निराले सद्गुरु
Nirale Satguru
साहिब बन्दगी द्वारा
स्रोत: Sahib Bandgi Sant Ashram Edition · Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri, Distt. Samba (J & K) (उद्गम)
आपका नाम सबसे निराला है
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रूप में किसी इंसान को समझा नहीं पाते हैं, कोई भी आपकी बात नहीं मानता है। एक अन्य भी तरीका है, पर उससे सब जीव आपमें समा जायेंगे, इसलिए आप हमेशा एक पर्दे से जीव को समझाते हैं, ताकि काल निरंजन को दिये हुए शब्द को काटे बिना आप सब जीवों को एक-साथ न ले जाकर युक्ति-युक्ति रूप से थोड़े-थोड़े जीवों को अमर-लोक ले जाएँ। ... तो आप युक्ति-युक्ति वाला तरीका ही अपनाते हैं। पर यह तरीका एक इंसानी रूप में ही ठीक रहता है। इंसानी रूप में आकर जब सद्गुरु समझाते हैं तो जीव समझ भी जाते हैं। जीवों को युक्ति-युक्ति रूप से समझाने का जो काम सत्य पुरुष बिना शरीर के नहीं कर पाते हैं, वो काम संतों के शरीर के माध्यम से ही हो पाता है, इसलिए आप संतों को परम-पुरुष से बड़ा दर्जा देते हैं। हमारे साहिब जी इस शरीर से नितान्त ही परे रहते हैं। आप तो केवल शरीर में दिखाई देते हैं, पर वास्तव में आप अपने स्वरूप में ही हर समय समाए रहते हैं। यह बड़ी ही अटपटी बात है, जो कहने में नहीं आ रही है।
आपका नाम सबसे निराला है
आप आमतौर पर एक बात कहते हैं कि जो वस्तु मेरे पास है, वो किसी के पास नहीं है। वो वस्तु नाम ही है। सच है, जो नाम आपके पास है, वो किसी के पास नहीं है।
सन् 2002 में जब मुम्बई में शांति सम्मेलन हुआ तो देश के चुनिन्दा लोगों को बुलाया गया। दलाई लामा जैसे धार्मिक अगुआ भी उसमें शामिल थे। इसी तरह सिक्खों के, मुसलमानों के, ईसाइयों के पादरी आदि भी थे और विभिन्न पंथों, मत-मतान्तरों के अगुआ लोगों को निमंत्रण दिया गया था। आपको भी उसमें बुलाय गया। आपने भी सोचा कि चलो देखते हैं।
वहाँ बोलने को अपने-2 विचार प्रकट करने का विषय था कि
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वर्तमान में छल, कपट, पाप, अहिंसा, अशांति का वातावरण हो गया है। आखिर क्या किया जाए, जिससे मनुष्य इन सब पाप-कर्मों से दूर हो जाए और एक नेक इंसान बने।
बड़े-2 महात्माओं ने अपने-अपने विचार रखे। किसी ने कहा कि जाप करो, शांति हो जाएगी; किसी ने कहा कि योग करो; किसी ने कहा नमाज़ पढ़ो; किसी ने कहा कि तीर्थ करो। आपने सबकी बात सुनी। आपको घोर आश्चर्य इस बात का हुआ कि कोई एक भी मूल कारण नहीं जानता था। कोई नहीं जानता था कि मनुष्य पाप कर्म क्यों कर रहा है; कोई नहीं जानता था कि मनुष्य अच्छा कैसे हो सकता है; कोई एक भी आध्यात्मिक शक्तियों से परिचित नहीं था; कोई एक भी विदेह नाम से परिचित नहीं था। उन्हें नहीं पता था कि यह आदमी अपनी ताक़त से नहीं सुधर सकता है। कबीर साहिब ने यही तो समझाया है-
कितने तपसी तप कर डारे, काया डारी गारा।
गृह छोड़ भये सन्यासी, तऊ न पावत पारा॥
यानी जिन्होंने इतनी कठिन तपस्या की कि काया को गला दिया, वो भी नहीं समझ पाए। फिर आम इंसान को इन चीज़ों से सुधारने की कोशिश करने वाले कितने अज्ञानी थे!
वास्तव में मन ही इंसान से पाप कर्म करवा रहा है। यही निरंजन है। इस बात का किसी को पता नहीं था। फिर सत्य-पुरुष का सच्चा नाम ही मनुष्य को इस मन से बचाकर अच्छा बना सकता है। यही उसे पार भी करेगा। इंसान के मन को निर्मल करने वाली कोई वस्तु है तो परम पुरुष का सच्चा नाम, जो सद्गुरु के पास होता है। सद्गुरु से ही इस नाम को पाया जा सकता है। यह वाणी से परे विदेह नाम होता है। यह स्वयं परम सत्ता होती है। बाकी जो गुरु लोग होते हैं, उनके पास काया का नाम होता है, जो निरंजन का नाम है। सब नाम निरंजन के हैं, पर परम पुरुष का यह विदेह नाम किसी संत के पास ही हो सकता है। जिसके पास यह
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नाम हो, वो जानता है कि इसी से मनुष्य के मन को साफ़ करके उसे अच्छा बनाया जा सकता है।
नाम बिना हृदय शुद्ध न होई। कोटिन भांति करे जो कोई॥
साहिब की वाणियाँ इस बात को स्पष्ट कर रही हैं कि नाम के बिना मन अच्छा नहीं हो सकता है, चाहे कोई करोड़ों उपाय क्यों न कर ले। फिर जो अन्य उपायों का सुझाव दे तो यही समझना चाहिए कि उसके पास नाम का होना तो दूर, उसे इस नाम के बारे में कोई ख़बर ही नहीं है।
बाकी जितने भी गुरु लोग हैं, वो जो नाम दे रहे हैं, वो निरंजन का है। निरंजन यानी मन। मन के नाम द्वारा मन को ही मारने की बात सोची भी कैसे जा सकती है! इसलिए मन को मारने के लिए जो परम पुरुष का सच्चा नाम चाहिए, वो केवल सद्गुरु के ही पास मिल सकता है। यह नाम किसी बिरले संत के पास ही होता है। जब-जब दुनिया इस नाम से बेख़बर हो जाती है तब-तब कबीर साहिब यह नाम लेकर निरंजन के संसार में आते हैं और जीवों को यह नाम रूपी अमोलक वस्तु देकर उनके मन को निर्मल करके उन्हें अपने देश अमर लोक ले जाते हैं।
हरेक अपने गुरु के लिए बढ़ा-चढ़ाकर कहता है। इसलिए आपकी सही तस्वीर संसार के सामने रख पाना बड़ा कठिन कार्य हो जाता है। पर सत्य है कि आप ही साहिब हैं। इसमें कुछ भी बढ़ा-चढ़ाकर कहने वाली बात नहीं है। यह एक परम रहस्य है। आपसे नाम पाकर कुछ हद तक इस रहस्य को समझा जा सकता है। जो खोजी होगा, वो अवश्य ही इस रहस्य को समझ जायेगा।
कहने का भाव है कि अभी तक यह नाम किसी के पास नहीं है। यह आपसे ही प्राप्त किया जा सकता है। इस नाम के दाता इस युग में अभी तक आप ही हैं अन्य कोई नहीं। आपका नाम सबसे निराला है। आपका नाम काल के चंगुल से छुड़ाने वाला है। आपना नाम इंसान को निर्मल