निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
पृष्ठ 343, कुल 1282 में से
संदर्भ में पढ़ेंराक्षस । और औपमन्यव आचार्य मानते है कि—यह ‘पञ्चजन’
नाम मनुष्य जातिका ही है । जिससे प्रयोजन यह है कि—मनुष्य
जातिमे पाँच विभाग हैं । चार वर्ण (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और
शूद्र) और एक निषाद जाति, जो चारों वर्णोंसे अलग है ।
उक्त आचार्यका मतही यास्क-मुनिको स्वीकृत है । जिसका
प्रमाण आपने “यत्पाञ्चजन्या विशा” यह ऋचा दी है । इस
ऋचामें ‘विशू’ का विशेषण ‘पाञ्चजन्या’ है । ‘विशू’ नाम
मनुष्यका है जो उपर्युक्त निघण्टूक्त मनुष्यके पचीस (२५) नामोंमे
से पाँचवाँ है । इससे इस मन्त्रमें पाँच विभाग वाली मनुष्य
जाति बताई गई और चार प्रसिद्ध ब्राह्मण आदि भागोंके अति-
रिक्त कोई और जातिका इशारा पाया गया, किन्तु वह कौन है ?
इसका उत्तर औपमन्यवके मतसेही (“निषादः पञ्चमः”) दे दिया
है और यही ठीक भी है । क्योंकि--“निषादस्थपतिं याजयेत्”
[ ] अर्थात् निषाद् स्थपतिको यज्ञ करावे ।
“वर्षासु रथकारः” [ ] अर्थात् वर्षा ऋतुमे रथकार आधान
करे इत्यादि श्रुति उसके आधान और यज्ञके अधिकारको बता
रही हैं । स्थपति, निषाद और रथकार एवम् सौधये एक अर्थमें
ही रूढ है । इन नामोंकी व्याख्या या उल्लेख अन्यत्र अन्यत्र
ऋचाओंमें भी पाया जाता है । जैसे—
“रथं ये चक्रुः सुवृत्तम्” [ऋ० सं० ३, ७, ७, ३ ]
“सौधन्वना ऋभवः” [ऋ० सं० १,७,३०,४] इत्यादि ॥२॥
(खण्ड ३)
[ निघ० ] वश्मि (१) । उश्मसि (२) । वेति
(३) । वेनति (४) । वेसति (५) । वाञ्छित ।