निराले सद्गुरु
Nirale Satguru
साहिब बन्दगी द्वारा
स्रोत: Sahib Bandgi Sant Ashram Edition · Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri, Distt. Samba (J & K) (उद्गम)
आपका भोजन भी सबसे निराला है
64 <p align="right">साहिब बन्दगी</p>
जो जन आया शरण आपकी, भ्रम सब उसका काट निकाला।
अपनी मीठी तान सुना, आपने उसे मधुमय कर डाला॥
आपका भोजन भी सबसे निराला है
जो भोजन आप खाते हैं, कोई नहीं खा सकता है। आप तो बस इस शरीर रूपी घोड़े को स्वस्थ रखने के लिए भोजन लेते हैं। आपको स्वाद से कोई मतलब नहीं है। आपके भोजन को निगल पाना भी आम इंसान के लिए बहुत कठिन हो जायेगा।
एक बार आपके भाई ने आपसे कहा कि मैं आपको परमात्मा मानता हूँ। आपने कहा कि तुम्हारा यह मानने का आधार क्या है? उन्होंने कहा कि मैं आपकी आध्यात्मिक गहराई को नाप नहीं पाया हूँ, पर कुछ चीज़ें मैंने आपमें देखी हैं। पहले तो आपको दुनिया का कोई शौक नहीं है। आपके पास मन नाम की कोई चीज़ ही नहीं है। उन्होंने बहुत बातें कहीं। फिर कहा एक बार मैंने आपका बचा हुआ भोजन खा लिया। मुझे 7-8 मिर्च खानी पड़ीं, तब जाकर वो भोजन मैं गले से नीचे उतार पाया। आपके भोजन में कोई नमक, कोई स्वाद नहीं, कैसे खाते हो!
आप दुनिया का कोई भी मज़ा नहीं लेते हैं। इन मज़ों की ज़रूरत केवल उसी को होती है, जिसे आत्मा का आनन्द नहीं मिला हो।
बड़ा अन्याय किया जाता है आपके साथ
आपके साथ हर समय अन्याय ही होता रहा है। समाज में पाखण्डियों का ही बोलबाला होने के कारण ही यह सब होता रहा है। 30 जनवरी सन् 2008 की बात है। गाँधी जी की 60वीं पुण्यतिथि थी। आपको जम्मू के मुबारक मण्डी में आमंत्रित किया गया। वहीं पर आपको सन् 2003 को सन् 2002 का गाँधी शांति पुरस्कार भी दिया गया था। तब भी आपके साथ कुछ शैतान लोगों ने ऐसा ही किया था।
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इस बार ऐसा था कि वहाँ पर दो माइक लगे थे। एक छोटा माइक था, जहाँ से स्कूली बच्चे गाँधी के विचारों का प्रचार कर रहे थे और दूसरा बड़ा मॉइक था, जो बड़े आमंत्रित लोगों के बोलने के लिए था।
जब तक सारे आमंत्रित लोग न पहुँच गये, तब तक बच्चे उस छोटे मॉइक से बोले जा रहे थे। जैसे ही आप पहुँचे, आपको भी उस छोटे मॉइक पर बोलने के लिए बुला लिया गया। अब उस मॉइक से सभी तक आवाज़ नहीं पहुँच पा रही थी और फिर उस समय शोर भी बहुत था; नारे लगाए जा रहे थे। आपने तो भी वहीं से बोला। अब भी अन्दर में चालाक लोगों का दिल नहीं भरा तो बीच-बीच में आपको रोकना शुरू कर दिया और आने वाले के लिए सूचित करते रहे और ऐसे ही बीच में ही आपको रोक दिया गया और आपकी बात अधूरी ही रह गयी।
बाद में जब सब लोग आ गये तो आपको दिखावे के लिए मात्र उनके साथ बिठाया गया। सबको उस बड़े मॉइक पर बोलने का अवसर प्रदान किया गया जबकि आपको केवल वहाँ बिठाए रखा, बोलने का अवसर वहाँ से नहीं दिया गया, जहाँ से आपकी आवाज़ सब सुन सकें, आप अपनी बात सब तक पहुँचा सकें। क्या यह नाइंसाफ़ी नहीं थी। क्या यह चालाकी नहीं थी! पर फिर भी आपकी शालीनता तो देखो, जाते समय आपने दोनों हाथ जोड़कर उसे धन्यवाद किया, जिसने आपको उस माइक पर बोलने का अवसर नहीं दिया और बच्चों वाले माइक से बोलने को कहा।
यह केवल एक किस्सा नहीं है। हर बार जहाँ भी आपको आमंत्रित किया जाता है, पाखण्डियों की टीम इकट्ठा होकर साज़िश रच लेती है और कुछ ऐसा कर दिया जाता है कि आपको बोलने का अधिक अवसर नहीं दिया जाता। पाखण्डी जानते हैं कि आपको