नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)
Narada Smriti with Hindi Translation
देवर्षि नारद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
देने का आधार अमृत रूप हैं। आपसे प्रार्थना है कि यदि अभियुक्त सचमुच पापी
है, तो उसे दग्ध कर दें और यदि वह निर्दोष है, तो आप जल के समान शीतल हो
जायें।
प्रदेशिन्यक्षता यस्य संस्पृष्टायां परीक्षणे।
यदि विस्फोटका न स्युः शुद्धोऽसावन्यथा न हि ॥ 348 ॥
अब अभियुक्त को अपनी तर्जनी अंगुली से मुद्रिका को उठाने को कहना
चाहिए। तर्जनी के जलने अथवा क्षतिग्रस्त होने पर व्यक्ति को दोषी तथा तर्जनी के
अक्षत (अप्रभावित) रहने पर उसे निर्दोष-शुद्ध समझना चाहिए।
॥ चतुर्थ अध्याय का प्रथम प्रकरण समाप्त ॥
नारदस्मृति / 145
2. निक्षेप प्रकरण
- निक्षेप प्रकरण
स्वं द्रव्यं यत्र विश्रम्भात्निक्षिपत्यविशङ्कितः।
निक्षेपो नाम तत्प्रोक्तं व्यवहारपदं बुधैः ॥ 1 ॥
'निक्षेप' भी एक प्रकार का व्यवहार—लेन-देन से सम्बन्धित विषय—है।
अपनी किसी मूल्यवान् चल-अचल सम्पत्ति को किसी शंका, संशय अथवा सन्देह
के बिना, पूर्ण विश्वास के साथ किसी के पास रख देने का नाम ही 'निक्षेप' है।
टिप्पणी—नारदभाष्य के अनुसार निक्षेप शब्द का अर्थ है—‘“निःशंकम्
निक्षिप्यते स्थाप्यते इति निक्षेपः।’” अर्थात् निःशंक होकर (पूर्ण विश्वास रखकर)
अपनी कोई वस्तु किसी दूसरे को सौंपना अथवा उसके पास रखना ही निक्षेप है।
'व्यवहार प्रकाश' के अनुसार—निक्षेप एव ग्राहकस्यासमक्षं समर्पितो
न्यासः। अर्थात् बिना किसी साक्ष्य के अपनी सम्पत्ति किसी के पास रखने का नाम
निक्षेप है और इसी का दूसरा नाम न्यास है।
असहाय भाष्यकार के अनुसार—स्वं द्रव्यं यो निक्षिपति यच्च मतिवि-
स्त्रम्भादविशंकितो निक्षिपति। अनेनोक्तेनैतदुक्तं भवति किल यत्र अविश्वासात्
शंका भवति तत्र साक्षिलिखितग्रहणविरहितं कोऽपि वराटिकापि न ददाति।
यत्र पुनर्विश्वासात्निशंकः पुरुषो भवति तत्र साक्षिलिखितग्रहणवर्जितमेव सुवर्ण
सहस्त्रादिकमपि निक्षिपति।
अर्थात् जहां विश्वास नहीं होता, वहां व्यक्ति बिना लिखा-पढ़ी और गवाह
के किसी को एक कौड़ी भी देने को उद्यत नहीं होता। इसके विपरीत जहां विश्वास
होता है, वहां किसी को कानों-कान सूचना दिये बिना ही हज़ारों रुपये और
स्वर्णादि मूल्यवान् पदार्थ दे दिये जाते हैं। इस प्रकार निक्षेप का आधार है—
व्यक्ति-विशेष के प्रति मन में विश्वास का दृढ़ होना।
कुलजे वृत्तसम्पन्ने धर्मज्ञे सत्यवादिनि।
महापक्षे धनिन्यार्ये निक्षेपं निक्षिपेद्बुधः ॥ 2 ॥
निम्नोक्त सात गुणों से सम्पन्न व्यक्ति के पास ही निक्षेप का व्यवहार करना
चाहिए—1. कुलीन—श्रेष्ठ, निष्कलंक कुल में उत्पन्न व्यक्ति, 2. शुद्ध—पवित्र
चरित्रवान्, 3. धर्मात्मा, अर्थात् धर्म-विरुद्ध आचरण से भय खाने वाला, 4. सत्यवादी,
146 / नारदस्मृति
- उदार-हृदय, 6. धनसमृद्ध तथा 7. लोक में सम्मानित एवं प्रतिष्ठित।
उपर्युक्त सात गुणों से युक्त पुरुष के पास निक्षिप्त सम्पत्ति समय बीतने पर भी
सुरक्षित रहती है। उसे किसी प्रकार की कोई क्षति नहीं पहुंचती। निक्षेप्ता को चिन्ता
नहीं करनी पड़ती।
यो यथा निक्षिपेद्धस्ते यमर्थं यस्य मानवः।
स तथैव ग्रहीतव्यो यथा दायस्तथा ग्रहः॥ ३॥
जिस व्यक्ति को, जिस स्थिति में और जिस प्रकार जो वस्तु निक्षेप के रूप में
सौंपी जाती है, निक्षेप रखने वाले का कर्तव्य हो जाता है कि वह उस व्यक्ति को
उस स्थिति में और उसी प्रकार से गृहीत वस्तु लौटा दे। दाय के अनुरूप ही ग्रहण
का होना धर्म और न्याय है।
न चेद्दद्यात्तु निक्षेप्तुस्तद् द्रव्यं तु यथाविधि।
उपसंगृह्य दाप्योऽसौ दिव्यादिभिर्व्यवस्थितः ॥ ४॥
निक्षेप्ता से गृहीत वस्तु को ग्रहीता द्वारा यथावत् लौटाने से इनकार करने पर
धर्माधिकारी द्वारा दिव्य उपायों के प्रयोग से ग्रहीता से सत्य उगलवाना चाहिए और
निक्षेप्ता को उसकी वस्तु दिलवानी चाहिए।
टिप्पणी—इस सम्बन्ध में मनु की व्यवस्था इस प्रकार है—
अथ निक्षेपग्राही लोभं गच्छति, निक्षेप्तुस्तद् द्रव्यं न प्रयच्छति, तदावेदितो
राज्ञा उपसंगृह्य दिव्यादिप्रमाणसाधितो द्विगुणदण्डाकोदितः कृतो दाप्यः।
अर्थात् यदि निक्षेप रखने वाला धनिक लोभवश निक्षेप्ता की सम्पत्ति को
हड़पना चाहता है और वस्तु के निक्षेप रखे जाने से मुकर जाता है और फिर पीडित
व्यक्ति राजा से न्याय की गुहार करता है, तो राजा को दिव्य अथवा अदिव्य उपायों
से सत्य का पता लगाना चाहिए। धनिक के दोषी पाये जाने पर न केवल उससे
निक्षेप्ता की सम्पत्ति लेकर सम्बद्ध पक्ष को दिलानी चाहिए, अपितु व्यक्ति की धूर्तता
के लिए दण्ड-रूप में उससे वस्तु के मूल्य से दुगुनी धनराशि भी वसूल करनी चाहिए।
अन्यद्रव्यव्यवहितं द्रव्यमव्याहृतं च यत्।
निक्षिप्यते परगृहे तदौपनिधिकं स्मृतम्॥ ५॥
तालाबन्द बक्सा, पेटी, गठरी अथवा पैकेट—भीतर रखे सामान के विषय में
जानकारी दिये बिना सोना है अथवा मिट्टी है—कुछ भी बताये बिना—निक्षेप के
रूप में दूसरे के घर में रखे जाने को उपनिधि अथवा औपनिधिक निक्षेप नाम दिया
जाता है।
स पुनर्द्विविधः प्रोक्तः साक्षिमानितरस्तथा।
प्रतिदानं तथैवास्य प्रत्ययः स्याद्विपर्यये॥ ६॥
निक्षेप दो प्रकार से किया जाता है। प्रथम, साक्षी की उपस्थिति में तथा
नारदस्मृति / 147
द्वितीय, किसी साक्षी को बीच में लाये बिना। उल्लेखनीय यह है कि जिस भी रूप
में निक्षेप किया जाता है, उसी रूप में उसकी वापसी होनी चाहिए, अर्थात् यदि
साक्षी को बीच में डाला गया है, तो वापसी के समय भी उसकी उपस्थिति अनिवार्य
समझनी चाहिए।
याच्यमानस्तु यो दात्रा निक्षेपं न प्रयच्छति।
दण्ड्यः स राज्ञा दुष्टात्मा नष्टे दाप्यश्च तत्समम्॥ 7 ॥
निक्षेप्ता (निक्षेप रखने वाला) द्वारा अपना सामान वापस मांगने पर इनकार
करने वाले ग्रहीता को दुरात्मा एवं धूर्त मानकर राजा के द्वारा दण्डित किया जाना
चाहिए। राजा का यह भी कर्तव्य है कि निक्षेप में रखे सामान के नष्ट हो जाने पर
अथवा गुम हो जाने पर निक्षेप ग्रहण करने वाले से निक्षेप्ता को क्षतिपूर्ति के रूप में
सामान के बराबर मूल्य दिलाया जाये।
यं चार्थं साधयेत्तेन निक्षेप्तुरननुज्ञया।
तत्रापि दण्ड्यः स भवेद्दाप्यस्तच्चापि सोदयम्॥ 8 ॥
निक्षेप्ता की अनुमति के बिना अपने पास निक्षिप्त वस्तु से लाभ कमाने वाले
ग्रहीता से न केवल अर्जित धन और उस पर बनने वाले ब्याज की राशि वसूल
करनी चाहिए, अपितु ऐसे धूर्त ग्रहीता को यथोचित दण्ड से अनुशासित भी करना
चाहिए।
ग्रहीतुः सह योऽर्थेन नष्टो नष्टः स दायिनः।
दैवराजकृते तद्वत् चेत्तज्जिह्मकारितम्॥ 9 ॥
ग्रहीता के अपने धन के साथ निक्षिप्त वस्तु के भी नष्ट हो जाने की स्थिति में
अथवा दैवी आपत्ति—घर को आग लग जाना, चोरी हो जाना आदि—की स्थिति
में अथवा राजा द्वारा ले लिये जाने या छापा पड़ने पर अन्य सामान के साथ निक्षिप्त
वस्तु के भी अधिगृहीत हो जाने आदि की स्थिति में वह हानि निक्षेप्ता की होती है।
निक्षेप्ता ग्रहीता को क्षतिपूर्ति के लिए विवश नहीं कर सकता। हां, यहां यह अवश्य
निश्चित करना चाहिए कि ग्रहीता द्वारा निर्दिष्ट कारण वास्तविक है या नहीं। कहीं
वह छल-कपट अथवा कुटिलता को तो नहीं अपना रहा। सच्चाई और ईमानदारी
मिलने पर निक्षेप्ता को निक्षिप्त वस्तु की हानि को अपने भाग्य का दोष मानना
चाहिए; क्योंकि उस हानि में ग्रहीता का तो कोई योग नहीं। उसने जान बूझकर तो
कुछ नहीं किया। जब स्थिति उसके वश में नहीं थी, तो वह क्या कर सकता था ?
स्वयमेव तु यो दद्यान्मृतस्य प्रत्यनन्तरे।
न स राज्ञाभियोक्तव्यो न निक्षेप्तुश्च बन्धुभिः ॥ 10 ॥
यदि अपने किसी निकट सम्बन्धी के पास अपने सामान को निक्षेप करने
वाले के अचानक मर जाने पर ग्रहीता मृतक के परिवारजनों को स्वयं निक्षिप्त
148 / नारदस्मृति
सामान को लौटाता है, तो परिवारजनों को उसका सौजन्य मानकर उसके प्रति
आभार प्रकट करना चाहिए। उसके प्रति कुछ रख लेने का किसी प्रकार का कोई
सन्देह भी नहीं लाना चाहिए, अपितु उस पर पूर्ण विश्वास रखना चाहिए। उस पर
किसी प्रकार का न तो कोई आरोप लगाया जा सकता है और न ही उसके विरुद्ध
अभियोग चलाया जा सकता है।
अच्छलेनैव चान्विच्छेत्तमर्थं प्रीतिपूर्वकम्।
विचार्य तस्य वा वृत्तं साम्नैव परिशोधयेत् ॥ 11 ॥
निक्षेप्ता के निक्षेप की वस्तु को वापस लिये बिना अचानक मर जाने पर और
गृहीता द्वारा लौटाने से इनकार करने पर मृतक के उत्तराधिकारियों को बिना किसी
छल कपट का सहारा लिये प्रेम-पूर्वक उसे समझाने-बुझाने का प्रयास करना
चाहिए अथवा ग्रहीता के आचरण के अनुरूप साम-दान आदि किसी भी उपयुक्त
लगने वाले उपाय का यथेष्ट प्रयोग करना चाहिए।
उत्तराधिकारियों को यह कदापि नहीं भूलना चाहिए कि उनके पास निक्षेप
का कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं होता। जानकारी के निश्चित होने पर भी प्रमाण के
अभाव में ग्रहीता को न्यायालय में तो नहीं घसीटा जा सकता। अतः प्रेम से कार्य
निकालने में ही बुद्धिमत्ता होती है।
चौरैर्हृतं जले मग्नमग्निना दग्धमेव च।
न दद्यात् यदि तस्मात् स न संहरति किञ्चन ॥ 12 ॥
निक्षेप्ता की निक्षिप्त वस्तु के साथ ही अन्य छल-कपट का सहारा न लेने वाले
ग्रहीता के घर से सामान चोरी हो जाने पर, बाढ़ से बह जाने पर, आग लगने से जल
जाने पर निक्षेप्ता को अपनी निक्षिप्त वस्तु की मांग नहीं करनी चाहिए। हां, यह
अवश्य निश्चित करना चाहिए कि निक्षेप्ता का सामान सचमुच नष्ट हो गया है
अथवा उस सामान के बच जाने पर ग्रहीता की नीयत बिगड़ गयी है। ग्रहीता
दुर्घटना की आड़ में कहीं निक्षेप्ता के सामान को हड़पने तो नहीं जा रहा है।
यो निक्षेपं नार्पयति यश्चानिक्षिप्य याचते।
तावुभौ चौरवच्छास्यौ दण्डं दाप्यौ च तत्समम् ॥ 13 ॥
दोनों-निक्षेप को न लौटाने वाले तथा निक्षेप न रखकर भी उसकी मांग
करने वाले, अर्थात् झूठ बोलकर दूसरे को लूटने को प्रयत्नशील-को चोर समझना
चाहिए और दोनों को चोर के लिए निर्धारित दण्ड देकर उन्हें अनुशासित करना चाहिए।
एष एव विधिर्दृष्टो याचितान्वाहितादिषु।
शिल्पे चोपनिधौ न्यासे प्रतिन्यासे तथैव च ॥ 14 ॥
निम्नोक्त सामान के सम्बन्ध में भी निक्षेप के विषय में निर्दिष्ट नियम लागू होते
हैं-
नारदस्मृति / 149
याचित — काम चलाने के लिए आभूषण, वस्त्र, शस्त्र आदि मांगकर ले
जाना और फिर लौटाने का नाम न लेना।
अन्वाहित — किसी को देने के लिए लिया गया सामान, सम्बद्ध स्थान पर
सम्बद्ध व्यक्ति को न पहुंचाकर, अपने पास रख लेना।
शिल्प — कारीगर, लोहार, सोनार आदि द्वारा धन अथवा स्वर्ण आदि लेकर
मूर्ति, चित्र, आभूषण आदि बनाकर न देना।
उपनिधि — स्वर्णकार आदि शिल्पियों को नमूने की नक़ल के लिए दिये गये
सामान को उनके द्वारा हड़प लेना।
न्यास — किसी को थोड़े समय के लिए सामान की सुरक्षा का दायित्व
सौंपना और उस व्यक्ति का सामान को लेकर चलते बनना तथा
प्रतिन्यास — आदान-प्रदान के आधार पर किसी की वस्तु की रक्षा के बदले
अपनी वस्तु की रक्षा का दायित्व सौंपना और उस व्यक्ति द्वारा अपनी वस्तु को
सुरक्षित पाकर दूसरे की वस्तु के प्रति उपेक्षा दिखाना।
प्रतिगृह्णाति पोगण्डं यश्च सप्रधनं नरः।
तस्याप्येष भवेद्धर्मः षडेते विधयः समा॥ 15 ॥
इसी प्रकार जब किसी अनाथ बालक को फुसलाकर ग्रहीता उसका सामान
अपने पास रखवा तो लेता है, परन्तु उसके द्वारा मांग करने पर लौटाने से इनकार
करता है, तो ऐसे व्यक्ति को भी निक्षेप हड़पने के लिए निर्दिष्ट दण्ड देना चाहिए।
॥ चतुर्थ अध्याय का द्वितीय प्रकरण समाप्त ॥
150 / नारदस्मृति
3. सम्भूयसमुत्थान प्रकरण
- सम्भूयसमुत्थान प्रकरण
वणिक्प्रभृतयो यत्र कर्म सम्भूय कुर्वते।
तत्सम्भूयसमुत्थानं व्यवहारपदं स्मृतम्॥ 1 ॥
जहां वणिक आदि एक साथ मिलकर व्यापार-धन्धा करते हैं, शास्त्रों में उस
व्यावसायिक स्थल का नाम 'सम्भूयसमुत्थान' कहलाता है।
फलहेतोरुपायेन कर्म सम्भूय कुर्वताम्।
आधारभूतः प्रक्षेपस्तेनोत्तिष्ठेयुरंशतः ॥ 2 ॥
मिलकर साझा व्यापार-धन्धा करने वालों का एकमात्र उद्देश्य लाभ अर्जित
करना होता है। अर्जित लाभ का कितना अंश किसको मिलना है, इस मूलतत्त्व के
निर्धारण के लिए उनके द्वारा निवेशित धनराशि के अंश दान को ही आधार बनाया
जाता है। जिस भागीदार ने जितना धन लगाया है, उसे उतने ही भाग में लाभ पाने
का अधिकार है। उदाहरणार्थ, चार सहयोगियों ने मिलकर एक लाख रुपयों की
मूलराशि से किसी उद्यम का प्रारम्भ किया। इसमें एक ने पचास हज़ार रुपयों का
तथा दूसरे और तीसरे ने बीस बीस हज़ार रुपयों का और चतुर्थ ने केवल दस
हज़ार रुपयों का योग दिया है। उनके इसी योगदान के आधार पर प्रथम का पचास
प्रतिशत, द्वितीय-तृतीय का बीस-बीस प्रतिशत व चतुर्थ का दस प्रतिशत भाग माना
जायेगा।
समोऽतिरिक्तो हीनो वा तत्रांशो यस्य यादृशः।
क्षयव्ययौ तदा वृद्धिस्तत्र तस्य तथाविधाः ॥ 3 ॥
भागीदारों का जैसा-बराबर बराबर अथवा न्यूनाधिक-भाग निर्धारित रहता
है, ख़र्च तथा हानि आदि में उनसे उतनी ही कटौती की जाती है तथा लाभ में उन्हें
उतना ही भुगतान किया जाता है।
भाण्डपिण्डव्ययोद्धारभारसारान्ववेक्षणम् ।
कुर्युस्तेऽव्यभिचारेण समये स्वे व्यवस्थिताः ॥ 4 ॥
उद्यम से सम्बद्ध सामान की देखभाल के लिए, उसे विक्रय की दृष्टि से
आकर्षक बनाने के लिए तथा उसके लिए गुणों को प्रचारित करने के लिए निम्नोक्त
ख़र्च निर्विवाद रूप से देय होते हैं-
नारदस्मृति / 151
भण्डारण — खरीदे गये माल को सुरक्षित रखने के लिए गोदाम की व्यवस्था
करना।
पाथेय — क्रय-विक्रय के लिए अपने ही नगर के विभिन्न क्षेत्रों में अथवा
अन्य नगरों में आने जाने पर सवारी, खान पान तथा होटल आदि पर होने वाला
ख़र्च, अर्थात् यात्रा-भत्ता।
व्यय — कर्मचारियों का वेतन, दुकान गोदाम आदि का किराया, मरम्मत,
बैंक आदि से लिये ऋण अथवा ब्याज आदि का भुगतान, काग़ज़ स्याही आदि की
ख़रीद तथा बाहर के व्यापारियों के ठहराने और खान-पान पर होने वाले विभिन्न
प्रकार के ख़र्च।
उद्धार — अपने सामान की खपत को बढ़ाने के लिए किये जाने वाले
प्रयासों—विज्ञापन, प्रचार, उपहार-योजना तथा खुदरा व्यापारियों को लुभाने व
अंशदान (कमीशन)—पर आने वाला ख़र्च।
भार — अपने सामान की गुणवत्ता को बनाये रखने के लिए, अर्थात् रंग-
रूप, वज़न तथा माप आदि कम न होने देने के लिए किये जाने वाले कृत्रिम उपायों
पर होने वाला ख़र्च। (उदाहरणार्थ, सेब आदि फलों को कोल्ड-स्टोर में रखना,
गोदाम को चूहों-कीड़ों के प्रवेश से बचाने की व्यवस्था करना अथवा वर्षा आदि
के कारण बिगड़े सामान पर रंग-रोगन कराना, चमकाना आदि।)
सार — (मूल्यवान्) वस्तुओं—चन्दन, केसर, कस्तूरी, हीरा, मोती आदि—
की सुरक्षा की अतिरिक्त व्यवस्था करना—बैंक के लॉकर में रखवाना तथा बीमा
करवाना आदि।
प्रमादान्नाशितं दाप्यः प्रतिषिद्धकृतं च यत्।
असन्दिष्टश्च यत् कुर्यात् सर्वसम्भूयकारिभिः ॥ ५ ॥
सभी भागीदारों की सहमति प्राप्त किये बिना किसी सामान को नष्ट कर देने,
भागीदारों के मना करने पर भी किसी सामान का क्रय-विक्रय करने तथा अपनी ही
गलती से किसी सामान को गंवा बैठने से होने वाली हानि का दायित्व दूसरे
भागीदारों का कदापि नहीं होता, अपितु हानि की भरपायी एकमात्र कर्ता को ही
करनी होती है।
दैवतस्करराजभ्यो व्यसने समुपस्थिते।
यस्तत्स्वशक्त्या रक्षेत् तस्यांशो दशमः स्मृतः ॥ ६ ॥
आग लगने जैसी दैवी आपत्ति से, चोर डाकुओं के गिरोह से तथा राजकर्मियों
के अनुचित व्यवहार (छापा-ज़ब्त करना आदि) से अकेला जूझकर एवं अपने
प्राणों को संकट में डालकर साझी सम्पत्ति को बचाने वाले भागीदार को बचायी
गयी सम्पत्ति का दसवां भाग पुरस्कार के रूप में देना चाहिए।
152 / नारदस्मृति
किसी एक सहभागी के मर जाने अथवा विदेश जाने पर उसके द्रव्य की
व्यवस्था सम्बन्धी नियम—
एकस्य चेत् स्याद् व्यसनं दायादोऽस्य तदाप्नुयात्।
अन्यो वासति दायादे शक्ताश्चेत् सर्व एव वा॥ 7॥
दैवी उपद्रव, डाकुओं के उत्पात तथा प्रशासन की उग्रता से जूझने वाले तथा
साझी सम्पत्ति को बचाने में अपने प्राण गंवाने वाले भागीदार के दायाद - पैतृक
सम्पत्ति लेने वाले—को उसका स्थानापन्न मानकर उसके भाग का लाभांश उसे देते
रहना चाहिए। यह शेष भागीदारों का नैतिक कर्तव्य बनता है। मृतक के पुत्र के
होने पर उसके निकट सम्बन्धी को अथवा उसका दाहकर्म करने वाले को अथवा
अपने को उसका उत्तराधिकारी को उसका लाभांश देते रहना चाहिए।
ऋत्विनां व्यसनेऽप्येवमन्यस्तत्कर्म निस्तरेत्।
लभेत दक्षिणाभागं स तस्मात् सम्प्रकल्पितम्॥ 8॥
यज्ञ-यागादि कराने वाले ऋत्विज के सम्बन्ध में भी उपर्युक्त व्यवस्था लागू
होती है, अर्थात् यजमान से दान दक्षिणा आदि लिये बिना प्राण त्यागने वाले
पुरोहित को देय दान-दक्षिणा को पाने का अधिकारी उसका पुत्र, उसके अभाव में
उसका निकट सम्बन्धी अथवा उसका दाहकर्म करने वाला अथवा अपने को
उसका उत्तराधिकारी सिद्ध करने वाला व्यक्ति ही होता है।
ऋत्विग्याज्यमदुष्टं यस्त्यजेदनुपकारिणम्।
अदुष्टर्त्विजे भाज्यो विनेयौ तावुभावपि॥ 9॥
किसी प्रकार की दुष्टता अथवा उपकार न करने वाले यजमान को यज्ञ-
यागादि कराने की स्वीकृति देकर क्रोध-लोभ आदि के कारण उसे छोड़ने वाला
पुरोहित तथा एक बार वरण करके उसमें किसी दोष के न मिलने पर भी अकारण
ऋत्विज को छोड़ने वाला यजमान, दोनों ही दण्डनीय हैं। इन दोनों को कठोर दण्ड
देकर अनुशासित करना चाहिए।
ऋत्विक् तु त्रिविधो दृष्टः पूर्वजुष्टः स्वयं कृतः।
यदृच्छया च यः कुर्यादार्त्विज्यं प्रीतिपूर्वकम्॥ 10॥
ऋत्विक् तीन प्रकार के होते हैं—
पूर्वजुष्ट—कुल-परम्परा से चला आने वाला।
स्वयं कृत—यजमान द्वारा पुरोहित के पास जाकर ऋत्विक् बनाने का अनुरोध
करने तथा
यादृच्छिक—यजमान द्वारा किसी भी विप्र पर अनुरक्त होकर उसका वरण
करना।
नारदस्मृति / 153
क्रमागतेष्वेष धर्मो वृत्तेष्वृत्विक्षु च स्वयं।
यादृच्छिकेषु याज्यस्य तत्तयागे नास्ति किल्विषम्॥ 11 ॥
प्रथम दो—पूर्वजुष्ट तथा स्वयंकृत—के लिए यजमान का परित्याग और
यजमान द्वारा इनका परित्याग दण्डनीय अपराध है। यादृच्छिक इस नियम के
अन्तर्गत नहीं आता। यजमान ने किसी के गुणों पर मुग्ध होकर अथवा अकारण ही
उसका वरण कर लिया, परन्तु कुछ समय पश्चात् यजमान को पुरोहित साधारण
प्रतीत होने लगा अथवा उससे अधिक गुणी उसे मिल गया अथवा वह पूर्वजुष्ट के
क्रोध से डर गया, तो इस स्थिति में यादृच्छिक के परित्याग में कोई दोष नहीं।
शुल्कस्थानं वणिक् प्राप्तः शुल्कं दद्यात् यथोदितम्।
न तद्व्यतिहरेद्राजो बलिरेष प्रकीर्तितः॥ 12 ॥
प्रशासन को चुंगीघर पर मांगे गये शुल्क का भुगतान करने वाले व्यापारी के
माल को रोकने अथवा ज़ब्त करने का कोई अधिकार नहीं।
शुल्कस्थानं परिहरन्नकाले क्रयविक्रयो।
मिथ्योक्त्वा च परीमाणं दाप्योऽष्टगुणमत्ययम्॥ 13 ॥
चुंगीघर से लुक-छिपकर सामान ले जाने वाले, शुल्क चुकाने से पूर्व सामान
का क्रय-विक्रय करने वाले, शुल्क-अधिकारी को सामान का पूरा परिमाण न
बताने वाले अथवा सही जानकारी न देने वाले, अर्थात् अधिक शुल्क लगने वाला
सामान बताने वाले व्यापारी से छिपाये गये सामान पर लगने वाले शुल्क का आठ
गुना वसूल करना चाहिए।
सद्य श्रोत्रियवर्ज्याणि शुल्कान्याहुः प्रजानता।
गृहोपयोगि यच्चैषां न तु वाणिज्यकर्मणि॥ 14 ॥
धर्मशास्त्रकारों के अनुसार अपने घर के उपयोग में आने वाले सामान पर
श्रोत्रिय ब्राह्मणों से कर नहीं वसूल करना चाहिए। हां, यदि उनके द्वारा लाया गया,
सामान व्यापार के लिए है, तो शुल्क देय होता है।
प्रतिग्रहो द्विजातीनां धनं रङ्गोपजीविनाम्।
स्कन्धवाह्यं च यद् द्रव्यं न तद्युक्तं प्रदापयेद्॥ 15 ॥
दान दक्षिणा से प्राप्त ब्राह्मणों के धन के प्रचुर होने पर भी, नृत्य-गीत वाद्य
आदि से आजीविका चलाने वालों के धन के मात्रा में अधिक होने पर भी तथा
अपने कन्धों पर भार ढोने वाले श्रमिकों की आय के पर्याप्त होने पर भी उनसे कर
नहीं वसूल करना चाहिए।
कश्चिच्चेत् सञ्चरन्देशान् प्रेयादभ्यागतो वणिक्।
राजास्य भाण्डं रक्षेत् यावद्दायाददर्शनम्॥ 16 ॥
व्यापार के लिए विदेश गये व्यापारी के अचानक परलोक सिधार जाने पर
154 / नारदस्मृति
उसके उत्तराधिकारी के उस देश में पहुंचने तक व्यापारी के माल की सुरक्षा का
दायित्व उस देश के राजा का होता है।
दायादेऽसति बन्धुभ्यो जातिभ्यो वा समर्पयेत्।
तदभावे सुगुप्तं तद्धारयेद्दशतीः समाः ॥ 17 ॥
मृत व्यापारी के पुत्र के न आने पर मृतक का सामान उसके भागीदारों, जाति-
बन्धुओं अथवा अधिकार सिद्ध करने वाले इष्टमित्रों को सौंपना चाहिए। मृतक के
किसी भी उत्तराधिकारी द्वारा उसके सामान को लेने के लिए न आने पर राजा को
दस वर्षों तक सामान को सुरक्षित रखने का दायित्व निभाना चाहिए।
अस्वामिकमदायादं दशवर्षस्थितं ततः।
राजा तदात्मसात् कुर्यादेवं धर्मो न हीयते ॥ 18 ॥
यदि मृतक के सामान का कोई भी दावेदार दस वर्षों के भीतर आकर अपना
दावा प्रस्तुत नहीं करता, तो राजा को यह मान लेना चाहिए कि मृतक का कोई
उत्तराधिकारी नहीं है। इस स्थिति में प्रशासन को वह सामान बेचकर प्राप्त धन
राजकोष में जमा करा देना चाहिए।
दस वर्षों के पश्चात् किसी दावेदार के आ जाने पर उस धन को लौटाना-न
लौटाना राजा की इच्छा पर निर्भर करता है। निर्धारित अवधि के उपरान्त दावेदार
केवल दया की याचना ही कर सकता है; क्योंकि समय-सीमा के बीत जाने के
साथ उसका विधिसम्मत अधिकार भी समाप्त हो चुका होता है।
॥ चतुर्थ अध्याय का तृतीय प्रकरण समाप्त ॥
नारदस्मृति / 155
4. दत्ताप्रदानिकं प्रकरण
- दत्ताप्रदानिकं प्रकरण
दत्त्वा द्रव्यमसम्प्यग् यः पुनरादातुमिच्छति।
दत्ताप्रदानिकं नाम तद्विवादपदं स्मृतम्॥ 1 ॥
किसी अयोग्य व्यक्ति को योग्य समझकर दिये गये धन को उसकी अयोग्यता
एवं अपात्रता के प्रकट हो जाने पर क्रोधावेश में वापस लेने का प्रयास 'दत्ताप्रदानिक'
कहलाता है। इसे भी एक विवाद स्थल समझना चाहिए।
अदेयमथ देयं च दत्तं चादत्तमेव च।
व्यवहारेषु विज्ञेयो दानमार्गश्चतुर्विधः॥ 2 ॥
देना चार प्रकार होता है-अदेय, देय, दत्त और अदत्त। निषिद्ध वस्तु का देना
अदेय, देने योग्य वस्तु का दान देय, देकर पुनः न लौटाना दत्त तथा एक बार देकर
वापस मिल गया अदत्त कहलाता है।
तत्रेहाष्टावदेयानि देयमेकविधं स्मृतम्।
दत्तं सप्तविधं ज्ञेयमदत्तं षोडशात्मकम्॥ 3 ॥
स्मृतिकारों ने अदेय के आठ, देय का एक, दत्त के सात और अदत्त के सोलह
प्रकार बताये हैं।
अन्वाहितं याचितकमाधिः साधारणं च यत्।
निक्षेपः पुत्रदारं च सर्वस्वं चान्वये सति॥ 4 ॥
परिवार रखने वाले, अर्थात् गृहस्थ के लिए अदेय होते हैं-1. अन्वाहिता-
कठिनाई से जुटाया गया धन, 2. याचित, 3. आधि-धरोहर की वस्तु, 4. साधारण
द्रव्य-खाने-पीने के काम में आने वाला, 5.निक्षेप, 6. स्त्री, 7. पुत्र तथा 8. सर्वस्व
-घर के बरतन, वस्त्र आदि।
आपत्स्वपि हि कृष्ट्रासु वर्त्तमानेन देहिना।
अदेयान्याह्राचार्या यच्चान्यस्मै प्रतिश्रुतम्॥ 5 ॥
आचार्यों के अनुसार उपर्युक्त आठ प्रकार के धन घोर संकट के उपस्थित होने
पर तथा देने का वचन देकर भी कभी नहीं देने चाहिए।
कुटुम्बभरणाद् द्रव्यं यत्किञ्चिदतिरिच्यते।
तद्देयमपहृत्यान्यत् कुटुम्बी दोषमाप्नुयात्॥ 6 ॥
परिवार का भरण पोषण करना परिवार के मुखिया का कर्तव्य कर्म है।
156 / नारदस्मृति
अतः परिवारजनों की आवश्यकता से अतिरिक्त अवशिष्ट धन ही देय होता है।
परिवार के लोगों की आवश्यकता की उपेक्षा करके दिया गया दान 'अपहरण'
कहलाता है और इसके लिए दानकर्ता पुण्य के स्थान पर पाप का भागी बनता है।
यस्य त्रैवार्षिकं वित्तं पर्याप्तं भृत्यवृत्तये।
अधिकं वापि विद्येत स सोमं पातुमर्हति ॥ 7 ॥
तीन वर्षों तक अथवा उससे भी अधिक समय तक परिवार के भरण-पोषण
के लिए पर्याप्त धन रखने वाले गृहस्थ को ही यज्ञ-यागादि करने का अधिकार है।
अभिप्राय यह है कि सोमपान करने व यज्ञ-यागादि के लिए प्रस्तुत होने से
पूर्व गृहस्थ के लिए यह विचारणीय होता है कि क्या उसके पास तीन वर्षों तक
परिवारजनों की सभी प्रकार की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए पर्याप्त धन
विद्यमान है। यदि ऐसा नहीं, तो व्यक्ति को किसी बड़े यज्ञ को सम्पन्न करने के
विषय में सोचने तक का अधिकार नहीं। परिवारजनों की उपेक्षा करके पुण्य कर्म
करना सर्वथा अनुचित है।
टिप्पणी- लगता है कि सोमपान किये जाने वाले बृहत् यज्ञ-यागादि की
तैयारी में तथा उसे सम्पन्न करने में दो-तीन वर्ष लग जाते होंगे। इस अवधि में
व्यक्ति इस प्रकार व्यस्त हो जाता होगा कि उसके लिए व्यापार-धन्धा करना और
धन कमाना सम्भव ही नहीं रहता होगा। इसीलिए तीन वर्षों तक परिवार के भरण-
पोषण की पूर्व-व्यवस्था करने का निर्देश दिया गया है।
पण्यमूल्यं भृतिस्तुष्ट्यानां स्नेहात् प्रत्युपकारतः ।
स्त्रीभक्त्यानुग्रहार्थं च दत्तं सप्तविधं स्मृतम् ॥ 8 ॥
दत्त धन के निम्नोक्त सात प्रकार-भेद हैं- 1. पण्यमूल्य - ख़रीदे सामान का
दाम चुकाना, 2. भृति-वेतन अथवा भत्ता, 3. तोष - किसी के कार्य पर प्रसन्न
होकर उसे पुरस्कृत करना, 4. स्नेहसूचन - मित्र, बन्धु, प्रियजन के प्रति स्नेह-
प्रदर्शन के रूप में उपहार देना, 5. प्रत्युपकार - किसी के उपकार के भार को
हलका करने के लिए उसे भेंट के रूप में समर्पित करना, 6. विवाह आदि में शगुन
के रूप में कन्या, भगिनी आदि को स्त्रीशुल्क के रूप में सौंपना तथा 7. अनुग्रह -
किसी अभावग्रस्त की सहायता करना।
इस प्रकार आज की भाषा में दान के निम्नोक्त सात प्रकार हैं- विनिमय,
वेतन, पुरस्कार, उपहार, प्रत्युपकार, शुल्क तथा सहायता।
अदत्तं तु भयक्रोधद्वेषशोककरुगन्वितैः ।
तथोत्कोचपरीहासव्यत्यासच्छलयोगतः ॥ 9 ॥
बालमूढास्वतन्त्रार्तमत्तोन्मत्तापवर्जितम् ।
कर्त्ता ममायं कर्मेति प्रतिलाभेच्छया च यत् ॥ 10 ॥
नारदस्मृति / 157
अदत्त—अर्थात् दिया हुआ भी न दिये-जैसा—के निम्नोक्त सोलह भेद हैं—
- भय (धर्म का, दण्ड का या लोकलाज का भय) के कारण दिया गया
धन, 2. क्रोध—किसी के व्यवहार पर क्षुब्ध होकर, आवेश में आकर धन फेंकना, - शोक—स्त्री पुत्रादि की अकालमृत्यु पर विह्वल एवं विरक्त होकर सम्पत्ति का
त्याग कर देना, 4. रोग—किसी असाध्य रोग से पीड़ित और जीवन से निराश होने
की स्थिति में किसी को कुछ भी देने को बक देना, 5. उत्कोच—अपने किसी काम
को निकालने के लिए घूस देना, 6. परिहास—मज़ाक़ में ही किसी को कुछ देने को
बोल देना, 7. विनिमय—किसी वस्तु को लेने के बदले कुछ देने का वचन करना, - दानव्यत्यास—दूसरों को कुछ देता देखकर वास्तविक स्थिति की जांच किये
बिना ही भावावेश में आकर कुछ दे देना, 9. छल-कपट से दूसरों द्वारा धन
छीनना—सौ देकर हज़ार देना-बताना और वसूल करने की चेष्टा करना, - बालक द्वारा किया गया लेन-देन, 11. मूढ़, अर्थात् बुद्धिहीन व्यक्ति द्वारा दिया
गया, 12. अस्वतंत्र, अर्थात् दूसरों पर आश्रित व्यक्ति द्वारा प्रदत्त, 13. आर्त, अर्थात्
घर की निर्धनता, किसी रोग, संकट अथवा पारिवारिक कलह-द्वेष से दिया गया
धन, 14. मत्त—मदिरा आदि के प्रभाव से विवेकहीन बने व्यक्ति द्वारा दिया गया
धन 15. प्रयोजन-विशेष—नियुक्ति, स्थानान्तरण, सम्मान, पुरस्कार आदि लाभ के
लिए लिया-दिया, परन्तु उस प्रयोजन का सिद्ध न होना।
टिप्पणी—असहाय भाष्यकार ने 'भय से दत्त को अदत्त' मानने का एक
सुन्दर उदाहरण निम्नोक्त रूप से प्रस्तुत किया गया है—दुष्टेन साधुरटव्यां
प्राप्तोऽभिहितः। द्रम्माणां शतं ददासि ततो जीवसि अन्यथा म्रियसे। सोऽपि
भयाद्वदति दास्यामित्येवं भयप्रतिश्रुतमदत्तमिति विज्ञेयम्। अर्थात् एक दुष्ट किसी
सज्जन व्यक्ति को अकेले में पाकर उसे डराते हुए कहता है—तुम पर शनि भारी है,
यदि सौ दो सौ से पूजा नहीं करोगे, तो मर जाओगे। भला व्यक्ति उसके झांसे में
आकर देने का संकल्प कर लेता है—इस संकल्प को भी विवशता में किया होने के
कारण अव्यवहार्य माना जायेगा!
इसमें कुछ और भी जोड़ा जा सकता है। उदाहरणार्थ, लोभ को ही लीजिये।
कुछ धूर्त व्यक्ति स्वर्णाभूषणों को अथवा नक़दी को दुगुना करने का प्रलोभन देकर
व्यक्ति को लूट लेते हैं।
इसी प्रकार प्रसन्नता को भी लिया जा सकता है। कोई व्यक्ति किसी पर
प्रसन्न होकर अनपेक्षित धन पुरस्कार के रूप में दे देता है। कामवासना को भी इसी
प्रकार अदत्त ही मानना चाहिए। कामान्ध व्यक्ति अपनी किसी प्रेयसी अथवा वेश्या
को अन्धाधुन्ध धन लुटा देता है।
अभिप्राय यह है कि किसी भी असामान्य स्थिति में तथा अनुचित ढंग से
158 / नारदस्मृति
दिये धन को अदत्त ही मानना चाहिए।
अपात्रे पात्रमित्युक्ते कार्ये वा धर्मसंहिते।
यद्दत्तं स्यादविज्ञानाददत्तं तदपि स्मृतम्॥ 11 ॥
इसी तथ्य को इस पद्य में स्पष्ट करते हुए कहा गया है—1. अयोग्य व्यक्ति
द्वारा अपने को योग्य बताकर लिया (ऐंठा) गया धन। उदाहरणार्थ, किसी अशिक्षित
द्वारा अपने को विद्वान् धर्मात्मा बताकर धोखे से वसूल किया धन तथा 2. धर्मकार्य—
यज्ञ-यागादि को सम्पन्न करने अथवा तीर्थाटन करने अथवा कन्या का विवाह
करने—के लिए प्राप्त धन को द्यूत-क्रीड़ा व मदिरापान आदि में उड़ाना आदि।
इस प्रकार असत्य एवं दुरुपयोग आदि की स्थिति में दत्त को अदत्त मानना
चाहिए।
अभिप्राय यह है कि यदि उपर्युक्त सभी स्थितियों में धन देने का वचन किया
गया है, तो उसे नकार देना चाहिए और यदि धन दे दिया गया है, तो उसे वापस
लेने का उद्यम करना चाहिए।
गृह्णात्यदत्तं यो लोभाद् यश्चादेयं प्रयच्छति।
अदेयदायको दण्डस्तथादत्तप्रतीच्छकः॥ 12 ॥
न देने योग्य स्थिति में भी न देने योग्य वस्तु को लोभवश ग्रहण करने वाला
'अदत्त प्रतीच्छक' कहलाता है तथा अदेय स्थिति में अदेय वस्तु को देने वाला
'अदेय दायक' कहलाता है। प्रशासन को इन दोनों को यथोचित दण्ड देना चाहिए।
॥ चतुर्थ अध्याय का चतुर्थ प्रकरण समाप्त॥
नारदस्मृति / 159
- अभ्युपेत्याशुश्रूषा
अभ्युपेत्य च शुश्रूषां यस्तां न प्रतिपद्यते।
अशुश्रूषाभ्युपेत्यैतद्विवादपदमुच्यते ॥ 1 ॥
सेवा के लिए वचन देकर, अपने वचन को न निभाना, अर्थात् धोखा देना
'अभ्युपेत्याशुश्रूषा' नामक विवाद का विषय कहलाता है।
शुश्रूषकः पञ्चविधः शास्त्रे दृष्टो मनीषिभिः।
चतुर्विधः कर्मकरस्तेषां दासास्त्रिपञ्चकाः ॥ 2 ॥
मनीषियों ने शास्त्रों में सेवकों के पांच, कर्मकरों के चार तथा दासों के पन्द्रह
प्रकार-भेदों का वर्णन किया है।
टिप्पणी - आज्ञानुसार कार्य करने का नाम सेवा है। प्राचीनकाल में वेतनभोगी
स्थायी कर्मचारी सेवक, कार्य-विशेष के लिए विशेष अवसरों पर नियुक्त अस्थायी
कर्मचारी कर्मकर तथा ख़रीदे और वस्त्र-भोजन पर काम करने वाले घरेलू नौकर
दास कहलाते थे। इन्हीं के विभिन्न रूप-भेद हैं।
शिष्यान्तेवासिभृतकाश्र्चतुर्थस्त्वधिकर्मकृत् ।
एते कर्मकरा ज्ञेया दासास्तु गृहजादयः ॥ 3 ॥
निम्नोक्त चारों को कर्मकर-कुछ समय के लिए विद्या वेतन आदि के बदले
सेवा करने वाले-समझना चाहिए।
शिष्य-गुरुकुल में शिक्षा ग्रहण करने आने वाला, आज की भाषा में छात्र
(स्टूडेण्ट अथवा डे स्कॉलर)।
अन्तेवासी-गुरुकुल में रहकर शिक्षा ग्रहण करने वाला। आज की भाषा में
छात्रावास में रहने वाला (होस्टलर)।
भृतक-पारिश्रमिक लेकर सेवा करने वाला-पानी भरने वाला, भार ढोने
वाला, लकड़ी चीरने वाला तथा खाना बनाने वाला।
अधिकर्मकृत्-दुकान, कारखाना आदि व्यापारिक संस्थान आदि में कार्य
करने वाला-मुनीम, सहायक तथा सेल्समैन आदि।
सामान्यस्त्वस्वतन्त्रत्वमेषामाहुर्मनीषिणः ।
जातिकर्मकृतश्रोक्तो विशेषो वृत्तिरेव च ॥ 4 ॥
मनीषी स्मृतिकारों के अनुसार-यद्यपि ये चारों जाति, स्थिति, कर्म और
160 / नारदस्मृति
वृत्ति की दृष्टि से भिन्नता लिये हुए होते हैं, तथापि ये चारों एक दृष्टि से समान हैं।
वह समानता है—इन चारों का स्वामी के अधीन होना। शिष्य और अन्तेवासी जाति
से द्विज होते हैं। भृतक तथा अधिकर्मकृत शूद्र भी हो सकते हैं। इन चारों की
सामाजिक स्थिति की भिन्नता स्पष्ट है। शिष्य और अन्तेवासी गुरु की सेवा करते
हुए भी दास नहीं कहलाते, जबकि भृतक और अधिकर्मकृत दास कहला भी सकते
हैं और नहीं भी। शिष्य और अन्तेवासी वेतनभोगी नहीं होते, जबकि भृतक पारिश्रमिक
पाता है और अधिकर्मकृत वेतन अथवा भत्ता अथवा कमीशन पाता है। शिष्य और
अन्तेवासी गुरु की गुरुता के कारण उसके अधीन हैं और उसके प्रति श्रद्धा भाव
रखते हैं, परन्तु भृतक और अधिकर्मकृत को स्वामी के गुण, पद तथा सामाजिक
स्तर आदि से कुछ लेना-देना नहीं। उसे तो केवल उससे प्राप्त होने वाले धन और
उसके उदार व्यवहार से प्रयोजन है। शिष्य और अन्तेवासी को सामान्यतया शिक्षा-
समाप्तिकाल तक गुरु के पास रहना ही है। भृतक और अधिकर्मकृत का कार्यकाल
और स्थितिकाल तो अनिश्चित ही रहता है, वे जीवनपर्यन्त भी स्वामी के साथ जुड़े
रह सकते हैं तथा इसके विपरीत दूसरे दिन भी उसे छोड़कर जा सकते हैं।
इस प्रकार इन चारों में जाति सम्बन्धी, स्थिति सम्बन्धी, कर्म सम्बन्धी और
वृत्ति सम्बन्धी भिन्नता होते हुए भी एक अभिन्नता है—गुरु अथवा स्वामी की
वशवर्तिता—उसकी आज्ञापालन तत्परता। इस प्रकार उसकी अधीनता, दूसरे शब्दों
में अस्वतन्त्रता।
कर्मापि द्विविधं ज्ञेयमशुभं शुभमेव च।
अशुभं दासकर्मोक्तं शुभं कर्मकृता स्मृतम्॥ ५॥
सेवाकर्म दो प्रकार का कहा गया है—शुभ तथा अशुभ। दासकार्य—झाडू-
पोचा, बर्तन साफ़ करना, वस्त्र-प्रक्षालन, जूता-पॉलिश, तेल-मालिश तथा लकड़ी
चीरना-फाड़ना आदि छोटे कार्य—अशुभ कर्म हैं तथा शेष सभी कर्मचारियों का
सेवाकार्य शुभ कर्म है।
गृहद्वाराशुचिस्थानरथ्यावस्करशोधनम् ।
गुह्याङ्गा स्पर्शनोच्छिष्टविण्मूत्रग्रहणोज्झनम्॥ ६॥
इष्टतः स्वामिनश्चाङ्गोपस्थानमथोऽन्ततः।
अशुभं कर्म विज्ञेयं शुभमन्यदतः परम्॥ ७॥
अशुभ कर्मों का विवरण इस प्रकार है—1. गृहद्वार, अपवित्र स्थान, अपवित्र
मार्ग तथा अशुद्ध वस्तु का शोधन, 2. गृहस्वामी के गुप्त अंगों का स्पर्श,
3. उच्छिष्ट (जूठन) और मल-मूत्र को उठाकर घर से बाहर फेंकना तथा 4. स्वामी
की इच्छानुसार उसे इन्द्रिय सुख देना आदि इस प्रकार के सभी कर्म अशुभ हैं और
इनसे भिन्न अन्य कर्म शुभ हैं।
नारदस्मृति / 161
**टिप्पणी—**इससे स्पष्ट संकेत मिलता है कि प्राचीनकाल में स्वामी अपने
दास-दासी का यौन-शोषण भी करते थे। दासों को स्वामी की इच्छा का विरोध
करने का अधिकार नहीं था। स्वामी उनकी चमड़ी उधेड़ सकता था। यहां तक कि
उनके अधमरा हो जाने पर उसका उपचार कराने-न कराने के लिए स्वामी स्वतन्त्र
था। दास की मृत्यु के लिए स्वामी उत्तरदायी नहीं था। क्या मानवता थी ?
आविद्याग्रहणाच्छिष्यः शुश्रूषेत प्रयतो गुरुम्।
तद्वृत्तिर्गुरुदारेषु गुरुपुत्रे तथैव च॥ 8॥
शिष्य को विद्या-ग्रहणपर्यन्त पूरे समय पूर्ण मनोयोग से गुरु की सेवा में
अपने को समर्पित करना चाहिए। यही सेवा का भाव गुरुपत्नी और गुरुपुत्र के प्रति
भी रखना चाहिए।
ब्रह्मचारी चरेद्भैक्षमधः शाय्यनलङ्कृतः।
जघन्यशायी सर्वेषां पूर्वोत्थायी गुरोर्गृहे॥ 9॥
गुरुकुल में रहने वाले शिष्य (अन्तेवासी) को अपने निवासकाल में निम्नोक्त
नियमों का दृढ़ता से पालन करना चाहिए—1. ब्रह्मचर्य का पालन, अर्थात् स्त्री
संग की इच्छा भी न करना और न ही इस विषय में सोचना, 2. भिक्षा से उदर-
भरण करना, अर्थात् रुचिकर, स्वादिष्ट तथा मनचाहे भोजन के स्थान पर यथाप्राप्त
से सन्तोष करना तथा याचक के रूप में विनम्रता तथा साधुवृत्ति—जो दे उसका भी
भला, जो न दे उसका भी भला—को अपनाना और दूसरों से मांगे अन्न पर जीते
हुए समाज को लौटाने की भावना का पाठ पढ़ना, 3. भूतलशैया—रीढ़ की हड्डी को
सुदृढ़ बनाना, 4. अलंकरण की इच्छा का त्याग तथा 5. गुरु-परिवार के सोने के
उपरान्त सोना और जागने से पूर्व जागना।
नासन्दिष्टः प्रतिष्ठेत तिष्ठेद्वा गुरुणा क्वचित्।
सन्दिष्टः प्रतिकुर्वीत शक्तश्चेदविचारयन्॥ 10॥
गुरु का आदेश न मिलने तक शिष्य को उनके सामने उपस्थित रहना चाहिए।
उनकी अनुमति प्राप्त किये बिना वहां से खिसक जाना कदापि उचित नहीं। गुरु के
आदेश के औचित्य पर विचार किये बिना ही उसका पालन करना शिष्य का धर्म
एवं कर्तव्य है।
यथाकालमधीयीत यावन्न विमना गुरुः।
आसीनोऽधो गुरोः पार्श्वे फलके वा समाहितः॥ 11॥
शिष्य को नियम एवं निश्चित समय पर अपना अध्ययन प्रारम्भ करना
चाहिए और जब तक गुरु पठन पाठन को बन्द करने का आदेश नहीं देते, तब तक
अध्ययन जारी रखना चाहिए। शिष्य को पाठ पढ़ते समय गुरु के सामने धरती पर
आसन बिछाकर और संयत होकर बैठना चाहिए।
162 / नारदस्मृति
स्रोतोवहेव सर्वत्र विद्या निम्नानुसारिणी।
निम्नवर्ती श्रवेत्तस्मात्तदर्थी सर्वदा गुरोः ॥ 12 ॥
जिस प्रकार नदी का जल सदैव नीचे की ओर प्रवाहित होता है, उसी प्रकार
विद्या भी सदैव विनम्र व्यक्ति को प्राप्त होती है। अतः विद्यार्थी को उद्देश्य-सिद्धि के
लिए सदैव ही गुरु के प्रति विनम्र एवं विनत बने रहना चाहिए। तब ही वह विद्या
में प्रवीणता प्राप्त कर अपने जीवन को सफल बना सकता है।
अनुशास्यश्च गुरुणा न चेदनुविधीयते।
अविधिनाथवा बद्ध्वा रज्ज्वा वेणुदलेन वा ॥ 13 ॥
शिष्य के धृष्ट, अविनीत तथा अनुशासनहीन होने पर उसे अनुशासित करना,
सही मार्ग पर लाना, दिशा निर्देश देना गुरु का कर्तव्य-कर्म है। इसके लिए भले ही
गुरु को शिष्य की डण्डे से पिटाई करनी पड़े अथवा रस्सी से बांधकर रखना पड़े,
यह सब करने में संकोच नहीं करना चाहिए। वस्तुतः अपने शिष्य को सुसंस्कृत
करने के लिए गुरु द्वारा कठोर पग उठाना शिष्य के हित-साधन के निमित्त ही होता
है। इस सम्बन्ध में मनु का कथन दर्शनीय है-
सामृतैः पाणिभिर्ध्नन्ति गुरवो न विषोक्षितैः।
अर्थात् गुरु विष-भरे हाथों से नहीं, अपितु अमृतमय हाथों से पिटाई करते
हैं। उनके द्वारा पिटाई करने का उद्देश्य शिष्य को सन्मार्ग पर लाना होता है।
भृशं न ताडयेदेनं नोत्तमाङ्गे न वक्षसि।
अनुशास्याय विश्वास्यः शास्यो राज्ञान्यथा गुरुः ॥ 14 ॥
गुरु को अपने शिष्य को अनुशासित करने के लिए उसकी पिटाई करते समय
उसके उत्तम अंगों-वक्ष के ऊपर के अंगों-ग्रीवा, मस्तक, सिर, कान, नाक, गला
आदि-पर कभी प्रहार नहीं करना चाहिए। ताड़ना का विधान केवल अनुशासनहीन
छात्र के लिए है और उसका उद्देश्य छात्र को सही मार्ग पर लाना है। अनावश्यक
एवं अनुचित रूप से छात्रों को दण्ड देने वाले अध्यापक को क्रूर मानकर प्रशासन
द्वारा दण्डित करना चाहिए।
समावृत्तश्च गुरवे प्रदाय गुरुदक्षिणाम्।
प्रनीयात् स्वगृहानेषा शिष्यवृत्तिरुदाहृता ॥ 15 ॥
शिष्य का यह कर्तव्य कर्म है कि उसे अपनी शिक्षा-समाप्ति पर अपने गुरु
को दक्षिणा से सन्तुष्ट करने के उपरान्त ही अपने घर को लौटना चाहिए।
स्वशिल्पमिच्छन्नाहर्तुं बान्धवानामनुज्ञया।
आचार्यस्य वसेदन्ते कालं कृत्वा सुनिश्चितम् ॥ 16 ॥
छात्र को अपने अभिभावकों, शुभचिन्तकों तथा बन्धु-बान्धवों से परामर्श
करके ही शिक्षा की शाखा विशेष-वैद्यक, विज्ञान, कला, वाणिज्य, अनुसन्धान,
नारदस्मृति / 163
शिल्प तथा यान्त्रिकी आदि—का चुनाव करना चाहिए। अभिमत शाखा की पाठ्यावधि
के समाप्तिकाल तक उसे गुरुकुल में रहना चाहिए।
आचार्यः शिक्षयेदेनं स्वगृहे दत्तभोजनम्।
न चान्यत् कारयेत् कर्म पुत्रवच्चैनमाचरेत्॥ 17 ॥
आचार्य पिता बनकर अपने शिष्य का पुत्र के समान पालन-पोषण करता है।
वह अपने शिष्य से कोई अन्य निजी कार्य न लेकर केवल विद्या-प्राप्ति के लिए
अनुकूल सुविधाएं और परिवेश जुटाकर उसे उद्देश्य के प्रति समर्पित बनाता है।
शिक्षयन्तमदुष्टं य आचार्यः सम्परित्यजेत्।
बलाद्वासयितव्यः स्याद्बधबन्धौ च सोऽर्हति॥ 18 ॥
ईमानदारी से अपने शिष्यों को शिक्षित करने वाले तथा कठोरता से अनुशासन
को लागू करने वाले गुरु का परित्याग करने वाले छात्र को बांधकर पीटना ही नहीं
चाहिए, अपितु उसे बलपूर्वक गुरु के समीप लाकर शिक्षा-प्राप्ति के लिए बाध्य भी
करना चाहिए।
शिक्षितोऽपि कृतं कालमन्तेवासी समाप्नुयात्।
तत्र कर्म च यत् कुर्यादाचार्यस्यैव तत् फलम्॥ 19 ॥
शिक्षा-प्राप्तिकाल में शिष्य के द्वारा किये गये कर्म—आविष्कार, मूर्ति, चित्र-
निर्माण, वस्त्रों की सिलाई, खिलौने बनाना, फ़र्नीचर बनाना, लेख, पुस्तक लिखना,
प्रतियोगिता में पुरस्कार पाना आदि के फल एवं लाभ पर गुरु का अधिकार होता है।
शिष्य को शिक्षाकाल में अपने शारीरिक अथवा बौद्धिक श्रम से प्राप्त आय अपने
गुरु को ही समर्पित कर देनी चाहिए। शिक्षा-समाप्ति के उपरान्त शिष्य के द्वारा
गुरुकुल को छोड़कर अपने घर चले जाने पर, यदि उसके श्रम का कोई फल
मिलता है या किसी सामान की बिक्री का धन आता है, किसी पुस्तक पर पुरस्कार
मिलता है अथवा अन्य किसी प्रकार का सम्मान मिलता है, तो उस पर भी गुरु का
ही अधिकार होता है।
गृहीतशिल्पः समये कृत्वाचार्यप्रदक्षिणम्।
शक्तिश्चानुमान्यैनमन्तेवासी निवर्तते॥ 20 ॥
शिष्य अपने निर्वाचित शिल्प, कला आदि विषय के निर्धारित पाठ्यक्रम को
निश्चित अवधि में सम्पन्न करने के उपरान्त अपनी सामर्थ्य के अनुसार गुरु को
यथोचित दक्षिणा समर्पित करता है और फिर गुरु की अनुमति प्राप्त होने पर ही
अपने घर को लौटता है।
वेतनं वा यदि कृतं ज्ञात्वा शिष्यस्य कौशलम्।
अन्तेवासी समादद्यान्न चान्यस्य गृहे वसेत्॥ 21 ॥
यदि शिक्षा-समाप्ति के उपरान्त गुरु शिष्य को रोक लेता है और उसका वेतन
164 / नारदस्मृति