निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
हिन्दी निरुक्त । २१
शार्वरेण तमसा दिग्धानि सर्वद्रव्याणि प्रकाशोदकेन
धौतानिव करोतीत्यर्थः ॥
भाई बिना की कन्या जिस प्रकार पिताकी दी हुई होकर भी,
और पतिकी स्वीकारकी हुई होकर भी, सन्तान कर्म पिण्डदानके
लिये अपने बापके वंशमें ही आ जाती है। किन्तु पतिके घरमें
नहीं, उसी प्रकार उषा रात्रिके पिछले पहरमें आकाशमें चढ़ जाती
है। जिस प्रकार कोई दाक्षिणात्या (दक्षिण देशकी) स्त्री, जो
पति और पुत्रसे हीन है, धनकी प्राप्तिके लिये गर्त या सभास्थाणु
(चबूतरा या तख्त) पर चढ़ जाती है, उसी प्रकार उषा आकाशमें
चढ़ जाती है। जिस प्रकार काम-युक्त नारी ऋतुकालमें सुन्दर
वस्त्र धारण कर पतिको अपना रूप दिखाती है, उसी प्रकार उषा
भी मनुष्योंको अपना रूप दिखाती है। और जिस प्रकार हास्य
स्वभाववाली कोई स्त्री हँस कर अपने दाँतोंको दिखाती है, उसी
प्रकार उषा अपने भीतर छुपे हुए सब द्रव्योंके रूपोंको दिखाती है।
नि० अ०—जिस प्रकार भाई बिनाकी स्त्री सन्तान कर्म
पिण्डदानके लिये अपने पिताके वंशके सम्मुख आती है, किन्तु
पतिके घर नहीं। जैसे दक्षिण देशकी (पति-पुत्र-विहीन) स्त्री
धनके लाभार्थ गर्त पर चढ़ती है। 'गर्त' नाम सभास्थाणु (पासे
डालनेके तख्त) का है। 'गृ' निगरणे (क्र्या० प०) धातुसे
है। क्योंकि वह सत्यसङ्गर होता है। अर्थात् प्राय करके उस
पर कितव या जुआरिये 'सत्य-यह यहाँ पर गिरा है, यह नही
गिरा',—इस प्रकार सत्य शब्दको बहुत बोलते हैं। जो झूठके
लिये होता है, इसीसे वह सत्यसङ्गर और गर्त है। वहाँ उसे वह
स्त्री आरोहण करती है, जो पति और पुत्रसे रहित है। उस स्त्रीको
वहाँ अक्षों या पासोंसे ताड़न करते है (और) वह पतिके भागको
प्राप्त होती है।
२२ ३ अ० १ पा० ५ खं० ।
[ गर्त्त के प्रसङ्ग से ] श्मशान सञ्चय या मुरदे जलानेकी चबूतरी
भी 'गर्त्त' कहाती है। 'गुरी' उद्यमने (तु० आ०) धातुसे है।
क्योंकि—वह अपगूर्ण या लोकके विनाशके अर्थ उद्यत जैसा होता
है। अर्थात् वहाँ पर जो पिशाच आदि भूत रहते हैं, वे मनुष्योंकी
मृत्युको माँगते रहते हैं, और उनके मरने पर प्रसन्न होते हैं।
[ व्याख्यानके प्रसङ्गसे ] 'श्मशान' श्मशयनसे है। क्योंकि—
वहाँ 'श्म' शयन करता है। क्योंकि वह मरे हुएका वहाँ पर फेंक
दिया जाता है। 'श्म' नाम शरीरका है। 'शरीर' 'शॄ' हिंसायाम्
(क्र्या० प०) धातुसे है। 'श्मश्रु' नाम लोम (रोम) का है।
क्योंकि वह 'श्म' (शरीर) में आश्रित रहता है। 'लोम' शब्द
'लूञ्' छेदने (क्र्या० उ०) धातुसे है। अथवा 'लीङ्' श्लेषणे
(दि० आ०) धातुसे है। [क्योंकि—वह छेदन किया जाता है,
अथवा शरीरमें लगा हुआ रहता है।]
[ गर्त्त शब्दकी श्मशान वाचकता पर निगम ]
"ऊपरको न उघाड़ना चाहिये, यदि ऊपरको उघाड़े, तो यजमान
श्मशानमें सोवे, या मर जावे।" यह भी निगम है। [अपि
शब्दसे और निगमोंकी सम्भावना भी दिलाते हैं।] रथ भी 'गर्त्त'
कहलाता है। स्तुति-अर्थमें 'गृ' (क्र्या० प०) धातुसे है।
क्योंकि वह और यानोंसे सुखदायी यान (सवारी) है, अतः अधिक
प्रशंसा योग्य है।
[ रथ अर्थमें निगम ]
“आरोहथो मित्र" इत्यादि । "हे मित्र ! हे वरुण ! तुम
दोनों गर्त्त या रथ पर चढ़े हुए हो।" यह भी निगम है।
जिस प्रकार ऋतुकालमें कामयुक्त स्त्री सुन्दर वस्त्र धारण कर
पतिको रूप दिखाती है। जिस प्रकार हसना स्त्री दाँतोंको
२४ ३ अ० १ पा० ५ ख० ।
अभ्रातृमतोवादके अनुसार "शासदद्वन्हिः" इसके पूर्वार्द्ध का
अर्थ :-
उसी अभ्रातृमती कन्याका जो पुत्र है, उसीको पुत्रिका विधानके
द्वारा अपना अभिनिवेश या अभिमान कर लेनेसे अपुत्र नाना अपना
पौत्र मानता है। किन्तु अन्य भाईवाली कन्याओंके पुत्रोंको नहीं।
ऐसा न माननेसे सभी विवाहने वाले अपुत्र होंगे, तथा उससे
विवाहका परिश्रम व्यर्थ ही होगा। और पुत्रिकाके पिताकी भी
भार्या दूसरेकी कन्या है, इससे उसमें भी जो कन्या होगी, वह
नाना ही की होगी किन्तु दूसरे पुत्रिका पिताकी नहीं। यह सब
बात अनिष्ट है। इस कारण जोही कन्या अभिनिवेश पूर्वक पुत्रिका
की जाती है, उसीका पुत्र मातामहका होता है सब कन्याओंका
नहीं। और वह दायकी स्वामिनी होती है किन्तु भ्रातृमती नहीं।
इसीलिये "पिता यत्र" इत्यादि उत्तरार्द्ध कहा है।
पुत्रिका—जो अपुत्र पिता अपनी कन्याको इसलिये दूसरेको
देता है कि—उसके पुत्रको वह ले लेगा, वह कन्या पुत्रिका
कहलाती है।
अभ्रातृकाके पुत्र नानाके मुख्य पौत्र हैं और भ्रातृमती कन्याके
भी पुत्र कहीं लोक और वेदमें नानाके पौत्र कहे जाते हैं, किन्तु वे
गौणपौत्र हैं और अपने पिताके मुख्य पुत्र हैं।
जबकि अभ्रातृका कन्याका पिता उसका पुत्रिका धर्मसे विवाह
कर दे और बादमें उसके पुत्र हो जावें तो धनके विभाग कालमें
ज्येष्ठ भ्राताका जो भाग है वह उस पुत्रिकाको मिलेगा और सब
पुत्रोंको यथा भाग धन मिलेगा। किन्तु और सब कन्याएँ भाग
रहित ही होती हैं। सोही इस अगली ऋचासे कहा जाता है, जिस
प्रकार कि-अन्य कन्याओंका भाग नहीं है।
“गर्तारुक्—इव” इसके निरुक्तसे प्रतीत होता है कि यास्क-
मुनिके समयमे दक्षिण देशमें पुत्र विहीन विधवा स्त्रीकी उसे
उसके पतिके धन मिलनेके अर्थ इस प्रकारकी कोई परीक्षा
होती हो और उसके द्वारा उसके पातिव्रत्यका निर्णय माना जाता
हो।
ऐसे सन्दिग्ध अर्थोंके निर्णयके लिये धर्म-शास्त्रमें अनेक
परीक्षाएँ विधान भी की हैं। भगवद्दुर्गाचार्य और सायणाचार्यने
अक्षोंसे ताडनका कोई प्रयोजन स्पष्ट नहीं किया है। यास्कने
गर्त्तको सभास्थाणु, भगवद्दुर्गने अक्षनिर्वपण स्थान और सायणने
गृह तथा औचित्यसे न्यायालय बताया है। हमारी समझमें
जुआरिणी स्त्री-सामान्य लेनेसे भी मन्त्रकी उपमा भले प्रकार बन
सकती है। वह जिस प्रकार धनके लोभसे द्यूतके पीठपर चढ़
जाती है, उसी प्रकार उषा भी आकाशमें चढ़ जाती है॥
उपर। यज्ञमें जो वृक्षसे यूप बनता है, उसका पाँचवाँ भाग
लम्बाईका बिना छिला या छिलके सहित छोड़ दिया जाता है,
और उसे गाड़ देने पर वह गढ़े से जिसमें वह खड़ा होता है बाहर
रह जाता है पर उसे कुश या मृत्तिकासे ढाँप दिया जाता है।
यदि वह उघाड़ा रह जावे तो यजमानकी मृत्युका कारण बनता
है। इसी प्रयोजनको “नोपरस्याविष्कुर्यात्” यह श्रुति कहती है।
(ख० ६)
[निरु०] “न जामये तान्वो रिक्थमारैक् चकार
गर्भं सनितुर्निधानम् । यदी मातरो जनयन्त वह्नि
मन्यः कर्त्ता सुकृतोरन्य ऋन्धन्”
“न जामये” भगिन्यै । ‘जामिः’ अन्ये अस्यां
जनयन्ति । “जामपत्यम् जमतेर्वा स्याद्गतिकर्मणः ।
४
३६ ३ अ० १ पा० ६ खं० ।
निर्गमनप्राया भवति । "तान्वः" आत्मजः पुत्रः ।
"रिक्थं" प्रारिचत् प्रादात् "चकार" एनां गर्भ-
निधानीं 'सनितुः' हस्तग्राहस्य । "यदि मातरो
जनयन्त वह्निम्" पुत्रम् अवह्निञ्च स्त्रियम् । अन्य-
तरः सन्तानकर्त्ता भवति । पुमान् दायादः ।
अन्यतरोऽर्द्धयित्वा जामिः प्रदीयते परस्मै ॥६॥
इति तृतीयाध्यायस्य प्रथमः पादः ॥३, १॥
अर्थः ।
मन्त्रार्थः । "तान्वः" आत्मजः पुत्रः "जामये"
'भगिन्यै' रिक्थं" भागं "न" "आरैक्" 'प्रारिचत्-
प्रादात्' ददाति-इत्यर्थः । [तर्हि किं करोति ?
"सनितुः" 'हस्तग्राहस्य' भर्तुः "गर्भं निधानम्" 'एनां
गर्भनिधानीं' प्रसवसमर्थां "चकार" करोति पु-
ष्णाति । "मातरः" "यदी" यत् पुत्रद्वयं वह्निम्"
'पुवंस्त्रियं च' तत्र "अन्यः 'अन्यतरः" पुमान् सन्तान
कर्त्ता भवति, स एव दायादः । "सुकृतोः" एकेनापि
प्रयत्नेन कृतयोः उत्पादितयोः "अन्यः" 'अन्यतरः'
'जामिः' भगिन्याख्यः "ऋन्धन्" 'अर्द्धयित्वा'
वर्द्धयित्वा 'परस्मै प्रदीयते-इत्यर्थः ।
हिन्दी निरुक्त । २७
आत्मज या पुत्र बहिनको भाग नहीं देता । किन्तु उसके भर्त्ताके
लिये उसे गर्भ धारण करनेमें समर्थ बना देता है। माताएँ जो
पुत्र और पुत्रको जनती हैं, जो कि-एकसे यत्नसे पैदा किये जाते
हैं उनमेंसे एक सन्तानका और दूसरी भगिनी बढ़ाकर दूसरेको
दे दी जाती है ॥
नि० अ०—"जामि" भगिनीके लिये नहीं। 'जामि' क्यो ?
जिससे कि-इसमें दूसरे अपत्यको उत्पन्न करते हैं। 'जाम्' नाम
अपत्यका है। गति अर्थमें 'जम्' (भ्वा० प०) धातुसे है। क्योंकि-
वह प्राप्त करके गई हुई होती है। "तान्व" नाम आत्मज अपनेसे
उत्पन्न पुत्रका है। "रिक्थ" भागको देता है। इसे हाथके पक-
ड़ने वालेके अर्थ गर्भके योग्य बना देता है। माताएँ जो वह्नि या
पुत्र और अवह्नि या स्त्रीको जनती हैं। उनमेंसे एक पुरुष सन्ता-
नका करनेवाला और दाय (धन) का लेने वाला होता है। और
दूसरा भगिनीरूप अपत्य बढ़ा कर दूसरेको दे दिया जाता है ॥३,१ ॥
व्याख्या ।
"नं जामये" मन्त्रसे दो बातें निकलती है कि-भाईको बहिनका
दान-मानसे पोषण करना चाहिये, और वही (भाई) बापके धनका
स्वामी है किन्तु कन्या नहीं। यद्यपि दोनोंकी उत्पत्ति समान यत्नसे
ही होती है तथापि पुत्रसे बापका वंश बढ़ता है और कन्या दूसरेको
दे दी जाती है, इसीसे वह बापके धनकी भागिनी नहीं बनती।
धर्मशास्त्रमें जो गोत्र और सापिण्ड्यको त्याग कर कन्याका देना
लिखा है, उसका मूल यह मन्त्र भी हो सकता है।
पहिले यह कहा गया है कि पुरुषके भी दान, अतिसर्ग और
विक्रय होते है सो वह कदाचित् किसी निमित्तसे होते हैं, और
२८ ३ अ० १ पा० ६ खं० ।
स्त्री तो नियमसे ही दी जाती है, बेची जाती है और त्यागी जाती
है, अर्थात् वह परार्थ ही उत्पन्न की जाती है, इससे वह अभागा है
या पिताके धनकी अधिकारिणी नहीं होती ॥ ६ ॥
इति हिन्दीनिरुक्ते तृतीयाध्यायस्य प्रथमः पादः
समाप्तः ॥ ३, १ ॥
तृतीयाध्याये—
द्वितीयः पादः ।
[ निघण्टुः ] मनुष्याः ( १ ) । नरः ( २ ) ।
धवाः ( ३ ) । जन्तवः ( ४ ) । विशः ( ५ ) ।
क्षितयः ( ६ ) । कृष्टयः ( ७ ) । चर्षशयः ( ८ ) ।
नहुषः ( ६ ) । हरयः ( १० ) । मर्याः ( ११ ) ।
मर्त्यांः ( १२ ) । मर्त्ताः ( १३ ) । व्राताः ( १४ ) ।
तुर्वशाः ( १५ ) । द्रुह्यवः ( १६ ) । आयवः ( १७ ) ।
यदवः ( १८ ) । अनवः ( १८ ) । पूरवः ( २० ) ।
जगतः ( २१ ) । तस्थुषः ( २२ ) । पञ्चजनाः (२३) ।
विवस्वन्तः ( २४ ) । पृतनाः ( २५ । इति पञ्चविंशति-
र्मनुष्य नामानि ॥ ३ ॥
( खण्ड १ )
[ निरुक्तम् ] मनुष्य नामानि उत्तराणि पञ्च-
विंशतिः । मनुष्याः कस्मात् ? मत्वा कर्माणि सी-
व्यन्ति । मनस्यमानेन सृष्टाः । मनस्यतिः पुनर्मन-
स्वीभावे । मनोरपत्यं मनुषाः वा । तत्र पञ्चजनाः
इत्येतस्य निगमाः भवन्ति ॥ १ ॥
३० ३ अ० २ पा० १ खं० ।
अर्थ ।
प्रकृत अपत्य नामोंसे आगे पञ्चीस (२५) मनुष्यके नाम हैं।
'मनुष्य' क्यों ? (क) ज्ञान कर कर्मोंको करते हैं। (ख) हर्ष
युक्त होते हुए प्रजापतिने इन्हें रचा है। 'मनस्य' धातु (नामधातु)
मनस्वीभाव अर्थमे है। [मनस्वोभाव नाम हर्षयुक्त होनेका है।]
(ग) मनुका अपत्य। (घ) अथवा मनुषका अपत्य है। तहाँ
(मनुष्यनामोंमें) 'पञ्चजन' इस नामके निगम बहुत हैं ॥ १ ॥
व्याख्या ।
अपत्य नामोंके अनन्तर मनुष्य नामोंके कहनेका यह प्रयोजन है
कि अपत्य ही बढ़ कर मनुष्य कहलाते हैं। मनुष्यके नामोंमें
'पञ्चजन' शब्दकी प्रामाणिक कई व्याख्याएँ मिलती हैं, इस कारण
'पञ्चजन' शब्दकी व्याख्याको ही प्रस्तुत करते हैं—"तत्र
पञ्चजनाः" ॥ १ ॥
[ निघ० ] आयती (१) । व्यथाना (२) ।
अभीशू (३) । अप्रवाना (४) । विनङ्क॒ सौ (५) ।
गभस्ती (६) । करस्नौ (७) । बाहू (८) ।
भुरिजौ (८) । क्षिपस्ती (१०) । शक्वरी (११) ।
मरिचे (१२) । इति द्वादश बाहु नामानि ॥ ४ ॥
[ निघ० ] अग्रुवः (१) । अराव्यः (२) ।
विशः (३) । क्षिपः (४) । मर्याः (५) ।
रशनाः (६) । धीतयः (७) । अथर्यः (८) ।
विपः (६) । कक्ष्याः (१०) । अवनयः (११) ।
हिन्दी निरुक्त । ३१
हरितः ( १२) । स्वसारः ( १३ ) । जामयः ( १४) ।
सनाभयः ( १५) । योक्त्राणि ( १६) । योजनानि
( १७) । धुरः ( १८) । शाखाः ( १९) । अभी-
शवः ( २०) । दोधितरयः ( २१) । गभस्तयः
( २२) । इति द्वाविंशतिरङ्गुलिनामानि ॥ ५ ॥
( खं० २)
[ निरु० ] तदद्यवाचः प्रथमं मंसीय
येनासुरां अभि देवा असाम ।
ऊर्जाद उत यज्ञियासः पञ्चजना
मम होत्वं जुषध्वम्” ।
[ ऋ० सं० ८, १, १३, ४ ]
“तदद्य वाचः” परम “मंसीय” “येन-असुरान्-
अभि भवेम देवाः” असुराः असुरताः स्थानेषु ।
अस्ताः स्थानेभ्यः-इति वा । अपि वा ‘असुः’
इति प्राणनाम । अस्तः शरीरे भवति । तेन
तद्वन्तः । “सोर्देवान्-असृजत, तत् सुराणां सुर-
त्वम् । असोः असुरान् असृजत, तद् असुराणाम्-
असुरत्वम्” इति विज्ञायते । “ऊर्जाद उत यज्ञि-
यासः । अन्नादाश्च यज्ञियाश्च । ‘उर्क’-इति अन्न-
नाम । ऊर्जयति इति-सतः । पक्कं सुमवृक्णाम्-
इति वा । “पञ्चजना मम होत्रं जुषध्वम् ।”
'गन्धर्वाः, पितरः, देवाः, असुराः, रक्षांसि'-इत्येके ।
'चत्वारो वर्णाः निषादः पञ्चमः'- इति औपमन्यवः ।
'निषादः' कस्मात् ? 'निषण्ण मस्मिन् पापकम्'-
इति नैरुक्ताः । "यत् पाञ्चजन्या विशा ।" पञ्चज-
नीनया विशा । 'पञ्च' पृक्ता संख्या । स्त्रीपुंनपुंसकेषु
अविशिष्टा । बाहुनामानि उत्तराणि द्वादश ।
'बाहू' कस्मात् ? प्रबाधत आभ्यां कर्माणि ।
अङ्गुलिनामानि उत्तराणि द्वाविंशतिः । अङ्गुलियः
कस्मात् ? अग्रगामिन्यो भवन्ति-इति वा । अग्र
गालिन्यो भवन्ति इति वा अग्रकारिण्यो भवन्ति-
इति वा । अङ्कना भवन्ति-इति वा । अञ्चना
भवन्ति इति वा । अपि वा अभ्यञ्जनादेव स्युः ।
तासामेषा भवति ॥ २ ॥
अर्थ ।
"तदद्य वाचः"-इति सौचीकस्य अग्नेरार्षम् ।
तस्य विश्वैर्देवैः सह संवादः । तत्रेयं होतृजपे
विनियुक्ता ।
मन्त्रार्थः-हे देवाः ! अद्य अहम् "तत्"
"प्रथमं" 'परमम्' उत्कृष्टम् "वाचो" वीर्यं "संसीय"
हिन्दी निरुक्त । ३३
मन्ये जाने इत्यर्थः । “येन” वयम् “असुरान्”
“अभिभवाम” ‘अभिभवेम’। “उत” अपि च हे
“यज्ञियासः” यज्ञसम्पादिनो देवाः अपि च हे
“ऊर्जादः !” अन्नभक्षयितारः ! “पञ्चजनाः !”
मनुष्याः ! निषादपञ्चमा वर्णाः यूयम् “मम” “होत्रं”
यज्ञं “जुषध्वम्” सेवध्वम् अनुगृह्णीध्वम् ॥
हे यज्ञके सम्पादन करने वाले देवो ! आज मैं उस वाणीके ऊँचे
बलको जानता हूं, जिससे हम असुरोंको जीत सके। और हे
अन्नके खाने वाले मनुष्यो ! (जिनमे पाँचवाँ वर्ण निषाद है।)
तुम मेरे यज्ञको सेवन करो या अनुग्रह करो ॥
नि० अ०—आज उस वाणीके पूज्य या उत्तम वीर्यको जानता
हूं, जिससे हम असुरोंको तिरस्कार करें, हे देवो ! 'असुर' क्यों
है ? जिससे कि वे स्थानोंमें (चपलताके कारण) अच्छे प्रकार
जम कर नहीं रहते । अथवा देवताओंसे स्थानोंसे गिरा दिये या
हटा दिये गये हैं। अथवा 'असु' यह प्राणका नाम है। क्योंकि—
वह शरीरमें अस्त (डाला हुआ) होता है, उस (प्राण) से वे
(असुर) उस वाले (प्राणवाले) है। ['र' मत्वर्थप्रत्यय । ]
अथवा [ और ब्राह्मणमें कहा हुआ निर्वचन है ] “सु” से देवोंको
रचा है, यह सुरों (देवों) का सुरपना है, और 'असु' से असुरोंको
रचा है, यही असुरोंका असुरपना है”। यह ब्राह्मणमे जाना जाता
है। [ उत्तरार्द्ध-] “ऊर्ज्' अन्नके खानेवाले और यज्ञके सम्पादन
करने वाले। 'ऊर्ज्' यह अन्नका नाम है। 'ऊर्जयति' बल देता
है इस प्रकार कर्तृवाच्य 'ऊर्ज' बलप्राणनयोः (चु० उ० ) धातुसे
है। अथवा पका हुआ होने पर उत्तम प्रकारसे कट जाता है।
३४ ३ अ० २ पा० २ खं० ।
“तुम सब पञ्चजन या मनुष्य मेरे यज्ञको सेवन करो”। 'पञ्चजन'
पाँच जने । ( क ) कोई आचार्य मानते हैं—गन्धर्व, पितर, देव,
असुर और राक्षस ये पांच जने 'पञ्चजन' हैं। ( ख ) चार वर्ण
और पाँचवाँ निषाद ये पाँच पञ्चजन हैं, यह उपमन्युका पुत्र
मानता है। 'निषाद्' क्यों है ? 'इसमें पापकर्म बैठा हुआ है'—यह
नैरुक्त मानते हैं। [ पञ्चजनके दूसरे निर्वचनमे निगम-] “यत्
पाञ्चजनयया विशा”—[ऋ० सं ६, ४, ४३, १] अर्थात् “पाँच
जातियोंमें बटी हुई मनुष्य जातिके सहित ऋत्विजोंने इन्द्रके न
बरसने पर उसकी स्तुति की” इत्यादि । 'पञ्च' क्यो ? जिससे
कि-वह पृक्त संख्या है, अर्थात् स्त्री, पुम्, और नपुंसक तीनों लिङ्गोंमें
समान रूप रहती है।
मनुष्य नामोंके अनन्तर बारह (१२) बाहुके नाम हैं। [क्योंकि
ये मनुष्योंके ही होते हैं, इससे मनुष्य नामोंके अनन्तर कहे गये।]
'बाहु' क्यों ? जिससे कि—इनसे कर्मोंको बहुत बाधित करता
है।
बाहुके नामोंके अनन्तर अङ्गुलियोंके बाईस (२२) नाम हैं।
'अङ्गुलि' क्यों हैं? ये अग्रगामिनी या आगे चलनेवाली होती हैं।
अथवा आगे करने वाली होती हैं। अथवा इनसे जिसे ताडन
किया जाता है, वह अङ्कित जैसा हो जाता है। अथवा इनसे
अभ्यञ्जन (मालिश) की जाती है इसीसे ये अङ्गुलि हो सकती है।
उनके निर्वचनको करने वाली यह ऋचा है—॥२॥
व्याख्या ।
मनुष्योंके नामोंमें २३ वाँ 'पञ्चजन' एक नाम है, जिसका कि—
इस खण्डमें 'तदद्य' यह निगम दिया गया है। कोई आचार्य
मानते हैं कि—यह मनुष्य जातिसे अतिरिक्त पाँच जातियोंके समूह-
को कहता है। जैसे ॰कि—गन्धर्व, पितर, देव, असुर और
राक्षस । और औपमन्यव आचार्य मानते है कि—यह ‘पञ्चजन’
नाम मनुष्य जातिका ही है । जिससे प्रयोजन यह है कि—मनुष्य
जातिमे पाँच विभाग हैं । चार वर्ण (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और
शूद्र) और एक निषाद जाति, जो चारों वर्णोंसे अलग है ।
उक्त आचार्यका मतही यास्क-मुनिको स्वीकृत है । जिसका
प्रमाण आपने “यत्पाञ्चजन्या विशा” यह ऋचा दी है । इस
ऋचामें ‘विशू’ का विशेषण ‘पाञ्चजन्या’ है । ‘विशू’ नाम
मनुष्यका है जो उपर्युक्त निघण्टूक्त मनुष्यके पचीस (२५) नामोंमे
से पाँचवाँ है । इससे इस मन्त्रमें पाँच विभाग वाली मनुष्य
जाति बताई गई और चार प्रसिद्ध ब्राह्मण आदि भागोंके अति-
रिक्त कोई और जातिका इशारा पाया गया, किन्तु वह कौन है ?
इसका उत्तर औपमन्यवके मतसेही (“निषादः पञ्चमः”) दे दिया
है और यही ठीक भी है । क्योंकि--“निषादस्थपतिं याजयेत्”
[ ] अर्थात् निषाद् स्थपतिको यज्ञ करावे ।
“वर्षासु रथकारः” [ ] अर्थात् वर्षा ऋतुमे रथकार आधान
करे इत्यादि श्रुति उसके आधान और यज्ञके अधिकारको बता
रही हैं । स्थपति, निषाद और रथकार एवम् सौधये एक अर्थमें
ही रूढ है । इन नामोंकी व्याख्या या उल्लेख अन्यत्र अन्यत्र
ऋचाओंमें भी पाया जाता है । जैसे—
“रथं ये चक्रुः सुवृत्तम्” [ऋ० सं० ३, ७, ७, ३ ]
“सौधन्वना ऋभवः” [ऋ० सं० १,७,३०,४] इत्यादि ॥२॥
(खण्ड ३)
[ निघ० ] वश्मि (१) । उश्मसि (२) । वेति
(३) । वेनति (४) । वेसति (५) । वाञ्छित ।
३६ ३ अ० २ पा० ३ ख० ।
( ६ ) । वष्टि ( ७ ) । वनोति ( ८ ) । जुषते ( ९ ) ।
हर्यति ( १० ) । आचके ( ११ ) । उशिक् ( १२ ) ।
मन्यते ( १३ ) । छन्तसत् ( १४ ) । चाकमत् ( १५ ) ।
चकमानः ( १६ ) । कनति ( १७ ) । कानिषत् ( १८) ।
इति अष्टादश कान्तिकर्माणः ॥ ६ ॥
( नि०-] अन्धः ( १ ) । वाजः ( २ ) । पयः
( ३ ) । प्रयः ( ४ ) । पृक्षः ( ५ ) । पितुः ( ६ ) ।
वयः ( ७ ) । सिनम् ( ८ ) । अवः ( ९ ) । क्षु ( १० ) ।
धासिः ( ११ ) । इरा ( १२ ) । इला ( १३ ) । इषम्
( १४ ) । ऊर्क् ( १५ ) । रसः ( १६ ) स्वधा ( १७ ) ।
अर्कः ( १८ ) । क्षद्म ( १९ ) । नेमः ( २० ) ।
ससस् ( २१ ) । नम ( २२ ) । आयुः ( २३ ) ।
सूनृता ( २४ ) । ब्रह्म ( २५ ) । वर्चः ( २६ ) ।
कीलालम् ( २७ ) । यशः ( २८ ) इति अष्टाविंशतिः
अन्ननामानि ॥ ७ ॥
[ निघ०-] आवयति ( १ ) । भर्वति ( २ ) ।
बभस्ति ( ३ ) । वेति ( ४ ) । वेवेष्टि ( ५ ) । अवि-
ष्यन् ( ६ ) । वप्सति ( ७ ) । भसथः ( ८ ) । बब्धाम्
( ९ ) । व्हरति ( १० ) इति दश अत्तिकर्माणः ॥८॥
[ निघ०-] ओजः ( १ ) । वाजः ( वा ) । पाजः
( ३ ) । शवः ( ३ ) । तरः ( ४ ) । तवः ( ५ ) ।
त्वक्षः ( ६ ) । शर्द्धः ( ७ ) । बाधः ( ८ ) । नृम्णम्
( ६ ) । तविषी ( १० ) । शुष्मम् ( ११ ) । शुष्णम्
( १२ ) । शूषम् ( १३ ) । दक्षः ( १४ ) । वीलु
( १५ ) । च्यौत्नम् ( १६ ) । सहः ( १७ ) । यहः
( १८ ) । वध्रः ( १६ ) । वर्गः ( २० ) । वृजनम्
( २१ ) । वृक् ( २२ ) । मज्शना ( २३ ) ।
यौंस्यानि ( २४ ) । धर्णांसिः ( २५ ) । द्रविणम् (२६) ।
स्यन्द्रासः ( २७ ) । शम्बरम् ( २८ ) । इत्यष्टाविंशति
र्बलनामानि ॥ ६ ॥
[ निघ० ] मघम् ( १ ) । रेक्णः ( २ ) ।
रिक्थम् ( ३ ) । वेदः ( ४ ) । वरिवः ( ५ ) ।
श्वात्रम् ( ६ ) । रत्नम् ( ७ ) । रयिः ( ८ ) । क्षत्रम्
( ६ ) । भगः ( १० ) । मीळ्हुम् ( ११ ) । गयः
( १२ ) । द्युम्नम् ( १३ ) । इन्द्रियम् ( १४ ) । वसु
( १५ ) । रायः ( १६ ) । राधः ( १७ ) । भोजनम्
( १८ ) । तना ( १६ ) । नृम्णम् ( २० ) । वन्धुः
( २१ ) । मेधा ( २२ ) । यशः ( २३ ) । ब्रह्म ( २४ ) ।
३८ ३ अ० २ पा० ३ खं० ।
द्रविणम् ( २५ ) । अवः ( २६ ) । वृत्रम् ( २७ ) ।
वृतम् ( २८ ) । इति अष्टाविंशतिरेव धननामानि
॥ १० ॥
[ निघ० ] अघ्न्या ( १ ) । उस्रा २ । उस्रि-
या ( ३ ) । अही ( ४ ) । मही ( ५ ) । अदितिः
( ६ ) । इला ( ७ ) । जगती ( ८ ) । शक्वरी ( ६ ) ।
इति नव गोनामानि ॥ ११ ॥
[ निघ० ] रॆलते ( १ ) । हेलते ( २ ) । भामते
( ३ ) । हृणीयते ( ४ ) । भीणाति ( ५ ) । भॆषति
( ६ ) । दोषति ( ७ ) । वनुष्यति ( ८ ) । कम्पते
( ६ ) । भोजते (१०) । इति दश क्रुध्यतिकर्माणः ॥ १ ॥
[ निघ० ] हेलः ( १ ) । हरः ( २ ) । घृणिः
( ३ ) । त्यजः ( ४ ) । भामः ( ५ ) । राहः ( ६ )
ह्वरः ( ७ ) । तपुषी ( ८ ) । जूर्णिः ( ६ ) । मन्युः
(१०) । व्यथिः (११) । इत्येकादश क्रोधनामानि ॥१३॥
[ निघ० ) वर्त्तते ( १ ) । अयते ( २ ) । लोटते
( ४ ) । स्यन्दते ( ५ ) । कसति ( ६ ) । सर्पति
( ७ ) । स्यमति ( ८ ) । स्रवति ( ६ ) । स्रंसति
( १० ) । अवति ( ११ ) । श्चोतति ( १२ ) । ध्वंसति
हिन्दी निरुक्त । ३६
( १३ ) । वेनति ( १४ ) । मार्ष्टि ( १५ ) । भुर-
ण्यति ( १६ ) । शवति ( १७ ) । कालयति ( १८ ) ।
पेलयति ( १९ ) । कष्टति ( २० ) । पिस्यति
( २१ ) । विस्यति ( २२ ) । मिस्यति ( २३ ) ।
प्रवते ( २४ ) । प्लवते ( २५ ) । च्यवते ( २६ ) ।
कवते ( २७ ) । गवते ( २८ ) । नवते ( २९ ) ।
क्षोदति ( ३० ) । नक्षति ( ३१ ) । सक्षति ( ३२ ) ।
स्यन्दति ( ३३ ) । सचति ( ३४ ) । ऋच्छति ( ३५ ) ।
तुरीयति ( ३६ ) । चतति ( ३७ ) । अतति ( ३८ )
गाति ( ३९ ) । इयक्षति ( ४० ) । सश्चति ( ४१ ) ।
त्सरति ( ४२ ) । रंहति ( ४३ ) । यतते ( ४४ ) ।
भ्रमति ( ४५ ) । ध्रजति ( ४६ ) । रजति ( ४७ ) ।
लजति ( ४८ ) । क्षियति ( ४९ ) । धमति ( ५० ) ।
मिनाति ( ५१ ) । ऋण्वाति ( ५२ ) । ऋणोति
( ५३ ) । स्वरति ( ५४ ) । सिसर्ति ( ५५ ) ।
विषिष्टि ( ५६ ) । योषिष्टि ( ५७ ) । रिणाति ( ५८ ) ।
रीयते ( ५९ ) । रेजति ( ६० ) । दध्यति ( ६१ ) ।
दभ्नोति ( ६२ ) । युध्यति ( ६३ ) । धन्वति ( ६४ ) ।
अरुषति ( ६५ ) । आर्व्वति ( ६६ ) । सोयते ( ६७ ) ।
तकति ( ६८ ) । दोयति ( ६९ ) । ईषति ( ७० ) ।
फणति ( ७१ ) । हनति ( ७२ ) । अर्दति ( ७३ ) ।
४० ३ अ० २ पा० ३ ख० ।
मर्दति ( ७४ ) । ससृ॑ते ( ७५ ) । नसते ( ७६ ) ।
हर्म्य॑ति ( ७७ ) । इयत्ति॑ ( ७८ ) । ईर्त्तै ( ७९ ) ।
ईङ्खते ( ८० ) । अयति ( ८१ ) । श्नावति ( ८२ ) ।
गन्ति ( ८३ ) । आगनीगन्ति ( ८४ ) । जङ्गन्ति
( ८५ ) । जिन्वति ( ८६ ) । जसति ( ८७ ) । गमति
( ८८ ) । ध्रुति ( ८९ ) । ध्राति ( ९० ) । ध्रयति
( ९१ ) । वहते ( ९२ ) । रथर्य॑ति ( ९३ ) । जेहते
( ९४ ) । ष्षकति ( ९५ ) । चुम्यति ( ९६ ) ।
स्माति ( ९७ ) । वाति ( ९८ ) । याति ( ९९ ) ।
द्रुषति ( १०० ) । द्राति ( १०१ ) । द्रूलति
( १०२ ) । राजति ( १०३ ) । जमति ( १०४ ) ।
जवति ( १०५ ) । वञ्चति ( १०६ ) । अनिति
( १०७ ) । पवते ( १०८ ) । हन्ति ( १०९ ) ।
सेधति ( ११० ) । अगन् ( १११ ) । अजगन्
( ११२ ) । जिगाति ( ११३ ) । पतति ( ११४ ) ।
इन्वति ( ११५ ) । द्रमति द्रवति ( ११६ ) ।
( ११७ ) । वेति ( ११८ ) । हन्तात् ( ११९ ) ।
एति ( १२० ) । जगायात् ( १२१ ) । अययुः ( १२२ ) ।
इत द्वाविंशतं गतिकर्माणः ॥ १४ ॥
[ निघ० ] नु ( १ ) । मक्षु ( २ ) । द्रवत् ( ३ ) ।
ओषम् ( ४ ) । जीराः ( ५ ) । जूर्णिः ( ६ ) । शूर्त्ताः
हिन्दी निरुक्त। ४१
( ७ )। शूथनासः ( ८ )। शोभम् ( ९ )। दृषु
( १० )। तूयम् ( ११ )। तूर्णिः ( १२ )। अजिरम्
( १३ )। भुरण्यः ( १४ )। शु ( १५ )। आशु
( १६ )। प्राशुः ( १७ )। तूतूजिः ( १८ )। तूतूजानः
( १९ )। तुज्यमानासः ( २० )। अञ्जाः ( २१ )।
साचीवित् ( २२ )। द्युगत् ( २३ )। ताजत् ( २४ )।
तरणिः ( २५ )। वातरंहा ( २६ )। इति षड्विंशतिः
क्षिप्रनामानि ॥ १५ ॥
[ निघ० ] ततित् ( १ )। आसात् ( २ )।
अम्बरम् ( ३ )। तुर्वशे ( ४ )। अस्तमीके ( ५ )।
आके ( ६ )। उपाके ( ७ )। अर्वाके ( ८ )। अन्त-
मानाम् ( ९ )। अवमे ( १० )। उपमे ( ११ )।
इति एकादश अन्तिकनामानि ॥ १६ ॥
[ निघ० ] रणः ( १ )। विवाक् ( २ )। विस्खादः
( ३ )। नदनुः ( ४ )। भरे ( ५ )। आक्रन्दे ( ६ )।
आहवे ( ७ )। वाजौ ( ८ )। पृतनाज्यम् ( ९ )।
अभीके ( १० )। समीके ( ११ )। म्रक्षसत्यम् ( १२ )।
नेमधिता ( १३ )। सङ्गाः ( १४ )। समितिः ( १५ )।
समनम् ( १६ )। मौव्वहे ( १७ )। पृतनाः ( १८ )।
स्पृधः ( १९ )। मृधः ( २० )। पृत्सु ( २१ )।
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