नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)
Narada Smriti with Hindi Translation
देवर्षि नारद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
प्रारंभिक पृष्ठ व विषय-सूची
Dynamic RELIGIOUS SERIES
नारदस्मृति
229
नार। ना
डा. राम कुमार वर्मा "शास्त्री"
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कृष्णा समूह
KRISHNA
भारत के लब्ध प्रतिष्ठ प्रकाशन समूहों में से एक
कृष्णा समूह आज किसी परिचय का मोहताज नहीं है।
इस समूह ने स्वतंत्र भारत के 6 दशकों में अपनी
गौरव-गरिमा के शानदार पड़ाव तय किये हैं। आज
भारत भर में शैक्षिक उन्नयन व विकास के लिए कृष्णा
की भूमिका को अत्यंत सम्मान के साथ देखा जाता है। विभिन्न
प्रतियोगी परीक्षाओं के माध्यम से देश के शीर्षस्थ पदों पर विराजमान
अधिकारी अपनी कामयाबी का संपूर्ण श्रेय कृष्णा प्रकाशन की
उत्कृष्ट पुस्तकों को देते हैं। भारत के कोने-कोने में इस प्रकाशन
समूह की उच्चस्तरीय कृतियों की अनुगूंज है। कृष्णा प्रकाशन
समूह एक ऐसा समूह है जिससे आज प्रत्येक प्रतिष्ठित लेखक
जुड़ने को उत्सुक है जबकि प्रत्येक मेधावी युवा इसकी पुस्तकों
को अंगीकार करना चाहता है।
नई दिल्ली के प्रगति मैदान में '15वें विश्व पुस्तक मेले' के अवसर पर 'डायनेमिक पब्लिकेशंस
(इण्डिया) लि. के समारोह को सम्बोधित करते उप प्रधानमंत्री श्री लाल कृष्ण आडवाणी।
इस समूह की संपूर्ण सफलता का श्रेय समूह के चेयरमैन श्री सत्येन्द्र
कुमार रस्तौगी को जाता है, जिनकी अद्वितीय प्रतिभा, विलक्षण
अनुभव, दूरदर्शिता, सटीक निर्णय तथा रचनात्मक व सृजनात्मक
व्यक्तित्व के कुशल मार्गदर्शन की छत्र-छाया में कृष्णा रूपी पौधा
अत्यधिक पुष्पित-पल्लवित हो रहा है। बहुमुखी प्रतिभा के धनी श्री
रस्तौगी भारत में एक नई सृजनात्मक क्रांति को फलीभूत होते देखने
के इच्छुक हैं। वे कागज तथा कलम की सकारात्मक उपलब्धियों
के पृष्ठ पोषक हैं। डायनेमिक पब्लिकेशंस (इण्डिया) लि. कृष्णा समूह
की नवोदित प्रकाशन संस्था है जहां से प्रकाशित पुस्तकें लोकप्रियता
के नये आयाम स्पर्श कर रही हैं। निश्चित रूप से वो दिन दूर नहीं जब
भारत की सरहद के उस पार अन्य देशों में भी कृष्णा समूह की कीर्ति
पताका पूरी आन-बान-शान से फहरा रही होगी।
('मीडिया फीचर्स ऑफ इण्डिया' के जनरल से साभार)
नारदस्मृति
'आज उपलब्ध स्मृतियों में 'नारद स्मृति' का अपना अलग
ही महत्व है। इसमें जैसा संक्षिप्त, तर्कसंगत, उपयोगी,
व्यावहारिक एवं आवश्यक विवेचन हुआ है, वैसा अन्यत्र
दुर्लभ है। नारदस्मृति में आचार संहिता, व्यवहार-पद,
दण्ड-प्रणाली तथा राजधर्म का जैसा उत्कृष्ट, वैज्ञानिक,
तर्कयुक्त, युक्तिसंगत, सरल एवं संक्षिप्त परिचय दिया गया
है, वह अपने आप में अनुपम एवं अद्वितीय है।'
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त्रिस्कन्ध
Dynamic Religious Series
नारदस्मृति
रूपान्तरकार
डॉ. रामचन्द्र वर्मा शास्त्री
एम.ए. (हिन्दी-संस्कृत) एम.ओ.एल. पी.एच.डी.
DYNAMIC
डायनेमिक पब्लिकेशन्स (इण्डिया) लि०
11, शिवाजी मार्ग, मेरठ (उ.प्र.)
Dynamic Religious Series
नारदस्मृति
© प्रकाशकाधीन
Code No. : Q 3-1
ISBN-81-7933-116-4
डॉ. रामचन्द्र वर्मा शास्त्री
Price : Rs.90.00
Published by : S.K. Rastogi for KRISHNA PRAKASHAN MEDIA (P) LTD.
11, Shivaji Road Meerut. Pin : 250001 (U.P.)
Ph : 0121-2642946, 2644766, Fax : 0121-2645855
E-mail : [email protected]
Type Setting by : P.M. Books, Meerut 0121-2531788
Cover Designed by : Zius Graphic Arts, Meerut. 0121-2510493
Printed at : Chawla Offset Printers, Meerut. 0121-2650274, 2661646
Cover Printed at : Dharmesh Art Process, Delhi. 011-5708762, 5708662
प्राक्कथन
'साहित्य समाज का प्रतिबिम्ब है और स्मृतियां अपने युग में प्रचलित प्रथाओं,
परम्पराओं, मान्यताओं, धार्मिक रूढ़ियों तथा आचार-विचारों का संकलन है।' इस
सन्दर्भ में देखने पर प्राचीन भारत के गौरवमय होने, अतीत के उज्ज्वल होने तथा
मनु की गर्वोक्त—विश्व के लोग भारतीयों से आदर्श व्यवहार का प्रशिक्षण प्राप्त
करें—पर सहसा विश्वास नहीं होता।
जिस युग में स्त्रियों और शूद्रों को व्यक्ति न समझ कर वस्तु समझा जाता हो,
उनका क्रय-विक्रय किया जाता हो, उन्हें बन्धक रखा जाता हो, उनसे किसी भी
प्रकार की सेवा—देह-शोषण ही नहीं, देह-व्यापार तक करने-लेने की पुरुष को
स्वच्छन्दता-स्वतन्त्रता हो, उन पर क्रूरतापूर्ण अत्याचार को भी अधिकार माना जाता
हो, उस युग को स्वर्णिम युग मानने में हमें तो औचित्य दिखायी नहीं देता।
जिस युग में न्याय-व्यवस्था तथा दण्ड-प्रणाली भेद-भावपूर्ण हो, एक ही
अपराध के लिए विभिन्न वर्णों के लोगों को मृदु, मध्यम और कठोर दण्ड देने का
विधान हो, उस युग को स्वर्णिम युग कैसे माना जा सकता है ?
जिस युग में समाज वर्ण-व्यवस्था को महत्त्व देता हो और वर्ण-व्यवस्था
केवल जन्म पर आधृत हो, ब्राह्मण को उचित-अनुचित कुछ भी करने की छूट हो,
राजा को उसे दण्ड देने का अधिकार तक न हो, उस युग को स्वर्णिम युग मानना
क्या अटपटा नहीं लगता ?
हमारे विचार में आर्य लोग जब ईरान (ईरानम्-आर्याणाम्) से भारत (दक्षिण
भारत) पहुंचे होंगे, तो उस समय आर्यों में दो प्रकार के लोग रहे होंगे—गुरु तथा
शिष्य। गुरु केवल शास्त्रज्ञ ही नहीं, अपितु शस्त्र-विद्या में भी पारंगत थे। राम को
धनुर्विद्या सिखाने वाले विश्वामित्र थे, भीष्म और कर्ण के शिक्षक परशुराम ब्राह्मण
ही थे, भृगु ने दक्ष प्रजापति के यज्ञ की रक्षा की थी। वाल्मीकि ने लव-कुश को
धनुर्विद्या की शिक्षा दी थी। द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, वसिष्ठ और भरद्वाज सभी दोनों—
शास्त्र और शस्त्र-विधाओं में निष्णात थे, परन्तु मूलतः वे सभी शिक्षक ही थे,
सामान्य स्थिति में वे युद्ध-संघर्ष से दूर रहकर तप-साधना और शास्त्र-चिन्तन
करते थे। शिष्य ही सभी गतिविधियों में सक्रिय रहते थे। आगे चलकर गुरुओं को
ब्राह्मण और शिष्यों को क्षत्रिय कहा जाने लगा। आर्य विजेता थे और भारत की
जलवायु को अनुकूल पाकर वे स्थायी रूप से यहां बस गये थे। अतः उन्हें यहां के
मूल निवासियों से सम्पर्क बनाना ही पड़ा होगा।
आर्यों ने अपनी कूटनीति और चतुराई का आश्रय लेकर यहां के लोगों को दो
वर्गों (आगे चलकर वर्ग ही वर्ण बन गया) में बांट दिया। समृद्ध और प्रबुद्ध वर्ग
को विपन्न, अशिक्षित और दरिद्र वर्ग से तोड़कर अपने साथ मिला लिया, उन्हें
यज्ञोपवीत धारण करने, वेदाध्ययन करने और यज्ञ-यागादि करने का अधिकार
देकर वैश्य (विशः = प्रजाः ऋग्वेद) के रूप में अपने साथ मिला अवश्य लिया,
परन्तु आर्यों ने वैश्य के रूप में परिगणित लोगों को सदैव अपने से नीचे रखा। जिस
प्रकार गुरु-रूप में मान्य ब्राह्मण ने शिष्य (क्षत्रिय) से अपने को ऊपर बनाये रखा,
उसी प्रकार आर्यों ने अपने को वैश्यों से ऊपर बनाये रखा। जिस प्रकार ब्राह्मण की
वरीयता को स्वीकार करना क्षत्रियों की विवशता थी, उसी प्रकार विजेता आर्यों की
वरीयता को स्वीकार करना पराजित द्रविड़ों की भी विवशता थी। वस्तुतः पराजित
को विजेता की साधारण उदारता भी वरदान के समान प्रतीत होती है। इतिहास में
अकबर की उदारता की प्रशंसा इसका एक सजीव उदाहरण है।
यहां इस तथ्य की ओर संकेत करना अप्रासंगिक न होगा कि आर्यों ने भारत
में अपने पैर जमाते समय आपस में सौहार्द-सौमनस्य का अद्भुत परिचय दिया।
ब्राह्मण और क्षत्रिय वर्ग में विभक्त आर्यों ने अनार्यों के विषय में मतैक्य बनाये रखा
और 'परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ' के कथन को यथार्थ में ही चरितार्थ
कर दिखाया। इसी से उनकी उन्नति और प्रगति का मार्ग प्रशस्त हुआ।
द्रविड़ों में विभाजन का बीज बोने में सफल आर्यों ने शूद्रों का जमकर शोषण
किया, जिसे पढ़-सुनकर किसी का भी सिर लज्जा से झुके बिना नहीं रहता।
आर्यों ने भारत में अपने पैर दृढ़ता से जमा लेने के उपरान्त जिस समाज-
व्यवस्था, न्याय-प्रणाली, दण्ड-संहिता, आचार-परम्परा तथा रीति-नीति का प्रवर्तन
किया, उन्हीं का लिपिबद्ध रूप स्मृतियां हैं।
स्मृतियों की रचना के पीछे एक अन्य मान्यता यह भी है कि जब आदिम
मानव यायावरी जीवन से ऊब गया होगा व स्थायी निवास बनाने को उत्सुक हुआ
होगा, तो उसके मन में अपनी आजीविका के स्थायी साधनों को खोजने की, सञ्चय
की, सम्पत्ति बनाने की प्रवृत्ति ने जन्म लिया होगा। इसी के साथ उसने प्राणों की,
सम्मान की तथा सुरक्षा की आवश्यकता भी अनुभव की होगी। इसी तथ्य को
महाभारत के शान्तिपर्व में इस प्रकार स्वीकार किया गया है—
राजा चेना भवे लोके पृथिव्यां दण्डधारकः।
जले मत्स्यानिभक्ष्यन् दुर्बलं बलवत्तराः॥
अर्थात् राजा के भय से समाज में बड़ी मछली छोटी मछली को नहीं निगल
पाती। इस प्रकार सुरक्षा की आवश्यकता की पूर्ति के लिए ही शासन-प्रणाली का
जन्म तथा दण्ड-संहिता का प्रवर्तन हुआ होगा, जिसका लेखा-जोखा स्मृति ग्रन्थ
हैं।
स्मृति ग्रन्थों में कतिपय उल्लेखनीय ग्रन्थ हैं—
भगवान् शंकरकृत-वैशालाक्ष, देवराज इन्द्रककृत-बाहुदन्तक, देवगुरु
बृहस्पतिकृत नीतिशास्त्र, दैत्यगुरु शुक्राचार्य द्वारा रचित नीतिशास्त्र, महर्षि वैशम्पायन
कृत नीतिशास्त्र आदि। आज उपलब्ध स्मृतियों में प्रमुख हैं—मनुस्मृति, याज्ञवल्कवय-
स्मृति, विष्णुस्मृति, नारदस्मृति आदि।
स्वयं देवर्षि नारद ने निम्नोक्त पूर्ववती स्मृतिकारों का उल्लेख इस प्रकार से
किया है—
उपलब्ध स्मृतियों के सभी स्मृतिकारों ने समान रूप से मनु महाराज को
अत्यन्त महत्त्व और गौरव दिया है। मनुस्मृति की सर्वाधिक प्रसिद्धि तथा प्रचलन
भी इसकी सर्वाधिक लोकप्रियता का प्रमाण है, परन्तु 'नारदस्मृति' को देखने पर
हमें अपनी धारणा को बदलना पड़ा है। इसमें जैसा संक्षिप्त, तर्कसंगत, उपयोगी,
व्यावहारिक एवं आवश्यक विवेचन हुआ है, वैसा अन्यत्र दुर्लभ है। इसमें आचार-
संहिता, व्यवहार-पद, दण्ड-प्रणाली तथा राज-धर्म का जैसा उत्कृष्ट, वैज्ञानिक,
तर्कपरक, युक्तियुक्त, सरल एवं संक्षिप्त परिचय दिया गया है, वह अपने आप में
अनुपम एवं अद्वितीय है। स्मृतियों का तुलनात्मक अध्ययन करने पर पाठकों को
हमारे कथन की सत्यता का ज्ञान स्वतः हो जायेगा।
इस ग्रन्थ के प्रकाशक महोदय ने इस बहुमूल्य (दुर्लभ) ग्रन्थ का अनुवाद
प्रकाशित करके न केवल हिन्दी जानने वालों का, अपितु इस ग्रन्थ से अपरिचित
संस्कृत के ज्ञाताओं का भी महान् उपकार किया है। आशा है कि प्राचीन साहित्य
के अनुरागी प्रकाशक महोदय के इस प्रयास का अभिनन्दन करेंगे और उन्हें दुर्लभ
ग्रन्थों के प्रकाशन की योजना में संलग्न रहने के लिए उत्साहित करेंगे।
—रामचन्द्र वर्मा
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