निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअतिक्रममाणा दुर्गमनानि सर्वाणि ॥
'अपवा' यदेनया विद्धः अपवीयते । व्याधिर्वा ।
भयं वा ।
“अप्वे परेहि” (ऋ०सं० ८, ५, २३, ६) इत्यपि
निगमो भवति ।
'अमतिः' अमामयी मतिः आत्ममयी ।
“ऊर्ध्वा यस्या मतिर्भा अदिद्युतत्सवीमनि ।”
[ सा०छ० आ० ५,२,३,८ ] इत्यपि निगमो भवति ।
'शृष्टी' इति क्षिप्रनाम । आशु अश्नोति ॥ ३ (१२) ॥
'अमवान्' (४५) यह अनवगत और अनेकार्थ है ।
“कृणुष्वपाजः” यह ऋचा वामदेव ऋषि की है, अग्निचयन में पुरुष-व्या-
घारण में विनियुक्त ह ।
राजा को अपने शत्रु के जीतने के अर्थ किन २ सामानों
से जाना चाहिए, सो वामदेव ऋषि की अग्निदेव के प्रति
प्रार्थना से जानना चाहिए-
अर्थः-हे भगवन् ! अग्निदेव ! तू 'पाजः' अपने बल या सैन्य
को 'पृथ्वीम्' फैली हुई 'प्रसितिं-न' व्याध की जेवड़ी या जाल
के समान 'कृणुष्व' कर । [ प्रथम सेना का पूरा विस्तार करना
चाहिए । ] फिर 'याहि' विजय के अर्थ राक्षसों के प्रति जा ।
कैसे ? 'अमवान्' ( अमात्यवान् ) मन्त्रिसमूह से युक्त अथवा नीति-
युक्त अथवा (अभ्यमनवान) रोगरूप होकर शत्रुओंको भय देने
वाला अथवा (स्ववान्) अपने धनसे युक्त पुष्ट-भृत्य समूह 'राजा-
इव' राजा जैसे 'इभेन' ( इभामृता गणेन ) अन्न से पुष्ट या