निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
पृष्ठ 686, कुल 1282 में से
संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( २७२ ) ६ अ० ३ पा० ३ खं०
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निर्भय सेना के साथ अथवा 'इभेन' हाथी सेना के साथ अपने
शत्रुओं को जीतने जाता है, वैसे ही तू जा । ( अपना धन
चाहिए किन्तु ऋणका नहीं। मन्त्रिमण्डल युक्त होना चाहिए
किन्तु केवल अपने ही विचार पर निर्भर नहीं । नीति युक्त
होना चाहिए, किन्तु नीति रहित नहीं । अन्न सम्पत्ति आव-
श्यकतासे भी अधिक होनी चाहिए, किन्तु अल्प नहीं । सेना
पुष्ट रहनी चाहिए किन्तु भूखी नहीं । सेना निर्भय होनी चा-
हिये किन्तु सभय नहीं । इसी प्रकार हाथी भी बहुत उपयुक्त
होते हैं, उनका भी सम्पादन करना चाहिये । ) और कैसे ?
'तृष्वीम्-अनु' ( तृष्व्याम् ) शीघ्र या निरन्तर 'प्रसितिम्'
( प्रसित्या ) गतिसे 'द्रुहानः' ( रक्षांसि हिंसन् ) राक्षसों को
मारता हुआ । ( चढाईफलपर्यन्त निरन्तर रहना चाहिए । )
जिससे कि-तू 'अस्ता' राक्षसों के प्रति अपनी कान्ति का
फेंकनेवाला 'असि' है, इससे तू इस प्रकार से होकर 'तपिष्ठैः'
( तप्ततमैः, तृप्ततमैः, प्रपिष्टतमैः इतिवा ) बहुत गरम या अति
तृप्त हुई या बहुत सूक्ष्म अपनी किरणों से 'रक्षसः' हमारे शत्रु
राक्षसोंको 'विध्य' मार । इस प्रकार यहां राजा की उपमा के
सम्बन्ध से 'अमवान्' पद का 'अमात्यवान्' इत्यादि अर्थ
सिद्ध होता है ।
'पाज' यह बलका नाम कैसे ? पालन से । क्योंकि-उस
से पालन किया जाता है ।
'प्रसिति' ( मछली पकड़ने की डोरी या जाल ) क्यों? प्रस-
यन ( बन्धन ) से । क्योंकि-उन दोनों से ही मृग और मत्स्य
पकड़े जाते हैं ।
'अमीवा' (४६) अनवगत 'अस्यमनवान्' ( खेद पहुंचाने
वाला ) के अर्थ में है—