निराले सद्गुरु
Nirale Satguru
साहिब बन्दगी द्वारा
स्रोत: Sahib Bandgi Sant Ashram Edition · Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri, Distt. Samba (J & K) (उद्गम)
कौन है काल पुरुष व परम पुरुष
कौन है काल पुरुष व परम पुरुष ?
आओ इस भेद को थोड़ा समझें !
‘‘वेद चारों नाहिं जानत, सत्य पुरुष कहानियाँ॥’’
धर्म दास के पूछने पर आदि उत्पति का रहस्य संसार को सब से पहले कबीर साहिब जी ने दिया। आप ने कहा सत्य पुरुष पहले गुप्त और अकेले थे। वे कभी बने ही नहीं, न ही कभी मिटेंगे। जिस वस्तु का सर्जन होता है वह नष्ट भी अवश्य होती है। कबीर साहिब कहते हैं मैं तब की बात कहता हूँ जब साकार, निराकार, लोक-लोकांतर, सूर्य, चांद, तारे, ब्रह्मा, विष्णु, महेश, काल निरंजन (मन) भी नहीं बना था।
सब से पहले उस गुप्त, अगम पुरुष ने अपनी इच्छा से शब्द उचारा। जिस से अद्भुत श्वेत प्रकाश उत्पन्न हुआ, जो इस संसारी प्रकाश जैसा नहीं था। जिस का एक-एक कण करोड़ों सूर्यों को भी लज्जा दे। अगम पुरुष स्वयं उस प्रकाश में समा गये और वह प्रकाश जीवित हो गया। अगम पुरुष जो पहले गुप्त थे, प्रकाश में आने से उनको सत्य पुरुष, परम पुरुष, दयाल पुरुष कहा गया। वो ही अमर लोक सतलोक कहलाया।
फिर उन्होंने अपनी मौज से अपने ही स्वरूप को अपने में से शटका दिया, अनन्त बूंदें हुई। जो वापस उस अद्भुत अनन्त प्रकाश में आई। लेकिन उनका अपना अलग वजूद रहा वो उस अद्भुत अनन्त प्रकाश में मिक्स नहीं हो पाई। क्योंकि सत्यपुरुष ने इच्छा की कि इनका अलग अस्तित्व रह जाये। वे ही जीव (आत्मा) कहलाई। वे सब जीव उसी प्रकाश में विचरण करने लगे जैसे पानी में मछली। अमर लोक में आत्मा का प्रकाश सोलह सूर्य जितना है।
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इसके बाद सत्य पुरुष ने सौलह शब्द उचारे जिससे इनके सोलह शब्द पुत्र उत्पन्न हुए। इसके पश्चात् सत्य पुरुष का पांचवां पुत्र निरंजन, जिसको निराकार, निरंजन, नारायण, अथवा मन आदि नामों से जाना जाता है जिसे संसारिक लोग राम, ब्रह्मा, आदि दिरंजन, कादर, क्रीम, प्रमेश्वर, प्रमात्मा, हरी, हरि, अद्वैत, भगवान, तथा अलख निरंजन आदि नामों से याद करते हैं। निरंजन ने 70 युग तक एकागर चित होकर पर्म पुरुष का एक पग पर खड़े होकर ध्यान किया। इस तप से खुश होकर सत्यपुरुष ने निरंजन को मानसरोवर दीप में जाकर रहने को कहा।
इस स्थान पर निरंजन बहुत खुश हुआ और फिर से 70 युग तक एक पग पर खड़े हो कर परम पुरुष का ध्यान किया। परमपुरुष के प्रसन्न होने से निरंजन ने कहा या तो मुझे अमर लोक का राज्य दो नहीं तो अलग से एक न्यारा देश दे दो जिस पर मेरा पूरा अधिकार हो। सत्यपुरुष ने कहा तुम्हें 17 चौकड़ी असंख्या युग का राज्य देता हूं। अपने बड़े भाई कुरम से बीज लेकर शून्य में एक अलग ब्रह्मांड की रचना बनाओ। निरंजन ने बिनती किए बिना कुरम के तीन सीस काट डाले और उनके पेट से पांच तत्व का बीज छीन लिया। इस तरह निरंजन ने 49 क्रोड़ योजन पृथ्वी, सूर्य, चंद्र, तारे सप्त पाताल, सप्त लोक आदि सब बना दिये और शून्य में रहने लगा लेकिन वहां जीव नहीं थे, सोचा जीव नहीं तो ब्रह्मांड का क्या लाभ। अतः उसने पुनः 64 युग तक फिर परमपुरुष का ध्यान किया। परम पुरुष ने पूछा अब क्या चाहते हो ? निरंजन ने कहा जीव ही नहीं है तो राज्य किस पर करूँ। इस लिए कृप्या कर थोड़े से जीव मुझे भी दे दो।
अब परमपुरुष ने आदि शक्ति की उत्पत्ति कर उसे अनन्त आत्मायें देकर कहां हे ! पुत्री मानसरोवर में निरंजन के पास जाओ और
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मिलकर सत्य सृष्टि करो। पांच तत्वों से बनी रूदर मांस वाली नहीं (यानि आत्माओं को शरीरों में डालने की आज्ञा नहीं दी गई)।
निरंजन आद्या शक्ति का सौंदर्य देख कामुक हो गया तथा उसे निगल गया। यह परमपुरुष को बुरा लगा और निरंजन को शाप दे दिया कि तूं एक लाख जीवों को रोज निगलेगा तो भी तेरा पेट नहीं भरेगा और सवा लाख उत्पन्न करेगा मगर तू सत्यलोक नहीं आ सकेगा। तब से इसका नाम काल पुरुष हुआ। सत्य पुरुष ने सोचा निरंजन ने पहले कुर्म के तीन शीश काटे फिर आदि शक्ति को निगल लिया, तो विचार किया कि निरंजन को मिटा देता हूं। सोचा इसे मिटा दिया तो सोलह पुत्र जो एक नाल में हैं वे भी मिट जाएंगे और जो मैंने 17 चौकड़ी असंख्य युग का राज्य दिया है, मेरा शब्द भी कट जाएगा।
परम पुरुष ने अपने को मथ ज्ञानी पुरुष (कबीर साहिब योग जीत) को निकाला वास्तव में वो खुद ही सत्यपुरुष थे और उसे निरंजन की गलतियां बताकर कहा निरंजन को मानसरोवर से निकाल दो (मानसरोवर अमरलोक का हिस्सा है) ताकि वो सतलोक न आ सके। साहिब की आज्ञा से योगजीत ने निरंजन को शून्य में फेंक दिया। वहां निरंजन डर से सम्भल कर उठा तो आदि शक्ति परमपुरुष का ध्यान कर उसके पेट से बाहर आ गई और निरंजन को देख डरने लगी।
अब निरंजन ने आदि शक्ति को प्यार से कहा मैं पाप पुन्य से नहीं डरता मेरे से इसका हिसाब लेने वाला कोई नहीं मैं आगे भी पाप पुन्य कर्मों का जाल ही बिछाऊंगा, मुझ से मत डरो। परमपुरुष ने तुम्हे मेरे लिए रचा है। आठ भुजाओं वाली आदि शक्ति काल निरंजन के साथ सहमत हो गई और दोनों एक साथ रहने लगे, जिस से इनके तीन पुत्र ब्रह्मा, विष्णु और शिवजी पैदा हुए।
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निरंजन ने आद्या शक्ति को कहा जीव और बीज तुम्हारे पास है और तीनों पुत्र भी सौंपता हूं। मैं शून्य में निराकार रूप में समाऊंगा और मन बन कर सभी जीवों के साथ रहूंगा। मेरा भेद किसी को नहीं देना। मेरा कोई दर्शन नहीं कर सकेगा, चाहे खोजते खोजते जन्म गवादे। तुमने तीनों पुत्रों के साथ राज्य करना। जब यह बड़े होंगे तो समन्दर मन्थन के लिए भेजना।
यहाँ नोट करने वाली बात यह है कि काल निरंजन ने आद्या शक्ति को परमपुरुष का भेद छुपाने के लिए आपने साथ मिला लिया और भी देखे तो निरंजन ने आद्या शक्ति को चार खानि व 84 लाख जूनिया कैसे बनाना है इसका पूरा भेद बताकर शून्य में समा गया और कहा मैं मन रूप में हर जीव के साथ रहूँगा है ताकि कोई भी जीव परम पुरुष का भेद न जान पाये।
बच्चे बड़े हुए तो माता आद्या शक्ति ने तीनों पुत्रों को समुन्दर मन्थन के लिए भेजा। इतने में काल निरंजन ने तमाशा किया स्वांस द्वारा पवन में वेद उत्पन्न किये। निरंजन ने वायु में वेद के शब्द किए कोई पुस्तक नहीं लिखी थी। इस लिए वेद निराकार तक की बात कहता है। वेद उसका पूरा भेद नहीं बता रहा है। समुन्दर मन्थन के बाद ब्रह्मा को वेद, विष्णु को तेज और शिवजी को विष मिला। माता ने कहा जो जो तीनों को मिला है अपने पास रख लें।
कबीर साहिब धर्मदास को बता रहे हैं के अब आदि शक्ति ने पुनः तीनों पुत्रों को समुद्र मन्थन के लिए भेजा तो इतने में आद्या शक्ति ने तीन कन्याओं की उत्पत्ति कर समुद्र में समाने को कहा। जब समुद्र मन्थन हुआ तो तीनों को तीन कन्याएँ मिली। माता पास आए तो माता ने सावित्री ब्रह्मा जी को, लक्ष्मी विष्णु जी को और पार्वती शंकर जी को
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दे दी। तीनों भाई बड़े खुश हुए तीनों काम के वशीभूत उनमें रम गए। ऐसे में दैत्यों, देवताओं और राक्षसों की उत्पत्ति हुई। जगत की रचना शुरु हो गई।
ऐका माई जुगति वियाई तिनि चेले परवान।
एकु संसारी एकु भंडारी, एक लाये दिवान॥
सृष्टि रचना के लिए तीनों को अलग-अलग डिउटी दी गई। ब्रह्मा जी को उत्पत्ति करने की, विष्णु जी को पालनकर्ता की और शिवजी को संहारकर्त्ता का काम सौंपा गया। इसके आगे तेंतिस करोड़ देवी देवता जिनकी संसार किसी न किसी रूप में पूज रहा है यह सारा निरंजन का परिवार हुआ।
आओ, पाँच भोतिक तत्वों में से इसके अस्तित्व को देखें। चार तत्व तो हमें खुली आंखों से नजर आ रहे हैं लेकिन जो पांचवां तत्व आकाश तत्व है वह चारों तत्वों में रमा हुआ है, यह ही निरंजन है।
84 लाख योनियों में से जिस इंसानी देह को निरंजन ने अपने आप जैसा बनाया है, जिसको हरी मंदिर भी कहते हैं उसमें भी पांचवां तत्व जो आकाश तत्व है वहीँ काल पुरुष है। जो सभी शरीरों में मन रूप में रहता है। जब के जीव आत्मा का इस निरंजन के किसी भी देश, देवी, देवता व शरीर से कोई सम्बन्ध नहीं है। यह तो निरंजन ने जीव आत्मा को रोकने के लिए 84 लाख किस्मों के कैद खाने बनाए हैं। जीव आत्मा जो सत्य पुरुष की अंश है यह बिना बाती और तेल के जलती है, यह बिना आंख के देखती है, बिना पांव चलती है, बिना कानों के सुनती है, इसे कोई काट नहीं सकता, इसे किसी का डर नहीं है। यह निडर है। इसका कभी भी अंत नहीं हो सकता।
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शरीर रूपी कैद खानों से आत्मा को आज़ाद करवाने के लिए पूर्ण संत सद्गुरू से विदेह नाम लेना पड़ेगा। बिना विदेह नाम के जीव आत्मा सन्तलोक नहीं जा सकती।
निरंजन ने जिस बीज रुपी पाँच शब्दों से पांच तत्व के शरीर की रचना की उन शब्दों का स्थान भी शरीर में रख दिया। जिसे काया का नाम कहते हैं। जीव आत्मा को सत्य पुरुष से दूर रखने के लिए काल निरंजन ने जीवों को अपनी भक्ति में लगाने के लिए काया नाम के प्रगट शब्द गुरु मंत्र के रुप में जीवों को दीये जिसमें सभी जीव काया के नाम का सिमरन करने लगे और अन्दर में खोज करने लगे। बड़े-बड़े ऋषी, मुनि, सिद्ध, साथक, ब्रह्मा, विष्णु, महेश, पीर, पैगम्बर, औलिया भी इन शब्दों में उलझ गये। निरंजन ने इस भक्ति से जीव को बड़ी-बड़ी शक्तिया, रिद्ध, सिद्ध, पावर, चार तरह की मुक्ती का स्वर्ग दे दिया, यहां तक के सभी साधक निरंजन भगवान् की साधना में रम गए और 70 प्रकार की अनहद धुनों में आनन्द मगन रहने लगे और चुप्प रह कर अनहद धुनों का रस लेने के लिए एकांत की तालाश में रहे। मगर आत्मा का ज्ञान न हुआ ऐसे में आत्मा शरीर से अलग ना हो कर अमर लोक अपने निज धाम न जा सकी।
<p align="right"><i>-विसथार के लिए देखें पुस्तक अनुराग सागर वाणी</i></p>सुन्न गगन में सबद उठत है, सो सब बोल में आवै।
निःसबदी वह बोलै नाहीं, सो सत सबद कहावै॥
<p align="right"><b>-पलटू साहिब जी</b></p>