निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
पृष्ठ 687, कुल 1282 में से
संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( २७३ ) ६ अ० ३ पा० ३ खं०
“ यस्ते गर्भममीवा दुर्णामायोनिमाशये ”
अर्थात्-हे स्त्रि ! 'यः' जो 'ते'तेरे 'गर्भम्' गर्भके प्रति 'अमीवा'
रोग-रूप 'दुर्णामा' पापनामा क्रिमि (कीड़ा) 'योनिम्'
योनिको 'आशये' आकर सोता है, (उसे अग्निदेव ब्रह्मा के
सहित नाश करे)। उस प्रकार यहा 'अमीवा क्रिमिदा नाम
होता है। क्योंकि-क्रिमि से उपहत (घुँली हुई) योनि में
गर्भ नहीं होसकता है। (वैद्योंके ध्यान योग्य बात है।)।
'अमीवा' कैसे ? अभ्यसन से (“ कृणुष्वपाजः ”
मन्त्र के 'अमवान्' शब्द से) व्याख्यान किया गया। अर्थात्-
उसी प्रकार इसे भी समझना चाहिए।
'दुर्णामा' क्रिमि होता है। क्योंकि-वह पाप के स्थान
में परिवत या उत्पन्न होता है।
'कृमिः' क्यों ? क्रव्य ( मांस ) में स्नेह करता है। अथवा
गत्यर्थक 'क्रम' ( भ्वा० प०) धातु से है। क्योंकि-वह क्रमण
( संक्रमण ) या सरकता है अथवा 'क्रामति' ( भ्वा० प० )
धातु से है। (वही धातु दूसरे रूपमें है।)
'दुरित' (४७) अनवगत 'दुर्गति-गमन' के अर्थ में है—
“ अति क्रामन्तो दुरितानि विश्वा” अर्थात्-
हम 'विश्वा' ( विश्वानि ) सब 'दुरितानि' (दुर्गतिगमनानि)
दुर्गति के देने वाले कर्मों को 'अतिक्रामन्तः' (अतिक्राममाणाः)
उलांघते हुए ( शतंहिमाः सर्ववीरा मदेम ) सौ ( १०० ) -
मन्त ऋतुओं तक सब वीरों सहित आनन्द करें। यहां अति-
क्रमण ( उल्लंघन ) के संबन्ध से 'दुरित' नाम 'दुष्कृत' (बुरे
कर्मों ) का है।
'अपवा' (४८) यह अनवगत व्याधिका नाम है, अथवा
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