नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)
Narada Smriti with Hindi Translation
देवर्षि नारद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
3. सम्भूयसमुत्थान प्रकरण
- सम्भूयसमुत्थान प्रकरण
वणिक्प्रभृतयो यत्र कर्म सम्भूय कुर्वते।
तत्सम्भूयसमुत्थानं व्यवहारपदं स्मृतम्॥ 1 ॥
जहां वणिक आदि एक साथ मिलकर व्यापार-धन्धा करते हैं, शास्त्रों में उस
व्यावसायिक स्थल का नाम 'सम्भूयसमुत्थान' कहलाता है।
फलहेतोरुपायेन कर्म सम्भूय कुर्वताम्।
आधारभूतः प्रक्षेपस्तेनोत्तिष्ठेयुरंशतः ॥ 2 ॥
मिलकर साझा व्यापार-धन्धा करने वालों का एकमात्र उद्देश्य लाभ अर्जित
करना होता है। अर्जित लाभ का कितना अंश किसको मिलना है, इस मूलतत्त्व के
निर्धारण के लिए उनके द्वारा निवेशित धनराशि के अंश दान को ही आधार बनाया
जाता है। जिस भागीदार ने जितना धन लगाया है, उसे उतने ही भाग में लाभ पाने
का अधिकार है। उदाहरणार्थ, चार सहयोगियों ने मिलकर एक लाख रुपयों की
मूलराशि से किसी उद्यम का प्रारम्भ किया। इसमें एक ने पचास हज़ार रुपयों का
तथा दूसरे और तीसरे ने बीस बीस हज़ार रुपयों का और चतुर्थ ने केवल दस
हज़ार रुपयों का योग दिया है। उनके इसी योगदान के आधार पर प्रथम का पचास
प्रतिशत, द्वितीय-तृतीय का बीस-बीस प्रतिशत व चतुर्थ का दस प्रतिशत भाग माना
जायेगा।
समोऽतिरिक्तो हीनो वा तत्रांशो यस्य यादृशः।
क्षयव्ययौ तदा वृद्धिस्तत्र तस्य तथाविधाः ॥ 3 ॥
भागीदारों का जैसा-बराबर बराबर अथवा न्यूनाधिक-भाग निर्धारित रहता
है, ख़र्च तथा हानि आदि में उनसे उतनी ही कटौती की जाती है तथा लाभ में उन्हें
उतना ही भुगतान किया जाता है।
भाण्डपिण्डव्ययोद्धारभारसारान्ववेक्षणम् ।
कुर्युस्तेऽव्यभिचारेण समये स्वे व्यवस्थिताः ॥ 4 ॥
उद्यम से सम्बद्ध सामान की देखभाल के लिए, उसे विक्रय की दृष्टि से
आकर्षक बनाने के लिए तथा उसके लिए गुणों को प्रचारित करने के लिए निम्नोक्त
ख़र्च निर्विवाद रूप से देय होते हैं-
नारदस्मृति / 151
भण्डारण — खरीदे गये माल को सुरक्षित रखने के लिए गोदाम की व्यवस्था
करना।
पाथेय — क्रय-विक्रय के लिए अपने ही नगर के विभिन्न क्षेत्रों में अथवा
अन्य नगरों में आने जाने पर सवारी, खान पान तथा होटल आदि पर होने वाला
ख़र्च, अर्थात् यात्रा-भत्ता।
व्यय — कर्मचारियों का वेतन, दुकान गोदाम आदि का किराया, मरम्मत,
बैंक आदि से लिये ऋण अथवा ब्याज आदि का भुगतान, काग़ज़ स्याही आदि की
ख़रीद तथा बाहर के व्यापारियों के ठहराने और खान-पान पर होने वाले विभिन्न
प्रकार के ख़र्च।
उद्धार — अपने सामान की खपत को बढ़ाने के लिए किये जाने वाले
प्रयासों—विज्ञापन, प्रचार, उपहार-योजना तथा खुदरा व्यापारियों को लुभाने व
अंशदान (कमीशन)—पर आने वाला ख़र्च।
भार — अपने सामान की गुणवत्ता को बनाये रखने के लिए, अर्थात् रंग-
रूप, वज़न तथा माप आदि कम न होने देने के लिए किये जाने वाले कृत्रिम उपायों
पर होने वाला ख़र्च। (उदाहरणार्थ, सेब आदि फलों को कोल्ड-स्टोर में रखना,
गोदाम को चूहों-कीड़ों के प्रवेश से बचाने की व्यवस्था करना अथवा वर्षा आदि
के कारण बिगड़े सामान पर रंग-रोगन कराना, चमकाना आदि।)
सार — (मूल्यवान्) वस्तुओं—चन्दन, केसर, कस्तूरी, हीरा, मोती आदि—
की सुरक्षा की अतिरिक्त व्यवस्था करना—बैंक के लॉकर में रखवाना तथा बीमा
करवाना आदि।
प्रमादान्नाशितं दाप्यः प्रतिषिद्धकृतं च यत्।
असन्दिष्टश्च यत् कुर्यात् सर्वसम्भूयकारिभिः ॥ ५ ॥
सभी भागीदारों की सहमति प्राप्त किये बिना किसी सामान को नष्ट कर देने,
भागीदारों के मना करने पर भी किसी सामान का क्रय-विक्रय करने तथा अपनी ही
गलती से किसी सामान को गंवा बैठने से होने वाली हानि का दायित्व दूसरे
भागीदारों का कदापि नहीं होता, अपितु हानि की भरपायी एकमात्र कर्ता को ही
करनी होती है।
दैवतस्करराजभ्यो व्यसने समुपस्थिते।
यस्तत्स्वशक्त्या रक्षेत् तस्यांशो दशमः स्मृतः ॥ ६ ॥
आग लगने जैसी दैवी आपत्ति से, चोर डाकुओं के गिरोह से तथा राजकर्मियों
के अनुचित व्यवहार (छापा-ज़ब्त करना आदि) से अकेला जूझकर एवं अपने
प्राणों को संकट में डालकर साझी सम्पत्ति को बचाने वाले भागीदार को बचायी
गयी सम्पत्ति का दसवां भाग पुरस्कार के रूप में देना चाहिए।
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किसी एक सहभागी के मर जाने अथवा विदेश जाने पर उसके द्रव्य की
व्यवस्था सम्बन्धी नियम—
एकस्य चेत् स्याद् व्यसनं दायादोऽस्य तदाप्नुयात्।
अन्यो वासति दायादे शक्ताश्चेत् सर्व एव वा॥ 7॥
दैवी उपद्रव, डाकुओं के उत्पात तथा प्रशासन की उग्रता से जूझने वाले तथा
साझी सम्पत्ति को बचाने में अपने प्राण गंवाने वाले भागीदार के दायाद - पैतृक
सम्पत्ति लेने वाले—को उसका स्थानापन्न मानकर उसके भाग का लाभांश उसे देते
रहना चाहिए। यह शेष भागीदारों का नैतिक कर्तव्य बनता है। मृतक के पुत्र के
होने पर उसके निकट सम्बन्धी को अथवा उसका दाहकर्म करने वाले को अथवा
अपने को उसका उत्तराधिकारी को उसका लाभांश देते रहना चाहिए।
ऋत्विनां व्यसनेऽप्येवमन्यस्तत्कर्म निस्तरेत्।
लभेत दक्षिणाभागं स तस्मात् सम्प्रकल्पितम्॥ 8॥
यज्ञ-यागादि कराने वाले ऋत्विज के सम्बन्ध में भी उपर्युक्त व्यवस्था लागू
होती है, अर्थात् यजमान से दान दक्षिणा आदि लिये बिना प्राण त्यागने वाले
पुरोहित को देय दान-दक्षिणा को पाने का अधिकारी उसका पुत्र, उसके अभाव में
उसका निकट सम्बन्धी अथवा उसका दाहकर्म करने वाला अथवा अपने को
उसका उत्तराधिकारी सिद्ध करने वाला व्यक्ति ही होता है।
ऋत्विग्याज्यमदुष्टं यस्त्यजेदनुपकारिणम्।
अदुष्टर्त्विजे भाज्यो विनेयौ तावुभावपि॥ 9॥
किसी प्रकार की दुष्टता अथवा उपकार न करने वाले यजमान को यज्ञ-
यागादि कराने की स्वीकृति देकर क्रोध-लोभ आदि के कारण उसे छोड़ने वाला
पुरोहित तथा एक बार वरण करके उसमें किसी दोष के न मिलने पर भी अकारण
ऋत्विज को छोड़ने वाला यजमान, दोनों ही दण्डनीय हैं। इन दोनों को कठोर दण्ड
देकर अनुशासित करना चाहिए।
ऋत्विक् तु त्रिविधो दृष्टः पूर्वजुष्टः स्वयं कृतः।
यदृच्छया च यः कुर्यादार्त्विज्यं प्रीतिपूर्वकम्॥ 10॥
ऋत्विक् तीन प्रकार के होते हैं—
पूर्वजुष्ट—कुल-परम्परा से चला आने वाला।
स्वयं कृत—यजमान द्वारा पुरोहित के पास जाकर ऋत्विक् बनाने का अनुरोध
करने तथा
यादृच्छिक—यजमान द्वारा किसी भी विप्र पर अनुरक्त होकर उसका वरण
करना।
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क्रमागतेष्वेष धर्मो वृत्तेष्वृत्विक्षु च स्वयं।
यादृच्छिकेषु याज्यस्य तत्तयागे नास्ति किल्विषम्॥ 11 ॥
प्रथम दो—पूर्वजुष्ट तथा स्वयंकृत—के लिए यजमान का परित्याग और
यजमान द्वारा इनका परित्याग दण्डनीय अपराध है। यादृच्छिक इस नियम के
अन्तर्गत नहीं आता। यजमान ने किसी के गुणों पर मुग्ध होकर अथवा अकारण ही
उसका वरण कर लिया, परन्तु कुछ समय पश्चात् यजमान को पुरोहित साधारण
प्रतीत होने लगा अथवा उससे अधिक गुणी उसे मिल गया अथवा वह पूर्वजुष्ट के
क्रोध से डर गया, तो इस स्थिति में यादृच्छिक के परित्याग में कोई दोष नहीं।
शुल्कस्थानं वणिक् प्राप्तः शुल्कं दद्यात् यथोदितम्।
न तद्व्यतिहरेद्राजो बलिरेष प्रकीर्तितः॥ 12 ॥
प्रशासन को चुंगीघर पर मांगे गये शुल्क का भुगतान करने वाले व्यापारी के
माल को रोकने अथवा ज़ब्त करने का कोई अधिकार नहीं।
शुल्कस्थानं परिहरन्नकाले क्रयविक्रयो।
मिथ्योक्त्वा च परीमाणं दाप्योऽष्टगुणमत्ययम्॥ 13 ॥
चुंगीघर से लुक-छिपकर सामान ले जाने वाले, शुल्क चुकाने से पूर्व सामान
का क्रय-विक्रय करने वाले, शुल्क-अधिकारी को सामान का पूरा परिमाण न
बताने वाले अथवा सही जानकारी न देने वाले, अर्थात् अधिक शुल्क लगने वाला
सामान बताने वाले व्यापारी से छिपाये गये सामान पर लगने वाले शुल्क का आठ
गुना वसूल करना चाहिए।
सद्य श्रोत्रियवर्ज्याणि शुल्कान्याहुः प्रजानता।
गृहोपयोगि यच्चैषां न तु वाणिज्यकर्मणि॥ 14 ॥
धर्मशास्त्रकारों के अनुसार अपने घर के उपयोग में आने वाले सामान पर
श्रोत्रिय ब्राह्मणों से कर नहीं वसूल करना चाहिए। हां, यदि उनके द्वारा लाया गया,
सामान व्यापार के लिए है, तो शुल्क देय होता है।
प्रतिग्रहो द्विजातीनां धनं रङ्गोपजीविनाम्।
स्कन्धवाह्यं च यद् द्रव्यं न तद्युक्तं प्रदापयेद्॥ 15 ॥
दान दक्षिणा से प्राप्त ब्राह्मणों के धन के प्रचुर होने पर भी, नृत्य-गीत वाद्य
आदि से आजीविका चलाने वालों के धन के मात्रा में अधिक होने पर भी तथा
अपने कन्धों पर भार ढोने वाले श्रमिकों की आय के पर्याप्त होने पर भी उनसे कर
नहीं वसूल करना चाहिए।
कश्चिच्चेत् सञ्चरन्देशान् प्रेयादभ्यागतो वणिक्।
राजास्य भाण्डं रक्षेत् यावद्दायाददर्शनम्॥ 16 ॥
व्यापार के लिए विदेश गये व्यापारी के अचानक परलोक सिधार जाने पर
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उसके उत्तराधिकारी के उस देश में पहुंचने तक व्यापारी के माल की सुरक्षा का
दायित्व उस देश के राजा का होता है।
दायादेऽसति बन्धुभ्यो जातिभ्यो वा समर्पयेत्।
तदभावे सुगुप्तं तद्धारयेद्दशतीः समाः ॥ 17 ॥
मृत व्यापारी के पुत्र के न आने पर मृतक का सामान उसके भागीदारों, जाति-
बन्धुओं अथवा अधिकार सिद्ध करने वाले इष्टमित्रों को सौंपना चाहिए। मृतक के
किसी भी उत्तराधिकारी द्वारा उसके सामान को लेने के लिए न आने पर राजा को
दस वर्षों तक सामान को सुरक्षित रखने का दायित्व निभाना चाहिए।
अस्वामिकमदायादं दशवर्षस्थितं ततः।
राजा तदात्मसात् कुर्यादेवं धर्मो न हीयते ॥ 18 ॥
यदि मृतक के सामान का कोई भी दावेदार दस वर्षों के भीतर आकर अपना
दावा प्रस्तुत नहीं करता, तो राजा को यह मान लेना चाहिए कि मृतक का कोई
उत्तराधिकारी नहीं है। इस स्थिति में प्रशासन को वह सामान बेचकर प्राप्त धन
राजकोष में जमा करा देना चाहिए।
दस वर्षों के पश्चात् किसी दावेदार के आ जाने पर उस धन को लौटाना-न
लौटाना राजा की इच्छा पर निर्भर करता है। निर्धारित अवधि के उपरान्त दावेदार
केवल दया की याचना ही कर सकता है; क्योंकि समय-सीमा के बीत जाने के
साथ उसका विधिसम्मत अधिकार भी समाप्त हो चुका होता है।
॥ चतुर्थ अध्याय का तृतीय प्रकरण समाप्त ॥
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