निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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है । ऐसे ही ब्राह्मणसे जाना जाता है । अथवा इन्द्रसे हत हुआ
वृत्र या मेघ जलोंके बिलके खुल जाने पर जलोंको वृष्टिरूपसे
वर्षाता है, यही वृत्रका वृत्रपना है, यह ब्राह्मणमें जाना जाता है ।
अथवा बहुत बढ़ जाता है, यह वृत्रमें वृत्रपना है, यह ब्राह्मणमें
जाना जाता है ॥ ३ ॥
व्याख्या—
इस मन्त्रमें “दासपत्नी” विशेषणसे शूद्रोंका सेवाधर्म और
“पणिनैव गावः” इस दृष्टान्तसे वैश्योंका गोसेवा और वाणिज्य
धर्म कहा गया है ।
“कृषि-वाणिज्य गोरक्षा वैश्यकर्म स्वभावजम्”
[ भ० गी० १८, ४४ ]
अर्थात् भगवद्गीतामें 'कृषि, वाणिज्य और गोरक्षा ये वैश्यके
स्वाभाविक कर्म है' कहा है ।
इस उदाहरणसे स्पष्ट प्रतीत होता है कि-वृत्र मेघ है, असुरमें
जलोंका रुकना और उसके हननसे वृष्टि होना संभव नहीं । यह
नैरुक्त-पक्षमें प्रमाण है ॥ ३ ॥
इति हिन्दीनिरुक्ते द्वितीयाध्यायस्य पञ्चमः पादः ॥२, ५॥
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