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निराले सद्गुरु

Nirale Satguru

साहिब बन्दगी द्वारा

स्रोत: Sahib Bandgi Sant Ashram Edition · Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri, Distt. Samba (J & K) (उद्गम)

DevanagariHindipublished112 पृष्ठ

माँ की तरह है आपका व्यवहार

76 साहिब बन्दगी

आपने उसे चुपके से पूछा कि क्या तुमने संतोषी माता का व्रत नहीं रखा था? उसने अपनी भूल स्वीकार की। कहने का भाव है कि गुरु पर सब कुछ छोड़ा तो अन्य सहारा ढूँढ़ना ही नहीं है। यह तो चालाकी हुई गुरु से। यदि पुत्र हो जाता तो उसने कहना था कि संतोषी माता ने पुत्र दिया। संतोषी माता से आपका बैर नहीं है। पर गुरु-भक्ति खंडित हो जाती। इसलिए चाहे काम बने या न बने, गुरु शरण में ही रहना है। भाव यही होना चाहिए-

जीवन का अब सौंप दिया, सब भार तुम्हारे हाथों में।
है जीत तुम्हारे हाथों में, है हार तुम्हारे हाथों में॥

ज़रूरी नहीं है कि काम बने तभी समझो कि आप सच्चे हैं। नहीं। ऐसा बिलकुल नहीं समझना। कई बार आप भक्त लोगों को भक्ति में लगाने के लिए उनके काम नहीं करते हैं। उन्हें अभावों में रखते हैं, ताकि वे संसार से विरक्त होकर भक्ति कर सकें। इसलिए इस धोखे में नहीं रहना। भक्त को नहीं पता है कि उसके लिए क्या ठीक है, क्या नहीं। उसे यह सब गुरु पर ही छोड़ना है। फिर जो वो करे, उसी रज़ा में रहना है।

...तो अगली बार आपने उस माई को कहकर पुत्र दिया। पर उसे बता दिया कि भरोसा पक्का रखना।

माँ की तरह है आपका व्यवहार

अपने भक्तों से आप माँ की तरह व्यवहार करते हैं। जैसे माँ अपने बच्चे पर पूरा हक़ रखती है, ऐसे ही आप भी प्रत्येक नामी से हक़ से बात करते हैं। जैसे गलती होने पर माँ डाँटती है; उसे फ़िक्र रहती है कि उसका बेटा गलत न हो जाए, कहीं बुरी संगत में न फँस जाए, ऐसे ही आपको भी फिकर रहती है कि कहीं आपका नामी कहीं गलत तो नहीं चल रहा। यदि ऐसा है तो आप पूरे हक़ से उसे डाँट-फटकार कर सीधी राह पर लाते हैं। आपको हरेक की फ़िक्र रहती है। आपको हरेक

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का पता रहता है कि यह फलाना है, यह फलाना है। लाखों की संगत हो जाने पर भी आपको सबकी ख़बर है कि कौन क्या कर रहा है। फिर जैसे माँ का व्यवहार कोमल भी है; डाँटने के बाद अपने बच्चे को प्यार भी देती है। ऐसे ही आप भी प्यार देते हैं। फिर आपका प्यार पाकर वो डाँट भी भूल जाती है। कुछ तो चाहते हैं कि उन्हें डाँट पड़े, ताकि बाद में आपका बहुत सारा प्यार भी मिल सके। जैसे माँ के लिए सब बच्चे समान होते हैं, ऐसे ही आपके लिए भी सब समान हैं।

आपकी राह बड़ी कठिन है। कई समस्याएँ आपको सुननी पड़ती हैं। हररोज़ सैकड़ों लोग नयी-नयी समस्याएँ लेकर आते हैं। आप सबको सुनते हैं। फिर उसका हल भी बताते हैं, उन्हें संतुष्ट भी करते हैं। एक माई आई। उसके बेटे ने मोटर साइकिल पर एक्सीडेंट कर दिया था। लड़के का कंधा तोड़ दिया था। 4 महीने बाद घर में सम्मन आया। वकील किया तो वो 10 हज़ार रूपये माँग रहा था। माई ने कहा कि मैं ग़रीब हूँ; गाँव में मैं ही अकेली नामिन हूँ। अब आपको ऐसे लोगों की समस्या तो सुननी ही है, क्योंकि आप हैं ही ग़रीबों के। आपको ऐसे लोगों को तसल्ली देने के साथ-साथ ताक़त भी देनी पड़ती है ताकि दृढ़ रहें, घबराएँ नहीं।

आपको हर महीने अपने शिष्यों को दर्शन देने भी जाना पड़ता है। जहाँ-जहाँ भी आपके आश्रम हैं, वहाँ-वहाँ जाना पड़ता है। ग़रीब संगत होने से कुछ हर महीने नहीं आ पाते हैं। वे आपसे प्रार्थना करते हैं कि हर महीने दर्शन दिया करें। कभी आप कैंसल करने की सोचते हैं तो उनके चेहरे मुरझा जाते हैं। क्योंकि आपसे मिलने वाले उस अमृत को आपके नामी ही समझ पाते हैं। बाकी साधारण लोगों की बुद्धि से ये बातें बहुत परे की हैं। उनको ये बातें समझ में आने वाली नहीं हैं। क्योंकि उनके गुरु के पास यह अमृत नहीं है, जिसे लेने को वे बार-बार गुरु के पास पहुँचें। इसलिए तो वे कहते भी हैं कि क्या करना है बार-बार जाकर ! सीधा-सा मतलब है कि उन्होंने उस अमृत का कोई ज्ञान नहीं है,