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नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

देवर्षि नारद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished304 पृष्ठ

द्वितीय अध्याय

द्वितीय अध्याय
सुनिश्चितबलाधानस्त्वर्थी स्वार्थप्रचोदितः ।
लेखयेत् पूर्वपक्षं तु कृतकार्यविनिश्चयः ॥ १ ॥
वादी न्यायाधिकरण को यह आवेदन कर सकता है कि प्रतिवादी साधन-
सम्पन्न होने के अतिरिक्त अपने स्वार्थ से प्रेरित है तथा इस व्यवहार को जीतने का
दृढ़ संकल्प लिये हुए है, अतः वह लिखित प्रमाणों में गड़बड़ी और साक्ष्य आदि
को भड़काने-तोड़ने-जैसा कुछ भी कर सकता है, जिससे मुझे संरक्षण की आवश्यकता
है। मुझे सुरक्षा प्रदान की जाये और मेरा प्रतिद्वन्द्वी मनचाहा अनुचित न कर सके,
इसे सुनिश्चित किया जाये।
पूर्वपक्षश्रुतार्थस्तु प्रत्यर्थी तदनन्तरम् ।
पूर्वपक्षार्थसम्बन्धं प्रतिपक्षं निवेशयेत् ॥ २ ॥
वादी के आवेदन-पत्र में उल्लिखित आशंका के तात्पर्य को समझकर
प्रतिवादी को स्पष्टीकरण के रूप में अपना पक्ष न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करना
चाहिए।
श्वो लेखनं वा स लभेत् त्र्यहं सप्ताहमेव च।
अर्थी तृतीयपादे तु युक्तं सद्यो ध्रुवं जयी ॥ ३ ॥
प्रतिवादी को न्यायालय से वादी द्वारा की गयी शिकायत का उत्तर दूसरे
दिन, अथवा तीन दिनों में अथवा अधिक-से-अधिक एक सप्ताह के भीतर अवश्य
प्रस्तुत कर देना चाहिए। ऐसा न करने पर और व्यवहार के तीसरे चरण लेख-
परीक्षा, साक्ष्य-विचार तथा विवाद (Argument) को पार कर लेने पर व्यवहार को
निर्णीत और वादी को विजयी घोषित मानना चाहिए।
मिथ्या सम्प्रतिपत्तिर्वा प्रत्यवस्कन्दमेव वा।
प्राङ्न्यायविधिसाम्यं वा उत्तरं स्याच्चतुर्विधम् ॥ ४ ॥
वादी द्वारा प्रतिवादी के विरुद्ध उपस्थापित व्यवहार के प्रतिवादी द्वारा दिये
जाने वाले उत्तर के चार प्रकार हो सकते हैं—(१) व्यवहार को मिथ्या बताना,
(२) सम्प्रतिपत्ति—आवेदन की भाषा का अस्पष्ट होना, (३) दुर्बोध—कारण-
विशेष—का उल्लेख न होने की कहना तथा बताना, अर्थात् (४) इस व्यवहार का
अन्य न्यायालय में निरस्त हो गया बताना-प्राङ्न्याय।
40 / नारदस्मृति

मिथ्यैतन्नाभिजानामि मम तत्र न सन्निधिः।
अजातश्चास्मि तत्काल एवं मिथ्या चतुर्विधम् ॥ 5 ॥
मिथ्या उत्तर के चार प्रकार हो सकते हैं—
प्रथम, वादी द्वारा लगाये गये आरोप को मिथ्या बताना, द्वितीय, अभियोग
के विषय के सम्बन्ध में अपनी अनभिज्ञता प्रकट करना, तृतीय, अभियोग में
उल्लिखित घटनास्थल पर अपनी अनुपस्थिति बताना तथा चतुर्थ, उल्लिखित
घटना के समय अपना जन्म ही न हुआ होना अथवा उस समय अपने को विदेश में
या किसी समारोह में उपस्थित बताना।
मिथ्या च विपरीतं च पुनः शब्दसमागमम्।
पूर्वपक्षार्थसम्बन्धमुत्तरं स्याच्चतुर्विधम् ॥ 6 ॥
उपर्युक्त चारों मिथ्या उत्तरों के निम्नोक्त रूप से क्रमशः चार प्रत्युत्तर दिये जा
सकते हैं—
प्रथम, प्रतिवादी द्वारा अभियोग को मिथ्या बताना, अर्थात् मिथ्या है।
द्वितीय, प्रतिवादी अभियोग-आरोप के सम्बन्ध में पूरी जानकारी रखता है
तथा मेरे अभियोग-पत्र की भाषा पूर्णतः स्पष्ट सरल और सुबोध है।
तृतीय, अभियोग-पत्र में सभी कारणों का स्पष्ट उल्लेख हुआ है।
चतुर्थ, यह अभियोग किसी अन्य न्यायालय में कभी निरस्त नहीं हुआ। इस
सम्बन्ध में प्रतिवादी का कथन मिथ्या एवं भ्रामक है।
भाषाया उत्तरं यावत् प्रत्यर्थी विनिवेशयेत्।
अर्थी तु लेखयेत्तावद्यावद्वस्तु विवक्षितम् ॥ 7 ॥
वादी को लिखित आवेदन में केवल अत्यावश्यक ही नहीं, अपितु अनिवार्य
तथ्य लिखने चाहिए और प्रतिवादी के उत्तर की प्रतीक्षा करनी चाहिए। उसका
उत्तर न आने तक तथा अभियोग-पत्र की कोई प्रतिलिपि न भेजे जाने तक वादी
अपने आवेदन-पत्र में यथेष्ट संशोधन—जोड़ना-छोड़ना—कर सकता है। प्रतिवादी
को वादी के अभियोग से परिचित किये जाने के उपरान्त उसमें किसी प्रकार का
कोई परिवर्तन-परिवर्द्धन नहीं किया जा सकता। हां, प्रतिवादी के उत्तर के प्रत्युत्तर
में अपनी बात कहने के लिए वह अवश्य स्वतन्त्र है।
टिप्पणी—स्मृति चन्द्रिकाकार किन्हीं आचार्यों द्वारा प्रतिवादी के उत्तर के
आने के उपरान्त भी वादी द्वारा अपने अभियोग-पत्र में संशोधन की अनुमति देने
को अनुचित एवं अवाञ्छनीय मानते हैं—केचिन्निविष्टेऽप्युत्तरे शोधनमिच्छन्ति।
तदनवस्था प्रसंगात् पूर्वोक्तवचनविरोधाच्च हेयम्।
अन्यार्थमर्थहीनं च प्रमाणागमवर्जितम्।
लेख्यं हीनाधिकं भ्रष्टं भाषादोषास्तूदाहृताः ॥ 8 ॥
नारदस्मृति / 41

वादी द्वारा अपने विरुद्ध प्रस्तुत अभियोग-पत्र में प्रतिवादी निम्नोक्त सात दोष
निकाल सकता है—
प्रथम, अन्यार्थ—वाञ्छनीय अर्थ में भिन्न अर्थ की प्रतीति होना।
द्वितीय, अर्थहीनता—अभियोग के आवेदन करने का पात्र ही न होना।
तृतीय, प्रमाण-वर्जित—वादी द्वारा प्रस्तुत अभियोग की पुष्टि में किसी
प्रमाण का न होना।
चतुर्थ, आगम-वर्जित—अभियोग-पत्र का न्याय, धर्म आदि शास्त्रों के तथा
समाज व देश के विरुद्ध होना।
पञ्चम, हीन—अपेक्षित स्थान पर न होना। उपर्युक्त का अपनेक्षित स्थान पर
होना।
षष्ठ, अधिक—विसर्ग, विराम, अल्पविराम, मात्रा तथा स्वर आदि का यथास्थान
प्रयोग न होना।
सप्तम, भ्रष्ट—अभियोग-पत्र का स्वच्छ न होना, तेल, मिट्टी आदि से गन्दा
तथा पानी से भीगा होना एवं शिष्टता का अभाव।
लब्धव्यं येन यद्यस्मात् स तत्तस्मादवाप्नुयात्।
न त्वन्योन्यमथान्यास्मादित्यन्यार्थमिदं त्रिधा ॥ 9 ॥
सातों दोषों का परिचय इस प्रकार है—अभियोग-पत्र की—प्रथम अन्यार्थ—
जो वस्तु जिसको जिससे प्राप्त करनी हो—भाषा से वही अर्थ निकलना चाहिए;
क्योंकि अभिमत से भिन्न वस्तु को, वाञ्छित से भिन्न व्यक्ति से तथा अभीष्ट से
भिन्न व्यक्ति प्राप्त नहीं कर सकता। अतः सन्दर्भ से भिन्न अर्थ देने वाली भाषा का
प्रयोग अन्यार्थ दोष कहलायेगा और यह दोष अभियोग को निरस्त कर सकता है।
मनसाहमपि ध्यातस्त्वन्मित्रेणेह शत्रुवत्।
अतोऽनया महाक्षान्त्या त्वमिहावेदितो मया ॥ 10 ॥
किसी दूसरे की ओर से—उसकी अनुमति-सहमति होने अथवा न होने
(पावर ऑफ अटार्नी) पर—अमुक व्यक्ति मित्रता का ढोंग करता हुआ आपके प्रति
शत्रुता का व्यवहार करता है—जो मुझे रुचिकर नहीं—यह कहते हुए सम्बद्ध
व्यक्ति के विरुद्ध न्यायालय में अभियोग चलाना अर्थहीन अभियोग कहलाता है।
यहां विचारणीय तथ्य यह है कि जब सम्बद्ध व्यक्ति को विरोधी से कोई शिकायत
ही नहीं, वह स्वयं कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं करता तथा उसके विरुद्ध कोई पग
नहीं उठाता, तो किसी दूसरे को क्यों कष्ट हो रहा है ? ऐसे मामले में आजकल इस
मुहावरे का प्रयोग किया जाता है—‘‘मुद्दई (वादी) सुस्त, गवाह चुस्त।’’
द्रव्यप्रमाणहीनं यत्फलोपाश्रयवर्जितम्।
प्रमाणवर्जितं नाम लेख्यदोषं तदुत्सृजेत् ॥ 11 ॥
42 / नारदस्मृति

प्रमाण-वर्जित दोष वह होता है, जिसमें न तो द्रव्य (रुपया-पैसा अथवा
स्वर्ण, रत्न आदि अन्य मूल्यवान् वस्तु) का कोई लिखित प्रमाण होता है और न ही
उसके परिमाण की कोई निश्चित जानकारी होती है। इस प्रकार लेख्य-दोष के
कारण ऐसा अभियोग भी चलने योग्य नहीं होता।
आगमवर्जितं दोषं पूर्ववादे विवर्जयेत्।
एकस्य बहुभिः सार्धं पुरराष्ट्रविरोधकम् ॥ 12 ॥
आगम-वर्जित दोष का अर्थ है—एक के हित के विरुद्ध बहुतों के हित का
जुड़ा होना, अर्थात् व्यक्ति और समष्टि का संघर्ष, दूसरे शब्दों में व्यक्ति के व्यवहार
का जाति, समाज, नगर और देश के हितों के विरुद्ध होना। कहने की आवश्यकता
नहीं कि ऐसा अभियोग न्यायशास्त्र और लोक-विरुद्ध होने से तत्काल, प्रथम दृष्टि
में ही निरस्त होने योग्य होता है।
बिन्दुमात्राविहीना वा पदवर्णविदुष्टा वा।
हीनाधिका भवेद् व्यर्थी तां यत्नेन विवर्जयेत् ॥ 13 ॥
हीन और अधिक वे दोष हैं, जब अभियोग-पत्र की भाषा में विसर्ग, मात्रा
आदि न लगे हों, अल्पविराम, पद और वर्ण के अभाव हों, जिससे मनमाना अर्थ
निकलता हो, ऐसा अभियोग भी महत्त्वहीन हो जाता है। उदाहरणार्थ, 'पुत्री न
पुत्रः' को 'पुत्री, न पुत्रः' लिखने में अल्पविराम के स्थान-भेद से अर्थ-भेद हो
जाता है। अभियोग-पत्र में भी इस प्रकार से विराम आदि का यथोचित ध्यान न
रखने से अर्थ-भेद हो जाता है। लोक में भी अल्पविराम के स्थान-भेद से अर्थ-
भेद का बहुप्रचलित उदाहरण है—'रोको, मत जाने दो', 'रोको मत, जाने दो'।
भ्रष्टं तु दुःखितं यत्स्याज्जलतैलादिभिर्हतम्।
भाषायां तदपि स्पष्टं विस्पष्टार्थं विवर्जयेत् ॥ 14 ॥
भ्रष्ट-दोष से अभिप्राय है—अभियोग-पत्र का तेल आदि चिकने पदार्थों से,
रेत-मिट्टी आदि मलिन पदार्थों से दूषित तथा पानी से भीगा होना तथा अक्षरों का
कटा-फटा होना, अर्थात् सुवाच्य न रह पाना। ऐसा व्यवहार भी विचारणीय नहीं
रह पाता।
सत्या भाषा न भवति यद्यपि स्यात् प्रतिष्ठिता।
बहिश्चेद् भ्रश्यते धर्मान्नियताद् व्यवहारिकात् ॥ 15 ॥
यदि अभियोग-पत्र की भाषा-शैली शुद्ध, स्वच्छ, दोषरहित, सरल और
सुबोध होने पर भी अभियोग का विषय लोक-प्रचलित एवं व्यवहार में शुद्ध एवं
उपयोगी होने से सर्वमान्य धर्म के अनुकूल (सम्मत) नहीं, तो भी ऐसा अभियोग
अनुमत (Admit) नहीं होता, अपितु प्रथम दृष्टि में ही निरस्त हो जाता है।
गन्धमादनसंस्थस्य मयास्यासीत्तदर्पितम्।
व्यावहारिकधर्मस्य बाह्यमेतन्न सिध्यति ॥ 16 ॥
नारदस्मृति / 43

अभियोग-पत्र में अविश्वसनीय एवं काल्पनिक तथ्यों के उल्लेख से भी
अभियोग अग्राह्य हो जाता है। उदाहरणार्थ, किसी का गन्धमादन पर्वन पर किसी
वस्तु के लेने और न लौटाने का अभियोग विश्वसनीयता की सीमा से बाहर होने के
कारण ग्राह्य नहीं हो सकता; क्योंकि इस तथ्य की पुष्टि नहीं हो सकती कि लेने और
देने वाला दोनों कभी उक्त स्थान पर थे और दोनों में किसी प्रकार का कोई लेन-
देन हुआ था।
अन्याक्षरनिवेशेन अन्यार्थगमनेन च।
आकुलं च क्रियादानं क्रिया चैवाकुला भवेत्॥ 17 ॥
यदि अभियोग से सम्बन्धित आवेदन-पत्र में लिखे गये तथ्यों पर विवाद
(Argument) के समय व्यक्ति लिखित से अभिव्यक्त होने वाले अर्थ पर दृढ़ न
रहकर उससे भिन्न मन्तव्य प्रकट करता है, अर्थात् वह यह कहता है कि जो लिखा
गया है, वह उसका आशय नहीं था, तो ऐसा अभियोग भी निरस्त होने योग्य होता
है।
उदाहरणार्थ, यदि व्यक्ति किसी पर मानहानि का आरोप लगाते हुए मार-पीट
आदि करने का उल्लेख करता है और बहस में केवल अपशब्द कहना बताता है,
तो ऐसा अभियोग-पत्र निरस्त ही किया जाना चाहिए; क्योंकि इस प्रकार के
लिखित और मौखिक कथन के अन्तर से न केवल न्यायाधिकरण के सदस्य
परेशान हो जाते हैं, अपितु न्याय की प्रक्रिया भी दूषित हो जाती है।
रागादीनां यदेकेन कोपितः करणं वदेत्।
तदादौ तु लिखेत् सर्वं वादिनः फलकादिषु॥ 18॥
यदि कोई व्यक्ति काम, क्रोध और लोभ-ये तीनों रागादि (राग-द्वेष) के
नाम से जाने जाते हैं। इन तीनों में से किसी एक-क्रोध-में आकर धर्माधिकारी
को मौखिक रूप से अपने पक्ष में निर्णय लिखने के लिए धमकाता है, तो ऐसे
व्यक्ति का नाम तत्काल सूचनापट्ट (नोटिसबोर्ड) पर मोटे-काले अक्षरों में लिख
देना चाहिए।
राजकुलावबोधाय धर्मस्थैः सुविचारितम्।
तस्मादन्यद्व्यपोहां स्याद् वादिनः फलकादिषु॥ 19॥
यदि वादी द्वारा प्रस्तुत अभियोग-पत्र के विषय के एक सीमा तक राजकुल-
उच्च न्यायालय अथवा उच्चतम न्यायालय के विचार क्षेत्र में आने के कारण
धर्माधिकारियों-निम्न न्यायालय के न्यायाधीशों-द्वारा भली प्रकार विचार किये
जाने पर कुछ अविचारित रह जाता है, तो वादी को उस पर आपित्त करने का
अधिकार नहीं मिलता।
44 / नारदस्मृति

वादिभ्यामभ्यनुज्ञातं शेषं च फलके स्थितम्।
ससाक्षिकं लिखेयुस्ते प्रतिपत्तिं च वादिनोः ॥ २० ॥
वादी के अभियोग-पत्र का प्रतिवादी द्वारा उत्तर देने के पश्चात् और प्रतिवादी
द्वारा आरोपों के खण्डन-मण्डन में प्रत्युत्तर तथा साक्षियों के वक्तव्य के उपरान्त
वादी-प्रतिवादी में समझौते और निर्धारित शर्तों को न्यायाधिकरण के लेखक को
उस सरकारी अभिलेख में लिपिबद्ध करना चाहिए।
वादिभ्यां लिखिताच्छेषं यत्पुनर्वादिना स्मृतम्।
तत्प्रत्याकलितं नाम स्वपादे तस्य लिख्यते ॥ २१ ॥
यदि वादी और प्रतिवादी के वक्तव्यों के लिपिबद्ध हो जाने के उपरान्त वादी
कुछ अन्य स्मरण आये तथ्यों को सम्मिलित कराना चाहता है, तो उसे परिशिष्ट
(एडेण्डम) शीर्षक के अन्तर्गत लिया जाना चाहिए। ऐसे उल्लेख को 'प्रत्याकलित'
कहा जाता है।
अर्थिना सन्नियुक्तो वा प्रत्यर्थिप्रहितोऽपि वा।
यो यस्यार्थे विवदते तयोर्जयपराजयौ ॥ २२ ॥
अर्थी और प्रत्यर्थी द्वारा मनोनीत उनके प्रतिनिधि (अटार्नी) जब उनकी ओर
से अपना-अपना पक्ष प्रस्तुत करते हैं तथा वाद-विवाद में भाग लेते हैं, तब उन
प्रतिनिधियों के वक्तव्यों आदि के आधार पर व्यवहार किया गया निर्णय-जय-
पराजय-को स्वीकार करने के लिए दोनों पक्ष बाध्य होते हैं।
अभिप्राय यह है कि वादी तथा प्रतिवादी यह नहीं कह सकते कि हमारा
प्रतिनिधि ठीक से कार्य नहीं कर सका अथवा हमने तो भाग ही नहीं लिया।
प्रतिनिधियों की उपस्थिति को भी वादी-प्रतिवादी की उपस्थिति ही माना जायेगा।
यो न भ्राता न च पिता न पुत्रो न नियोगकृत्।
परार्थवादी दण्ड्यः स्याद् व्यवहारेऽपि विब्रुवन् ॥ २३ ॥
व्यवहार-कार्य में प्रवृत्त व्यक्ति का सम्बन्धी-पिता, पुत्र, भाई, पत्नी अथवा
अन्य निकट सम्बन्धी-तथा उसके द्वारा मनोनीत प्रतिनिधि न होने पर भी वादी
अथवा प्रतिवादी के हित-साधन अथवा विरोध के लिए व्यवहार में अनावश्यक
एवं अनुचित रूप से हस्तक्षेप करने वाला व्यक्ति 'परार्थवादी' कहा जाता है। ऐसा
व्यक्ति केवल अवाञ्छनीय-दाल-भात में मूसलचन्द-ही नहीं होता, अपितु
दण्डनीय भी होता है।
अभिप्राय यह है कि असम्बद्ध एवं बाहरी व्यक्ति द्वारा न्यायालय के किसी
मामले में किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप दण्डनीय अपराध होता है।
पूर्ववादं परित्यज्य योऽन्यमालम्बते पुनः।
वादसंक्रमणाज्ज्ञेयो हीनवादी स वै नरः ॥ २४ ॥
नारदस्मृति / 45

अभियोग-पत्र में उल्लिखित विषय की उपेक्षा करके अन्यान्य विषयों की
चर्चा में प्रवृत्त होने वाले वादी के पक्ष को दुर्बल ही समझना चाहिए। वस्तुतः वाद-
संक्रमण दुर्बलता का ही परिचायक लक्षण होता है।
सर्वेष्वपि विवादेषु वाक्छलेनापहीयते।
पशुस्त्रीभूम्यृणादाने शास्योऽप्यर्थान्न हीयते ॥ 25 ॥
यों तो न्यायालय में प्रस्तुत सभी प्रकार के मामलों में छल-कपट और धोखा-
धड़ी करने वाले पक्ष की धूर्तता सिद्ध होने पर उसकी पराजय निश्चित होती है,
परन्तु पशु, स्त्री, भूमि तथा ऋण के लेन-देन से सम्बन्धित मामलों में तो छल-
कपट और धोखा-धड़ी सिद्ध होने पर पराजय के साथ-साथ दण्ड भी भुगतना
पड़ता है।
अभियुक्तोऽभियोगस्य यदि कुर्यादपह्नवम्।
अभियोक्ता दिशेद्देश्यं प्रत्यवस्कन्दितो न चेत् ॥ 26 ॥
अभियुक्त प्रतिवादी अपने विरुद्ध अभियोग को मिथ्या तो बताता है, परन्तु
अपने मन्तव्य की पुष्टि में ठोस प्रमाण प्रस्तुत नहीं करता, जबकि वादी प्रतिपाद्य
विषय को प्रमाणों द्वारा सत्य सिद्ध करने में सफल रहता है और इधर प्रतिवादी वादी
के मन्तव्य का खण्डन भी नहीं कर पाता, तो प्रतिवादी को पराजित और वादी को
विजित मानना चाहिए।
पूर्वपादे हि लिखितं यथाक्षरमशेषतः।
अर्थी तृतीयपादे तु क्रियया प्रतिपादयेत् ॥ 27 ॥
अभियोग के प्रथम चरण-अभियोग-पत्र को जमा कराने के उपरान्त अभियोग
के तृतीय चरण-विवाद के समय-में वादी को अभियोग-पत्र में लिखित तथ्यों
की ही तर्कों और प्रमाणों से पुष्टि करनी होती है। उस समय वादी किसी नये विषय
को प्रस्तुत नहीं कर सकता। उसे अपने को वहीं तक सीमित करना होता है।
क्रियापि द्विविधा प्रोक्ता मानुषी दैविकी तथा।
मानुषी लेख्यसाक्षिभ्यां घटादिर्दैविकी स्मृता ॥ 28 ॥
प्रमाण के अन्तर्गत क्रिया के दो रूप-भेद होते हैं-मानुषी क्रिया तथा दैवी
क्रिया। लिखित पत्र-पत्रिका आदि तथा साक्ष्य मानुषी क्रिया न्याय है। घट, तुला,
अग्नि तथा जल आदि की शपथ लेना दैवी क्रिया है। दैवी क्रिया को दिव्य प्रमाण
भी माना जाता है। जहां कोई प्रत्यक्ष प्रमाण उपलब्ध नहीं होता, वहां इन्हीं दिव्य
प्रमाणों द्वारा काम चलाया जाता है।
दिवा कृते कार्यविधौ ग्रामेषु नगरेषु वा।
सम्भवे साक्षिणां चैव दिव्या न भवति क्रिया ॥ 29 ॥
दिन में, ग्राम-नगर आदि जनपद में घटित घटना की प्रामाणिकता के लिए तो
46 / नारदस्मृति

लौकिक प्रमाण के अन्तर्गत साक्ष्य आदि से ही काम चलाया जाता है। ऐसी
घटनाओं के विषय में दिव्य प्रमाण स्वीकृत नहीं होता। लौकिक प्रमाण की
अनुपलब्धता में ही दिव्य प्रमाण की आवश्यकता और उपयोगिता आंकी जाती है।
अरण्ये निर्जने रात्रावन्तर्वेश्मनि साहसे।
न्यासस्यापह्नवे चैव दिव्या सम्भवति क्रिया॥ ३०॥
निर्जन वन में अथवा जनशून्य स्थान—ग्राम, नगर आदि के बाहर—रात्रि में
(अन्धकार में) घर के भीतर किसी प्रत्यक्षदर्शी के अभाव में, डाका डाले जाने
वाले स्थान-भय के कारण लोगों के भाग जाने, छिप जाने पर, धरोहर के रूप में
रखी वस्तु को छिपा लेने की स्थिति में मानुषी प्रमाण की उपलब्धता सम्भव ही
नहीं होती। अतः ऐसे स्थानों अवसरों पर दिव्य प्रमाण हो स्वीकृत होते हैं।
कारणप्रतिपत्त्या च पूर्वपक्षे विरोधिते।
अभियुक्तेन वै भाव्यं विज्ञेयं पूर्वपक्षवत्॥ ३१॥
जिस प्रकार वादी अपने अभियोग को विश्वसनीय बनाने के लिए उसके
समर्थन में लिखित प्रमाण एवं साक्ष्य आदि जुटाता है, उसी प्रकार प्रतिवादी को भी
वादी के अभियोग के खण्डन और अपने पक्ष के समर्थन में पुष्ट प्रमाण जुटाने
चाहिए, तभी उसे अपनी विजय की आशा करनी चाहिए।
पलायते च आहूतो मौनी साक्षिपराजितः।
स्वयमभ्युपपन्नश्च अवसन्नश्चतुर्विधः ॥ ३२॥
निम्नोक्त चार प्रकार अवसन्न, अर्थात् पराजित पक्ष कहलाते हैं—
प्रथम—अभियुक्त व्यक्ति द्वारा धर्माधिकरण के आह्वान-पत्र (समन) को
लेने से कतराना, छिप जाना, भाग जाना, आह्वान-पत्र लाने वाले को घूस देकर
अपने को अनुपस्थित दिखाना अथवा आह्वान-पत्र प्राप्त करके निश्चित तिथि व
समय पर न्यायाधिकरण के समक्ष उपस्थित न होना।
द्वितीय—न्यायाधिकरण के समक्ष उपस्थित होने पर मौन रहना अथवा वादी
के आरोपों का खण्डन न करना।
तृतीय—साक्षी को प्रस्तुत न कर पाना अथवा साक्ष्य का पुष्ट न होना अथवा
साक्षी का बिदक-भटक जाना।
चतुर्थ—न्यायालय में अपने पक्ष की प्रस्तुति के लिए वादी द्वारा प्रथम
अपना प्रतिनिधि मनोनीत करना और फिर उसकी कार्य-शैली से सन्तुष्ट न होकर
स्वयं उपस्थित हो जाना।
इन चारों तत्त्वों को प्रतिवादी के पक्ष की दुर्बलता का सूचक ही समझना चाहिए!
अन्यवादी क्रियाद्वेषी नोपस्थाता निरुत्तरः।
आहूतप्रपलायी च हीनः पञ्चविधः स्मृतः ॥ ३३॥
नारदस्मृति / 47