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निराले सद्गुरु

Nirale Satguru

साहिब बन्दगी द्वारा

स्रोत: Sahib Bandgi Sant Ashram Edition · Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri, Distt. Samba (J & K) (उद्गम)

DevanagariHindipublished112 पृष्ठ

प्रारंभिक पृष्ठ व विषय-सूची

श्री सद्गुरु वे नमः

निराले सद्गुरु

सब परबत स्याही करूँ,
घोलू समुन्दर जाय।
धरती का कागज करूँ,
गुरु अस्तुति न समाय॥

साहिब [ श्री सद्गुरु वे नमः / सत्य ] बन्दगी


सन्त आश्रम रांजड़ी, पोस्ट राया, ज़िला साम्बा (जे. एण्ड के.)

निराले सद्गुरु

प्रचार अधिकारी
— राम रतन, जम्मू

© SANT ASHRAM RANJRI DISTT. SAMBA (J & K)
ALL RIGHTS RESERVED

First Edition—August, 2008
Copies—5000

Website Address.
www.sahibbandgi.org


E-Mail Address.
*[email protected]


Editor
Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri
Post -Raya, Distt.-Samba (J & K)
Ph. (01923) 242695, 242602


Mudrak: Sartaj Printing Press

(iii)

विषय सूचीपृष्ठ संख्या
☞ कौन है काल पुरुष व परम पुरुष9
☞ प्रेम के अथाह सागर हैं आप15
☞ आत्मा आपकी तरफ आकर्षित होती है16
☞ सब महात्माओं से अलग हैं आप17
☞ आपकी किसी से स्पर्द्धा (competition) नहीं है21
☞ सभी डर रहे हैं आपसे22
☞ सेवा है आपका लक्ष्य27
☞ बचपन से ही परिश्रमी रहे आप31
☞ भूत भी भाग जायेगा31
☞ वो समय भी था............35
☞ एक ही धुन में रहते हैं आप35
☞ अंत में ऐसे साथ देते हैं आप37
☞ सबके दुख को समझते हैं आप38
☞ मच्छर तक को नहीं मारते हैं आप41
☞ आपके आगे मन का ज़ोर नहीं चलता है42
☞ प्रोफेसर बोला-आप साधारण नहीं हैं43
☞ गहरी सुरति देनी पड़ी आपको44
☞ ठीक चौबीस घण्टे बाद वो हिला45
☞ बहुत कोमल हृदय है आपका46
☞ आपकी वाणी बड़ी ही प्यारी है47
☞ आपकी आँखें भी सबसे निराली हैं47
☞ महात्मा लोग भी समझ रहे हैं आपको48
☞ साहिब कबीर धरती पर उतर आए है50
☞ इसलिए शरीर धारण करना पड़ता है परम पुरुष को51
☞ आपका नाम सबसे निराला है53

(iv)

विषय सूची            पृष्ठ संख्या

☞ अभियान चलाया              56
☞ आपका ज्ञान देख वैज्ञानिक भी दंग रह गये     57
☞ वाणी पर पूरा कण्ट्रोल रहता है आपका       58
☞ आप दीन दुखियों के हैं            58
☞ इसलिए जगह-जगह आश्रम बनवाते हैं आप     60
☞ सिद्धांत के इतने पके हैं आप          61
☞ इंस्पेक्टर बोला-दो साल नौकरी आपने की है    61
☞ वापिस आना ही पड़ता है           61
☞ केवल श्रद्धा देखते हैं आप           62
☞ आपकी तान निराली है           62
☞ आपका भोजन भी सबसे निराला है        64
☞ बड़ा अन्याय किया जाता है आपके साथ      64
☞ भोजन बड़ा स्वादिष्ट बनाते हैं आप        66
☞ सिर पर बैठकर जो चाहते हैं करवा लेते हैं     67
☞ वो बोली-मुझे करंट पड़ रही है         68
☞ लड़की बोली-मेरे साथ साहिब हैं         69
☞ एक गुरु शिष्य का नाता ही मानते हैं आप     69
☞ ऐसी चीज़ों से आप निपट लेते हैं         69
☞ शब्द है आपका वाहन             70
☞ परमहंस की तरह रहते हैं आप          71
☞ निंदकों से भी प्रेम करते हैं आप          72
☞ शब्द नहीं देते हैं आप             73
☞ माँ की तरह है आपका व्यवहार         76
☞ संगत का एक पैसा भी नहीं लेते हैं आप      78

(v)

विषय सूचीपृष्ठ संख्या
☞ आप सौम्य हैं79
☞ सुलझावन हारी है आपकी वाणी80
☞ आपके पास हज़ार रूपया भी नहीं मिलता है81
☞ इसलिए लड़कियों की शादियाँ करवाते हैं आप82
☞ हरेक की शंका मिटा देते हैं आप83
☞ आपको नाराज़ करना ठीक नहीं है84
☞ बाहरी दिखावे से बहुत दूर रहते हैं आप86
☞ जासूसी करने आए थे और भक्त बन गये87
☞ दीनों के नायक हैं आप87
☞ फौज में रहे शान से89
☞ जब आप नाचे........89
☞ बदमाशों को भी सिखाया प्रेम आपने90
☞ वो भी करते हैं बंदगी90
☞ बिल्ली बोली-मेरे बच्चे कहां हैं92
☞ ऐसे निपटते हैं आप92
☞ आपको सबकी ख़बर रहती है98
☞ बड़े जिम्मेदार हैं आप100
☞ धुन के पक्के हैं आप102
☞ 500 कहानियाँ रोज़ सुननी पड़ती हैं आपको103
☞ जब आप किसी धर्मस्थान पर जाते हैं104
☞ कहे गंगा104
☞ ऐसे हैं आपके काम105
☞ कोई वर्णन नहीं कर सकता है106
☞ ज़रूरत पड़ने पर मुर्दों में भी प्राण फूँकते हैं आप107
☞ कोई समझे प्रेम दीवानी है110

दो शब्द

आप जब इस संसार में आए, तब महाकलयुग शुरू हो गया था। आम आदमी ही नहीं, भक्ति करने वाला इंसान भी भटक चुका था। आपने आकर केवल धार्मिक क्रांति ही नहीं लाई बल्कि समाज सुधार का काम भी किया। जहाँ धर्म में व्यवसाय, राजनीति, रोमाँस आदि ने स्थान ले लिया था, वहीं समाज में हिंसा, छल, कपट, ठगी, बेईमानी, चरित्रहीनता सहित अनेक बुराइयाँ अपनी चरम सीमा तक पहुँच रही थीं। कहीं सयाने बाबे हमारी माँ, बहन, बेटियों को नचा रहे थे तो कहीं नकली ज्योतिषि समाज को भटका रहे थे। आपने समाज को जगाया, बचो इनसे। इसके लिए आपको इस महाकलयुग में पाखण्डियों द्वारा बहुत निंदा झेलनी पड़ी।

कहीं उग्रवादी कहा गया। दुनिया भी कितनी भोली है, मान लिया। फौज में नौकरी करने वाले को उग्रवादी कहा। कितने बेवकूफ थे पाखण्डी। फिर मानने वाले तो भोले भाले थे, विचार भी नहीं किया। कहीं आपको मजनू कहा गया। आप तो किसी स्त्री को स्पर्श तक नहीं करते हैं और न ही आपने शादी की। यदि आपको जरूरत होती तो शादी कर लेते। यह भी किसी ने विचार नहीं किया। कहीं चमार कहा गया। आपके गुरू के लिए भी किसी की यह सोच रही थी। किसी ने उनकी जाति पूछी थी। आपके गुरू जी ने कहा कि जाति पाति पूछे न कोई। हरि को भजे सो हरि का होई।। तो उसने कहा कि यह तो रविदास जी ने कहा था, क्योंकि वे जाति से चमार थे। तब आपका दिल हुआ कि बता

<center>(vi)</center>

(vii)

दूँ कि गुरू जी ब्राह्मण हैं, पर गुरू जी ने इशारे से मना कर दिया। बाद में कहा कि अपनी जाति बतानी ही नहीं है। आप तो स्वयं साहिब हैं, फिर आपकी
जाति जो पूछे वो मूर्ख ही है। फिर पाखण्डियों ने आपको अनेक यातनाएं देने की कोशिश की, कहीं जहर दिया, कहीं जिंदा जलाने का प्रयास किया, कहीं तलवारों से मरवाने की कोशिश की, पर आपका कोई बाल भी बांका नहीं कर सका।

साहिब आए काल जगत में, निंदे सबही कोय।
महाकलयुग देत है दस्तक, पाखण्ड जय जय होय॥

पर आप चुप नहीं हुए, जो संदेश समाज को शुरू से दिया, उससे कभी हटे नहीं, कहीं आपने अपने शब्दों में बदलाव नहीं लाया। महाकलयुग में आप अनेक यातनाएं सहते हुए समाज को बुराइयों से, पाखण्डियों से बचा रहे हैं। इस कलयुग में जो काम आप कर रहे हैं, न आज कोई कर रहा, न आगे कर पायेगा।

इस अनथक बेमिसाल शूरवीर सद्गुरु मधु परमहंस जी के चरणों में अर्पण दो शब्द लिखने के लिए हमारी कलम नहीं रुक रही। जिसने 17 साल की आयु से ही भारत की थल सेना के महार ग्रुप में रह कर अपनी देश सेवा के दौरान ही संसार के, भूले भटके लोगों को भक्ति का ठीक रास्ता दिखाने के लिए संत सम्राट् सद्गुरु कबीर साहिब द्वारा दिया सच का प्रतीक, ‘सत्य का झंडा’ उठाया। निरंजन की भक्ति को छोड़कर सत्य पुरुष की भक्ति करने को कहा है।

मिठास के प्रतीक ‘मधु’ परमहंस जी के विशाल हृदय से निकलने वाली निर्मल धारा ने भक्ति के क्षेत्र में एक सैलाब व क्रांति ला रखी है।

(viii)

जिसने पाखंडवाद को झंझोड़ कर रख दिया है। यही कारण है कि भक्ति के नाम पर पल रहे सभी तपके, इस अथक नौजवान के विरोध में नित्य नये जाल बनाये जा रहे हैं। कोई कुल्ले जला रहा है कोई लाखों की फिरोती देकर, कोई जहर आदि देकर उस परम सत्य के सैलाब को रोकने की कोशिश कर रहा है।

मगर कौन रोक पायेगा ! सतसंग करना उनका शौक है पेशा नहीं। सतसंग द्वारा वे जीवात्मा को चेतन करके उसे अमर लोक का नाम प्रदान कर रहे हैं। जो शिष्य की सोते, जागते सुरक्षा करता है और जीवात्मा मन और माया से अजाद हो कर अमर-लोक चली जाती है। साहिब कहते हैं ‘नाम पाय सत्य जो बीरा, संग रहुँ मैं दास कबीरा’। इसीलिए साहिब बार-बार सुचेत करते हैं कि मैं बढ़ई वश नहीं कहता।

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“जो वस्तु मेरे पास है

वह ब्रह्माण्ड में कहीं

नहीं है।”

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<div align="center">

सतगुरु मारा तानि के, शब्द सुरंगे बान।
मेरा मारा फिर जिये, तो हाथ न गहुँ कमान॥

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