निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
पृष्ठ 967, कुल 1282 में से
संदर्भ में पढ़ेंअथ नवमोध्यायः ॥६॥
प्रथमः पादः
( खं० १ )
( अथ षट् त्रिंशत् (३६) पदानि )
निघ०-अश्वः ॥१॥ शकुनिः॥२॥ मण्डू-
काः ॥३॥ ऋताः ॥४॥ ग्रावाणः ॥५॥
नाराशंसः ॥६॥
निरु०-अथ यानि पृथिव्यायतनानि सत्त्वानि
स्तुतिं लभन्ते तानि अतोऽनुक्रमिष्यामः ।
तेषाम्-‘अश्व’ प्रथमागामी भवति ।
‘अश्वो’ व्याख्यातः । तस्य एषा भवति ॥१॥
अर्थः-“अथ०” यहांसे जो पृथिवी स्थान = पृथिवी में रहने
वाले सत्त्व = द्रव्य स्तुति को प्राप्त होते हैं, उनको यहां से
आगे अनुक्रमण करेंगे = क्रम २ से कहेंगे ।
उनमें ‘अश्व’ स्वभाव से पहिले आने वाला है ।
‘अश्व’ यह पद व्याख्यान किया जाचुका [ अ० २ पा० ७
खं० ५ ] ॥ उसकी यह ऋचा है- ॥१॥
व्याख्या
‘अथ” यह अधिकार वचन है । पूर्व आप्री देवताओं से
यह ‘अश्व आदि (३६) द्रव्य विलक्षण हैं- भिन्न प्रकार हैं
इससे इनका अलग अधिकार कियागया ।