निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ३२० ) ६ अ० १ पा० ६ खं०
भेदन आदि धर्म हैं वे सब उनके उत्पत्ति स्थान वृक्षसे आये
हुये हैं, इसी प्रकार संसार की अन्य २ वस्तुओं में या प्रा-
णिश्रों में देखना चाहिये यह मन्त्र का उपदेश है ॥८॥
( खं० ६ )
निरु०-प्रैते वदन्तु प्र॒वयं व॑दाम॒ ग्राव॑भ्यो॒ वाच॑
वदता वदद्भ्यः । यदद्र॑यः पर्वताः साकमाशवः
श्लोकं॒ घोषं॒ भरथेन्द्राय सोमिनः ॥” ( ऋ०सं० ८,
४, २९, १ ) ॥
प्रवदन्तु एते, प्रवदाम वयं, ग्रावभ्यो वाचं वदत
वदद्भ्यः यद्-अद्रयः पर्वताः आदरणीयाः सह
सोमम्-आशवः क्षिप्रकारिणः ।
‘श्लोकः’ शृणोतेः ।
‘घोषः’ घुष्यतेः ।
सोमिनो यूयं स्थ-इतिवा । सोमिनो गृहेषु इतिवा ।
येन नराः प्रशस्यन्ते स ‘नाराशमो’ मन्त्रः ।
तस्य-एषा भवति-॥९॥
अर्थ:-“प्रैते वदन्तु०” इस ऋचा का अर्बुद ऋषि है।
हे ग्रावो ! ( पत्थरों ) ‘यद्’ ( यस्मात् ) जिस से कि
( यूयम् ) तुम ‘अद्रयः’ ( आदरणीयाः ) आदर के योग्य हो,
‘पर्वताः’ ( पर्ववन्तः ) पर्वों वाले हो- ग्रन्थियों वाले हो,
‘साकम्’ ( सह ) साथ मिले हुए ‘आशवः’ ‘सोमम् अश्नीथ’
सोम को अशन करते हो-कूटते हो, और उस सोमको कूटते