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सर्वकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 256

हिन्दी निरुक्त । ८६
दोनों मिलित देवताओंकी-[ उदाहरण ] आदित्या दानुनस्पती" ।
अर्थात् अदितिके पुत्र और दानके पति [ मित्रावरुण है । ] दानके
पति । और भी अकेले मित्रकी स्तुतिमें “प्रसमित्र०” । अर्थात्
‘हे मित्र ! अदितिके पुत्र ! वह मनुष्य अन्नवान् हो, जो तेरे लिये
निर्वपण आदि कर्मसे संस्कार करके इस चरु-रूप हविः को देता है’
यह निगम होता है। और भी अकेले वरुणको ‘आदित्य’ नामसे
स्तुतिमें—“अथाव ” । ‘हे अदितिके पुत्र ! हम तेरे व्रतमें
आदर-युक्त हों।’ [ यह निगम है ।] ‘व्रत’ यह कर्मका नाम है।
[ क्योकि- ] वह कर्त्ताको आवरण कर लेता है। कर्त्तृवाच्य ‘वृञ्’
( स्वा० उ० ) धातुसे । यह भी दूसरा ‘व्रत’ शब्द जो यम, नियम
आदिका वाचक है इसी धातुसे होता है। यहाँ निवृत्ति , अर्थ है।
कर्त्तृवाच्य णिजन्त ‘वारयति’ इस क्रियारूपसे है। अन्न भी व्रत
कहाता है। जो शरीरको आवरण या व्यापन कर लेता है ॥ १ ॥
व्याख्या ।
द्युलोक भी अन्तरिक्षका ही एक उच्चतम भाग है, एवम् उसीमें
आदित्यमण्डल घूमता है, इससे अन्तरिक्षनामोंके अनन्तर इन
दोनोंके साधारण नाम कहे गये हैं। यद्यपि देवताओंके नामोंकी
व्याख्याके लिये दैवतकाण्ड स्वतन्त्र स्थान है, अतः आदित्यके नाम
होनेसे ये उसी काण्डमें चाहिये, तथापि द्युलोकके सम्बन्धसे ये
नाम यहाँ नैघण्टुक काण्डमें संग्रह किये गये हैं। इसीसे जिन
आदित्यके नामोंसे मन्त्रोंमें आदित्यकी मुख्यतासे स्तुति आती है,
उन ‘सविता’, भग’ आदि नामोंकी व्याख्या दैवतकाण्डमें
ही होगी ।
व्याख्येय ‘खः’ आदि छः नामोंमें भाष्यकारको कुछ अल्प
वक्तव्य है, किन्तु इनके व्याख्याभूत ‘आदित्य’ शब्दमे अनेक विशेष