नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)
Narada Smriti with Hindi Translation
देवर्षि नारद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
2. निक्षेप प्रकरण
- निक्षेप प्रकरण
स्वं द्रव्यं यत्र विश्रम्भात्निक्षिपत्यविशङ्कितः।
निक्षेपो नाम तत्प्रोक्तं व्यवहारपदं बुधैः ॥ 1 ॥
'निक्षेप' भी एक प्रकार का व्यवहार—लेन-देन से सम्बन्धित विषय—है।
अपनी किसी मूल्यवान् चल-अचल सम्पत्ति को किसी शंका, संशय अथवा सन्देह
के बिना, पूर्ण विश्वास के साथ किसी के पास रख देने का नाम ही 'निक्षेप' है।
टिप्पणी—नारदभाष्य के अनुसार निक्षेप शब्द का अर्थ है—‘“निःशंकम्
निक्षिप्यते स्थाप्यते इति निक्षेपः।’” अर्थात् निःशंक होकर (पूर्ण विश्वास रखकर)
अपनी कोई वस्तु किसी दूसरे को सौंपना अथवा उसके पास रखना ही निक्षेप है।
'व्यवहार प्रकाश' के अनुसार—निक्षेप एव ग्राहकस्यासमक्षं समर्पितो
न्यासः। अर्थात् बिना किसी साक्ष्य के अपनी सम्पत्ति किसी के पास रखने का नाम
निक्षेप है और इसी का दूसरा नाम न्यास है।
असहाय भाष्यकार के अनुसार—स्वं द्रव्यं यो निक्षिपति यच्च मतिवि-
स्त्रम्भादविशंकितो निक्षिपति। अनेनोक्तेनैतदुक्तं भवति किल यत्र अविश्वासात्
शंका भवति तत्र साक्षिलिखितग्रहणविरहितं कोऽपि वराटिकापि न ददाति।
यत्र पुनर्विश्वासात्निशंकः पुरुषो भवति तत्र साक्षिलिखितग्रहणवर्जितमेव सुवर्ण
सहस्त्रादिकमपि निक्षिपति।
अर्थात् जहां विश्वास नहीं होता, वहां व्यक्ति बिना लिखा-पढ़ी और गवाह
के किसी को एक कौड़ी भी देने को उद्यत नहीं होता। इसके विपरीत जहां विश्वास
होता है, वहां किसी को कानों-कान सूचना दिये बिना ही हज़ारों रुपये और
स्वर्णादि मूल्यवान् पदार्थ दे दिये जाते हैं। इस प्रकार निक्षेप का आधार है—
व्यक्ति-विशेष के प्रति मन में विश्वास का दृढ़ होना।
कुलजे वृत्तसम्पन्ने धर्मज्ञे सत्यवादिनि।
महापक्षे धनिन्यार्ये निक्षेपं निक्षिपेद्बुधः ॥ 2 ॥
निम्नोक्त सात गुणों से सम्पन्न व्यक्ति के पास ही निक्षेप का व्यवहार करना
चाहिए—1. कुलीन—श्रेष्ठ, निष्कलंक कुल में उत्पन्न व्यक्ति, 2. शुद्ध—पवित्र
चरित्रवान्, 3. धर्मात्मा, अर्थात् धर्म-विरुद्ध आचरण से भय खाने वाला, 4. सत्यवादी,
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- उदार-हृदय, 6. धनसमृद्ध तथा 7. लोक में सम्मानित एवं प्रतिष्ठित।
उपर्युक्त सात गुणों से युक्त पुरुष के पास निक्षिप्त सम्पत्ति समय बीतने पर भी
सुरक्षित रहती है। उसे किसी प्रकार की कोई क्षति नहीं पहुंचती। निक्षेप्ता को चिन्ता
नहीं करनी पड़ती।
यो यथा निक्षिपेद्धस्ते यमर्थं यस्य मानवः।
स तथैव ग्रहीतव्यो यथा दायस्तथा ग्रहः॥ ३॥
जिस व्यक्ति को, जिस स्थिति में और जिस प्रकार जो वस्तु निक्षेप के रूप में
सौंपी जाती है, निक्षेप रखने वाले का कर्तव्य हो जाता है कि वह उस व्यक्ति को
उस स्थिति में और उसी प्रकार से गृहीत वस्तु लौटा दे। दाय के अनुरूप ही ग्रहण
का होना धर्म और न्याय है।
न चेद्दद्यात्तु निक्षेप्तुस्तद् द्रव्यं तु यथाविधि।
उपसंगृह्य दाप्योऽसौ दिव्यादिभिर्व्यवस्थितः ॥ ४॥
निक्षेप्ता से गृहीत वस्तु को ग्रहीता द्वारा यथावत् लौटाने से इनकार करने पर
धर्माधिकारी द्वारा दिव्य उपायों के प्रयोग से ग्रहीता से सत्य उगलवाना चाहिए और
निक्षेप्ता को उसकी वस्तु दिलवानी चाहिए।
टिप्पणी—इस सम्बन्ध में मनु की व्यवस्था इस प्रकार है—
अथ निक्षेपग्राही लोभं गच्छति, निक्षेप्तुस्तद् द्रव्यं न प्रयच्छति, तदावेदितो
राज्ञा उपसंगृह्य दिव्यादिप्रमाणसाधितो द्विगुणदण्डाकोदितः कृतो दाप्यः।
अर्थात् यदि निक्षेप रखने वाला धनिक लोभवश निक्षेप्ता की सम्पत्ति को
हड़पना चाहता है और वस्तु के निक्षेप रखे जाने से मुकर जाता है और फिर पीडित
व्यक्ति राजा से न्याय की गुहार करता है, तो राजा को दिव्य अथवा अदिव्य उपायों
से सत्य का पता लगाना चाहिए। धनिक के दोषी पाये जाने पर न केवल उससे
निक्षेप्ता की सम्पत्ति लेकर सम्बद्ध पक्ष को दिलानी चाहिए, अपितु व्यक्ति की धूर्तता
के लिए दण्ड-रूप में उससे वस्तु के मूल्य से दुगुनी धनराशि भी वसूल करनी चाहिए।
अन्यद्रव्यव्यवहितं द्रव्यमव्याहृतं च यत्।
निक्षिप्यते परगृहे तदौपनिधिकं स्मृतम्॥ ५॥
तालाबन्द बक्सा, पेटी, गठरी अथवा पैकेट—भीतर रखे सामान के विषय में
जानकारी दिये बिना सोना है अथवा मिट्टी है—कुछ भी बताये बिना—निक्षेप के
रूप में दूसरे के घर में रखे जाने को उपनिधि अथवा औपनिधिक निक्षेप नाम दिया
जाता है।
स पुनर्द्विविधः प्रोक्तः साक्षिमानितरस्तथा।
प्रतिदानं तथैवास्य प्रत्ययः स्याद्विपर्यये॥ ६॥
निक्षेप दो प्रकार से किया जाता है। प्रथम, साक्षी की उपस्थिति में तथा
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द्वितीय, किसी साक्षी को बीच में लाये बिना। उल्लेखनीय यह है कि जिस भी रूप
में निक्षेप किया जाता है, उसी रूप में उसकी वापसी होनी चाहिए, अर्थात् यदि
साक्षी को बीच में डाला गया है, तो वापसी के समय भी उसकी उपस्थिति अनिवार्य
समझनी चाहिए।
याच्यमानस्तु यो दात्रा निक्षेपं न प्रयच्छति।
दण्ड्यः स राज्ञा दुष्टात्मा नष्टे दाप्यश्च तत्समम्॥ 7 ॥
निक्षेप्ता (निक्षेप रखने वाला) द्वारा अपना सामान वापस मांगने पर इनकार
करने वाले ग्रहीता को दुरात्मा एवं धूर्त मानकर राजा के द्वारा दण्डित किया जाना
चाहिए। राजा का यह भी कर्तव्य है कि निक्षेप में रखे सामान के नष्ट हो जाने पर
अथवा गुम हो जाने पर निक्षेप ग्रहण करने वाले से निक्षेप्ता को क्षतिपूर्ति के रूप में
सामान के बराबर मूल्य दिलाया जाये।
यं चार्थं साधयेत्तेन निक्षेप्तुरननुज्ञया।
तत्रापि दण्ड्यः स भवेद्दाप्यस्तच्चापि सोदयम्॥ 8 ॥
निक्षेप्ता की अनुमति के बिना अपने पास निक्षिप्त वस्तु से लाभ कमाने वाले
ग्रहीता से न केवल अर्जित धन और उस पर बनने वाले ब्याज की राशि वसूल
करनी चाहिए, अपितु ऐसे धूर्त ग्रहीता को यथोचित दण्ड से अनुशासित भी करना
चाहिए।
ग्रहीतुः सह योऽर्थेन नष्टो नष्टः स दायिनः।
दैवराजकृते तद्वत् चेत्तज्जिह्मकारितम्॥ 9 ॥
ग्रहीता के अपने धन के साथ निक्षिप्त वस्तु के भी नष्ट हो जाने की स्थिति में
अथवा दैवी आपत्ति—घर को आग लग जाना, चोरी हो जाना आदि—की स्थिति
में अथवा राजा द्वारा ले लिये जाने या छापा पड़ने पर अन्य सामान के साथ निक्षिप्त
वस्तु के भी अधिगृहीत हो जाने आदि की स्थिति में वह हानि निक्षेप्ता की होती है।
निक्षेप्ता ग्रहीता को क्षतिपूर्ति के लिए विवश नहीं कर सकता। हां, यहां यह अवश्य
निश्चित करना चाहिए कि ग्रहीता द्वारा निर्दिष्ट कारण वास्तविक है या नहीं। कहीं
वह छल-कपट अथवा कुटिलता को तो नहीं अपना रहा। सच्चाई और ईमानदारी
मिलने पर निक्षेप्ता को निक्षिप्त वस्तु की हानि को अपने भाग्य का दोष मानना
चाहिए; क्योंकि उस हानि में ग्रहीता का तो कोई योग नहीं। उसने जान बूझकर तो
कुछ नहीं किया। जब स्थिति उसके वश में नहीं थी, तो वह क्या कर सकता था ?
स्वयमेव तु यो दद्यान्मृतस्य प्रत्यनन्तरे।
न स राज्ञाभियोक्तव्यो न निक्षेप्तुश्च बन्धुभिः ॥ 10 ॥
यदि अपने किसी निकट सम्बन्धी के पास अपने सामान को निक्षेप करने
वाले के अचानक मर जाने पर ग्रहीता मृतक के परिवारजनों को स्वयं निक्षिप्त
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सामान को लौटाता है, तो परिवारजनों को उसका सौजन्य मानकर उसके प्रति
आभार प्रकट करना चाहिए। उसके प्रति कुछ रख लेने का किसी प्रकार का कोई
सन्देह भी नहीं लाना चाहिए, अपितु उस पर पूर्ण विश्वास रखना चाहिए। उस पर
किसी प्रकार का न तो कोई आरोप लगाया जा सकता है और न ही उसके विरुद्ध
अभियोग चलाया जा सकता है।
अच्छलेनैव चान्विच्छेत्तमर्थं प्रीतिपूर्वकम्।
विचार्य तस्य वा वृत्तं साम्नैव परिशोधयेत् ॥ 11 ॥
निक्षेप्ता के निक्षेप की वस्तु को वापस लिये बिना अचानक मर जाने पर और
गृहीता द्वारा लौटाने से इनकार करने पर मृतक के उत्तराधिकारियों को बिना किसी
छल कपट का सहारा लिये प्रेम-पूर्वक उसे समझाने-बुझाने का प्रयास करना
चाहिए अथवा ग्रहीता के आचरण के अनुरूप साम-दान आदि किसी भी उपयुक्त
लगने वाले उपाय का यथेष्ट प्रयोग करना चाहिए।
उत्तराधिकारियों को यह कदापि नहीं भूलना चाहिए कि उनके पास निक्षेप
का कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं होता। जानकारी के निश्चित होने पर भी प्रमाण के
अभाव में ग्रहीता को न्यायालय में तो नहीं घसीटा जा सकता। अतः प्रेम से कार्य
निकालने में ही बुद्धिमत्ता होती है।
चौरैर्हृतं जले मग्नमग्निना दग्धमेव च।
न दद्यात् यदि तस्मात् स न संहरति किञ्चन ॥ 12 ॥
निक्षेप्ता की निक्षिप्त वस्तु के साथ ही अन्य छल-कपट का सहारा न लेने वाले
ग्रहीता के घर से सामान चोरी हो जाने पर, बाढ़ से बह जाने पर, आग लगने से जल
जाने पर निक्षेप्ता को अपनी निक्षिप्त वस्तु की मांग नहीं करनी चाहिए। हां, यह
अवश्य निश्चित करना चाहिए कि निक्षेप्ता का सामान सचमुच नष्ट हो गया है
अथवा उस सामान के बच जाने पर ग्रहीता की नीयत बिगड़ गयी है। ग्रहीता
दुर्घटना की आड़ में कहीं निक्षेप्ता के सामान को हड़पने तो नहीं जा रहा है।
यो निक्षेपं नार्पयति यश्चानिक्षिप्य याचते।
तावुभौ चौरवच्छास्यौ दण्डं दाप्यौ च तत्समम् ॥ 13 ॥
दोनों-निक्षेप को न लौटाने वाले तथा निक्षेप न रखकर भी उसकी मांग
करने वाले, अर्थात् झूठ बोलकर दूसरे को लूटने को प्रयत्नशील-को चोर समझना
चाहिए और दोनों को चोर के लिए निर्धारित दण्ड देकर उन्हें अनुशासित करना चाहिए।
एष एव विधिर्दृष्टो याचितान्वाहितादिषु।
शिल्पे चोपनिधौ न्यासे प्रतिन्यासे तथैव च ॥ 14 ॥
निम्नोक्त सामान के सम्बन्ध में भी निक्षेप के विषय में निर्दिष्ट नियम लागू होते
हैं-
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याचित — काम चलाने के लिए आभूषण, वस्त्र, शस्त्र आदि मांगकर ले
जाना और फिर लौटाने का नाम न लेना।
अन्वाहित — किसी को देने के लिए लिया गया सामान, सम्बद्ध स्थान पर
सम्बद्ध व्यक्ति को न पहुंचाकर, अपने पास रख लेना।
शिल्प — कारीगर, लोहार, सोनार आदि द्वारा धन अथवा स्वर्ण आदि लेकर
मूर्ति, चित्र, आभूषण आदि बनाकर न देना।
उपनिधि — स्वर्णकार आदि शिल्पियों को नमूने की नक़ल के लिए दिये गये
सामान को उनके द्वारा हड़प लेना।
न्यास — किसी को थोड़े समय के लिए सामान की सुरक्षा का दायित्व
सौंपना और उस व्यक्ति का सामान को लेकर चलते बनना तथा
प्रतिन्यास — आदान-प्रदान के आधार पर किसी की वस्तु की रक्षा के बदले
अपनी वस्तु की रक्षा का दायित्व सौंपना और उस व्यक्ति द्वारा अपनी वस्तु को
सुरक्षित पाकर दूसरे की वस्तु के प्रति उपेक्षा दिखाना।
प्रतिगृह्णाति पोगण्डं यश्च सप्रधनं नरः।
तस्याप्येष भवेद्धर्मः षडेते विधयः समा॥ 15 ॥
इसी प्रकार जब किसी अनाथ बालक को फुसलाकर ग्रहीता उसका सामान
अपने पास रखवा तो लेता है, परन्तु उसके द्वारा मांग करने पर लौटाने से इनकार
करता है, तो ऐसे व्यक्ति को भी निक्षेप हड़पने के लिए निर्दिष्ट दण्ड देना चाहिए।
॥ चतुर्थ अध्याय का द्वितीय प्रकरण समाप्त ॥
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