नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)
Narada Smriti with Hindi Translation
देवर्षि नारद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished304 पृष्ठ
पृष्ठ 162, कुल 304 में से
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- अभ्युपेत्याशुश्रूषा
अभ्युपेत्य च शुश्रूषां यस्तां न प्रतिपद्यते।
अशुश्रूषाभ्युपेत्यैतद्विवादपदमुच्यते ॥ 1 ॥
सेवा के लिए वचन देकर, अपने वचन को न निभाना, अर्थात् धोखा देना
'अभ्युपेत्याशुश्रूषा' नामक विवाद का विषय कहलाता है।
शुश्रूषकः पञ्चविधः शास्त्रे दृष्टो मनीषिभिः।
चतुर्विधः कर्मकरस्तेषां दासास्त्रिपञ्चकाः ॥ 2 ॥
मनीषियों ने शास्त्रों में सेवकों के पांच, कर्मकरों के चार तथा दासों के पन्द्रह
प्रकार-भेदों का वर्णन किया है।
टिप्पणी - आज्ञानुसार कार्य करने का नाम सेवा है। प्राचीनकाल में वेतनभोगी
स्थायी कर्मचारी सेवक, कार्य-विशेष के लिए विशेष अवसरों पर नियुक्त अस्थायी
कर्मचारी कर्मकर तथा ख़रीदे और वस्त्र-भोजन पर काम करने वाले घरेलू नौकर
दास कहलाते थे। इन्हीं के विभिन्न रूप-भेद हैं।
शिष्यान्तेवासिभृतकाश्र्चतुर्थस्त्वधिकर्मकृत् ।
एते कर्मकरा ज्ञेया दासास्तु गृहजादयः ॥ 3 ॥
निम्नोक्त चारों को कर्मकर-कुछ समय के लिए विद्या वेतन आदि के बदले
सेवा करने वाले-समझना चाहिए।
शिष्य-गुरुकुल में शिक्षा ग्रहण करने आने वाला, आज की भाषा में छात्र
(स्टूडेण्ट अथवा डे स्कॉलर)।
अन्तेवासी-गुरुकुल में रहकर शिक्षा ग्रहण करने वाला। आज की भाषा में
छात्रावास में रहने वाला (होस्टलर)।
भृतक-पारिश्रमिक लेकर सेवा करने वाला-पानी भरने वाला, भार ढोने
वाला, लकड़ी चीरने वाला तथा खाना बनाने वाला।
अधिकर्मकृत्-दुकान, कारखाना आदि व्यापारिक संस्थान आदि में कार्य
करने वाला-मुनीम, सहायक तथा सेल्समैन आदि।
सामान्यस्त्वस्वतन्त्रत्वमेषामाहुर्मनीषिणः ।
जातिकर्मकृतश्रोक्तो विशेषो वृत्तिरेव च ॥ 4 ॥
मनीषी स्मृतिकारों के अनुसार-यद्यपि ये चारों जाति, स्थिति, कर्म और
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