निराले सद्गुरु
Nirale Satguru
साहिब बन्दगी द्वारा
स्रोत: Sahib Bandgi Sant Ashram Edition · Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri, Distt. Samba (J & K) (उद्गम)
सेवा है आपका लक्ष्य
निराले सद्गुरु
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चेले भी आखिरकार थक ही जाते हैं। पर आप खुद कभी नहीं थकते हैं और जब चाहते हैं तो अपनी सुरति देकर अपनी संगत को भी चेतन कर देते हैं। यह चीज़ें लालची लोग कभी समझ नहीं पायेंगे, क्योंकि आखिर उनका दिमाग़ है ही शैतानी। वे शैतानी बातें ही सोच-समझ सकते हैं। वो आरामपरस्त हैं, स्वार्थ के लिए, पैसे के लिए प्रोग्राम देते हैं जबकि आप परिश्रमी हैं, परमार्थ के लिए, जीवों को चेतन करने के लिए यह काम कर रहे हैं।
यदि आप एक इच्छा करें तो उन्हें नानी-परनानी भी याद आ जाए, पर आप यह काम नहीं करना चाहते हैं। जब निरंजन आपसे भयभीत रहता है, फिर वे बेचारे किस खेत की मूली हैं! पर अन्तर यह है कि निरंजन को आपकी शक्तियों की पूरी जानकारी है; आप क्या कर सकते हैं, वो समझता है। इसलिए सीधे-सीधे आपसे कोई पंगा न लेकर अपने उपासकों के द्वारा यह काम करता है।
जब 21 ब्रह्माण्डों पर कब्जा करने वाले, प्रलय करने वाले निरंजन का आपके आगे कुछ बस नहीं चलता है तो इन बाबों की क्या बात करनी! ये बेचारे तो हैं ही नहीं। इनका तो होना या न होना एक समान है। इनमें रूहानियत का कोई जलवा ही नहीं है, इसलिए बाहरी रुकावटें देने में लगे हुए हैं। जब रूहानियत का कोई लक्षण ही नहीं है तो फिर छल-कपट करना तो इनकी मजबूरी हो जाती है। इन्हें डर है कि धूर्तों वाला काम नहीं किया तो सारी पब्लिक ‘साहिब-बंदगी’ पंथ में चली जायेगी। उन्हें इस बात का भय है।
सेवा है आपका लक्ष्य
आपका सारा समय परमार्थ में, सेवा में व्यतीत होता है। अपने लिए आपके पास कोई समय नहीं है। सबसे बड़ी बात है कि सेवा के लिए आप सही पात्र को चुनते हैं।
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एक समय आप अखनूर जा रहे थे तो नेर्शानल हाइवे पर आपको एक पागल मिला। वो केवल कमीज़ पहने था, नीचे कुछ नहीं पहने था; बिलकुल नंगा था। वो सड़क पर से पत्थर उठा-उठा कर साइड पर रख रहा था। आपने सोचा कि कोई रात के समय उस पर गाड़ी चढ़ा सकता है। आपके दिल में उसके प्रति दया की भावना उमड़ आई। आपने उसी समय फैसला किया कि आप पागलों के लिए अलग से एक आश्रम बनवाकर वहाँ उनकी सेवा करेंगे।
आप ऐसे लोगों की तलाश करते हैं। आपको ऐसे लोगों की ज़रूरत है, जिन्हें दुनिया ने ठुकरा दिया हो। दुनिया जिन्हें बेघर कर देती है, आप उन्हें शरण देने की ठान लेते हैं। आप सभी पागलों को इकट्ठा करना चाहते हैं। तभी तो आप इनके लिए एक अलग आश्रम बनाना चाहते हैं जहाँ ऐसे लोगों की जमकर सेवा की जा सके। आप कहते हैं कि यही मेरा काम है, क्योंकि इन्हें कोई नहीं पूछ रहा है, इन्हें कोई नहला नहीं रहा है, कोई खिला नहीं रहा है, घर वालों ने इन्हें घर से बाहर कर दिया है। आपका धर्म ही सेवा है तो इससे बेहतर पात्र नहीं मिलेंगे। आप अपने लोगों को ऐसे लोगों को ढूँढ़ने में लगाएँगें। जहाँ भी दया का कोई ऐसा पात्र मिल जाए, उसे आश्रम में लाया जायेगा और फिर उसकी सेवा की जायेगी। फेरी वाला वहीं जाता है, जहाँ ग्राहक हों। आपका काम ही परमार्थ है, इसलिए आप उन्हें लाना चाहते हैं, आश्रम में रखकर उन्हें नहलाना चाहते हैं, पूरी ड्यूटी के साथ उनकी सेवा करना चाहते हैं। आप अपना काम खुद करते हैं, किसी से अपनी सेवा नहीं करवाते, इसलिए आप अपने लोगों को इनकी सेवा में लगाना चाहते हैं। आप कहते हैं कि यही मेरी सेवा होगी।
आप सबमें एक आत्मा देखते हैं, इसलिए आप पहले उन लोगों को चुनते हैं, जिन्हें सेवा की ज़रूरत है। जब कभी भण्डारा होता है तो
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कुछ बागड़ियों के बच्चे भी खाने के लिए आ जाते हैं। कभी आपके लोग उन्हें भगाने की कोशिश करते हैं, पर आप कहते हैं कि इन्हें भगाओ नहीं, बल्कि पहले इन्हें खिलाओ; इनको ज़्यादा ज़रूरत है इसकी, आपको नहीं।
भोपाल में एक भण्डारा हुआ तो बागड़ियों को सेवादारों ने भगाना चाहा। आपने कहा कि मैंने यह इंतज़ाम अमीरों के लिए नहीं किया है, बड़े लोगों के लिए नहीं किया है, अच्छे कपड़े वालों के लिए नहीं किया है। ये अधिक ज़रूरतमंद हैं, पहले इन्हें खिलाओ। वो कहने लगे कि ये माँस खाते हैं, हम इन्हें इन थालियों में नहीं खिला सकते हैं। आपने कहा कि फिर इनके लिए पत्तलों का इंतज़ाम करो। क्योंकि आप ऐसे ही लोगों की सच्चे दिल से सेवा करना चाहते हैं। यही सेवा के सच्चे हक़दार हैं। जब आपका लक्ष्य ही सेवा है तो इससे बेहतर पात्र कहाँ मिलेंगे! आप तो उन बूढ़ों के लिए भी आश्रम बनवा रहे हैं, जिन्हें घर से बेघर कर दिया गया है। आप उनकी भी सेवा करना चाहते हैं। यह मनुष्य तो स्वार्थी है, दुनिया में रहने वाला हर इंसान स्वार्थी है, पर आप दुनिया में नहीं रहते हैं, हर समय अपने में ही रहते हैं, इसलिए आप परमार्थी हैं, हर समय परमार्थ में ही लगे रहते हैं। यही आपका लक्ष्य है।
दुनिया के लोग तेरा-मेरा करते हैं, पर आपके लिए सब अपने हैं। अपनापन होने से ही दूसरों से मनुष्य घृणा करता है, अपनो से नहीं। आपको हर प्राणी अपना लगता है। संपूर्ण विश्व को आप अपना मानते हैं। आपको सबकी पीड़ा अपनी लगती है।
आपकी जीभ थक जाती है। आप कहते हैं कि ख़ामोश! तुझे बोलना ही बोलना है। आँखें थक जाती हैं। आप कहते हैं कि देखो; तुम्हें देखना-ही-देखना है। आप आत्मनिष्ठ होकर जीते हैं। आप मानते हैं कि
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आदमी ही बूढ़ा होता है, अन्य कोई जीव नहीं। आदमी मतलबी है, साठ साल का होता है तो बच्चों को कहता है कि शर्म करो, मैंने आपको खिलाया, पढ़ाया, बड़ा किया; अब मैं बूढ़ा हो गया हूँ, मुझे खिलाओ, मेरी सेवा करो। यह मतलब। कोई गाय का बछड़ा गाय के लिए कभी घास नहीं लाया कि ले माँ खा, अब तू बूढ़ी हो गयी है, मैं तेरी सेवा करता हूँ। कोई कौवे का बच्चा अपनी माँ को नहीं खिलाता। वे खुद करते हैं।
आपने फैसला किया कि कभी बूढ़ा नहीं होना है। सबका अपना-अपना लक्ष्य होता है। आपका लक्ष्य ही परमार्थ है, इसके लिए आपने दुनिया का मज़ा भी नहीं लिया।
दुनिया मतलब की क्यों है? किसी ने नहीं सोचा। किसी के पास माकूल जवाब नहीं है। क्योंकि दिमाग़ शातिर है, मतलब का है, हमेशा अपना सोचता है यह। दुनिया के लोग इसी के कहे अनुसार काम करते हैं। इसे बनाया ही इसलिए गया है कि अपने लिए ही सोचना है। आप अपने लिए नहीं सोचते हैं। प्रोग्राम देते-देते रात के 12-1 बज जाते हैं। 7-7 घण्टे का सफ़र करके दूर-दूर प्रोग्राम देने जाते हैं, फिर उसी समय प्रोग्राम देकर वापिस भी आते हैं। आपका दिमाग़ कभी हताश नहीं होता। क्योंकि आप स्वार्थी नहीं हैं। दुनिया का हरेक आदमी स्वार्थी है। आप इस दुनिया में दिखते हुए भी इसमें नहीं हैं, इसलिए आप स्वार्थी नहीं हैं।
अमर लोक के स्वामी साहिब, सेवक बनकर आए हैं।
ढूँढ़-2 कर दीन जनों को, प्रेम मलहम लगाए हैं॥
स्वामीपन का मान न कोई, हंसन दिल को भाए हैं।
मधुमय कर भक्तजनों को, अमर लोक पठाए हैं॥