निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
पृष्ठ 982, कुल 1282 में से
संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( २१६ ) ६ अ० १ पा० ७ खं०
मण्डूकाः अन्वमोदन्त । स मण्डूकान् अनुमोदमा-
नान् दृष्ट्वा तुष्टाव ।
तदभिवादिनी एषा ऋग् भवति- ॥६॥
अर्थ:- वसिष्ठ ऋषि ने वर्षा की कामना से पर्जन्य (मेघ)
की स्तुति की । मण्डूकों ने (मेंढकों ने ) उसका अनुमोदन
किया = सराहा । उस ऋषि ने अनुमोदन करते हुये मण्डकों
को देखकर स्तुति की ॥
उसको कहने वाली यह ऋचा है-॥६॥
(खं० ७)
निरु०- "उप प्रवद मण्डूकि वर्ष मावद तादुरि ।
मध्ये ह्रदस्य प्लवस्व विगृह्य चतुरः पदः ॥”
[ ] इति सा निगदव्याख्याता ।
'अक्षाः' अश्नुवते एनान्- इतिवा। अभ्यश्नुवते
एभिः- इतिवा ।
तेषाम्- एषा भवति- ॥७॥
अर्थ- "उप प्रवद" हे 'मण्डूकि !' हे मेंढकी ! (त्वम्)
तू (मा) मेरे (उप) (गम्य) पास होकर 'प्रवद' खूब बोल 'वर्षम्'
वर्ष भर 'आ' सामने होकर 'वद' बोल 'तादुरि' हे तैरने
के स्वभाव वाली । 'ह्रदस्य' तलाव के 'मध्ये' बीच में 'चतुरः'
चारों 'पदः' पैरों को 'विगृह्य' फैलाकर 'प्लवस्व' तैर ।
यह ऋचा अपने उच्चारण से ही व्याख्यान की हुई है ।
'अक्षाः (४) (पासे) यह निर्वचन करने योग्य है ।
'अक्ष' क्यों ? 'अश्नुवते एनान्' जुवारिये इन्हें हाथों से