निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( २७२ ) ६ अ० १ पा० १ खं०
इनकी भी मन्त्रों में स्तुति आती है, इस लिये इनकी
समाम्नाय में गणना की गई है ।
पृथिवी में रहने वाले हैं, इस लिये पृथिव्यायतन देवता-
ओं के गणमें इनका पाठ है ।
पृथिवी स्थान के सादृश्य से इन्हीं के भीतर सर्प लाङ्गल
और कुषुम्भक आदि भी समझने चाहिएं । क्यों कि- इनकी
भी मन्त्रों में स्तुति आती है ।
यहां पर शब्दों के पाठ का क्रम अर्थस्वभाव = वस्तु-
स्वभाव से अङ्गीकार किया हुआ है ।
क्रम की व्यवस्था होने पर मुख्य का परित्याग न्याय-
सङ्गत नहीं है । इसी से आचार्य कहता है- “तेषामश्वः
प्रथमागामी०” ।
'अश्व' क्यों प्रथम है ? पुरुष के बाद इसका जन्म है-
“तस्या आहुत्याः पुरुषोऽजायत, द्वितीयामजु-
होत् ततोऽश्वोऽजायत” अर्थात्- 'उस आहुति से पुरुष
हुआ, दूसरी का होम किया उससे अश्व हुआ' यह ब्रा० वा-
क्य है । और विशेष प्रकार के "अश्वमेध" कर्म में इसका
विशेष अङ्गभाव = उपयोग है । इस कारण भी औरों की
अपेक्षा यह मुख्य है ।
“अश्वो व्याख्यातः” वहां पर अश्नुते अध्वानम्”
मार्ग को व्यापन करता है, “महाशनो भवतीतिवा”
अथवा बड़ा भोजन करने वाला है, इससे यह 'अश्व' है ।
ऐसी व्याख्या की गई है ॥१॥