निराले सद्गुरु
Nirale Satguru
साहिब बन्दगी द्वारा
स्रोत: Sahib Bandgi Sant Ashram Edition · Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri, Distt. Samba (J & K) (उद्गम)
शब्द नहीं देते हैं आप
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को अपनी सुरति भी देते हैं। सुरति देना यानी प्रेम करना। इसका सीधा मतलब है कि आपके दिल में निंदकों के प्रति कोई घृणा है ही नहीं। यदि होती तो आप उन्हें नाम नहीं देते। आपने तो अखनूर आश्रम पर हमला करने वालों को भी नाम दे दिया था। फिर जो बेचारा भोला आदमी केवल बातों से निंदा कर रहा है, उसके प्रति आप क्या घृणा कर सकते हैं। वो बेचारा तो स्वयं ही नरक की ओर जा रहा है। इसके बाद यदि आप उसके प्रति और बैर रखेंगे तो फिर तो उसकी मुक्ति जन्म-जन्मांतरों तक भी नहीं हो पायेगी। यही विचार कर आप किसी के प्रति बैर भाव नहीं रखते हैं। आप यही विचारते हैं कि हो सकता है कि उन्हें पता नहीं है; जब पता चलेगा तो वो भी आयेंगे।
सब आपके ही हैं। यह एक परम रहस्य है, जिसे दुनिया के साधारण जन समझ नहीं पायेंगे। इसी रहस्य के कारण आपके लिए कोई न दोस्त है, न दुश्मन। जो भी जब भी अपनी भूल पर पछचाताप करके आपकी शरण में पहुँच जाता है, आप सहज ही उसे क्षमा करके नाम रूपी दौलत प्रदान कर देते हैं।
शब्द नहीं देते हैं आप
आप कोई भी शब्द बेकार में नहीं बोलते हैं। आपके हरेक शब्द में वज़न होता है। आप कभी किसी को आशीर्वाद नहीं देते कि ‘युग युग जिओ।’ महात्मा लोग ऐसे आशीर्वाद दे देते हैं। पर सच यह है कि ऐसा आशीर्वाद देना झूठ बोलने के बराबर होता है। यह तो अपने सिर पर पाप लादने वाली बात है। क्योंकि यदि जुग-युग जीने का आशीर्वाद दिया तो युग-युग जीने की शक्ति भी देनी होगी। यदि ‘पुत्रवती भवः’ का आशीर्वाद दिया तो बेटा भी देना होगा, नहीं तो झूठ हो जायेगा। इसी कारण आप कोई भी आशीर्वाद नहीं देते हैं।
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जब कोई आपको अपनी समस्या बताता है तो आप उसे यह नहीं कहते कि जाओ, तुम्हारा काम हो जायेगा। क्योंकि यह तो शब्द हो गया। फिर वो होना-ही-होना है। आप दिन भर लोगों की समस्याओं को सुनते हैं और रात को उसकी पूरी रील खोलते हैं। फिर जिस-जिस की समस्या का समाधान करना होता है, या जो कृपा के लायक समझते हैं, उनकी समस्या को चुपके से सुलझा देते हैं।
शब्द क्यों नहीं देते हैं आप? इसके पीछे एक रहस्य है। एक बार एक माई आपके पास आई। उसने फ़रियाद की कि उसके कोई संतान नहीं है; उसे बच्चा दो। आपने कहा-जाओ, पुत्र होगा। आपने शब्द दे दिया। रात को आपको सिग्नल मिला कि आज ठीक नहीं हुआ। जिस स्त्री को पुत्र होने का शब्द मिला है, उसके तो गर्भाशय ही नहीं है। अब पुत्र कैसे हो! तब उस स्त्री का गर्भाशय स्थापित किया गया और फिर उसे पुत्र हुआ। उसके बाद आपने किसी को भी शब्द नहीं दिया। हज़ारों माइयों को आपने पुत्र दिया। पर यह कहकर नहीं दिया कि पुत्र हो। आपने यही कहा कि भरोसा रखना। हज़ारों लँगड़ों की टाँगें आपने ठीक कर दी, पर किसी को नहीं कहा कि ठीक हो जायेगी। आपने भरोसा रखने के लिए कहा। हजारों लायलाज बीमारियों वाले आपके पास आकर ठीक हुए, पर आपने केवल भरोसा रखने के लिए ही कहा, शब्द नहीं दिया कि ठीक कर दूँगा। फिर तो आप शब्द में बँध जाते। फिर यदि वो कृपा का पात्र न होता तो भी आपको उसे ठीक करना पड़ जाता। एक नहीं, दो नहीं, सैकड़ों मृतकों को आपने नवजीवन दिया, पर किसी को यह नहीं कहा कि अभी जीवित करता हूँ। जिसे जीवित करना ज़रूरी समझा, उसे कर दिया। यह रहस्य पुनः जीवन प्राप्त किये हुए ही जानते हैं। यदि आप पहले ही कह देते कि जीवित कर देता हूँ तो गलत भी हो सकता था। यदि वो कृपा का पात्र न होता तो गलत हो जाता।
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एक शिष्य अपने गुरु के साथ नदी में नहा रहा था। वहाँ एक अँधा खड़ा था, जो ठीक से चल नहीं पा रहा था और गिर-गिर पड़ता था। चेले को दया आई, उसने गुरु जी से कहा कि इस पर कृपा करो, इसे ठीक कर दो। गुरु जी ने कहा कि भगवान ने इसे जैसा रखा है, रहने दो। पर चेले ने जिद्द की तो गुरु जी ने उसे ठीक कर दिया। अगले दिन जब वे नदी में नहाने आए तो वही अँधा लोगों को पकड़-पकड़कर नदी में डुबो रहा था। उसने चेले को भी पकड़ा। चेले ने कहा-गुरु जी, सोच क्या रहे हो, जल्दी से इसे अँधा करो। गुरु जी ने कहा कि मैंने तुम्हें पहले नहीं कहा था कि इसे रहने दो ऐसे ही। यह अँधा ही ठीक था।
...तो कई कारण होते हैं कि महात्मा लोग सबपर अपनी शक्ति नहीं लगाते हैं। यदि वही आदमी ठीक होकर गलत काम करने लग जाए तो फिर महात्मा भी उसके गलत कामों में शामिल हो जायेंगे। इसलिए वे इन झंझटों से दूर ही रहते हैं और यदि कृपा करते भी हैं तो सोच-समझकर।
यदि आप सबको कहकर जीवित करना शुरू कर दें तो राँजड़ी में लाशें ही लाशें पहुँच जायेंगी। फिर सत्संग सब समास हो जायेंगे और आपसे प्रेम करने वालों को आपके नज़दीक से दर्शन भी नसीब नहीं होंगे।
अब विश्वास रखने के लिए आप इसलिए कहते हैं कि यदि उसका विश्वास ही नहीं होगा, वो कहीं दूसरी जगह भी माथा मार रहा होगा तो ठीक होने के बाद वो समझेगा कि वो वहीं से ठीक हुआ है और फिर उसकी भक्ति खंडित हो जायेगी। इसलिए बहुत सी चीज़ें ध्यान में रखते हुए तब आप किसी पर कृपा करते हैं।
जैसे एक माई थी। उसे पुत्र नहीं था। दो बेटियाँ थीं। उसने आपसे प्रार्थना की। आपने कहा कि भरोसा रखना। पर तीसरी बार भी उसे पुत्र नहीं हुआ। वो आपके पास आई, कहा कि इस बार भी बेटी ही हुई है।