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निराले सद्गुरु

Nirale Satguru

साहिब बन्दगी द्वारा

स्रोत: Sahib Bandgi Sant Ashram Edition · Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri, Distt. Samba (J & K) (उद्गम)

DevanagariHindipublished112 पृष्ठ

महात्मा लोग भी समझ रहे हैं आपको

48 \hfill साहिब बन्दगी

इस कारण सभी हंसों को एक साथ न लेकर युक्ति-युक्ति द्वारा उन्हें सतलोक ले जाने के लिए वह परम सत्ता जीवों को लेने आया करती है। इसी सत्ता को कबीर साहिब के रूप में भी आना पड़ा था। यह एक परम सत्य है। पर इस रहस्य को कोई बिरला ही समझ पाता है।

...तो आँखों में चूंकि आपका वास रहता है, इसलिए आँखें कोई नहीं बना सकता है। इसलिए बंदगी के समय भी आपसे आँखें ही मिलाई जाती हैं। इसलिए-

नज़र मिलाना आओ जब-जब, वो ही मिलन द्वारा है।
आँखों में ही बैठ यह साहिब, चुन-चुन हंसन तारा है॥

महात्मा लोग भी समझ रहे हैं आपको

आपकी वाणी की नक़ल भी हो चुकी है। बड़े-2 पंथों के महात्मा आपकी वाणी को तोड़-मरोड़कर कह रहे हैं। यदि उनके सन् 2000 से पहले वाले सत्संग सुनें जाएँ तो उनकी वाणी में, उनके विचारों में, उनकी फ़िलासफ़ी में बहुत अंतर मिल जायेगा। जबकि एक सच्चे महात्मा की वाणी कभी बदलती नहीं है। बदलेगी तो तभी जब उसमें कमी होगी, उसे अपनी वाणी पर संदेह होगा, आत्म-अनुभव नहीं होगा। जो आँखों देखी बात करता है, वो जो आज कहेगा, 50 साल बाद भी वही कहेगा। तो आपके ज्ञान, आपकी वाणी को सुनकर महात्मा लोगों को पता चलने लग गया है कि आप क्या चीज़ हैं। कुछ महात्मा आपसे नाम की दीक्षा भी चाहते हैं कुछ महात्मा आप से छुपके से दीक्षा ले चुके हैं और शिष्यों को भी दिलाना चाहते हैं ताकि वे खुद भी संसार-सागर से पार हो सकें और उनके शिष्य भी। यह बात कठिन ज़रूर लगेगी, पर परम-सत्य है। सबकी यह बात आप मंजूर नहीं करते हैं। इसका कारण आप ही जानते हैं।

निराले सद्गुरु 49

संत अभिलाष दास जी ने कई पुस्तकें लिखी हैं, भारतवर्ष में मशहूर हैं। कबीर पंथी होने के कारण उन्होंने साहिब की वाणियों की टीका भी किया है। जब एक बार उन्होंने आपके प्रवचन सुने तो बड़े प्रभावित हुए। कबीर साहिब की वाणी का बहुत ज्ञान होने के कारण शायद उन्हें महसूस हो गया कि कबीर साहिब अपना दिया हुआ शब्द पूरा करने के लिए आ गये हैं। उन्होंने आपको अपना आश्रम ही दे दिया, कहा कि आप ही इसे संभालो। फिर कुछ समय बाद आपके दर्शन करने राँजड़ी में आए और आपको दो और आश्रम दे दिये।

एक माहत्मा का दूसरे महात्मा को समर्पण करना कोई आसान काम नहीं है। उसने पहले आपको बहुत परखा, तभी धीरे-2 सर्वस्व आपको समर्पित करते जा रहे हैं।

एक बार जब वो राँजड़ी में आपके दर्शनों को आए तो कहा कि घूमने जाना है। आपने आश्रम की गाड़ी दी; एक ड्राइवर भी दिया। उनके शिष्य भी साथ थे। आपके कार्य को देखकर अपने शिष्यों से बोले कि देखो, कैसे सेनापति की तरह कार्य चल रहा है! तब उन्होंने आपके चरणों की ओर देख मन-ही-मन बंदगी की ओर चल पड़े। जब वापिस आने लगे तो शिष्यों ने कहा कि हम वापिस राँजड़ी नहीं जायेंगे.... बहुत थक गये हैं। महात्मा जी के मुख से निकला कि गुरु जी का शब्द है कि मिलते जाना, इसलिए मैं उनका शब्द नहीं काट सकता; आप जाओ। वो महात्मा अकेले आए। क्योंकि वो आपको कुछ-कुछ समझ चुके थे कि आप संत नहीं बल्कि संतों की खान बनकर धरती पर आ गये हैं।

साहिब शब्द न काटिहौं, बोले संत अभिलाष।
बोले संत अभिलाष, हे शिष्यो! तुम जाओ;
हम तो रहेंगे, कुछ दिन साहिब पास ॥
दर्शन तो हम पायेंगे, न चाहें कोई साथ।