निराले सद्गुरु
Nirale Satguru
साहिब बन्दगी द्वारा
स्रोत: Sahib Bandgi Sant Ashram Edition · Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri, Distt. Samba (J & K) (उद्गम)
सबके दुख को समझते हैं आप
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सबके दुख को समझते हैं आप
आपके पशु बड़े चेतन हैं। आपका मानना है कि आदमी तो फ़ालतू बोलता है, बेकार काम करता रहता है, कहीं तिनके तोड़ता है, कहीं कुछ, पर पशु नहीं। आप कहते हैं कि बच्चा क्यों रोता है, क्योंकि उसके पास भाषा नहीं है। वो अपने भाव रोकर व्यक्त करता है। सभी तो रोते हैं। क्यों? क्योंकि भाषा नहीं है।
आप अरनिया में सत्संग कर रहे थे तो एक भैंस चिल्ला रही थी। किसी ने ध्यान नहीं दिया। उसे तो धूप में बाँध रखा था। वो परेशान थी। वो कह रही थी कि मैं छाया में नहीं जा पा रही हूँ, मुझे बाँध रखा है। आपने एक सत्संगी को धूप में खड़ा किया। एक मिनट बाद पूछा कि कैसा लग रहा है? उसने कहा कि बहुत कष्ट है। आपने उसी को वहाँ भेजा; कहा कि उस भैंस को खोलकर छाया में बाँधो; चाहे जिसकी भी भैंस हो। फिर आपने देखा कि उसे प्यास भी लगी थी। तो आपने एक को कहा कि बाल्टी लेकर जाओ और उसे पानी पिलाओ।
दुनिया के लोग तो तेरा-मेरा कर रहे हैं। यही बात है कि दूसरे से घृणा कर रहे हैं। अपनापन नहीं दिखा रहे हैं। आपको हर प्राणी अपना लगता है। संपूर्ण विश्व अपना लगता है। ये केवल कहने में ही नहीं; यही सत्य है। आपको सबकी पीड़ा अपनी लगती है। आपने यह फैसला भी किया है कि जो गाएँ बेघर हैं, उन्हें भी इकट्ठा करके उनकी सेवा करूँगा; किसी को लगा दूँगा उनकी सेवा में; कहूँगा कि यही मेरी सेवा मानना।
एक गाय गुरुद्वारे में थी, पर वो उनकी सेवा नहीं कर पा रहे थे। गाय गजब की थी। वो 20 किलो दूध देती थी। किसी ने कहा कि साहिब-बंदगी वालों को दे दो। 1993 में उन्होंने उसे 17 हज़ार में दिया। पैसे तो ज़्यादा थे, पर गाय अच्छी थी। उसने तीन बछड़ियाँ दीं; वो भी बड़ी ही प्यारी थीं, माँ की तरह थीं। बड़ी होकर वो भी बहुत दूध देने
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लगीं। जब वो गाय बूढ़ी हो गयी तो गर्भनी हुई। तब उसे बैठने में भी तक़लीफ़ होती थी। जब बैठती तो उठने में तक़लीफ़ होती थी। आपके कुछ लोगों ने कहा कि इसे बेच देते हैं। आपने कहा-नहीं, यह तो पाप है, धोखा है। अभी यह बूढ़ी है; हमारा धर्म तो इसकी सेवा करना है।
आप राँजड़ी में ज़्यादा पशु नहीं रखना चाहते हैं; जगह कम है, इसलिए वही रखते हैं, जो ज़्यादा दूध देते हैं। क्योंकि वहाँ रोज़ कोई 40 किलो दूध लगता है। बहुत लोग आते हैं; सबके लिए चाय बनाना; जो वहाँ रहते हैं, उनके लिए चाय। ...तो गाय ओखी हो गयी, परेशान हो गयी। एक ने कहा कि इसे रखबंधु में भेज देते हैं, दूध कम दे रही है, 3-4 किलो ही दे रही है। आपने कहा-नहीं। साल-भर आपने कहीं नहीं ले जाने दिया। एक दिन एक ने कहा कि यहाँ पक्का फर्श है, इसलिए यह दुखी है; इसे रखबंधु ले जाता हूँ; वहाँ कच्चा फर्श है, वहाँ यह आराम से रहेगी, ठीक हो जायेगी। आप उसकी बात में आ गये। वो उसे ले गया और उसे नया कर दिया। आप वहाँ गये तो वो हाँप रही थी। आप कहते हैं कि किसी भी पशु को परेशान करके दूध पिया तो यह ठीक नहीं है, किसी काम का नहीं है। आपने उसे डाँटा। उसने कहा कि गलती हो गयी। ....तो उस गाय ने बच्चा दिया और फिर 24 किलो दूध दिया।
आप कहते हैं कि जब गाय का बछड़ा मर जाए तो वो दूध नहीं देती है। फिर उसे इंजेक्शन लगाकर दूध नहीं लेना। कुछ तो भैंस के बछड़े के लिए पहले से ही खड्ढा खोदकर रखते हैं, पर आप इसे बहुत पाप मानते हैं, समझाते हैं कि ऐसा कभी न करना।
आपके पशु भी आपसे बहुत प्रेम करते हैं। आप उन्हें भी सुरति देते हैं। वे चेतन हैं सभी। जिस समय आप पहुँचते हैं तो वे जान जाते हैं कि आप आ गये। जिस दिन आप समय पर उन्हें खाना नहीं देते हैं तो वे नाराज़गी भी दिखाते हैं। वे आपको आवाज़ देकर बुलाते भी हैं कि अभी समय हो गया है, हमें खाना दो। तो आपने एक से कह रखा है कि
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जब भी आवाज़ दें तो इन्हें खिला देना। जब एक दिन वो गया तो एक गाय पंखे की तरफ देखने लगी। वो कह रही थी कि चलाओ, हमें गर्मी लग रही है।
हित अनहित पशु पक्षिन जाना। मानव तन गुण ज्ञान निदाना ॥
इसलिए आप सभी में एक आत्मा देखते हैं, उनके दुख को भी समझते हैं।
एक ने आपको कहा कि मैं आपको दो भैंसे दान में देना चाहता हूँ। आपने पूछा कि तुम्हारे पास कितनी भैंसे हैं? उसने कहा-दो। आपने कहा कि फिर एक ही दो। उसने कहा कि एक भैंस के दो ही थन हैं, पर वो अच्छी है, दूध बहुत देती है। 3-4 महीने बाद बच्चा देगी।
आपने उसे अखनूर में रखा। 15 दिन में एक बार जब जाते तो टोकरी-भर रोटी खिलाते। वो आपसे बातें करती थी, अपने विचार रखती थी। जब कट्टा हुआ तो वो 10 किलो दूध देने लगी। भैंस का 1 किलो दूध गाय के 4 किलो दूध के बराबर होता है। कुछ समय बाद वो कम दूध देने लगी। उसकी देखभाल करने वाले बाबे ने कहा कि इसे ले जाओ; यह कभी दूध देती है, कभी नहीं। आपने कहा कि इसकी देखभाल करो अच्छी तरह। उसने कहा कि इसे राँजड़ी में भेज दो। पर जब उसे भेजने लगे तो वो जा ही नहीं रही थी। बड़ी मुश्किल से आपने उसे राँजड़ी भेजा। उसे पता था कि यहाँ सबकुछ अच्छा है, बड़ी सेवा होती है। वो आपसे सवाल कर रही थी कि इतने दिन दूध दिया, भूल गये। आपने कहा कि चिंता मत करो, वहाँ भी अच्छी सेवा होगी।
आपके पास एक आदमी आया; वो रो पड़ा, कहा कि यह तन आपका है, धन भी आपका है, मैं अपना कभी नहीं माना। आप कैसे हैं, यह भी मैं जानता हूँ। वो बोला कि आपके आश्रम के साथ मेरी ज़मीन है, उसे आपके लोगों ने कवर् किया है; जब मैंने कहा तो उन्होंने कहा कि हमारी है। उन्होंने फिर आपसे शिकायत की और आप नाराज़ हुए;