निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( २१४ ) ६ अ० १ पा० ६ खं०
शुभ होता है, और किसी में अशुभ सो ही ऋषि कहता है-
हे शकुने ! ( त्वम् ) ( जो ) तू 'कपिञ्जलः' 'कपिञ्जल'
जातीय पक्षी हैं, सो 'दक्षिणतः' दाहिनी ओर 'भद्रम्' शुभ
'वद' बोल । 'उत्तरतः' बाईं ओर 'भद्रम्' शुभ 'वद' बोल ।
'नः' हमारे लिये 'पुरस्तात्' सोम्हने 'भद्रम्, शुभ 'वद' बोल।
'पश्चात् ' पीठ पीछे 'भद्रम्' कुशल बोल ॥
यह ऋचा अपने शब्दों से ही अपने अर्थ को कह रही है।
'गृत्समद्' क्या ? गृत्समदन । 'गृत्स' यह मेधावी =
धारणा वाली बुद्धि वाले का नाम है। स्तुति अर्थ में 'गृ'
(क्र्या० प०) धातु से है। अर्थात्- जो मेधावी हो। और
मद या मदन = हर्ष वाला हो वह 'गृत्समद्' होता है ॥
'मण्डूकाः' (३) यह निर्वचन करना है--
'मण्डूक' क्या ? मज्जुक । 'मज्जुक' क्यों ? मज्जन से-
डूबने से । क्यों कि- वे जल में डूबते रहते हैं। अथवा-
मोद् अर्थ में 'मद्' (भ्वा० प०) धातु से हैं। क्यों कि वे सदा
ही मोद युक्त रहते हैं। अथवा- तृप्ति अर्थ में 'मन्द' (भ्वा०
आ०) धातु से हैं। क्यों कि- वे सदा ही तृप्त रहते हैं।
अथवा- 'मण्ड' (चु०उ०) धातु से हैं- ऐसा वैयाकरण मान-
ते है। अथवा- 'मण्ड' (जल) में उनका 'ओकः' (स्थान) हो-
ता है, इससे वे 'मण्डूक' हैं।
'मण्ड' कैसे ! अथवा- 'मद्' धातु से है। अथवा 'मुद्'
धातु से है।
उन (मण्डूको) की यह ऋचा है-- ॥५॥
(खंड६)
निरु०-“संवत्सरंशशयाना ब्राह्मणा व्रतचारिणः।