निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( २६८ ) ६ अ० ३ पा० २ खं०
'ब्रह्मद्विषे' ब्राह्मणद्वेष्ट्रे ।
'क्रव्यादे' क्रव्यमदते ।
'घोरचक्षसे' घोरख्यानाय ।
'क्रव्यं, 'विकृत्तात् जायते'–इति नैरुक्ताः ।
द्वेषो धत्तम् ।
'अनवायम्' अनवयवम् । यत् अन्ये न व्यवेयुः,
अद्वेषसः–इति वा ।
'किमीदिने' किमिदानीम्–इतिचरते । 'किमिदं
किमिदम्'–इति वा पिशुनाय चरते ।
'पिशुनः' पिंशतेः । विपिंशति–इति ॥ २ (११) ॥
'अनवायम्' (४३) 'किमीदिने' (४४) ये दो पद अनवगत हैं ।
'अनवाय' शब्द अनवयव (अवयव (भाग) रहित) के अर्थमें और 'किमीदिने'
शब्द 'किमिद किमिदम्' ( यह क्या ? यह क्या ? ) ऐसा करने वाला (धूर्त्त)
के अर्थ में है ।
" इन्द्रासोमा " यह वसिष्ठ ऋषि की है ।
अर्थः—'इन्द्रासोमा' ( इन्द्रासोमो ) हे इन्द्र सोम देवो !
( युवाम् ) तुम दोनों 'अघशंसम्' ( अघस्य शंसितारम् ) पाप
की प्रशंसा करने वाले 'अभ्यघम्' पाप को ही करने को सदा
संमुख रहने वाले को 'स ( तापयतम् ) सताओ । वह पापी
'तपुः' तुम दोनों से सताया हुआ 'अग्निमान्' अग्नि से संयुक्त
'चरुः–इव' होम- द्रव्य के समान 'ययस्तु' ( क्षयं यातु ) नष्ट हो
जाय । 'ब्रह्मद्विषे' ( ब्राह्मणद्वेष्ट्रे ) ब्राह्मणों से द्वेष (वैर) करने
वाले 'क्रव्यादे' ( क्रव्यम्–अदते ) मांस के खाने वाले 'घोरचक्षसे'