निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
क्योंकि-वह दही बनाने के अर्थ कुछ पकाया जाता है।
और यह दूसरी (लौकिक) 'आशीः' (प्रार्थना = आ-
शीर्वाद) आ (ङ्) उपसर्ग 'शास्' (अदा०प०) धातु से है।
“इन्द्राय गाव आशिरं (दुदुह्रे) ” अर्थात्-‘इन्द्राय
इन्द्रके अर्थ ‘गावः' गोओने ‘आशिरम्' आशिर नामक (प्रयो-
जन वाला) दूध दुहा। यह भी निगम है। और-
“सामे सत्याशीर्देवेषु ” अर्थात्-‘'सा' वह 'मे'मेरी
'सत्या' सच्ची 'आशीः' प्रार्थना 'देवान्' (गम्यात्) देवताओं
के प्रति जावे।' यह भी है। यहां पर आशिषा (प्रार्थना)
ही 'आशीः' शब्द से कही जाती है, क्योंकि उसका देवताओं
के प्रति जाना अभीष्ट है ॥ ४ ॥
( खं० ५ )
निघ०- अजीगः ॥ ३६॥ अमूरः ॥३७॥
शशमानः ॥ ३८ देवोदेवाच्या कृपा ॥३९
निरु०- “यदा ते मर्त्तो अनुभोगमानलादिद्
ग्रसिष्ठ ओषधीरजीगः” (ऋ० सं० २,३, १२, २)
यदा ते मर्त्तो भोगमन्वापद्-अथ ग्रसितृतम
ओषधीरगारीः ।
‘जिगर्त्तिः’ गिरतिकर्मावा गृणातिकर्मा वा ।
गृह्णातिकर्मा वा ॥
“मूरा अमूर न वयश्चिकित्वो महित्वमग्ने त्वमङ्ग
हिन्दी निरुक्त ( २६१ ) ६ अ० २ पा० ५ खं०
वित्से । ” ( ऋ० सं० ७, ५,३२, ४) ।
मूढा वयं स्मः, अमूढस्त्वमसि, न वयं विद्मो
महत्त्वमग्ने त्वं तु वेत्थ ॥
‘शशमानः’ शंसमानः ।
“यो वां यज्जैः शशमानो ह दाशति” (ऋ०सं०
१, २, २१, २) । इत्यपि निगमो भवति ।
‘देवो देवान्त्या कृपा’ । देवो देवान् प्रति-अक्तया
कृपा कृप् कृपतेर्वा । कल्पते र्वा ॥ ५ (८) ॥
‘अजीगः’ (३६ ( अनवगत) ‘अगारी’ ( निगलता है) के अर्थ में है।-
“ यदाते ०-० ” अर्थात्- हे अश्व ! ‘ यदा ’ जब
‘मर्त्तः’ ( मनुष्यः ) मनुष्य ‘ते’ तेरे ‘भोगम्’ भोगको ‘अनु-
आनट् ’ ( अन्वापत् ) प्राप्त होता है (तुझे चढ़कर वाहता है)
‘आदित्’ (अथ) फिर तू थका हुआ भी ( ग्रसितृतमः ) बहु-
भोजन-शील ‘ ओषधीः ’ ‘अगारीः : ’ ओषधियों ( घास )
को ग्रहण करता अथवा खाता ही है। अर्थात्-और पशु थके
हुए चर नहीं सकते और तू बहुत अच्छे प्रकार ओषधियों को
खाता है, यह तेरा अधिक सामर्थ्य है। इस प्रकार यहां
ओषधि और अश्वके संबन्धसे ‘जिगत्ति’ धातु ‘गिरति’ धातु
के अर्थ (निगलने ) में अथवा ‘गृह्णाति’ धातुके अर्थ (ग्रहण)
में है, यह सिद्ध होता है।
‘अमूर’ ( ३७ ) शब्द ( अनवगत ) ‘अमूढ’ ( नहीं मूढ )
के अर्थ में है।-
“मूरा वयम्० ०” अर्थात्- हे भगवन् अग्निदेव !
हिन्दी निरुक्त ( २६२ ) ६ अ० २ पा० ६ खं०
'अमूर' ! अमूढ ! 'वयम्' हम 'मूराः' ( मूढाः-स्म ) मूढे हैं ।
'महित्वम्' (महत्वम्) तेरी महिमा को 'न-चिकित्वः' (न-वि-
जानीमः) नहीं जानते हैं। हे 'अग्ने !' 'त्वम्-अङ्ग' (त्वं) किन्तु
तू 'वित्से' (वेत्थ) जानता है ॥ यहां पर 'मूढाः' पदसे अपनी
निन्दा के द्वारा 'अमूढः' पद से अग्नि की स्तुति की गई है,
इससे 'अमूर' शब्दका 'अमूढ' शब्द ही बदला हो सकता है।
'शशमानः' (३८) शब्द ( अनवगत ) 'शंसमानः' ( स्तुति
करता हुआ ) के अर्थ में है।—
“यो वां य॒ज्ञैः शश॑मानो॒ हं दाशा॑ति” अर्थात्-
'यः' जो यजमाने 'वाम्' ( युवाम् ) तुम दोनों को 'यज्ञैः'
यज्ञों से 'शशमानः' (शंसमानः') स्तुति करता हुआ 'दाशति'
(ददाति) हवियों कोदेता है। यह भी निगम होता है। इस
प्रकार यहां यज्ञ के सम्बन्ध और शब्द की समानता से 'शश-
मानः' यह पद 'शंसमानः' के अर्थ में है यह सिद्ध होता है।
'देवो देवाच्या कृपा' (३६) ये दो शब्द अनवगत हैं। 'देव'
शब्द इन्हीं दोनों शब्दों के मन्त्रविशेष में पहिचान कराने के अर्थ है। देवः,
देवाच्या, कृपा, ये तीन पद है। 'देवाच्या'पद की 'देवान्प्रति-अञ्चितया' (देव-
ताओं के प्रति गई हुई से) यह अर्थ-प्रतीति है। 'कृपा' इसकी भी 'कल्पितया'
( कल्पित की हुई से ) अर्थ-प्रतीत है—
“देवो देवाच्या कृपा” अर्थात्-“ 'देवः' देव 'देवांच्या'
( देवान्प्रति-अक्तया ) देवताओं के प्रति गई हुई, 'कृपा'
कल्पित की हुई से' । 'कृप्' शब्द कृपार्थक 'कृप् ( तुं० प० )'
धातु से है। अथवा सामर्थ्य अर्थ में कृप् ( स्वा० आ० ) धातु
से है ॥ ५ ( ८ ) ॥
हिन्दी निरुक्त ( २६३ ) ६ अ० ३ पा ६ खं०
( खं० ६ )
[निघ०-] विजामातुः ॥४०॥ ओमासः
॥४१॥
(निरु०) अश्रवं हि भूरिदावत्तरा वां विजामातु-
रुत वा घा स्यालात् । अथा सोमस्य प्रयती युव-
भ्या मिन्द्राग्नी स्तोमं जनयामि नव्यम् ॥ (ऋ०सं०
१, ७, २८, २ )
अश्रौषं हि बहुदातृतरौ वां विजामातुः = असु-
समाप्तात्-जामातुः ॥
‘विजामाता’-इति शश्वत्-दाक्षिणाजाः क्रीताप-
तिमाचक्षते ।
असुसमाप्तइव वरोऽभिप्रेतः ।
‘जामाता’ जा अपत्यं तन्निर्माता ।
‘उत वा घा स्यालात्’ अपिच स्यालात् ।
‘स्यालः’ आसन्नः संयोगेन-इति नैदानाः। स्यात्
लाजान् आवपति-इति वा ।
‘लाजाः’ लाजन्तेः ।
‘स्यं’ शूर्पम् । स्यतेः ।
‘शूर्पम्’ अशनपवनम् । शृणोतेर्वा ।
अथ सोमस्य प्रदानेन
हिन्दी निरुक्त (२६४) ६ अ० २ पा० ६ खं०
"युवाभ्या मिन्द्राग्नी स्तोमं जनयामि नव्यम्"
नवतरम् ।
'ओमासः' इति उपरिष्टाद् व्याख्यास्यामः ॥
६ (९) ॥
इति षष्ठाध्यायस्य द्वितीयः पादः ॥ ६, २ ॥
'अश्रवंहि' यह ऋचा कुत्स ऋषि की है। इसका त्रिष्टुप् छन्द है।
अर्थ-'इन्द्राग्नी !' हे इन्द्र अग्नि देवो ! ( अहम् ) मैंने
'वाम्' तुम दोनों को 'विजामातुः' ( असुसमाप्ताज्जामातुः )
अधूरे जामाता या जँवाई से 'वा' अथवा 'घा' (अनर्थक) 'श्या-
लात्' साले से 'भूरिदावत्तरा' (बहुदातृतरौ) अधिक धनके देने
वाले 'अश्रौषम्' सुना है । 'अथा' इस से 'सोमस्य' सोम के
'प्रयती' ( प्रदानेन ) प्रदान (दान) से 'युवाभ्याम्' तुम दोनों
के लिये 'नव्यम्' (नवतरम्) बहुत नया 'स्तोमम्' स्तोत्र 'जन-
यामि' (उच्चारयामि) उच्चारण करता हूं। इस प्रकार यहां पर
'विजामातृ' शब्द से अधूरा जमाई कहा जाता है, क्यों कि-
वह जामाता के गुणों से हीन होने के कारण कन्या के पिता
आदि को बहुत धन देकर उन्हें अपने अनुकूल करता है, इसी
से वह बहुदाता है, और उसकी अपेक्षा इन्द्राग्नी देवता
अधिक देने वाले कहे जाने से उनकी स्तुति होती है ।
यह बात प्रसिद्ध है कि-दक्षिणी लोग क्रीतापति (खरीदी
हुई स्त्री) के पति को 'विजामाता' कहते हैं। क्यों कि-वह
विगुण होने से अपनी भार्या बनाने के अर्थ कन्या को खरीदता
है। इसीसे वह असुसमाप्त (अधूरा) जैसा वर माना गया है ।
'जामाता' क्यों ? 'जा' अपत्य या सन्तान का नाम है,
हिन्दी निरुक्त ( २६५ ) ६ अ० ३ पा० १ खं०
उसका निर्माता होता है, अर्थात् वह मैथुनधर्म के द्वारा उस
(कन्या) में स्त्रीत्व (भार्यापन) को बनाता है, इसी से दुहिता
का पति 'जामाता' कहलाता है।
'स्याल' क्यों ? संयोग से आसन्न (समीप-वर्त्ती) है। यह
शब्द के निदान के जानने वाले विद्वान् मानते हैं। अथवा
'स्य' (छाज) से लाजों (धानकी खीलों) को कन्या की अञ्जलि
में होम के अर्थ प्रावाप करता (घालता) है।
'लाज' कैसे ? 'लाज्' (भ्वा० प०) धातु से है।
'स्य' क्या? शूर्प (छाज) कैसे ? फेंकने अर्थ वाले 'स्य' (सो)
(दि० प०) धातु से है। क्योंकि-उससे तुष (अन्नके छिलके)
फेंके जाते हैं।
'शूर्प' क्यों ? वह अशन-पवन है, अर्थात्-उससे अशन
(खाने योग्य अन्न) पवन (पवित्र) किया जाता है। अथवा
हिंसाार्थक 'शृ' (क्रया० प०) धातु से है। क्यों कि-वह शरों
(सींखों) से बना हुआ होता है।
'ओमासः' (४१) शब्दकी व्याख्या बारहवें अध्याय में
"ओमासश्चर्षणी धृतः” इस मन्त्र में होगी ॥६,२॥
इति हिन्दीनिरुक्ते षष्ठाध्याये द्वितीयः पादः समाप्तः ॥
तृतीयः पादः ।
(खं० १)
[निघ०-] सोमानम् ॥४२॥
(निरु०-) "सोमानं स्वरणं कृणुहि ब्रह्मणस्पते । क-
क्षीवन्तं य औशिजः ।" [ य० सं० ३, २८ ]
हिन्दी निरुक्त ( २६६ ) ६ अ० ३ पा० १ खं०
सोमानं सोतारं प्रकाशनवन्तं कुरु ब्रह्मणस्पते
कक्षीवन्तमिव य औशिजः ।
'कक्षीवान्' कक्ष्यावान् ।
'औशिजः' उशिजः पुत्रः ।
'उशिक्' वष्टेः कान्तिकर्मणः ।
अपितु अयं मनुष्यकक्षएव अभिप्रेतः स्यात् ।
तं सोमानं सोतारं मां प्रकाशनवन्तं कुरु ब्रह्मण-
स्पते ॥ १ (१०) ॥
अर्थः-'सोमानम्' (४२) यह (अनवगत) 'सोतारम्' (उ-
त्पन्न करने वाले) के अर्थ में है—
"सोमानं ०—०" यह ऋचा काण्व मेधातिथि ऋषि की
है। अग्नि के उपस्थान में विनियुक्त है।
'सोमानम्' (सोमानाम्) अनेक सोमों के (सोतारम्) उत्पन्न
करने वाले 'स्वरणम्' (शब्दयितारम्) स्तुति करने वाले (माम्)
मुझ को 'ब्रह्मणस्पते' हे ब्रह्मणस्पति देव ! 'यः' जो 'औशिजः'
(उशिजः पुत्रः) उशिक् का पुत्र (कक्षीवान्) कक्षीवान् (कक्ष्या-
वान्) है, 'कक्षीवन्तम्' (इव) उस कक्षीवान् के समान (प्रका-
शनवन्तम्) प्रकाश वाला 'कृणुहि' (कुरु) कर। इस प्रकार
यहां शब्द की समानता से 'सोमानम्' का 'सोमानाम्' (सोमों
का) परिवर्तन हो सकता है।
'कक्षीवान्' क्या ? कक्ष्यावान् अर्थात्-कक्ष्या (बगल या
काख) वाला होता है। अथवा यह 'कक्ष' मनुष्य का कक्ष ही
माना जा सकता है। क्योंकि-वह कक्ष में उत्पन्न है, इस से
३. दैवत काण्ड (पूर्वाद्ध - अध्याय ७-९): अग्नि, वायु, सूर्य व अन्तरिक्षस्थ देव मन्त्र-मीमांसा
हिन्दी निरुक्त (२६७) ६ अ० ३ पा २ खं०
(कक्ष (काख) में उत्पत्ति के संयोग से) वह 'कक्षीवान्' है।
पहिली व्याख्या में वह स्वयम् काख वाला है, और दूसरी
व्याख्या में वह काख से उत्पन्न हुआ है, यह भेद है।
'औशिज' क्या? उशिज् का पुत्र।
'उशिज्' कैसे ? कान्ति अर्थ वाले 'वश्' (अदा० प०)
धातु से है।
'कक्षोवन्तम्' यह लुप्त उपमा है, उपमा का वाचक इव'
पद ऊपर से लिया जाता है।
'प्रकाशनवन्तम्' (प्रकाश वाला) पद भाष्यकारने ऊपरसे
ले लिया है। क्यों कि-अर्थ की पूर्त्ति ऐसा करने से ही
होती है ॥१(१०)॥
(खं० २)
निघ०-अनवायम्॥४३॥किमीदिने॥४४॥
निरु०- "इन्द्रासोमा समघशंस मभ्य १ घं तपुर्य-
यस्तु चरुरग्निवां इव। ब्रह्मद्विषे क्रव्यादे घोरचक्षसे
द्वेषोधत्तम नवायँ किमीदिने ॥" (ऋ० सं० ५, ७,
५, २)।
इन्द्रासौमौ अघस्य शंसितारम्।
'अघं' हन्तेः। निर्ह्रासितोपसर्ग आहन्ति-इति।
'तपुः' तपतेः।
'चरुः' मृन्मयो भवति। चरतेर्वा। समुच्चरन्ति
अस्मात् आपः।
हिन्दी निरुक्त ( २६८ ) ६ अ० ३ पा० २ खं०
'ब्रह्मद्विषे' ब्राह्मणद्वेष्ट्रे ।
'क्रव्यादे' क्रव्यमदते ।
'घोरचक्षसे' घोरख्यानाय ।
'क्रव्यं, 'विकृत्तात् जायते'–इति नैरुक्ताः ।
द्वेषो धत्तम् ।
'अनवायम्' अनवयवम् । यत् अन्ये न व्यवेयुः,
अद्वेषसः–इति वा ।
'किमीदिने' किमिदानीम्–इतिचरते । 'किमिदं
किमिदम्'–इति वा पिशुनाय चरते ।
'पिशुनः' पिंशतेः । विपिंशति–इति ॥ २ (११) ॥
'अनवायम्' (४३) 'किमीदिने' (४४) ये दो पद अनवगत हैं ।
'अनवाय' शब्द अनवयव (अवयव (भाग) रहित) के अर्थमें और 'किमीदिने'
शब्द 'किमिद किमिदम्' ( यह क्या ? यह क्या ? ) ऐसा करने वाला (धूर्त्त)
के अर्थ में है ।
" इन्द्रासोमा " यह वसिष्ठ ऋषि की है ।
अर्थः—'इन्द्रासोमा' ( इन्द्रासोमो ) हे इन्द्र सोम देवो !
( युवाम् ) तुम दोनों 'अघशंसम्' ( अघस्य शंसितारम् ) पाप
की प्रशंसा करने वाले 'अभ्यघम्' पाप को ही करने को सदा
संमुख रहने वाले को 'स ( तापयतम् ) सताओ । वह पापी
'तपुः' तुम दोनों से सताया हुआ 'अग्निमान्' अग्नि से संयुक्त
'चरुः–इव' होम- द्रव्य के समान 'ययस्तु' ( क्षयं यातु ) नष्ट हो
जाय । 'ब्रह्मद्विषे' ( ब्राह्मणद्वेष्ट्रे ) ब्राह्मणों से द्वेष (वैर) करने
वाले 'क्रव्यादे' ( क्रव्यम्–अदते ) मांस के खाने वाले 'घोरचक्षसे'
हिन्दी निरुक्त ( २६६ ) ६ अ० ३ पा ३ खं०
घोर दर्शन वाले 'किमीदिने' (पिशुनाय) धूर्त्त के लिये
'अनवायम्' पूरा (अखण्ड) 'द्वेषः' द्वेष (बैर) 'धत्तम्'
धारण करो।
'अघ' कैसे ? हिंसाार्थक 'हन्' (अदा० प०) धातु से है।
[क्योंकि वह हनन (नाश) किया जाता है।] 'हन्' धातु से
किस प्रकार ? ह्रस्व किया हुआ उपसर्ग 'आहन्ति' इससे।
['आ' का 'अ' और 'ह' का 'घ' हो जाता है।]
'तपुः' कैसे ? संताप अर्थमें 'तप' (भ्वा०प०) धातु से है।
'चरुः' क्या ? 'मृच्चय' (मिट्टी से संचित) होता है।
अथवा 'चर' (भ्वा० प०) धातु से है। क्योंकि-इस से जल
समुच्चरण करते (उछलते) हैं।
'क्रव्य' (मांस) क्यों ? 'विकृत्त (कटे हुए) से उत्पन्न
होता है।' यह नैरुक्त लोग मानते हैं।
'अनवाय' क्या ? अनवयव या अवयवरहित। अथवा
जिसे अन्य (धूर्त्त के मित्र) हटाते हुए भी व्यवाय न कर
सकें (हटा न सकें)।
'किमीदिन्' क्या ? 'किमिदानीम्' (अब क्या होरहा है)
ऐसे करते रहने वाला। अथवा 'किमिदम्' 'किमिदम्' यह
क्या ? यह क्या ? करने वाला पिशुन धूर्त्त है।
'पिशुन' कैसे ? 'पिंश' (तु० प०) धातु से है। क्योंकि-
वह थोड़े पाप को भी बढ़ाता रहता है ॥ २ (११) ॥
(खं० ३)
निघ०- अमवान् ॥४५॥ अमीवा ॥४६॥
दुरितम्॥४७॥ अप्वे ॥४८॥ अमतिः॥४९॥
श्रुष्टी ॥५०॥ पुरन्धिः ॥५१॥
हिन्दी निरुक्त ( २७० ) ६ अ० ३ पा० ३ खं०
निरु०-“कृणुष्व पाजः प्रसितिं न पृथ्वीं याहि रा-
जेवामवाँ इभेन । तृष्वीमनु प्रसितिं द्रूणानोऽस्ता-
सि विध्य रक्षसस्तपिष्ठैः ॥” (ऋ०सं० ३,४,२३,१)
कुरुष्व पाजः । ‘पाजः’ पालनात् ।
प्रसितिमिव पृथ्वीम् । ‘प्रसितिः’ प्रस्यनात् ।
तन्तुर्वा । जालंवा ॥
याहि राजा-इव अमात्यवान्, अभ्यमनवान्,
स्ववान् वा, इराभृता गणेन, गतभयेन, हस्तिना
इति वा ।
तृष्व्या नु प्रसित्या द्रूणाननः ।
‘तृष्वी’ इति क्षिप्रनाम । तरतेर्वा । त्वरतेर्वा ।
असितासि विध्य रक्षसः तपिष्ठैः = तप्ततमै, तृप्त-
तमैः, प्रपिष्टतमैः-इति वा ।
“यस्ते गर्भममीवा दुर्णामा योनि माशये ।”
(ऋ० सं० ८, ८, २०, २ )
‘अमीवा’ अभ्यमनेन व्याख्यातः ।
‘दुर्णामा’ क्रिमिर्भवति पापनामा ।
‘कृमिः’ क्रव्ये मेद्यति । क्रमते र्वा स्यात् सरण-
कर्मणः क्रामते र्वा ।
“अतिक्रामन्तो दुरितानि विश्वा ।” [ ]
अतिक्रममाणा दुर्गमनानि सर्वाणि ॥
'अपवा' यदेनया विद्धः अपवीयते । व्याधिर्वा ।
भयं वा ।
“अप्वे परेहि” (ऋ०सं० ८, ५, २३, ६) इत्यपि
निगमो भवति ।
'अमतिः' अमामयी मतिः आत्ममयी ।
“ऊर्ध्वा यस्या मतिर्भा अदिद्युतत्सवीमनि ।”
[ सा०छ० आ० ५,२,३,८ ] इत्यपि निगमो भवति ।
'शृष्टी' इति क्षिप्रनाम । आशु अश्नोति ॥ ३ (१२) ॥
'अमवान्' (४५) यह अनवगत और अनेकार्थ है ।
“कृणुष्वपाजः” यह ऋचा वामदेव ऋषि की है, अग्निचयन में पुरुष-व्या-
घारण में विनियुक्त ह ।
राजा को अपने शत्रु के जीतने के अर्थ किन २ सामानों
से जाना चाहिए, सो वामदेव ऋषि की अग्निदेव के प्रति
प्रार्थना से जानना चाहिए-
अर्थः-हे भगवन् ! अग्निदेव ! तू 'पाजः' अपने बल या सैन्य
को 'पृथ्वीम्' फैली हुई 'प्रसितिं-न' व्याध की जेवड़ी या जाल
के समान 'कृणुष्व' कर । [ प्रथम सेना का पूरा विस्तार करना
चाहिए । ] फिर 'याहि' विजय के अर्थ राक्षसों के प्रति जा ।
कैसे ? 'अमवान्' ( अमात्यवान् ) मन्त्रिसमूह से युक्त अथवा नीति-
युक्त अथवा (अभ्यमनवान) रोगरूप होकर शत्रुओंको भय देने
वाला अथवा (स्ववान्) अपने धनसे युक्त पुष्ट-भृत्य समूह 'राजा-
इव' राजा जैसे 'इभेन' ( इभामृता गणेन ) अन्न से पुष्ट या
हिन्दी निरुक्त ( २७२ ) ६ अ० ३ पा० ३ खं०
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निर्भय सेना के साथ अथवा 'इभेन' हाथी सेना के साथ अपने
शत्रुओं को जीतने जाता है, वैसे ही तू जा । ( अपना धन
चाहिए किन्तु ऋणका नहीं। मन्त्रिमण्डल युक्त होना चाहिए
किन्तु केवल अपने ही विचार पर निर्भर नहीं । नीति युक्त
होना चाहिए, किन्तु नीति रहित नहीं । अन्न सम्पत्ति आव-
श्यकतासे भी अधिक होनी चाहिए, किन्तु अल्प नहीं । सेना
पुष्ट रहनी चाहिए किन्तु भूखी नहीं । सेना निर्भय होनी चा-
हिये किन्तु सभय नहीं । इसी प्रकार हाथी भी बहुत उपयुक्त
होते हैं, उनका भी सम्पादन करना चाहिये । ) और कैसे ?
'तृष्वीम्-अनु' ( तृष्व्याम् ) शीघ्र या निरन्तर 'प्रसितिम्'
( प्रसित्या ) गतिसे 'द्रुहानः' ( रक्षांसि हिंसन् ) राक्षसों को
मारता हुआ । ( चढाईफलपर्यन्त निरन्तर रहना चाहिए । )
जिससे कि-तू 'अस्ता' राक्षसों के प्रति अपनी कान्ति का
फेंकनेवाला 'असि' है, इससे तू इस प्रकार से होकर 'तपिष्ठैः'
( तप्ततमैः, तृप्ततमैः, प्रपिष्टतमैः इतिवा ) बहुत गरम या अति
तृप्त हुई या बहुत सूक्ष्म अपनी किरणों से 'रक्षसः' हमारे शत्रु
राक्षसोंको 'विध्य' मार । इस प्रकार यहां राजा की उपमा के
सम्बन्ध से 'अमवान्' पद का 'अमात्यवान्' इत्यादि अर्थ
सिद्ध होता है ।
'पाज' यह बलका नाम कैसे ? पालन से । क्योंकि-उस
से पालन किया जाता है ।
'प्रसिति' ( मछली पकड़ने की डोरी या जाल ) क्यों? प्रस-
यन ( बन्धन ) से । क्योंकि-उन दोनों से ही मृग और मत्स्य
पकड़े जाते हैं ।
'अमीवा' (४६) अनवगत 'अस्यमनवान्' ( खेद पहुंचाने
वाला ) के अर्थ में है—
हिन्दी निरुक्त ( २७३ ) ६ अ० ३ पा० ३ खं०
“ यस्ते गर्भममीवा दुर्णामायोनिमाशये ”
अर्थात्-हे स्त्रि ! 'यः' जो 'ते'तेरे 'गर्भम्' गर्भके प्रति 'अमीवा'
रोग-रूप 'दुर्णामा' पापनामा क्रिमि (कीड़ा) 'योनिम्'
योनिको 'आशये' आकर सोता है, (उसे अग्निदेव ब्रह्मा के
सहित नाश करे)। उस प्रकार यहा 'अमीवा क्रिमिदा नाम
होता है। क्योंकि-क्रिमि से उपहत (घुँली हुई) योनि में
गर्भ नहीं होसकता है। (वैद्योंके ध्यान योग्य बात है।)।
'अमीवा' कैसे ? अभ्यसन से (“ कृणुष्वपाजः ”
मन्त्र के 'अमवान्' शब्द से) व्याख्यान किया गया। अर्थात्-
उसी प्रकार इसे भी समझना चाहिए।
'दुर्णामा' क्रिमि होता है। क्योंकि-वह पाप के स्थान
में परिवत या उत्पन्न होता है।
'कृमिः' क्यों ? क्रव्य ( मांस ) में स्नेह करता है। अथवा
गत्यर्थक 'क्रम' ( भ्वा० प०) धातु से है। क्योंकि-वह क्रमण
( संक्रमण ) या सरकता है अथवा 'क्रामति' ( भ्वा० प० )
धातु से है। (वही धातु दूसरे रूपमें है।)
'दुरित' (४७) अनवगत 'दुर्गति-गमन' के अर्थ में है—
“ अति क्रामन्तो दुरितानि विश्वा” अर्थात्-
हम 'विश्वा' ( विश्वानि ) सब 'दुरितानि' (दुर्गतिगमनानि)
दुर्गति के देने वाले कर्मों को 'अतिक्रामन्तः' (अतिक्राममाणाः)
उलांघते हुए ( शतंहिमाः सर्ववीरा मदेम ) सौ ( १०० ) -
मन्त ऋतुओं तक सब वीरों सहित आनन्द करें। यहां अति-
क्रमण ( उल्लंघन ) के संबन्ध से 'दुरित' नाम 'दुष्कृत' (बुरे
कर्मों ) का है।
'अपवा' (४८) यह अनवगत व्याधिका नाम है, अथवा
३५
हिन्दी निरुक्त ( २७४ ) ६ अ० ३ पा० ४ खं०
भय का नाम है। क्योंकि-इस से विद्ध हुआ पुरुष प्राणों से
अपवीत या रहित होता है।
“ अप्वे परेहि ” अर्थात्-हे अप्वे ! रोग ! या भय !
तू ‘परेहि’ दूर हो, यह भी निगम है। यहां दूर होने की
प्रार्थना के संबन्ध से ‘अप्वो’ रोग या भय ही हो सकता है।
‘अस्मति’ (४६) अनवगत अंशमयी मति या आत्म
मयी या अपने को प्रकाश करने वाली आदित्य की बुद्धि के
अर्थ में है। क्योंकि- स्वयम् वह प्रकाश पदार्थ ही है, उसमें
कोई दूसरा पदार्थ मिश्रित नही इस लिये वह अपने प्रकाश के
अर्थ किसी दूसरे प्रकाश की अपेक्षा नहीं करता । -
“ ऊर्ध्वा यस्यामति र्भा अदिद्युतत्सवीमनि ”
अर्थात् ‘यस्य’ जिस आदित्य की ‘ऊर्ध्वा’ सब से ऊँची
‘अमतिः’ आत्म-प्रकाशमयी बुद्धि है। जिसने ‘भाः’ अपनी
ज्योतियों को ‘अदिद्यतत्’ फैलाया (प्रकाशकिया) है।
‘सवीमनि’ (प्रसवे) जिसकी आज्ञा में सब जगत् है। यह
भी निगम है।
‘शृष्टी’ (५०) अनवगत ‘क्षिप्र (शीघ्र) का नाम है।
क्योंकि--वह ‘आशु-शृष्टि शीघ्र अशन (व्यापन) करता
है॥ ३ (१२)॥
(खं० ४)
निघ०- रुशत् ॥ ५२ ॥
निरु०- “ ताँ अध्वर उशतो यक्ष्यग्ने श्रुष्टी भगं
नासत्या पुरन्धिम् । ” ( ऋ० सं० ५,४, ६,४) ।
“ तान् ‘अध्वरे’ यज्ञे, ‘उशतः’ कामयमानान्,
हिन्दी निरुक्त ( २७५ ) ६ अ० ३ पा० ४ खं०
यज अग्ने श्रुष्टि, भगं, नासत्यौ च अश्विनौ ।
'सत्यौ-एव नासत्यौ'-इति और्णवाभः ।
'सत्यस्य प्रणेतारौ' इति आग्रायणः । 'नासिका-
प्रभवौ बभूवतुः'-इति वा ।
'पुरन्धिः' बहुधीः । तत्कः ? पुरन्धि र्भगः,
पुरस्तात् तस्यान्वादेशः-इत्येकम् । इन्द्रः-इत्यपरम् ।
स बहुकर्मतमः, पुरां च दारयितृतमः । वरुणः-
इत्यपरम् । तं प्रज्ञया स्तौति-
"इमामू नु कवितमस्य मायाम् ।" ( ऋ०सं०
४, ४, ३१, १) । इत्यपि निगमो भवति ।
'रुशत्'-इति वर्णनाम । रोचते र्ज्वलतिकर्मणः।
"समिद्धस्य रुशद्दर्शि पाजः" ( ऋ० सं०
३, ८, १२, २) इत्यपि निगमो भवति ॥ ४ (१३) ॥
अर्थः-'अग्ने' हे अग्निदेव ! 'तान्' उन 'उशतः' (काम-
यमानान्) कामना करते हुए देवताओं को 'अध्वरे' (यज्ञे)
हमारे यज्ञ में 'श्रुष्टि' शीघ्र 'यक्षि' (यज यजन करो । वे
कौन ? 'भगम्' भग 'नासत्या' (नासत्यौ अश्विनौ) नासत्य
या अश्विनी कुमार 'पुरन्धिम्' और पुरन्धि (इन्द्र) । इस
प्रकार यहां याग की विघ्न भयसे शीघ्रता इष्ट है इससे 'श्रुष्टि'
यह शीघ्र का नाम होना युक्त है ।
'नासत्य' क्या ? 'सत्य ही नासत्य होते हैं, यह और्ण-
वाभ आचार्य मानते हैं। क्योंकि-जो सत्य नहीं, सो 'असत्य
हिन्दी निरुक्त ( २७६ ) ६ अ० ३ पा० ४ खं०
कहलाता है, और जो असत्य नहीं, सो 'नासत्य' कहलाता
है। दो बार निषेध करने से प्रकृत वस्तु ही हो जाती है।
'सत्य के प्रणेता (प्रवृत्त करने वाले) 'नासत्य' कहलाते
हैं, यह आग्रायण आचार्य मानते हैं।
अथवा—नासिका (नाक) से उत्पन्न हुये थे इस से
वे नासत्य हैं।
'पुरन्धि' (५१) अनवगत अनेकार्थ है।
'पुरन्धि' क्या ? 'पुरु' (बहुत) 'धी' (बुद्धि) वाला ।
सो कौन मन्त्र में पहिले 'भग' देवता कहा गया है, उसी का
यह पुनः कथन अर्थात्-विशेषण है। यह एक मत हुआ। दूसरा
मत है कि-'पुरन्धि' इन्द्र का नाम है। क्योंकि-यह बहुत २
कर्म वाला है, और पुरों (मेघों) का विदारण करने (फाड़ने)
वाला है। 'पुरन्धि' वरुण का नाम है, यह और मत है।
उसी की यह विशेषण द्वारा स्तुति है, कि-वह 'पुरन्धि' या
बहु बुद्धि वाला है। —
"इमामूनु कवितमस्य मायाम् " अर्थात् 'इमाम्'
इस 'कवितमस्य' (मेधावितमस्य) बड़े बुद्धिमान् वरुणदेव
की 'मायाम्' प्रज्ञा को (न किरादधर्ष) कोई नहीं दबा सकता
है, यह भी निगम है। इस प्रकार यहां वरुण देव प्रज्ञा के
द्वारा स्तुति किये जाते हैं, और 'धी' यह नाम बुद्धि का है,
सो जिसके 'पुरु' बहुत हो, उसे 'पुरन्धि' कहते हैं, इस से
वरुण पुरन्धि है, युक्त होता है।
'रुशत्' (५२) यह अनवगत वर्ण का नाम है। ज्वलन
(जलना) अर्थ में 'रुच' (भ्वा०आ०) धातु का है।
"समिद्धस्य रुशद्दर्शि पाजः " अर्थात्-'समि-
दृश्य , जलते हुए अग्नि देव का ‘ रुशत् ’ सुन्दर वर्ण और
‘ पाजः ’ बल ‘ अदर्शि ’ दिखाई दिया । यह भी निगम है
॥ ४ ( १३ ) ॥
( खं० ५ )
निघ०-रिशादसः ॥ ५३ ॥ सुदत्रः ॥५४॥
सुविदत्रः ॥५५॥ आनुषक् ॥५६॥ तुर्वणिः
॥ ५७ ॥ गिर्वणाः ॥ ५८ ॥
निरु०-“ अस्ति हि वः सजात्यं रिशादसो देवासो
अस्त्याप्यम् । ” ( ऋ० सं० ६, २, ३२, ५ )
अस्ति हि वः समानजातितो रेशयदारिणो
देवाः । अस्त्याप्यम् ।
‘आप्यम्’ आप्नोतेः ।
‘सुदत्रः’ कल्याणदानः ।
“ त्वष्टा सुदत्रो विदधातु रायः । ” ( ऋ०सं०
५, ३, २७, २ ) । इत्यपि निगमो भवति ।
‘सुविदत्रः’ कल्याणविद्यः ।
“ आग्ने याहि सुविदत्रेभिरर्वाङ् ” । ( ७,६,
१८, ४ ) । इत्यपि निगमो भवति ।
‘ आनुषक् ’-इति नाम अनुपूर्वस्य अनुषक्तं
भवति ।
“ स्तृणन्ति बर्हिरानुषक् । ” ( ऋ०सं० ६, ३,
हिन्दी निरुक्त ( २७८ ) ६ अ० ३ पा० ५ खं०
४२, १ ) इत्यपि निगमो भवति ।
'तुर्वणिः' तूर्णवनिः ।
“सतुर्वाणि र्महाँ अरेणु पौंस्ये” । [ऋ० सं० १, ४,
२१, ३, ] । इत्यपि निगमो भवति ।
गिर्वणा देवो भवति । गीर्भिरेनं वनयन्ति ।
“जुष्टं गिर्वणसे बृहत्” । (ऋ० सं० ६, ६,
१२, ७ ) ॥ ५ (१४) ॥
अर्थः-हे 'रिशादसः' (रेशयदासिनः वा रेशयदारिणः )
हिंसकों को विदारण करने वाले ! 'देवासः' (देवाः !) देवो !
'वः' ( युष्माकम् ) तुम्हारी 'सजात्यम्' (समानजातित्रा ) एक
जातीयता 'अस्ति' है, और वह 'आप्यम्' मनुष्यों को प्राप्त
करने योग्य है। अर्थात्-तुम्हारा आश्रयण करने से वे रक्षा
पा सकते हैं । इस प्रकार यहा पर शब्द की समानता और
अर्थ की योग्यता से 'रिशादसः' 'रेशयदारिणः' (हिंसक के
मारने वाले) के अर्थ में है, यह उपपन्न होता है ।
'आप्य' व्याप्ति अर्थमें 'आप्' (स्वा० प०) धातु से है ।
'सुदत्र' ( ५४ ) अनवगत 'कल्याणदानः' ( पवित्र दान
वाला ) के अर्थ में है ।
“त्वष्टा सुदत्रो विदधातु रायः” अर्थात्- 'सुदत्रः'
सुन्दर दान करने वाला 'त्वष्टा' त्वष्टा देव हमारे अर्थ 'रायः'
(धनानि) धनों को 'विदधातु' देवे । इस प्रकार यहां धन के
सम्बन्ध से 'सुदत्र' शब्द 'कल्याण दान' के अर्थ में उपपन्न
होता है ।
हिन्दी निरुक्त ( २७६ ) ६ अ० ३ पा० ५ खं०
‘सुविदत्र’ (५५) शब्द अनवगत ‘कल्याणविद्य’ या उत्तम
विद्या वाला के अर्थ में है—
“आग्ने याहि सुविदत्रेभिरर्वाङ्” अर्थात्—‘अग्ने ! ,
हे अग्नि देव ! ‘सुविदत्रेभिः’ उत्तम विद्या वाले पितरों के
सहित ‘अर्वाङ्’ हमारे अभिमुख ‘आ-याहि’ आ। यह भी निगम
है। यहां शब्द की समानता से ‘सुविदत्र’ शब्द ‘कल्याणविद्य’
के अर्थ में है।
‘आनुषक्’ (५६) यह नाम (अनवगत) ‘अनु’ (उपसर्ग)
पूर्वक संगार्थक ‘सञ्ज’ (भ्वा० प०) धातु का है। ‘आनुषक’
क्या ? अनुषक्त या पीछे लगा हुआ होता है।
“स्तृणन्ति बर्हिरानुषक्” अर्थात्—जो यज्ञों में ‘आनु-
षक्’ अनन्तर अनन्तर (एक से एक) लगी हुई ‘बर्हिः’ कुशाओं
को ‘स्तृणन्ति’ बिछाते है।’ यह भी निगम है।
‘तुर्वणि’ (५७) क्या ? तूर्णवनि, अर्थात्—जो शीघ्र वनन
(सेवन) करता है।
“स तुर्वणिर्महाँ अरेणु पौंस्ये” (“गिरे भृष्टि र्न
भ्राजते”) अर्थात्—‘तुर्वणिः’ शीघ्र अपने स्तुति करने वाले
को भजने वाला ‘महान्’ प्रभाव से बड़ा ‘सः’ वह इन्द्र ‘अरेणु
पौंस्ये’ अन्तरिक्ष (आकाश) में (पर्वतके शिखर के समान चम-
कता है)। यह भी निगम है।
‘गिर्वणस्’ (५८) देव होता है। क्यों कि—इसे गिराओं
(स्तुतियों) से वनन या याचन करते हैं।
“जुष्टं गिर्वणसे बृहत्” अर्थात्- हे स्तोताओ ! तुम
‘गिर्वणसे’ स्तुतियों की गिराओं (वाणियों) से भजन योग्य