निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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हैं, उन्हींके उद्घाटन करनेके लिये कौतुकवश पहिले ही यह प्रश्न
उठाते हैं—'आदित्यः कस्मात्' ? यहाँ पर 'आदित्य' शब्दके चार
अर्थ दिखाये हैं, जिनमें प्रथम तीन अर्थ-रसोंका आदान, ज्योतियों-
की दीप्तिका आदान और प्रकाशसे व्याप्त होना, आदित्य मात्रमें
घटते हैं, और चतुर्थ अर्थ 'अदितिका पुत्रभाव' सूर्य तथा अन्य मित्र
आदि सब देवताओंमें साधारण है, इससे उस अर्थको लेकर यह
'आदित्य' शब्द और देवताओंके लिये भी विशेषणरूपसे आता है।
भगवद्दुर्गाचार्यने “अल्पप्रयोगं तु अस्यैतद् आर्चाम्याम्नाये”
यह पंक्ति 'आदितेय' नामके अभिप्रायसे और 'सूक्तभाक्, सूर्यमादि-
तेयम्'-यह पङ्क्ति 'आदितेय' नामके अभिप्रायसे लगाई है, किन्तु
हमारे विचारमें “आदित्यः कस्मात्” से “अथाप्ययमादित्य व्रते तव”
तक आदित्य शब्दका ही सम्बन्ध है। आपको प्रकरण भेद करनेका
मुख्य कारण “सूर्यमादितेयम्” यह उदाहरण है, इसीके कारण
आपने 'सूक्तभाक्' इस वाक्यके लिये 'आदितेयः इति' का अध्या-
हार किया। किन्तु वास्तवमें यह ठीक नहीं प्रतीत होता। वस्तुतः
'सूर्यमादितेयम्' यह सूर्यमें आदित्य प्रवाद स्तुतिका उदाहरण ही
है। इसीसे 'अन्यसामपि देवता नामादित्यप्रवादाः स्तुतयो
भवन्ति'—इस अग्रिम पङ्क्तिमें अपि शब्द दिया है। जिसका अभि-
प्राय यह है कि जिस प्रकार 'सूर्यमादितेयम्' इस उक्त उदाहरणमें
सूर्यकी आदित्यप्रवाद स्तुति है, उसी प्रकार और देवताओंकी भी
हैं। यास्कके अभिप्रायमें 'आदित्य' और 'आदितेय' दोनों
समानार्थ हैं।
इसके अतिरिक्त यह भी है कि 'आदित्य' शब्दके प्रथम तीन
निर्वचन प्रत्यक्ष सिद्ध हैं, किन्तु चतुर्थ निर्वचन ही प्रमाणापेक्ष है,
इससे यह उदाहरण दिया है, जिससे सूर्यको अदितिपुत्रता स्पष्ट
उक्त होती है।