो बन्द ।
सिव सक्ती के मिलन में मो कौ भयौ अनन्द ॥
( २५४ )
ऐसा ब्राह्मन मिलै जो ता के परछौं पाँय ॥
(१) पांडवों के साथ अपना प्रण रख कर श्रीकृष्ण ने महाभारत की लड़ाई
उन्हें जिता दी । (२) पुकार । (३) निकल ।
१०२ कुंडलिया
ता के परछौं पाँय ब्रह्म अपने को पावै ।
भर्म जनेऊ तोरि प्रेम तिरसूत बनावै ॥
सब कर्मन को करै कर्म से रहता न्यारा ।
दुतिया देइ बहाय ब्रह्म का करै बिचारा ॥
ज्ञान दिवस में सयन मोह रजनी में जागै ।
पारब्रह्म भगवान ताहि घर भिच्छा माँगै ॥
चेतन देइ जगाय ब्रह्म की गाँठि को खोलै ।
करै गायत्री गुप्त सब्द ब्रह्मांड में बोलै ॥
पलटू तजै अठारह सहस बरन ह्वै जाय ।
ऐसा ब्राह्मन मिलै जो ता के परछौं पाँय ॥
( २५५ )
सब बैरागी बटुरि कै पलटुहि किया अजात ॥
पलटुहि किया अजात प्रभुता देखि न जाई ।
बनिया काल्हिक१ भक्त प्रगट भा सब दुतियाई२ ॥
हम सब बड़े महन्त ताहि को कोउ न जानै ।
बनिया करै पखंड ताहि को सब कोउ मानै ॥
ऐसी इर्षा जानि कोऊ ना आवै खाई ।
बनिया ढोल बजाय रसोई दिया लुटाई ॥
मालपुवा चारिउ बरन बाँधि लेत कछु खात ।
सब बैरागी बटुरि कै पलटुहि किया अजात ॥
( २५६ )
हींग लगाइस भात में भूल गई है नार ॥
भूल गई है नार आन कै आनै कीन्हा ।
कातिस मोटा सूत कातन को चाही झीना ॥
लहँगा पाछे जरै चूल्ह में पानी नावा ।
(१) कल्ह का । (२) अलग कर दिया ।
पलटू साहिब की बानी भाग—१ १०३
हँसिया को है ब्याह गीत खुरपा कै गावा ॥
देय महावर आँख गोड़ में काजर लावै ।
ऐसी भोली नारि ताहि कौ को समुझावै ॥
पलटू वाहि अबूझ है अंत खायगी मार ।
हींग लगाइस भात में भूल गई है नार ॥
( २५७ )
घरिया औटै तत्व की परै नाम टकसार ॥
पड़ै नाम टकसार द्वादस सन१ बहुत करकरा ।
ज्ञान चोख से चोख रैनि दिन पड़ै धरधरा ॥
चौकस करै बिबेक सरन जो जौ भरि आवै ॥
ऐसा सिक्का होय कोई ना बट्टा लावै ॥
देवै ठासा बेहद परै सनवाती सीका२ ।
चारि खूँट में चलै जियत इक होय रती का ॥
पलटू बानी परा कहँ लेहै सन्त बिचार ।
घरिया ओटै तत्व की परै नाम टकसार ॥
( २५८ )
सतगुरु के परताप से पकरा पाँचो चोर ॥
पकरा पाँचो चोर नगर में अदल चलाया ।
तिगुंन दिया निकारि आनि कै भक्ति बसाया ॥
लोभ मोह को पकरि ताहि की गरदन मारी ।
तृस्ना औ हंकार पेट दियो इनको फारी ॥
दुर्मति दई निकारि सुमति का चाबुक दीन्हा ।
चढ़े सिपाही संत अमल कायागढ़ कीन्हा ॥
पलटू संजम मैं किया परा मुलुक में सोर ।
सतगुरु के परताप से पकरा पाँचो चोर ॥
(१) सन १२ के सिक्के की चाँदी सोना बहुत खरा मशहूर है। (२) सिक्का।
१०४ कुंडलिया
( २५९ )
दूसर जनमत मारिये की बरु रहिये बाँझ ॥
दूसर जनमत मारिये की बरु रहिये बाँझ ॥
की बरु रहिये बाँझ कोख में दाग लगावै ।
जामै१ पेड़ मदार ताहि में क्या फल आवै ॥
जो जनमै हरि भक्त जगत में सोभा पावै ।
कुल में फूलै कमल पुत्रवंती कहवावै ॥
कौसिल्या देवकी बड़ी अब कहिये सोई ।
हरि जन में हरि रहै भार जिन लीन्हा दोई ॥
पलटू सोई पुत्रवती भक्त रहै जेहि माँझ२ ।
दूसर जनमत मारिये की बरु रहिये बाँझ ॥
( २६० )
आगि लगो वहि देस में जहँवाँ राजा चोर ॥
जहँवाँ राजा चोर प्रजा कैसे सुख पावै ।
पाँच पचीस लगाइ रैनि सदा मुसावै ॥
आठौ पहर उपाधि रहै नाना बिधि लागी ।
काम क्रोध हंकार सकै ना रैयत भागी ॥
लोभ मोह की दिनै३ गले बिच नावै फाँसी ।
लोक लाज मरजाद चलावै तिरगुन गाँसी ॥
पलटू रैयत क्या करै चलै न एकौ जोर ।
आगि लगो वहि देस में जहँवाँ राजा चोर ॥
( २६१ )
यह अचरज हम देखिया कानी काजर देइ ॥
कानी काजर देइ खसम के मन ना मानै ।
निसि दिन करै सिंगार भेद या बिरला जानै ॥
नख सिख खोटी मोटि पहिरि कै बैठो गहना ।
(१) उगै । (२) उदर में । (३) दिन दहाड़े ।
पलटू साहिब की बानी भाग—१ १०५
मूरख देखन जाय देखि कै करै सरहना ॥
बोलै मीठी बोल सबन को बेगि रिझावै ।
नाहिं खसम से भेंट बैठि कै बात बनावै ॥
पलटू या संसार में झूठ कहै सो लेय ।
यह अचरज हम देखिया कानी काजर देय ॥
( २६२ )
मुसलमान रब्बी मेरी हिन्दू भया खरीफ ॥
हिन्दू भया खरीफ दोऊ है फसिल हमारी ।
इनको चाहै लेइ काटि कै बारी बारी ॥
साल भरे में मिली यहो हम को जागीरी ।
चाकर भये हजूरी कौन अब करै तगीरी१ ॥
दूनों को समुझाइ ज्ञान का दफ्तर खोलै ।
सब कायल होइ जाय अमल दै कोऊ न बोलै ॥
दोऊ दीन के बीच में पलटूदास हरीफ२ ।
मुसलमान रब्बी मेरी हिन्दू भया खरीफ ॥
( २६३ )
नाचन को ढंग नाहिं है कहती आँगन टेढ़ ॥
कहती आँगन टेढ़ जक्त की लाज लजाई ।
लम्बा घूँघट काढि डरै३ फिर नाचन आई ॥
जाति बरन मरजाद छुटी ना लोक बड़ाई ।
करै खसम को चाह खसम का४ सहजै पाई ॥
अपनी बात उड़ाइ आपु से जैसे भूसा ।
भौंसै पेड़ बनाय पाछे से फड़िहै फरसा५ ॥
पलटू पावै खसम को रहै संत की खेढ़ ।
(१) तंगी । (२) निपुन । (३) लोक लाज के डर से लम्बा घूँघट काढ़ कर ।
(४) क्या । (५) लोक लाज और कुल कानि की पौध को झुलस डाले नहीं तो बढ़ जाने
पर फरसा से काटने की जरूरत होगी ।
१४
१०६ कुंडलिया
नाचन को ढंग नाहिं है कहती आँगन टेढ़ ॥
( २६४ )
पलटू खोजै पूरबे घर में है जगन्नाथ ॥
घर में है जगन्नाथ सकल घट व्यापक सोई ।
पसु पंछी चर अचर और नहिं दूजा कोई ॥
पूरन प्रगटे ब्रह्म देह धरि सब में आये ।
दिया कर्म को आड़ भेद यह बिरलन पाये ॥
उपजै बिनसै देह जीव सो मरता नाहीं ।
कहन सुनन को जुदा रहत है सब घट माहीं ॥
चलते चलते पग थका एकौ लगा न हाथ ।
पलटू खोजै पूरबे घर में है जगन्नाथ ॥
( २६५ )
आन को सेंदुर देखि कै तू का फोरै लिलार१ ॥
तू का फोरै लिलार नारि तू बड़ी अनारी ।
तू ना देवै जाय देखि क्या जरै हमारी ॥
तेरे करम में नाहिं देखि क्या सरबर२ करती ।
चलि जा अपनी राह सोच में नाहक परती ॥
जेकँ है चाहै पीव ताहि को करै सोहागिनि ।
समुझ आपनी चूक नारि तू बड़ी अभागिनि ॥
पलटू सेवै साधु को तब रीझै करतार ।
आन को सेंदुर देखि कै तू का फोरै लिलार ॥
( ६६ )
पलटू पारस नाम का मनै रसायन होय ॥
मनै रसायन होय करै या तन की सीसी ।
संपुट दै गुरु ज्ञान बिस्वास दवाई पीसी ॥
दसौ दिसा से मूँदि जोग की भाठी बारै ।
(१) माथा । (२) हिसका ।
पलटू साहिब की बानी भाग—१ १०७
तेहि पर देहि चढ़ाय ब्रह्म की अगिन से जारै ॥
ईंधन लावै ध्यान प्रेम रस करै तयारी ।
सबद सुरति के बीच तहाँ मन राखै मारी ॥
जड़ि बूटी के खोजते गई सिध्याई खोय ।
पलटू पारस नाम का मनै रसायन होय ।
( २६७ )
कहत फिरत हम जोगी, पक्का दुइ सेर खाय ॥
पक्का दुइ सेर खाय, कहै मैं बड़का जोगी ।
सोवै टाँग पसारि, देखत कै बड़ा बिरोगी ॥
हृष्ट पुष्ट होइ रहै, लड़न को नाहीं माँदा¹ ।
काम क्रोध और मोह, करत हैं बाद बिबादा ॥
पलटू ऐसा देखि कै, मुँह ना राखी लाय ।
कहत फिरत हम जोगी, पक्का दुइ सेर खाय ।
( २६८ )
जल पषान को छोड़ि कै पूजौ आतम देव ॥
पूजौ आतम देव खाय औ बोलै भाई ।
छाती दैकै पाँव पथर की मुरत बनाई ॥
ताहि धोय अन्हवाय बिंजन लै भोग लगाई ।
साच्छात भगवान द्वार से भूखा जाई ॥
काह लिये बैराग झूँठ के बाँधे बाना ।
भाव भक्ति की मरम है कोइ बिरले जाना ॥
पलटू दोउ कर जोरि कै गुरु संतन को सेव ।
जल पषान को छोड़ि कै पूजौ आतम देव ॥
(१) थका या निर्बल ।
॥ इति ॥
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