निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
हिन्दी निरुक्त । ८६
दोनों मिलित देवताओंकी-[ उदाहरण ] आदित्या दानुनस्पती" ।
अर्थात् अदितिके पुत्र और दानके पति [ मित्रावरुण है । ] दानके
पति । और भी अकेले मित्रकी स्तुतिमें “प्रसमित्र०” । अर्थात्
‘हे मित्र ! अदितिके पुत्र ! वह मनुष्य अन्नवान् हो, जो तेरे लिये
निर्वपण आदि कर्मसे संस्कार करके इस चरु-रूप हविः को देता है’
यह निगम होता है। और भी अकेले वरुणको ‘आदित्य’ नामसे
स्तुतिमें—“अथाव ” । ‘हे अदितिके पुत्र ! हम तेरे व्रतमें
आदर-युक्त हों।’ [ यह निगम है ।] ‘व्रत’ यह कर्मका नाम है।
[ क्योकि- ] वह कर्त्ताको आवरण कर लेता है। कर्त्तृवाच्य ‘वृञ्’
( स्वा० उ० ) धातुसे । यह भी दूसरा ‘व्रत’ शब्द जो यम, नियम
आदिका वाचक है इसी धातुसे होता है। यहाँ निवृत्ति , अर्थ है।
कर्त्तृवाच्य णिजन्त ‘वारयति’ इस क्रियारूपसे है। अन्न भी व्रत
कहाता है। जो शरीरको आवरण या व्यापन कर लेता है ॥ १ ॥
व्याख्या ।
द्युलोक भी अन्तरिक्षका ही एक उच्चतम भाग है, एवम् उसीमें
आदित्यमण्डल घूमता है, इससे अन्तरिक्षनामोंके अनन्तर इन
दोनोंके साधारण नाम कहे गये हैं। यद्यपि देवताओंके नामोंकी
व्याख्याके लिये दैवतकाण्ड स्वतन्त्र स्थान है, अतः आदित्यके नाम
होनेसे ये उसी काण्डमें चाहिये, तथापि द्युलोकके सम्बन्धसे ये
नाम यहाँ नैघण्टुक काण्डमें संग्रह किये गये हैं। इसीसे जिन
आदित्यके नामोंसे मन्त्रोंमें आदित्यकी मुख्यतासे स्तुति आती है,
उन ‘सविता’, भग’ आदि नामोंकी व्याख्या दैवतकाण्डमें
ही होगी ।
व्याख्येय ‘खः’ आदि छः नामोंमें भाष्यकारको कुछ अल्प
वक्तव्य है, किन्तु इनके व्याख्याभूत ‘आदित्य’ शब्दमे अनेक विशेष
६० २ अ० ४ पा० १ खं० ।
हैं, उन्हींके उद्घाटन करनेके लिये कौतुकवश पहिले ही यह प्रश्न
उठाते हैं—'आदित्यः कस्मात्' ? यहाँ पर 'आदित्य' शब्दके चार
अर्थ दिखाये हैं, जिनमें प्रथम तीन अर्थ-रसोंका आदान, ज्योतियों-
की दीप्तिका आदान और प्रकाशसे व्याप्त होना, आदित्य मात्रमें
घटते हैं, और चतुर्थ अर्थ 'अदितिका पुत्रभाव' सूर्य तथा अन्य मित्र
आदि सब देवताओंमें साधारण है, इससे उस अर्थको लेकर यह
'आदित्य' शब्द और देवताओंके लिये भी विशेषणरूपसे आता है।
भगवद्दुर्गाचार्यने “अल्पप्रयोगं तु अस्यैतद् आर्चाम्याम्नाये”
यह पंक्ति 'आदितेय' नामके अभिप्रायसे और 'सूक्तभाक्, सूर्यमादि-
तेयम्'-यह पङ्क्ति 'आदितेय' नामके अभिप्रायसे लगाई है, किन्तु
हमारे विचारमें “आदित्यः कस्मात्” से “अथाप्ययमादित्य व्रते तव”
तक आदित्य शब्दका ही सम्बन्ध है। आपको प्रकरण भेद करनेका
मुख्य कारण “सूर्यमादितेयम्” यह उदाहरण है, इसीके कारण
आपने 'सूक्तभाक्' इस वाक्यके लिये 'आदितेयः इति' का अध्या-
हार किया। किन्तु वास्तवमें यह ठीक नहीं प्रतीत होता। वस्तुतः
'सूर्यमादितेयम्' यह सूर्यमें आदित्य प्रवाद स्तुतिका उदाहरण ही
है। इसीसे 'अन्यसामपि देवता नामादित्यप्रवादाः स्तुतयो
भवन्ति'—इस अग्रिम पङ्क्तिमें अपि शब्द दिया है। जिसका अभि-
प्राय यह है कि जिस प्रकार 'सूर्यमादितेयम्' इस उक्त उदाहरणमें
सूर्यकी आदित्यप्रवाद स्तुति है, उसी प्रकार और देवताओंकी भी
हैं। यास्कके अभिप्रायमें 'आदित्य' और 'आदितेय' दोनों
समानार्थ हैं।
इसके अतिरिक्त यह भी है कि 'आदित्य' शब्दके प्रथम तीन
निर्वचन प्रत्यक्ष सिद्ध हैं, किन्तु चतुर्थ निर्वचन ही प्रमाणापेक्ष है,
इससे यह उदाहरण दिया है, जिससे सूर्यको अदितिपुत्रता स्पष्ट
उक्त होती है।
६२ २ अ० ४ पा० २ ख०।
आदित्यप्रवादाः। आदित्येन आदित्य-इति नाम्ना प्रवादः
प्रकर्षेण वादः स्तवनं यासु, ताः आदित्यप्रवादाः। जिन स्तुतियोंमे
आदित्य नामसे विशेष कर स्तुति या कथन हो वे स्तुतियें आदित्य-
प्रवाद होती हैं ॥ १ ॥
(खण्ड २)
(निरु०) 'स्वः'—आदित्यो भवति । सु-अरणः,
सु-ईरणः। स्वृतो रसान् । स्वृतो भासं ज्योति-
षाम्। स्वृतो भाषा-इति वा। एतेन द्यौ
व्याख्याता । 'पृश्निः' आदित्यो भवति । प्राश्नुते-
एनं वर्णः-इति नैरुक्ताः । संस्पृष्टा रसान् ।
संस्पृष्टा भासं ज्योतिषाम् । संस्पृष्टो भासा-इति
वा । अथ द्यौः-संस्पृष्टा ज्योतिर्भिः पुण्यकृद्भिञ्च ।
'नाकः' आदित्यो भवति । नेता भासाम् । ज्योतिषां
प्रणयः। अथ द्यौः-'कम्'-इति सुखनाम, तत्
प्रतिषिद्धं प्रतिषिध्येत ।
“न वा अमुं लोकं जग्मुषे किञ्च नाकम्” ।
न वा अमुं लोकं जग्मुषे किञ्चन-असुखम्,
पुण्यकृतो हि-एव तत्र गच्छन्ति। 'गौः' आदित्यो
भवति । गमयति रसान् । गच्छति-अन्तरिक्षे ।
अथ “द्यौ”-यत्-पृथिव्या अधि दूरं गता भवति ।
यच्च-अस्यां ज्योतींषि गच्छन्ति । 'विष्टप्' आदित्यो
हिन्दी निरुक्त । ६३
भवति । आविष्टो रसान् । आविष्टो भासं
ज्योतिशाम् । आविष्टो भासा-इति वा । अथ
द्यौः-आविष्टा ज्योतिर्भिः पुण्यकृद्भिञ्च । 'नभः'
आदित्यो भवति । नेता भासाम् । ज्योतिषां
प्रणयः । अपि वा भन एव स्याद्विपरीतः । न'न
भाति-इति वा । एतेन द्यौ व्याख्याता ॥ २ ॥
इति द्वितीयाध्यायस्य चतुर्थः पादः ॥ २, ४ ॥
अर्थ ।
[ दोनों पक्षोंमें छहों शब्दोंका निर्वचन । ]
(आदित्य पक्षमें-) 'खर्' (१) आदित्य होता है । (क्योंकि-)
सुन्दर गमन करता है । ( ऋ' गतौ (जु० प०) धातुसे । ) सुन्दर
प्रेरण करनेवाला है । [ अर्थात् उसके उदय होते ही सब लोक
अपने कर्ममें लगजाता है । ] [ 'ईर्'गतौ (अदा० आ०) धातुसे । ]
सुन्दर रसोंके प्रति गया हुआ । [ सूर्यकी किरणें पृथ्वी पर सब
जलको खे'चनेके लिये आती हैं । ] सब ज्योतियोंके प्रकाशके प्रति
गया हुआ । [ क्योंकि सूर्यकी ज्योतिसे ही चन्द्र आदि ज्योति
चमकते हैं । ] अथवा भास् या प्रकाशसे घिरा हुआ । [ द्युलोक-
पक्षमें । ] इससे द्यौ भी व्याख्याकी गई । [ आदित्यवाली बातें
आदित्य-लोकमे भी हैं, इससे वे ही अर्थ इस पक्षमें ले लेने
चाहियें । ] आदित्य पक्षमें-] 'पृश्नि' ( २ ) आदित्य है।
[ क्योंकि-] नैरूक्त कहते हैं कि—'इसे वर्ण बाहुल्यसे व्याप्त करता
है। रसोंको अच्छे प्रकार स्पर्श करता है। ज्योतियोकी भास्
को अच्छे प्रकार स्पर्श करने या छूनेवाला । अथवा भास् या
दीप्तिसे छूया हुआ। [द्युलोक पक्षमें-] और द्यौ (द्युलोक)
ज्योतियों या ग्रह-ताराओसे और पुण्यवान् पुरुषोंसे छूई हुई।
[आदित्य पक्षमें-] 'नाक' (३) आदित्य है। [क्योंकि-] वह
भासों या प्रकाशो का नेता है। और ज्योतिश्चक्र या ग्रहमण्डलका
घुमानेवाला। [इन्ही भगवान् सूर्यदेवके रश्मिजालके अग्रोंमें लगा
हुआ ज्योतिश्चक्र घुमता है।] [द्युलोक पक्षमे-] और 'द्यौः'
[नाक क्यो है?] 'क' यह सुखका नाम है। उसका प्रतिषेध
करके प्रतिषेध किया जावेगा। [अर्थात् जो 'क' सुख नहीं है,
वह 'अक' दुःख होता है, और 'अक' या दुःख जिसमें न हो, वह
नाक होता है। द्युलोकमें दुःख न होनेसे वह 'नाक' है। 'न,
अ, क'—इन तीन शब्दोके जुडनेसे 'नाक' शब्द होता है।] [इस
अर्थमें ब्राह्मण प्रमाण है-] “न वा ० ०”। उस लोकमें गये हुए
को कोई असुख या दुःख नहीं होता। क्योकि वहाँ पुण्यकर्मके
करनेवाले ही जाते हैं। [आदित्य पक्षमें-] 'गो' (४) आदित्य
होता है। [क्यों?-] रसोको अपनी ओर ले जाता है, या उन्हें
पृथवीसे सुखा देता है। [अथवा-] अन्तरिक्षमें चलता है। और
द्यौ [क्यों 'गो' है?] जिससे कि—वह पृथवीके ऊपर दूर गई हुई
होती है। और जिससे कि—इसमें ज्योतिष्गण गमन करते हैं।
[आदित्य पक्षमें-] विष्टप्' (५) आदित्य होता है। [क्योकि-]
यह सम्मुख भावसे पृथिवी और अन्तरिक्षके रसोको अपनी
किरणोंसे लेनेको उनके प्रति लगा हुआ होता है। और ज्योतिषों
या ग्रहोकी भासाके प्रति आविष्ट अर्थात् प्रवेश किये हुए रहता है।
अथवा भास् या दीप्तिसे प्रविष्ट होता है। [द्युलोक पक्षमें-]
और द्यौः [क्यों 'विष्टप्' है?] वह ज्योतियों और पुण्यवानोंसे
प्रवेशकी हुई होती है। [आदित्य पक्षमें-] नभस्' (६) आदित्य
होता है। [क्योंकि-] भासःओंका नेता होता है। और ज्योतियों-
हिन्दी निरुक्त । ६५
का प्रणयण या घुमानेवाला है। अथवा 'भन्' शब्द ही उलटा
हो। अर्थात् भासन होता हुआ ही विपरीत होकर नभ' होगया ।
अथवा 'नहीं प्रकाश होता हुआ नहीं, अर्थात् अवश्य प्रकाश होने-
वाला। [द्युलोक पक्षमें-] इससे द्यौ का भी व्याख्यान हो चुका ।
[अर्थात् ये ही प्रकार उसमें भी जानने जो आदित्य पक्षमें
हैं।] ॥२॥
इति हिन्दीनिरुक्ते द्वितीयाध्यायस्य चतुर्थ पादः
समाप्तः ।
६६ २ अ० ५ पा० १ खं० ।
पञ्चमः पादः ।
[ निघ० ] खदयः (१) । किरणाः (२) ।
गावः (३) । रश्मयः (४) । अभीशवः (५) । दी-
धितयः (६) । गभस्तयः (७) । वनम् (८) ।
उस्राः (६) । वसवः (१०) । मरीचिपाः (११) ।
मयूखाः (१२) । सप्त ऋषयः (१३) । साध्याः
(१४) । सुपर्णाः (१५) । इति पञ्चदश रश्मि-
नामानि ॥ ५ ॥
[ निघ० ] आताः (१) । ओशाः (२) । उपराः
(३) । आष्ठाः (४) । काष्ठाः (५) । व्योम (६) ।
ककुभः (७) । हरितः (८) । इति अष्टौ दिङ्
नामानि ॥ ६ ॥
( खण्ड १ )
[ निरु० ] रश्मिनामानि-उत्तराणि पञ्चदश । 'रश्मिः
यमनात् । तेषाम्-आदितः साधारणानि
पञ्च अश्वरश्मिभः । दिङ् नामानि उत्त-
राणि-अष्टौ । 'दिशः' कस्मात् ? दिशतेः ।
आसदनात् । अपि वा अभ्यशनात् । तत्र
'काष्ठा' इत्येतद् अनेकस्यापि सत्वस्य
भवति । काष्ठा दिशो भवन्ति । क्रान्त्वा
हिन्दी निरुक्त । ६३
स्थिता भवन्ति । काष्ठा उपदिशो भवन्ति ।
इतरेतरं क्रान्त्वा स्थिता भवन्ति ।
आदित्योऽपि काष्ठा उच्यते । क्रान्त्वा
स्थितो भवति । आज्यन्तः-अपि काष्ठा
उच्यते । क्रान्त्वा स्थितो भवति । आपः-
अपि काष्ठा उच्यते । क्रान्त्वा स्थिता
भवन्ति-इति स्थावराणाम् ॥ १ ॥
अर्थ ।
दिव् व आदित्यके नामोंके अनन्तर पन्द्रह ( ५ ) रश्मि (किरण
या लगाम) के नाम हैं । 'रश्मि' क्यों ? जलो या अश्वोंके यमन
(थाँम्हने) से । उनमें प्रथम पाँच नाम घोडोंकी रश्मियोंके साथ
साझेके नाम हैं ।
रश्मि नामोंके पश्चात् आठ (८) दिशाके नाम हैं । 'दिश्'
किस निर्वचनसे ? दिश् अतिसर्जन या दान अर्थ मे (तु० प०)
धातुसे । क्योंकि-'अति सृज्यन्ते आसु हविरादीनि देवतानाम्'
इनमे देवताओके लिये हविः आदि दी या रखी जाती हैं । ] आसा-
दन अर्थात् प्रत्येक वस्तुके आसन्न या समीप रहनेसे । अथवा
प्रत्येक वस्तुको अभ्यशन या अपने अन्तर्गत कर लेती हैं, इससे ।
उनमें 'काष्ठा' यह नाम उनके द्वय्योका होता है । 'काष्ठा' दिशा
होती है । क्योंकि वे प्रत्येक वस्तुके प्रति जाकर स्थित होती है ।
'काष्ठा' उपदिशा या कोण-दिशा होती हैं । क्योंकि-वे भी
परस्परको दबा कर दिशाओंके साथ स्थित होती है । आदित्य भी
'काष्ठा' कहा जाता है । क्योकि-वह भी अपने स्थानको दबा कर
१३
६८ २ अ० ५ पा० २ खं० ।
स्थित होता है । रण या संग्रामका देश भी-'काष्ठा' कहलाता है ।
क्योंकि-वह भी अपने स्थानको दबा कर स्थित होता है। जल
भी 'काष्ठा' कहलाते है । [ जल दो प्रकारके होते हैं, स्थावर और
जङ्गम उनमें ] ये जलाशयमें जाकर स्थित हो जाते हैं, यह स्था-
वरोंका निर्वचन है । [ अस्थावर या चलते हुए जलोंके अभिप्रायसे-
'क्रामन्ते च एताः, न क्वचित् तिष्ठन्ति, इति काष्ठाः मेध्याः आपः'
अर्थात् ये चलते ही रहते हैं, किन्तु कहीं भी ठहरते नहीं, इससे
'काष्ठाः' मेध्य या पवित्र जल हैं। यह निर्वचन है । ] ॥ १ ॥
(खण्ड २)
(निरु०) "अतिष्ठन्ती नाम निवेशनानां का-
ष्ठानां मध्ये निहितं शरीरम् । वृत्रस्य निण्यं वि-
चरन्त्यापो दीर्घं तम आशयदिरुद्रशत्रुः ॥”
“अतिष्ठन्तीनाम्”-अनिवेशमानानाम्-इति ।
अस्थावराणां “काष्ठानां मध्ये निहितं शरीरं”
मेघः । 'शरीरं' शृणातेः । शम्नातेर्वा । “वृत्रस्य
निण्यं” निर्णामं “विचरन्ति” विजानन्ति-“आपः”
इति । “दीर्घं” द्राघतेः । “तमः” तनोतेः ।
“आशयत्” आशेतेः । “इन्द्रशत्रुः” इन्द्रः-अस्य
शमयिता वा । घातयिता वा, तस्मादिन्द्रशत्रुः ।
तत्को वृत्रः ? मेघः इति नैरुक्ताः । त्वाष्ट्रः-असुरः-
इति ऐतिहासिकाः । अपां च ज्योतिषश्च मिश्री-
भावकर्मणो वर्षकर्म जायते । तत्रउपमार्थेन युद्धवर्णाः
हिन्दी निरुक्त। ६६
भवन्ति । अहिवत् तु खलु मन्त्रवर्णाः ब्राह्मण-
वादाश्च । विवृद्ध्या शरीरस्य स्रोतांसि निवारया-
ञ्चकार, तस्मिन् हते प्रसस्यन्दिरे आपः । तदभिवा-
दिनी-एषा-ऋग् भवति ॥ २ ॥
अर्थ ।
[ जङ्गम काष्ठा या जलोंके वर्णनमें मन्त्र— ]
“हिरण्यस्तूपस्य इयमर्षम्, दासपत्नीरिति च ।
त्रिष्टुभावेते । 'अग्निष्टोमे निष्केवल्यं नाम शस्त्रम्
तत्र निविद्धानीयमेतत् सूक्तम्, तत्र द्वे अपि शस्येते ।”
'अतिष्ठन्ती' मेघके चलते हुए बराबर चलती हुईं 'अनिबेशना'
जलाशयकी प्राप्तिसे पहिले कहीं कही रुकनेवाली 'मध्ये' मेघके
उदरमें स्थित हुई हुईं काष्ठाआं (जलों) के बाहरसे विधाताने
मेघरूप शरीर जो उनको आवरण किये हुए और उन्हींकी रक्षाके
लिये है, लगा दिया है। अप् या जल वृत्र (मेघ) के 'निण्य'
नीचे स्थानको जिससे वह गमन करता है, जानते हुएके समान
नीचेकी ओर जाते हैं, और इन्द्र शत्रु (वृत्र या मेघ) उसके
रोकनेवालेके समान दूर तक उसके आगे बढ़ता है, और अन्धकार-
को फैला कर स्थित होता है ।
इस मन्त्रमें वर्षाकालीन मेघका स्वभाव और रूप वर्णन किया
है। वर्षाऊ बादलकी काली काली घटाएं नीचेको पृथ्वीकी ओर
लटक आती हैं और दूरतक फैल जाती हैं। बादलके भीतरका
पानी भारीपनसे नीचेको आता है और उसीके साथ उसका धूम-
आदि-मय शरीर भी उसके आगे तक फैल जाता है। मानो एककी
स्पर्धासे एक आगे बढ़ता है, यही दृश्य इस मन्त्रके द्वारा देख रहा है।
३०० २ अ० ५ पा० २ ख० ।
[ निरुक्तार्थ ] नहीं ठहरने वालियोंके, नहीं निवेश ( प्रवेश )
करनेवालियोंके, यह स्थावर (चल) जलोंका (वर्णन है।)
काष्ठाओंके बीचमें (रहते हुए) (विधाताने बाहरसे) शरीर रख
दिया। शरीर नाम मेघ। "शरीर" शब्द ‘शॄ’ हिंसायाम्-
(क्रयादि० प०) धातुसे होता है। [क्योंकि वह इन्द्रदेवसे विदा-
रण किया जाता है।] अथवा हिंसार्थक 'शम्' (क्रया० प०)
धातुसे है। 'वृत्र' के 'निण्य' निर्णाम नीचेको झुके हुए स्थानको
'विचरन्ति' विशेषरूपसे जाती हैं। "आपः" जल। "दीर्घ" शब्द
'द्राघ्' वृद्धयर्थक (भ्वा० आ०) धातुसे होता है। [क्योंकि वह
बढ़ा हुआ होता है।] "तमस्" शब्द विस्तार अर्थमें 'तनु' (त० उ०)
धातुसे है। [क्योंकि वह विस्तृत होता है।] "आशयत्" पद
'आङ्' (३ प०) और 'शीङ्' स्वप्ने (अदा० आ०) धातुसे है।
"इन्द्रशत्रु" [क्यों ?] इन्द्र इसका शमन करनेवाला है। अथवा
शातन या छेदन करनेवाला है। इससे वह 'इन्द्रशत्रु' है। सो
कौन "वृत्र" है ? 'मेघ' यह निरुक्तके आचार्य कहते हैं। 'त्वष्टाका
पुत्र असुर है' यह इतिहासके जाननेवाले कहते हैं। जलोंके और
ज्योति या बिजलीके मेलसे वृष्टि होती है। तहाँ मन्त्रोंमें उपमा
रूपसे इन्द्र और वृत्रासुरके युद्धका वर्णन है। अहिके समान और
वृत्रके समान मन्त्रोंके वर्ण और ब्राह्मण ग्रन्थोंके वाद हैं। [वृत्रने]
शरीरको वृद्धिसे स्रोतों या जलके प्रवाहोंको रोका, इन्द्रके द्वारा
उसके विदीर्ण होते ही जल झरे (बरसे) उसको कहनेवाली यह
ऋचा है ॥ २ ॥
व्यवस्था ।
मन्त्रोंमें देवताओं और असुरोंके संग्रामका वर्णन बाहुल्यसे
आता है, किन्तु उसमें सन्देह होता है, क्या यह वास्तव है
या रूपक ?
हिन्दी निरुक्त । १०१
यास्क आचार्य व्यवस्था देते हैं कि—नैरुक्त आचार्य इसे रूपक
मानते हैं, और ऐतिहासिक उसे सच्चा इतिहास मानते हैं, जो कि-
स्वयम् तहाँ तहाँ मन्त्रवर्णों से ही प्रमाणित है, किन्तु रूपक होनेमें
प्रमाणकी अपेक्षा है, इसीसे आप उसे यों दिखाते हैं—यदि 'वृत्र'
नाम मेघका है, तो मन्त्रोंमें जो संग्रामका श्रवण होता है, उसकी
क्या सङ्गति है।
[ उत्तर ] मेघके भीतर पानी और उपयुक्त बिजलीके मेलसे
वर्षा होती है। वैद्युत ज्योति वायुसे लिपटा हुआ होकर जिसे
इन्द्र कहते हैं, जलको ताडन करता है, और उस ताडनके वश जल
बरसने लगते हैं। वहाँ पर इसी प्रकारके जल और तेजके विरुद्ध-
भावको युद्धके रूपमें वर्णन किया गया है, इस लिये मन्त्रोंमें युद्ध
वर्णन रूपकमात्र है, क्योंकि न वास्तविक कोई युद्ध है और न इन्द्रके
कोई शत्रुही हैं। मन्त्र भी इस बातको प्रमाणित करता है:—
यदचरस्तन्वा वावृधानो
बलानीन्द्र प्रब्रुवाणो जनेषु ।
मायेत्सा ते यानि युद्धान्याहुर्नाद्य
शत्रुं न नु पुरा विवित्से ॥
[ ऋ० सं० ८, १, १५, २ ]
वामदेवस्य बृहदुक्थस्य आर्षम् । त्रिष्टुप् ।
व्यूढस्य अष्टमे अहनि निष्केवल्ये शस्यते ।
अर्थः—हे इन्द्र ! जो तू शरीरधारी होकर फिर फिर बढ़ता
हुआ, मनुष्योंमें अपने वीर्योंको कहता हुआ जैसा, नानाप्रकारके
कर्म करता है, [ क्या तू वैसा ही है ? ] नहीं। वह सब तेरो माया
ही है, और [ ऐतिहासिक ] जो तेरे युद्धोंको वर्णन करते हैं, यह
१०२ २ अ० ५ पा० ३ ख० ।
भी तेरी माया ही है। न तेरा अब कोई शत्रु है और न पहिले ही
था, यह मैं ही नहीं जानता बल्कि—तू भी यह सब जानता
ही है।
इस प्रकार इस मन्त्रमें युद्धको मायारूप वर्णन किया है। और
भी ब्राह्मण ग्रन्थमें कहा है—
“वीर्य्यं वै प्रावोर्य्यमिन्द्र इति ह विज्ञायते”
अर्थात् 'जितना संसारमें वीर्य है, वह इन्द्र ही है',—फिर कौन
उसका शत्रु और किसके साथ उसका युद्ध हो। एवम्—
“तद्वाहु नैतदस्ति यद् देवासुरमिति”
अर्थात् यह सब ऐसा ही नहीं है, जैसा कि देव और असुरोंका
संग्राम वर्णन किया है।
अतः ठीक ही कहा है, कि—‘जल और विद्युत्के मेलसे वर्षा
होती है, और युद्ध वर्णन उपमा मात्र है' ॥ २ ॥
[ खं० ३ ]
( निरु० ) “दासपत्नीरहिंगोपा अतिष्ठन्
निरुद्धा आपः पणिनेव गावः ।
अपां बिलमपिहितं यदासीद्
वृत्तं जघन्वां अप तद्ववार ॥”
“दासपत्नीः” दासाधिपत्याः । 'दासः' दस्यतेः ।
उपदासयति कर्माणि । “अहिगोपा अति-
ष्ठन्” । अहिना गुप्ताः । 'अहिः'-अयनात् ।
एति-अन्तरिक्षे । अयमपि-इतरः-'अहिः' एतस्मा-
देव । निर्ह्रसितोपसर्गः-आहन्ति-इति । “निरुद्धा
हिन्दी निरुक्त । १०३
आपः पणिनेव गावः” ‘पणिः’–वणिग् भवति ।
‘पणिः’ पण्यात् । वणिक पण्यं नेनेक्ति । “अपां
बिलमपिहितं यदासीद् ।” ‘बिलं’ भरं भवति ।
बिभर्तेः । “वृत्रं जघ्निवानपववार तद् ।” ‘वृत्रः’
वृणोते र्वा । वर्त्तते र्वा । वर्द्धते र्वा । “यद्-अवृ-
णोत् तद् वृत्रस्य वृत्रत्वम्” इति विज्ञायते । “यद्
अवर्त्तत तद् वृत्रस्य वृत्रत्वम्” इति विज्ञायते ।
“यद्-अवर्द्धत तद्वृत्रस्य वृत्रत्वम्-इति विज्ञायते ॥३॥
इति द्वितीयाध्यायस्य पञ्चमः पादः ॥ २, ५ ॥
अर्थः ।
“दासपत्नीः” दासाधिपत्याः “अहिगोपाः” अहिना
( मेघेन ) गुप्ताः “पणिना” वणिजा “गावः-इव”
मेघोदरे “निरुद्धाः” “आपः” “अतिष्ठन् ।” “यदा”
“अपां” “बिलम्” “अपिहितम्”मुद्रितम् “आसीत्”
तदा इन्द्रः “वृत्रं” मेघम् “जघन्वान्” जघान “तत्”
द्वारञ्च “अप-ववार” ‘अपावृत्तवान्’ तथा आपश्च वर्ष-
भावेन प्रसस्यन्दिरे,-इत्यर्थः ॥
दास (कर्म करनेवाले) की रक्षा करनेवालीं, मेघसे रक्षित
वणियेसे गोओंके समान मेघके भीतर रुकी हुई अप् (जल) ठहरी
हुई थीं। जब जलोंके निकलनेका द्वार मुँदा हुआ था उस समय
१०४ २ अ० ५ पा० ३ खं० ।
इन्द्रने वृत्र या मेघंको हनन किया और उस द्वारको खोला, तथा
जल वृष्टिरूपसे गिरे ॥
[ एक-पद निरुक्त ] "दासपत्नी" दासकी अधिपत्नियें या दास-
के पेटमें स्थित होकर उसकी रक्षा करनेवालीं । [ अर्थात् जब
नौकर काम करता हुआ थक जाता है, तब जलके पानसे उसे बल
मिलता है, और उसकी थकावट दूर हो जाती है, यह जलसे दास-
की रक्षा है । ] [ विग्रह-प्रसक्त ] 'दास' शब्द 'दसु' उपक्षये ( दि०
प० ) धातुसे है । [ क्योंकि-] वह कृषि आदि कर्मोंको सम्पादन
करता है। "अहिगोपाः-अतिष्ठन्" अहि (मेघ) से रक्षित हुई
स्थित थीं । 'अहि' [ क्यों ? ] अयन या गमनसे अन्तरिक्ष
(आकाश) में गमन करता है । यह भी 'अहि' शब्द जो सर्पका
नाम है इसी धातुसे बनता है; क्योंकि—वह भी चलनेवाला है ।
अथवा उपसर्गको ह्रस्व करके 'अहि' कहा जाता है । [क्योंकि-]
वह 'आहन्ति भोगेन' अर्थात् शरीरसे चलता है ] 'आङ्' पूर्वक 'हन्'
हिंसागत्योः (अ० प०) धातुसे होता है । "निरुद्धा आपः पणिना
इव गावः” वणियेसे गोओंके समान रुके हुए जल । 'पणि' नाम
वणिक् या वणियेका है । [ यह पर्यायसे तत्व-कथन है ] 'पणि'
[ क्यों ? ] पणन या लेन देनसे । [ क्योंकि-वह पणन या व्यवहार
करता है ] [ पर्याय-प्रसक्त ] 'वणिज्' (क्) [ क्यो ? ] वह पण्य
(माल) को नित्य सुधारता रहता है, [ जिससे कि वह मूल्यके
योग्य हो जावे । ] जब जलोंका बिल मुँदा हुआ था । 'बल'
[ क्यों ? ] वह जल आदिसे भरा हुआ रहता है। 'डुभृञ्'
धारणपोषणयोः ( जु० उ० ) धातुसे है। 'वृत्रको मारा और उसे
खोला।' वृत्र' शब्द 'वृञ्' वरणे (स्वा० ) धातुसे । अथवा 'वृधु'
वृद्धौ ( भ्वादि० आ० ) धातुसे । जो कि—वह आकाश अथवा
जलसे महान् होनेसे आवरण कर लेता है, यही वृत्रका वृत्रपना
हिन्दी निरुक्त । १०५
है । ऐसे ही ब्राह्मणसे जाना जाता है । अथवा इन्द्रसे हत हुआ
वृत्र या मेघ जलोंके बिलके खुल जाने पर जलोंको वृष्टिरूपसे
वर्षाता है, यही वृत्रका वृत्रपना है, यह ब्राह्मणमें जाना जाता है ।
अथवा बहुत बढ़ जाता है, यह वृत्रमें वृत्रपना है, यह ब्राह्मणमें
जाना जाता है ॥ ३ ॥
व्याख्या—
इस मन्त्रमें “दासपत्नी” विशेषणसे शूद्रोंका सेवाधर्म और
“पणिनैव गावः” इस दृष्टान्तसे वैश्योंका गोसेवा और वाणिज्य
धर्म कहा गया है ।
“कृषि-वाणिज्य गोरक्षा वैश्यकर्म स्वभावजम्”
[ भ० गी० १८, ४४ ]
अर्थात् भगवद्गीतामें 'कृषि, वाणिज्य और गोरक्षा ये वैश्यके
स्वाभाविक कर्म है' कहा है ।
इस उदाहरणसे स्पष्ट प्रतीत होता है कि-वृत्र मेघ है, असुरमें
जलोंका रुकना और उसके हननसे वृष्टि होना संभव नहीं । यह
नैरुक्त-पक्षमें प्रमाण है ॥ ३ ॥
इति हिन्दीनिरुक्ते द्वितीयाध्यायस्य पञ्चमः पादः ॥२, ५॥
१४
१०६ २ अ० ६ पा० १ खं० ।
: षष्ठः पादः ।
( निघ० ) श्यावी ( १ ) । क्षपा ( २ ) । शर्वरी
( ३ ) । अक्तुः ( ४ ) । ऊर्म्या ( ५ ) । राम्या ( ६ ) ।
यम्या ( ७ ) । नम्या ( ८ ) । दोषा ( ९ ) । नक्ता
( १० ) । तमः ( ११ ) । रजः ( १२ ) । असिक्नी
( १३ ) । पयस्वती ( १४ ) । तमस्वती ( १५ ) ।
घृताची ( १६ ) । शिरिणा ( १७ ) । मोकी ( १८ ) ।
शोकी ( १९ ) । ऊधः ( २० ) । पयः ( २१ ) । हिमा
( २२ ) । वस्वी ( २३ ) । इति त्रयोविंशती रात्रि-
नामानि ॥ ७ ॥
विभावरी ( १ ) । सूनरी ( २ ) । भास्वती
( ३ ) । ओदती ( ४ ) । चित्रा मघा ( ५ ) । अर्जुनी
( ६ ) । वाजिनी ( ७ ) । वाजिनीवती ( ८ ) ।
सुम्नावरी ( ९ ) । अहना ( १० ) । द्योतना ( ११ ) ।
श्वेत्या ( १२ ) । अरुषी ( १३ ) । सूनृता ( १४ ) ।
सूनृतावतो ( १५ ) । सूनृतावरी ( १६ ) । इति
षोडश उषोनामानि ॥ ६ ॥
:( खण्ड १ )
( निरु० ) रात्रिनामानि-उत्तराणि त्रयो-
विंशतिः । रात्रिः कस्मात् ? प्ररमयति भूतानि ।
हिन्दी निरुक्त । १०७
नक्तं चारोणि-उपरमयति, इतराणि ध्रुवीकरोति ।
राते र्वा स्याद् दानकर्मणः । प्रदीयन्ते अस्याम्
अवश्यायाः ।
उषोनामानि उत्तराणि षोडश । उषाः कस्माद् ?
उच्छति इति सत्याः । रात्रे रपरः कालः । तस्या
एषा भवति ॥ १ ॥
अर्थ ।
'काष्ठा' यह अनेक द्रव्यका नाम होता है,-यहाँसे दिशाओंके
प्रसंग ओर अनुप्रसंगकी बातें कही गईं, अब प्रकृतकी व्याख्या
होती है—
दिशाके नामोंसे आगे तेईस ( २३ ) रात्रिके नाम हैं । [ रात्रिमें
तम या अँधेरा ही पदार्थ है, और वह दिशाओंमें ही अपनी स्थिति
करता है, इससे दिङ्नामोंके अनन्तर रात्रिनाम कहे गये हैं । ]
'रात्रि' क्यों है ? जब यह भी आती है, तो नक्तंचरो ( रात्रिके
विचरनेवालों ) को रमण कराती है। [ क्योंकि-वे दिनके बीत
जाने पर, रात्रिके आते ही, अपने विहारका समय जान कर विशेष-
रूपसे रमण करते हैं । और वही अन्य दिवाचारी मनुष्य आदि
प्राणियोंका भी उपरमण कराती है, अर्थात् रात्रिके आजाने पर
अपने अपने कार्योंसे निवृत्त होकर निवासके लिये स्थिर हो जाते
हैं । अथवा दानार्थ 'रा' ( अदा० प० ) धातुसे है । [ क्योंकि-]
उसमें अवश्यःय ( तुषार ) या ओस गिरती है। इन्हींका प्रदान
करनेसे यह रात्रि हैं ।
क्योंकि-रात्रिका ही पिछला समय 'उषस्' ( उषा ) कहलाता
है, इसीसे रात्रिनामोंके पश्चात् सोलह ( १६ ) 'उषा' के नाम हैं।
१०८ २ अ० ६ पा० २ खं० ।
'उषा' क्यों है ?. जिससे कि यह अँधेरेको निवृत्त करती है ।
'उच्छी' विवासे ( भू० प० ) धातुसे कर्त्तृकारकमें है ।
'उषा' रात्रिका पिछला समय है, इसको कहनेवाली यह
ऋचा है—॥ १ ॥
( खण्ड २ )
[ निरु० ) “इदं॒ श्रेष्ठं॒ ज्योति॑षां॒ ज्योति॒रागा-
च्चित्रः प्रके॒तो अ॑जनिष्ट॒ विभ्वा । यथा॑ प्रसू॒ता स॑वि॒तुः
सवाय॑ ए॒वा रात्र्यु॒षसे॒ योनि॑मारैक् ॥”
“इदं॒ श्रेष्ठं॒ ज्योतिषां ज्योतिः”-आगमत् । चित्रं
प्रकेतनं प्रज्ञाततमम् “अजनिष्ट” विभूततमम् ।
“यथा प्रसूता सवितुः” प्रसवाय रात्रिः आदित्यस्य
एवं “रात्रौ उषसे योनिम्” अरिचत्, स्थानम् । स्त्री-
योनिः । अभियुतः एनां गर्भः । तस्या एषा अपरा
भवति ॥ २ ॥
अर्थ ।
आदित्यादीनां “ज्योतिषां” मध्ये “श्रेष्ठम्”
“इदम्” उषो लक्षणं “ज्योतिः” “आगात्” आ-
गच्छति । “चित्रः” ‘चित्र’ चायनीयं पूजनीयं वा
श्रेष्ठत्वादेव, “प्रकेतः” ‘प्रकेतनं’ ‘प्रज्ञाततमं’
“विभ्वा” ‘विभूततमम्’ “अजनिष्ट” जातमित्यर्थः ।
“यथा” “प्रसूता” प्रसवमनुप्राप्ता “रात्रि” “सवितु”
हिन्दी निरुक्त । १०६
‘आदित्यस्य’ “सवाय” ‘प्रसवाय’ आदित्योत्सृष्टे
देशे जायते “एवा एवम् “रात्री” “उषसे” “यो-
निम्” ‘स्थानम्’ “आरिचत्” आरेचयति-ददाति-
इत्यर्थः ॥
“इदं श्रेष्ठम्” इति आङ्गिरसस्य कुत्सस्य
इयम्-आर्षम्, उत्तरा च । उभे अपि त्रिष्टुभौ एते ।
प्रातरनुवाकाश्विनयोः शस्येते ।
आदित्य आदि ज्योतियोंमें, अति शीत अति उष्ण (गरम) न
होनेके कारण श्रेष्ठ यह उषा रूप ज्योति आता है। अपनी श्रेष्ठता-
से ही पूजनीय अति प्रसिद्ध और अन्य छोटे ज्योतियोंकी अपेक्षा-
अधिक व्यापक है। जिस प्रकार जनती हुई रात्रि आदित्यको
जननेके लिये उसके स्थानसे दूसरे स्थानमें हो जाती है, उसी प्रकार
उषाके लिये भी स्थान देती है।
जिस प्रकार उषा आदित्यके जन्मका कारण है, क्योंकि-वह
उस (उषा) के अनन्तर ही होता है, उसी प्रकार रात्रि उषाका हेतु
है। इस रीतिसे ‘इस ऋचामें रात्रिका अपर (पिछला) भाग ही
‘उषा हुआ।’ यह प्रतीत होता है।
यह ज्योतियोंमें श्रेष्ठ (उत्तम) ज्योति (उषा) आती है।
चित्र या पूजनीय, प्रकेतन नाम बहुत प्रसिद्ध और अधिक व्यापक
हुआ। जैसे प्रसव या जननेवाली रात्रि सूर्यके प्रसव (जनने)
के लिये है, उसी प्रकार रात्रि उषाके लिये स्थान देती है। [यह
भी दूसरी] स्त्रीकी योनि [इसी धातुसे है] क्योंकि-गर्भ इसके
साथ मिला हुआ रहता है। उसी उषाके लिये यह दूसरी और