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सर्वकोश
नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

देवर्षि नारद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished304 पृष्ठ

पृष्ठ 156, कुल 304 में से

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पृष्ठ 156

क्रमागतेष्वेष धर्मो वृत्तेष्वृत्विक्षु च स्वयं।
यादृच्छिकेषु याज्यस्य तत्तयागे नास्ति किल्विषम्॥ 11 ॥
प्रथम दो—पूर्वजुष्ट तथा स्वयंकृत—के लिए यजमान का परित्याग और
यजमान द्वारा इनका परित्याग दण्डनीय अपराध है। यादृच्छिक इस नियम के
अन्तर्गत नहीं आता। यजमान ने किसी के गुणों पर मुग्ध होकर अथवा अकारण ही
उसका वरण कर लिया, परन्तु कुछ समय पश्चात् यजमान को पुरोहित साधारण
प्रतीत होने लगा अथवा उससे अधिक गुणी उसे मिल गया अथवा वह पूर्वजुष्ट के
क्रोध से डर गया, तो इस स्थिति में यादृच्छिक के परित्याग में कोई दोष नहीं।
शुल्कस्थानं वणिक् प्राप्तः शुल्कं दद्यात् यथोदितम्।
न तद्व्यतिहरेद्राजो बलिरेष प्रकीर्तितः॥ 12 ॥
प्रशासन को चुंगीघर पर मांगे गये शुल्क का भुगतान करने वाले व्यापारी के
माल को रोकने अथवा ज़ब्त करने का कोई अधिकार नहीं।
शुल्कस्थानं परिहरन्नकाले क्रयविक्रयो।
मिथ्योक्त्वा च परीमाणं दाप्योऽष्टगुणमत्ययम्॥ 13 ॥
चुंगीघर से लुक-छिपकर सामान ले जाने वाले, शुल्क चुकाने से पूर्व सामान
का क्रय-विक्रय करने वाले, शुल्क-अधिकारी को सामान का पूरा परिमाण न
बताने वाले अथवा सही जानकारी न देने वाले, अर्थात् अधिक शुल्क लगने वाला
सामान बताने वाले व्यापारी से छिपाये गये सामान पर लगने वाले शुल्क का आठ
गुना वसूल करना चाहिए।
सद्य श्रोत्रियवर्ज्याणि शुल्कान्याहुः प्रजानता।
गृहोपयोगि यच्चैषां न तु वाणिज्यकर्मणि॥ 14 ॥
धर्मशास्त्रकारों के अनुसार अपने घर के उपयोग में आने वाले सामान पर
श्रोत्रिय ब्राह्मणों से कर नहीं वसूल करना चाहिए। हां, यदि उनके द्वारा लाया गया,
सामान व्यापार के लिए है, तो शुल्क देय होता है।
प्रतिग्रहो द्विजातीनां धनं रङ्गोपजीविनाम्।
स्कन्धवाह्यं च यद् द्रव्यं न तद्युक्तं प्रदापयेद्॥ 15 ॥
दान दक्षिणा से प्राप्त ब्राह्मणों के धन के प्रचुर होने पर भी, नृत्य-गीत वाद्य
आदि से आजीविका चलाने वालों के धन के मात्रा में अधिक होने पर भी तथा
अपने कन्धों पर भार ढोने वाले श्रमिकों की आय के पर्याप्त होने पर भी उनसे कर
नहीं वसूल करना चाहिए।
कश्चिच्चेत् सञ्चरन्देशान् प्रेयादभ्यागतो वणिक्।
राजास्य भाण्डं रक्षेत् यावद्दायाददर्शनम्॥ 16 ॥
व्यापार के लिए विदेश गये व्यापारी के अचानक परलोक सिधार जाने पर
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