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निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

अथ नवमोध्यायः ॥६॥
प्रथमः पादः
( खं० १ )
( अथ षट् त्रिंशत् (३६) पदानि )
निघ०-अश्वः ॥१॥ शकुनिः॥२॥ मण्डू-
काः ॥३॥ ऋताः ॥४॥ ग्रावाणः ॥५॥
नाराशंसः ॥६॥
निरु०-अथ यानि पृथिव्यायतनानि सत्त्वानि
स्तुतिं लभन्ते तानि अतोऽनुक्रमिष्यामः ।
तेषाम्-‘अश्व’ प्रथमागामी भवति ।
‘अश्वो’ व्याख्यातः । तस्य एषा भवति ॥१॥
अर्थः-“अथ०” यहांसे जो पृथिवी स्थान = पृथिवी में रहने
वाले सत्त्व = द्रव्य स्तुति को प्राप्त होते हैं, उनको यहां से
आगे अनुक्रमण करेंगे = क्रम २ से कहेंगे ।
उनमें ‘अश्व’ स्वभाव से पहिले आने वाला है ।
‘अश्व’ यह पद व्याख्यान किया जाचुका [ अ० २ पा० ७
खं० ५ ] ॥ उसकी यह ऋचा है- ॥१॥
व्याख्या
‘अथ” यह अधिकार वचन है । पूर्व आप्री देवताओं से
यह ‘अश्व आदि (३६) द्रव्य विलक्षण हैं- भिन्न प्रकार हैं
इससे इनका अलग अधिकार कियागया ।

हिन्दी निरुक्त ( २७२ ) ६ अ० १ पा० १ खं०
इनकी भी मन्त्रों में स्तुति आती है, इस लिये इनकी
समाम्नाय में गणना की गई है ।
पृथिवी में रहने वाले हैं, इस लिये पृथिव्यायतन देवता-
ओं के गणमें इनका पाठ है ।
पृथिवी स्थान के सादृश्य से इन्हीं के भीतर सर्प लाङ्गल
और कुषुम्भक आदि भी समझने चाहिएं । क्यों कि- इनकी
भी मन्त्रों में स्तुति आती है ।
यहां पर शब्दों के पाठ का क्रम अर्थस्वभाव = वस्तु-
स्वभाव से अङ्गीकार किया हुआ है ।
क्रम की व्यवस्था होने पर मुख्य का परित्याग न्याय-
सङ्गत नहीं है । इसी से आचार्य कहता है- “तेषामश्वः
प्रथमागामी०” ।
'अश्व' क्यों प्रथम है ? पुरुष के बाद इसका जन्म है-
“तस्या आहुत्याः पुरुषोऽजायत, द्वितीयामजु-
होत् ततोऽश्वोऽजायत” अर्थात्- 'उस आहुति से पुरुष
हुआ, दूसरी का होम किया उससे अश्व हुआ' यह ब्रा० वा-
क्य है । और विशेष प्रकार के "अश्वमेध" कर्म में इसका
विशेष अङ्गभाव = उपयोग है । इस कारण भी औरों की
अपेक्षा यह मुख्य है ।
“अश्वो व्याख्यातः” वहां पर अश्नुते अध्वानम्”
मार्ग को व्यापन करता है, “महाशनो भवतीतिवा”
अथवा बड़ा भोजन करने वाला है, इससे यह 'अश्व' है ।
ऐसी व्याख्या की गई है ॥१॥

हिन्दी निरुक्त ( २०३ ) ६ अ० १ पा० २ खं०
(खं० २)
निरु०- "अश्वो वोळ्हा सुखं रथं हसनामुप-
मन्त्रणः । शेपो रोमण्वन्तौ भेदौ वारिन्मण्डूक
इच्छतीन्द्रायेन्दो परिस्रव ॥" [अ०७ अ०५ व२५] ॥
अश्वो वोळ्हा सुखं वोळ्हा रथं वोढा ।
'सुखम्' इति कल्याणनाम । कल्याणं पुण्यं
सुहितं भवति । सुहितं गम्य (मय) ति इतिवा
हसै िसि ता वा । [पातावा । पालयितावा ।]
शेपम्- ऋच्छति- इति ।
'वारि' वारयति ।
"मानो" व्याख्यातः ॥
तस्य- एषा (अपरा) भवति ॥२॥
(खं० ३)
"मानो मित्रो वरुणो अर्यमायुरिन्द्र ऋभुक्षा
मरुतः परिख्यन् । यद्वाजिनो देवजातस्य सप्तेः
प्रवक्ष्यामो विदथे वीर्याणि ॥" [ऋ० सं०२,३,७,१]॥
यद् वाजिनो दैवै र्जातस्य 'सप्तेः' सरणस्य प्रव-
क्ष्यामो यज्ञे 'विदथे' वीर्याणि, मानः त्वं मित्रश्च
वरुणश्च अर्यमाच 'आयु'श्च वायुः अयनःइन्द्रश्च
उरुक्षयणः । ऋभूणां राजा- इतिवा । मरुतश्च
परिख्यन् ॥

हिन्दी निरुक्त ( २०४ ) ६ अ० १ पा० ३ खं
'शकुनिः' शक्नोति उन्नेतुम्- आत्मानम् ।
शक्नोति नदितुम् इतिवा । शक्नोति तक्तितुम्-
इतिवा । सर्वतः शङ्करः अस्तु-इतिवा शक्नोतेर्वा ॥
तस्य एषा भवति- ॥३॥
अर्थः- “अश्वो वोल्हा” हे 'इन्दो' सोमः 'मन्त्रियाः'
(मन्त्रप्रतिपाद्यस्य इन्द्रस्य) मन्त्र से प्रतिपादन करने योग्य
इन्द्र देव का 'अश्वः' घोड़ा 'सुखम्' सुखसे 'रथम्' रथ को
वोल्हा (वोढा) खेंचने वाला 'हसनाम्' (हसिताम् = इसनशी-
लाम्) हिनसने वाली (घोड़ी) को 'उप' (श्लिष्य) आलिङ्गन
करके = उसके साथ चिपटकर 'शेपः' (शेपम्- ऋच्छति) पुरुष
चिन्हको प्राप्त होता है प्रचलित करता है । 'भेदौ' उस अश्वके
दो भेद हैं [क्यों कि- “हरी इन्द्रस्य” 'इन्द्र के 'हरि' नाम
वाले या हरे दो घोड़े हैं' यह निघ, अ० १ खं० १५ में कहा है।]
या वे दो शत्रुओं के भेदन करने वाले हैं, और 'रोमशवन्तौ'
सांड हैं । (क्यों कि- “लोमशः पुरुषः स्मृतः” लोम =
रोम = लिङ्ग इन्द्रिय वाला पुरुष होता है, यह पुरुष का लक्षण
है ।) 'मण्डूकः' मेंढक 'वारित' (वारि) जल को 'इच्छति'
चाहता है । अर्थात्- अश्व का रथ के लेचलने का सामर्थ्य
और मेंढक की प्यास का मिटना वर्षा के द्वारा तेरे अधीन
है । इस कारण हे सोम (त्वम्) तू 'इन्द्राय' इन्द्र के लिये 'परि-
स्रव' झर । प्रयोजन यह कि-हे सोम तेरे झरने से यज्ञ होगा,
यज्ञ से वृष्टि, और वृष्टि से घास अन्न आदि । इस प्रकार

हिन्दी निरुक्त (२०५) ६ अ० १ पा० ३ खं०
केवल जल से जीने वाले तथा तृण आदि से जीने वाले सभी
प्रकार के प्राणियों का उपकार तेरे अधीन है। अतः तू क्षम।
[यह सोम से प्रार्थना है।] ॥
दूसरी व्याख्या- 'मन्त्रिणः' (मन्त्रवतः यजमानस्य) दीक्षा
प्राप्त यजमान का 'अश्वः'घोड़ा 'हसनाम्' (हसनवतीं यजमान-
पत्नीम्) हँसती हुई यजमान की पत्नी को 'उप' (श्लिष्य)
समीप में लग कर 'शेपम्' चिन्ह को 'ऋच्छति' प्राप्त होता
है या प्रचलित करता है। और सब उक्त प्रकार से है। इस
अर्थ में "अश्वमेध" यज्ञ में यजमान पत्नी और अश्व के
संबन्ध को लेकर जो क्रिया होती है उसका स्मरण होता है
जैसा कि- [का०२०, ६, १६- ] "अश्व शिश्नमुपस्थे
कुरुते वृषावाजीति" ॥
'सुख' यह कल्याण का नाम है। 'कल्याण' पुण्य होता
है। 'सुख' क्यों ? वह सुहित = सुन्दर हित होता है। अथवा
सुहित को प्राप्त कराता है। (पहिले पक्षमें 'सुख' नाम सुख
का ही है और दूसरे पक्षमें सुख के साधन का नाम सुख है।)
'हसना' क्या ? हसिता = हँसने वाली। (अथवा पाता =
पालयिता या रक्षा करने वाला।)
'वारि' क्यों ? वह 'वारयति' तृषा = प्यास को बुझा-
ता है।
"मानो व्याख्यातः" [ यह अपपाठ है । ]
"तस्य०" उस (अश्व) की (और) यह ऋचा है ॥२॥
व्याख्या।
इस खण्ड की जो व्याख्या ऊपर की गई है, वह यथा

हिन्दी निरुक्त ( २०६ ) ६ अ० १ पा० ३ खं०
संभव सबके अक्षरों के सहारे पर है। इस की व्याख्या भग-
वद्दुर्गाचार्य की टीका में भी नहीं मिलती है, किन्तु इस से
यह प्रक्षिप्त नहीं समझा जासकता, कारण इस का प्रतीक इसी
अध्याय के खण्ड सूत्र में वर्त्तमान है। सर्वथा खण्ड का होना
प्रमाणित होता है। भगवद् दुर्गाचार्य की व्याख्या के न होने
का कारण यह भी हो सकता है कि वर्त्तमान के समान उनके
समय में भी इस खण्ड का पाठ अस्तव्यस्त रहा हो और
उन्होंने इस की व्याख्या की उपेक्षा करदी हो।
मं० “ह्मनामुपमन्त्रिणः शेपः” भा०- “शेपमृ-
च्छति” पहिले मन्त्र खण्ड के ‘मन्त्रिणः’ पदको ‘रथम्’ के
साथ जोड़ा जासकता है,जिससे मन्त्रिणः रथं वोढा' मन्त्री =
मन्त्र का आराध्य देव = इन्द्र के अथवा मन्त्रवान् यजमान के
रथको खैंचने वाला (अश्व) ऐसी योजना होजाती है।
और ‘शेपः’ इस प्रथमान्त को ‘शेपम्’ द्वितीयान्त करके
‘ऋच्छति’ पद का भाष्यकार ही अध्याहार करते हैं, तदनु-
सार ‘हसनाम्-उप (श्लिष्य) शेप. = शेपम् ऋच्छति’—
ह्मना = ह्सनशीला-हिनसने वाली (घोड़ी) को आलिङ्गन
करके शेप (पुरुष चिन्ह) को प्राप्त होता है। क्योंकि उसके
संगसे ही उसका चिन्ह बढ़ता है, और वही उस की प्राप्ति
भी है। नीचे भाष्य में इसी ‘हसना’ पद का ‘हसिता’ पद
से निर्वचन भी किया है, जो ‘हसित’ शब्द का स्त्रीलिङ्ग में
संभव है। मूलपाठ में ‘हसेता’ पद है, वह ‘हसिता’ से ही
बिगड़ा हुआ हो सकता है। उसके आगे जो ‘पाता’ और
‘पालयिता’ ये दो पद निर्वचन सूत्र में हैं, वे अन्य पदों की

हिन्दी निरुक्त (२०७) ६ अ० १ पा० ३ खं०

व्याख्या टूट कर के लेखक के अज्ञान से यहां आए हुये हो
सकते हैं। क्योंकि-स्त्रीलिङ्ग का निर्वचन पुंल्लिङ्ग पदसे नहीं
हो सकता और न उनके अर्थ की संगति ही होती है।
पूर्व खण्ड के अन्तमें-“अश्वो व्याख्यातस्तस्यैषा
भवति”।
इस द्वितीय खण्ड के अन्त में-“मानो व्याख्यातः
तस्य एषा भवति”।
तीसरे खण्ड के आदि में-“मानो मित्रो०” (मन्त्र)
पाठ है।
इन तीनों पाठों में पहिले को यथास्थित, और दूसरे के
स्थान में 'तस्य एषा अपरा भवति' ऐसा पढ़ने से तीसरा पाठ
स्वयम् समन्वित होता हुआ दिखाई देता है। क्योंकि-दूसरी
ऋचा (मानो मित्रो०) भी अश्वकी ही स्तुति में है।
प्रयोजन यह कि-जब नवमाध्याय के खण्डसूत्र में “अ-
श्वो वोढा” इस खण्ड प्रतीक को प्रमाण मानते हैं, तब
“अश्वो वोढा” इस द्वितीय खण्ड से “पाता वा पा-
लयितावा तथा “मानो व्याख्यातः” इन दोनों पाठों
को अलग करके और “तस्यैषा भवति” इसके स्थान में
'तस्यैषाऽपरा भवति' ऐसा सुधार करके उक्त खण्ड (निरु०
६ अ० १ पा० २ खं०) को पढ़ना चाहिये। एवम् जब भग-
वद्दुर्गाचार्य की टीका का अनुरोध करते हैं, तब इस द्वितीय
खण्ड को ही अलग करके प्रथम खण्ड के अनन्तर तृतीय खण्ड
को ही पढ़ेंगे।

हिन्दी निरुक्त ( २०८ ) ३ अ० १ पा० ३ खं०
“पातावा\पालयितावा” यह प्रथम अपपाठ लेखक की
भ्रान्ति से प्रक्षिप्त हुआ प्रतीत होता है। और “मानोव्या-
ख्यात स्तस्यैषा भवति” यह किसी दुर्बुद्ध पुरुष के द्वारा
सुधारा हुआ प्रतीत होता है। क्यों कि नतो उसने निघण्टु
के मूल पाठ ही पर ध्यान दिया और न इस शब्द का जो
उसने निगम समझा है “मानो मित्रो वरुणः” इत्यादि
मन्त्र, उसके अर्थ को ही समझा, किन्तु उसने अपनी अदीर्घ
बुद्धि से “अश्वो व्याख्यातस्तस्यैषा भवति”—
“अश्वो वोढा” इसकी तुकबन्धी को देख कर तथा
“मानो मित्रो वरुणः” इस ऋचा को अनुपयुक्त देख कर
सोचा कि–पूर्व निर्दिष्ट ऋचा के आद्य शब्द के लिये जैसा
लिखा हुआ है, वैसाही इस दूसरे मन्त्र के आद्य शब्द (मानः)
के लिये भी क्यों न हो ? यदि वह निघण्टु की ओर दृष्टि ले
जाता, तो निघण्टु मे ‘अश्वः’ शब्द के अनन्तर ‘शकुनिः’ यह
दूसरा शब्द है, उसकी व्याख्या– ‘शकुनिः शक्नोत्युन्नेतुम्’–
इत्यादि ग्रन्थ से आगे करही रखी है। यदि मन्त्रार्थ पर ध्यान
देता, तो “मानः” यह कोई देवता का नाम नहीं और
न प्रकृत ग्रन्थ में प्रसक्त तथा प्रसक्तानुप्रसक्त ही है, जिस से
कि–इसकी व्याख्या अपेक्षित होती । बल्कि– ‘मानः’ ये दो
शब्द हैं पहिला ‘मा’ (मत) और दूसरा ‘नः’ (हमको) । इस
प्रकार यहां पर ‘मानः’ यह कोई एक शब्द नहीं होता ।
तथा यदि मन्त्र के अर्थ पर ही ध्यान देता तो मन्त्र में अश्व
की ही स्तुति है और वह अश्व का ही निगम बनता है ।

हिन्दी निरुक्त ( २०६ ) ६ अ० १ पा० ३ खं०
एवम् दूसरे खण्ड के अन्तिम वाक्य “तस्यैषा भवति” में,
प्रथम खण्ड के अन्तिम वाक्य “तस्यैषा भवति” में
“अश्वावोल्हा” की भांति “मानो मित्र” की संगति
नहीं होती क्योंकि इस मन्त्र का उसकी बुद्धि के अनुसार
अर्थ ही नहीं है यह तो अश्व स्तुतिका मन्त्र है इससे यही
प्रतीत होता है कि यह उसने अपनी ही बुद्धि से परिकल्पन
कर निष्फल मनघडन्त वाक्य जोड़ दिया है।
यद्यपि “मानो मित्रः” इस मन्त्र में ‘अश्व’ शब्द
स्वयम् नहीं है, जिस से उसके साथ इस मन्त्र के सम्बन्ध
विच्छेद की आपत्ति हो सकती है, तथापि ‘वाजिनः’ और
‘सप्तेः’ ये दो पद मन्त्र में अश्व के ही प्रत्यक्ष बोधक हैं, अतः
पूर्वोक्त आपत्ति को अवसर नहीं मिल सकता ।
हां यह निश्चय करना यहां बहुत कठिन न होगा, कि
‘मानो व्यारुधोतः’ इस पाठ को प्रक्षिप्त करने वाले के साम्हने
“अश्वो वोढा” यह दूसरा खण्ड अवश्य था । अर्थात्-इस
द्वितीय खण्ड की सृष्टि के अनन्तर ही उसकी बुद्धि को यह
प्रवेश मिला। अन्यथा एक ‘तस्यैषा’ पाठके होते हुए वह दूसरा
वैसा ही पाठ अव्यवहित देश में धर नहीं सकता था ॥२॥
“मानो मित्रः” इसका दीर्घतमा ऋषि है। अश्व का
ही आवाहन इस सूक्त में किया गया है ॥
‘यद्’ (यदा) जब (वयम्) हम ‘देवजातस्य’ (देवैर्जातस्य)
देवताओं से उत्पन्न ‘सप्तेः’ (सरणस्य) चलने वाले ‘वाजिनः’
घोड़े के ‘वीर्याणि’ गुणों को ‘विदथे’ (यज्ञे) यज्ञ में ‘प्रव-

हिन्दी निरुक्त (२१०) ६ अ० १ पा० ४ खं०
वयामः' कहें, तो 'नः' हमें (त्वम्) तू 'मित्रः' मित्र 'वरुणः',
वरुण 'अर्यमा' 'आयुः' (वायुः) वायु 'ऋभुक्षाः' अन्तरिक्ष में
रहने वाला अथवा देवताओं का राजा 'इन्द्रः' इन्द्र और 'मरु-
तः' मरुत् ये सब 'मा-परिख्यन् (प्रत्याचक्षीरन्) न रोकें'।
'आयुः' क्या! वायु। कैसे वह अयन होता है-चलने वाला
होता है। यहां 'व' कार के लोप से 'वायु' का 'आयु' है।
'ऋभुक्षाः' क्या ? 'उरुक्षयणः' या उरु = अन्तरिक्ष में
क्षयण = रहने वाला होता है। निवास अर्थ में 'क्षि' (तु० प०)
धातु से है। अथवा ऋभुओं का = देवताओं का राजा 'ऋभु-
क्षाः' होता है। यहां 'ऋभु' पूर्व पद है, और ऐश्वर्य अर्थ में
'क्षि' धातु उत्तर पद ।
'शकुनि' (२) (पक्षी) क्यों ? 'शक्नोति' सकता है-अपने
को ऊपर की ओर ले जाने को। अथवा 'शक्नोति' सकता
है-शब्द करने को। अथवा 'शक्नोति' सकता है-कष्ट से जीने
को। अथवा “सर्वतः शंकरोऽस्तु” 'सब ओर कल्याण का
करने वाला हो'इस वाक्य का संक्षेप 'शकुनि' शब्द है। अथवा
फिर सकने अर्थ में 'शक्' (स्वा० उ०) धातु से है। क्यों कि-
क्या वह सकता है, जो उसके सकने योग्य हो। यह 'शकुनि'
शब्द इन पांचों व्याख्यानों में-(१)'शक्' (धा०)'नी' (धा०)
(२) 'शक्' (धा०) 'नद्' (धा०) (३) 'शक्' (धा०) 'तक्' (धा०)
(४) 'शम्' (अव्यय) 'कृ' (धा०) (५) 'शक्नोति' से बनता है।
“तस्य०” उसकी यह ऋचा है ॥३॥
(खं० ४)
निघ०-“कनिक्रदज्जनुषं प्रब्रुवाण इयर्त्ति वाच-

मरितेव नावम् । सुमङ्गलश्च शकुने भवासि मा
त्वा काचिदभिभा विश्व्याविदत् ” ॥ ( ऋ० सं०
२, ८, ११, १) ॥
न्यक्रन्दीत् जन्म ब्रुवाणः, यथा अस्य शब्दः
तथा नाम ईरयति वाचम्, ईरयिता-इव नावम्,
सुमङ्गलश्च शकुने ! भव कल्याणमङ्गलः ।
‘मंगलं’ गिरते गृणात्यर्थे । गिराति-अनर्थान्-
इतिवा ।
‘अंगलम् ' अंगवत् ।
‘मज्जयति पापकम्' इति नैरुक्ताः ।
मां गच्छतु-इति वा ।
मा चत्वा काचिद्-अभिभूतिः सर्वतो विदत् ॥
गृत्समदम्- अर्थम्-अभ्युत्थितं कपिञ्जलःअभि-
ववाशे ।
तदभिवादिनी एषा ऋग् भवति-॥४॥
अर्थः-“कनिक्रदज्जनुषम्” इस ऋचा का गृत्समद
ऋषि है । शकुनि = सौन चिड़ा के शब्द को सुनकर इसका
जप किया जाता है ॥
हे ‘शकुने ? ’ ‘जनुषम्’ (अभिजातिम्) अपने कुल (खान
दान) को ‘ब्रुवाणः’ बताता हुआ जैसा (तू) ‘कनिक्रदत् ’
बार २ कूकता है ‘अरिता (ईरयिता = नाविकः) मल्लाह

हिन्दी निरुक्त ( २१२ ) ६ अ० १ पा० ४ खं०
'नावम्-वृक्ष' नाव को जैसे 'वाचम्' वाणी को 'ईयत्ति' प्रेरणा
करता है- (यथा अस्य शब्दः तथा नाम ईरयति वाचम्) जैसा
इसका शब्द है, वैसे ही वाणी को चलाता है-जैसी सुन्दर
सुरीली बोली = आवाज है, वैसा ही शुभ अर्थ उसमें कहता
है। हे सौन चिड़ी ? ( त्वम् ) तू 'सुमङ्गलः' (कल्याणमङ्गलः )
कल्याण मङ्गल के देने वाली 'भवासि' (भव) हो । और हम
भी तेरे लिये ऐसा चाहते हैं-'त्वा' तुझे ' काचित् ' कोई
'अभिभा' (अभिभूतिः) तिरस्कार 'विश्वतः' ( सर्वतः ) कहीं
से भी 'मा' मत 'विदत्' (विन्दतु) आवे ॥
'मङ्गल' कैसे ? ' गृणाति' ( उगीरता है) (आलाप करता
है) के अर्थ में ' (तु० प०) गृधातु से है। जब कभी कोई
आनन्दमग्न ( मस्त ) होकर बिना किसी अर्थ के स्वर का
आलाप करता है-रागता है, वह शब्द कार्य के आरम्भ में
मङ्गलदायक समझाजाता है ।
अथवा वह अनर्थों को निगल जाता है, इससे 'मङ्गल' है ।
अथवा ' अङ्गल ' शब्द ' म' जुड़ने से मङ्गल होता है ।
'अङ्गल' क्या ? अङ्गवाला । 'अङ्ग' शब्द से मत्वर्थ ( वाला
अर्थ ) में ' र प्रत्यय होता है, और उस ' र ' का 'ल' बदल
जाता है (जैसा कि व्याकरण में माना हुआ है)। दही,
मधु, और अक्षत आदि मगल के अंग हैं। उन्ही से वह अंग
वाला होकर 'मगल' कहा जाता है ।
'मज्जयति' ( डुबा देता है, अनर्थ को ) इससे मंगल '
है, यह नैरुक्त आचार्य जानते है । इस मतमें 'मज्जन' क्रिया
से 'मंगल' शब्द बनता है ।

[Header] हिन्दी निरुक्त ( २१३ ) ६ अ० १ पा० ५ खं०
अथवा 'मां गच्छतु' (मुझे यह मिले) वाक्य से 'मंगल'
शब्द निकला ॥
“गृत्समदम०” गृत्समद ऋषि किसी समय किसी कार्य को
सिद्धकरने के लिए उठे और उठते हुए उनको कपिञ्जल = सौन
चिड़ीने उनकी सिद्धि को कहते हुए संमुख शब्द किया । उसी
अर्थ को कहने वाली यह ऋचा है उसी की प्रशंसा में ऋषि
को यह ऋचा दिखाई दी ॥ ४ ॥
( खं० ५ )
निघ०- "भद्रं वद दक्षिणतो भद्र मुत्तरतो वद ।
भद्रं पुरस्तान्नो वद भद्रं पश्चात्कपिञ्जलः ॥”
( ) ॥ इति सा निगदव्याख्याता ॥
'गृत्समदः' गृत्समदनः ।
'गृत्स' इति मेधाविनाम । गृणातेः स्तुति-
कर्मणः ॥
'मण्डूकाः' मज्जुकाः । मज्जनात् । मदते र्वा
मोदतिकर्मणः । मन्दतेर्वा तृप्तिकर्मणः ।
'मण्डयतेः' इति वैयाकरणाः ।
'मण्डः एषाम्-ओकः' इति वा ।
'मण्डः' मदेर्वा । मुदेर्वा ।
तेषाम्-एषा भवति-॥ ५ ॥
अर्थः- “भद्रं वद” । शकुनि [पक्षी] किसी दिशा में

हिन्दी निरुक्त ( २१४ ) ६ अ० १ पा० ६ खं०
शुभ होता है, और किसी में अशुभ सो ही ऋषि कहता है-
हे शकुने ! ( त्वम् ) ( जो ) तू 'कपिञ्जलः' 'कपिञ्जल'
जातीय पक्षी हैं, सो 'दक्षिणतः' दाहिनी ओर 'भद्रम्' शुभ
'वद' बोल । 'उत्तरतः' बाईं ओर 'भद्रम्' शुभ 'वद' बोल ।
'नः' हमारे लिये 'पुरस्तात्' सोम्हने 'भद्रम्, शुभ 'वद' बोल।
'पश्चात् ' पीठ पीछे 'भद्रम्' कुशल बोल ॥
यह ऋचा अपने शब्दों से ही अपने अर्थ को कह रही है।
'गृत्समद्' क्या ? गृत्समदन । 'गृत्स' यह मेधावी =
धारणा वाली बुद्धि वाले का नाम है। स्तुति अर्थ में 'गृ'
(क्र्या० प०) धातु से है। अर्थात्- जो मेधावी हो। और
मद या मदन = हर्ष वाला हो वह 'गृत्समद्' होता है ॥
'मण्डूकाः' (३) यह निर्वचन करना है--
'मण्डूक' क्या ? मज्जुक । 'मज्जुक' क्यों ? मज्जन से-
डूबने से । क्यों कि- वे जल में डूबते रहते हैं। अथवा-
मोद् अर्थ में 'मद्' (भ्वा० प०) धातु से हैं। क्यों कि वे सदा
ही मोद युक्त रहते हैं। अथवा- तृप्ति अर्थ में 'मन्द' (भ्वा०
आ०) धातु से हैं। क्यों कि- वे सदा ही तृप्त रहते हैं।
अथवा- 'मण्ड' (चु०उ०) धातु से हैं- ऐसा वैयाकरण मान-
ते है। अथवा- 'मण्ड' (जल) में उनका 'ओकः' (स्थान) हो-
ता है, इससे वे 'मण्डूक' हैं।
'मण्ड' कैसे ! अथवा- 'मद्' धातु से है। अथवा 'मुद्'
धातु से है।
उन (मण्डूको) की यह ऋचा है-- ॥५॥
(खंड६)
निरु०-“संवत्सरंशशयाना ब्राह्मणा व्रतचारिणः।

हिन्दी निरुक्त ( २१५ ) ६ अ० १ पा० ६ खं०
वाचं पर्जन्यजिन्वितां प्रमण्डूका अवादिषुः ॥
[ऋ० सं० ५, ७, ३, १] ॥
संवत्सरं शशयाना ब्राह्मणा व्रतचारिणः– अब्रु-
वाणाः । अपि वा उपमार्थे स्यात्— ब्राह्मणा इव
व्रतचारिणः– इति । वाचं पर्जन्यप्रीतां प्रावादिषुः
मण्डूकाः ॥
अर्थः– "संवत्सरम्०" इस ऋचा का वसिष्ठ ऋषि है।
'संवत्सरम्' वर्ष भर 'शशयानाः' (शिश्यानाः) न बोलने
से सोये हुये जैसे 'ब्राह्मणाः' (ब्रुवाणाः सर्वथा सन्तो वक्तुम्)
सब प्रकार से बोलने वाले होकर भी 'व्रतचारिणः' (अब्रुवाणाः)
मौनी रहते हुये— अथवा (ब्राह्मण शब्द) उपमा अर्थ में हो–
ब्राह्मणों के समान व्रतधारी रहते हुये [जिस प्रकार ब्राह्मण
वर्षा में उपाकर्म करके हाथ में पवित्र धारण करके मेखला =
मूंज आदि विहित द्रव्य की तागड़ी पहिन कर नियत समय
तक वेद की वाणी को बोलते रहते हैं, वैसे ही] 'मण्डूकाः'
मेंढक 'पर्जन्यजिन्विताम्' मेघ से तृप्त हुई 'वाचम्' वाणी को
'प्र-अवादिषुः' (वदन्ति) बोलते हैं ॥
व्याख्या– उक्त निगम में भाष्यकारने 'ब्राह्मण' शब्द
से यौगिक वृत्ति ˙ ब्रुवाण (बोलने वाला) अर्थ तथा रूढिवृत्ति
से ब्राह्मण जातीय अर्थ लेकर व्याख्या धर्म का परिदर्शन किया
है। अर्थात्– मन्त्रों में प्रमाण के अविरुद्ध एक शब्द के नाना
अर्थ परिकल्पित करने में भी कोई हानि नहीं होती।
निरु०– वसिष्ठो वर्षकामः पर्जन्यं तुष्टाव । तं

हिन्दी निरुक्त ( २१६ ) ६ अ० १ पा० ७ खं०
मण्डूकाः अन्वमोदन्त । स मण्डूकान् अनुमोदमा-
नान् दृष्ट्वा तुष्टाव ।
तदभिवादिनी एषा ऋग् भवति- ॥६॥
अर्थ:- वसिष्ठ ऋषि ने वर्षा की कामना से पर्जन्य (मेघ)
की स्तुति की । मण्डूकों ने (मेंढकों ने ) उसका अनुमोदन
किया = सराहा । उस ऋषि ने अनुमोदन करते हुये मण्डकों
को देखकर स्तुति की ॥
उसको कहने वाली यह ऋचा है-॥६॥
(खं० ७)
निरु०- "उप प्रवद मण्डूकि वर्ष मावद तादुरि ।
मध्ये ह्रदस्य प्लवस्व विगृह्य चतुरः पदः ॥”
[ ] इति सा निगदव्याख्याता ।
'अक्षाः' अश्नुवते एनान्- इतिवा। अभ्यश्नुवते
एभिः- इतिवा ।
तेषाम्- एषा भवति- ॥७॥
अर्थ- "उप प्रवद" हे 'मण्डूकि !' हे मेंढकी ! (त्वम्)
तू (मा) मेरे (उप) (गम्य) पास होकर 'प्रवद' खूब बोल 'वर्षम्'
वर्ष भर 'आ' सामने होकर 'वद' बोल 'तादुरि' हे तैरने
के स्वभाव वाली । 'ह्रदस्य' तलाव के 'मध्ये' बीच में 'चतुरः'
चारों 'पदः' पैरों को 'विगृह्य' फैलाकर 'प्लवस्व' तैर ।
यह ऋचा अपने उच्चारण से ही व्याख्यान की हुई है ।
'अक्षाः (४) (पासे) यह निर्वचन करने योग्य है ।
'अक्ष' क्यों ? 'अश्नुवते एनान्' जुवारिये इन्हें हाथों से

हिन्दी निरुक्त (२१७) ६ अ० १ पा० ८ खं०
अशन (व्यापन) करते हैं। अथवा इससे ज्वारिये दूसरे जुवा-
रिये से धन को अशन करते हैं- लेते हैं ।
उन (पासों) की स्तुति करने वाली यह ऋचा है- ॥७॥
(खं० ८)
निरु०- "प्रावेपा मा बृहतो मादयन्ति प्रवातेजा
इरिणे वर्वृतानाः । सोमस्येव मौजवतस्य भक्षो
विभीदको जागृविर्मह्यमच्छान्॥"[अ०७अ०८व३]
प्रवेपिणो मा महतो विभीदकस्य फलानि माद-
यन्ति । प्रवातेजाः प्रवणेजाः । इरिणे वर्त्तमानाः।
'इरिणं' निर्ऋणम् । ऋणातेः । अपार्णं भवति
अपरता ओषधयः अस्मात्- इतिवा ।
सोमस्येव मौजवतस्य भक्षः ।
'मौजवतः' मूजवति जातः ।
'मृजवान्' पर्वतः । मुञ्जवान् ।
'मुञ्जः' विमुच्यते इषीकया ।
'इषीका' इषतेर्गतिकर्मणः । इयमपि 'इषीका'
एतस्मादेव ।
'विभीदकः' विभेदनात् ।
'जागृविः' जागरणात् ।
मह्यम्- अचच्छत् । प्रशंसति एनान् प्रथमया
निन्दति उत्तराभिः, ऋषेः अक्षपारिचनस्य एतद्-

आर्षं वेदयन्ते ॥
'ग्रावाणः' हन्तेर्वा । गृणातेर्वा । गृह्णातेर्वा ॥
तेषाम्-एषा भवति- ॥ ८ ॥
अर्थः- "प्रावेपाः" यह ऋचा अक्षपुत्र मौजवंत ऋषि
की है ।
[ एते अक्षाः-] ये अक्ष या पासे 'प्रावेपाः' ( प्रवेपिणः )
बहुत कांपने वाले 'बृहत्तः' ( महतःवृक्षस्य ) बड़े वृक्षके हैं-
किसी बहुत कांपने वाले वृक्षसे उपजे हैं = बने हुए हैं। 'प्रवाते-
जाः' ( प्रवणोजाः ) बहुत वायुके या जलके स्थान में या काल
में उत्पन्न हुये हैं । 'इरिणे' (अपगतर्णे ) जहां पुत्र पौत्र आदि
तक ऋण नहीं जाता, किन्तु अपने तक ही रहता है, ऐसे
स्थान में उत्पन्न हुए हुए, 'मौजवतस्य' मूजवान् पर्वत में
उत्पन्न हुए हैं, 'सोमस्य' सोमके 'भक्षः-इव' भक्षण के समान
'मा' मुझे 'मादयन्ति' ( हर्षयन्ति ) हर्षित करते हैं अथवा
( तर्पयन्ति ) तृप्त करते हैं । और जो 'विभीदकः' कोष्ठ का
भेदन करने वाला 'जागृविः' जागरण का करने वाला तथा
'मह्यम्' मेरे लिये 'अच्छान् ( अच्छच्छदत् ) (प्रशंसति-एमान् )
इनकी प्रशंसा करता है, ( तस्य विभीदकस्य फलानि )
उस विभीदक वृक्ष के ये फल हैं॥
'इरिण' क्या ? निर्ऋण होता है । (क्योंकि-जूवा के
स्थान में हारने से जो ऋण होता है, वह हारने वाले के पुत्र
पौत्र पर नहीं जाता, किन्तु उस पुरुष तथा उस स्थान में ही
रहता है ।) 'ऋ' ( क्रया०प० ) धातु से है। अथवा 'इरिण'
ऊपर भूमि होती है । क्योंकि-'अपगता ओषधयः अस्मात्'
इससे ओषधि गई हुई होती हैं-इसमें कुछ उपजता नहीं ।

‘मौजवत’ क्या ? मूजवान् में उत्पन्न ।
‘मूंजवान ही क्या ? पर्वत वह क्यों ? मूंजवाला होने से
‘मुञ्ज’ क्यों ? इषीका से (तूली से) सिसोचन की
जाती है ।
‘इषीका’ कैसे ? गति अर्थ में ‘इष’ (तु०प०) धातु से ।
यह इषीका भी इसी से है ।
‘विभीदक’ क्यों ? भेदन करने से ।
‘जागृवि,’ क्यों ? जागरण से । क्योंकि-जो जूवामें हारता
है वह दुःख से जागता है, और जीतता है, वह सुख से =
हर्ष से जागता है ।
पहिली ऋचा से इनकी प्रशंसा करता है, और अगली
ऋचाओं से इसकी निन्दा करता है । इस ऋचा को अक्ष-
परिद्यून (अक्षपुत्र) ऋषि का आर्ष बताते हैं,-अक्षपुत्र ऋषि
इसका ऋषि है, ऐसा कहते हैं ।
‘ग्रावाणः’ (५) (पत्थर) कैसे ? हिंसार्थक ‘हन्’ (अदा०
प०) धातु से हैं । क्योंकि-इनसे हनन किया जाता है । शब्द
अर्थ में ‘गृ’ (क्र्या०प०) धातु से हैं । क्योंकि-इनसे शब्द
होता है अथवा ‘ग्रह’ (क्र्या०प०) धातु से हैं । क्योंकि-ये
कूटने आदि क्रिया के लिये ग्रहण किये जाते हैं ।
उन ग्रावों (पत्थरों) की स्तुति की यह ऋचा है-॥८॥
व्याख्या
“प्रावेपा०” मन्त्र में-जिस वस्तुमें जो गुण या दोष होते
हैं, वे सब प्रायः उसके कारण से ही आए हुए होते हैं, इसी
न्याय से अक्षों के सब गुण दोषों को उनके कारण भूत वृक्ष
में ऋषि देखता है । इन में जो कम्पन मादन जागरण और

हिन्दी निरुक्त ( ३२० ) ६ अ० १ पा० ६ खं०
भेदन आदि धर्म हैं वे सब उनके उत्पत्ति स्थान वृक्षसे आये
हुये हैं, इसी प्रकार संसार की अन्य २ वस्तुओं में या प्रा-
णिश्रों में देखना चाहिये यह मन्त्र का उपदेश है ॥८॥
( खं० ६ )
निरु०-प्रैते वदन्तु प्र॒वयं व॑दाम॒ ग्राव॑भ्यो॒ वाच॑
वदता वदद्भ्यः । यदद्र॑यः पर्वताः साकमाशवः
श्लोकं॒ घोषं॒ भरथेन्द्राय सोमिनः ॥” ( ऋ०सं० ८,
४, २९, १ ) ॥
प्रवदन्तु एते, प्रवदाम वयं, ग्रावभ्यो वाचं वदत
वदद्भ्यः यद्-अद्रयः पर्वताः आदरणीयाः सह
सोमम्-आशवः क्षिप्रकारिणः ।
‘श्लोकः’ शृणोतेः ।
‘घोषः’ घुष्यतेः ।
सोमिनो यूयं स्थ-इतिवा । सोमिनो गृहेषु इतिवा ।
येन नराः प्रशस्यन्ते स ‘नाराशमो’ मन्त्रः ।
तस्य-एषा भवति-॥९॥
अर्थ:-“प्रैते वदन्तु०” इस ऋचा का अर्बुद ऋषि है।
हे ग्रावो ! ( पत्थरों ) ‘यद्’ ( यस्मात् ) जिस से कि
( यूयम् ) तुम ‘अद्रयः’ ( आदरणीयाः ) आदर के योग्य हो,
‘पर्वताः’ ( पर्ववन्तः ) पर्वों वाले हो- ग्रन्थियों वाले हो,
‘साकम्’ ( सह ) साथ मिले हुए ‘आशवः’ ‘सोमम् अश्नीथ’
सोम को अशन करते हो-कूटते हो, और उस सोमको कूटते