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सर्वकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 341, कुल 1282 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 341

हिन्दी निरुक्त । ३३

मन्ये जाने इत्यर्थः । “येन” वयम् “असुरान्”
“अभिभवाम” ‘अभिभवेम’। “उत” अपि च हे
“यज्ञियासः” यज्ञसम्पादिनो देवाः अपि च हे
“ऊर्जादः !” अन्नभक्षयितारः ! “पञ्चजनाः !”
मनुष्याः ! निषादपञ्चमा वर्णाः यूयम् “मम” “होत्रं”
यज्ञं “जुषध्वम्” सेवध्वम् अनुगृह्णीध्वम् ॥
हे यज्ञके सम्पादन करने वाले देवो ! आज मैं उस वाणीके ऊँचे
बलको जानता हूं, जिससे हम असुरोंको जीत सके। और हे
अन्नके खाने वाले मनुष्यो ! (जिनमे पाँचवाँ वर्ण निषाद है।)
तुम मेरे यज्ञको सेवन करो या अनुग्रह करो ॥
नि० अ०—आज उस वाणीके पूज्य या उत्तम वीर्यको जानता
हूं, जिससे हम असुरोंको तिरस्कार करें, हे देवो ! 'असुर' क्यों
है ? जिससे कि वे स्थानोंमें (चपलताके कारण) अच्छे प्रकार
जम कर नहीं रहते । अथवा देवताओंसे स्थानोंसे गिरा दिये या
हटा दिये गये हैं। अथवा 'असु' यह प्राणका नाम है। क्योंकि—
वह शरीरमें अस्त (डाला हुआ) होता है, उस (प्राण) से वे
(असुर) उस वाले (प्राणवाले) है। ['र' मत्वर्थप्रत्यय । ]
अथवा [ और ब्राह्मणमें कहा हुआ निर्वचन है ] “सु” से देवोंको
रचा है, यह सुरों (देवों) का सुरपना है, और 'असु' से असुरोंको
रचा है, यही असुरोंका असुरपना है”। यह ब्राह्मणमे जाना जाता
है। [ उत्तरार्द्ध-] “ऊर्ज्' अन्नके खानेवाले और यज्ञके सम्पादन
करने वाले। 'ऊर्ज्' यह अन्नका नाम है। 'ऊर्जयति' बल देता
है इस प्रकार कर्तृवाच्य 'ऊर्ज' बलप्राणनयोः (चु० उ० ) धातुसे
है। अथवा पका हुआ होने पर उत्तम प्रकारसे कट जाता है।