नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary
सम्राट हर्षवर्धन द्वारा
( २४१ )
वृद्धा—हाय बेटा ! हा प्यारे ! गुरुजनों के प्रिय ! तुम कहां हो ? मुझे
जवाब दो !
जीमूतकेतु—हाय पुत्र जीमूतवाहन ! हा प्रेमीजनों के प्यारे ! हा सब
गुणों के खजाने ! तुम कहां हो ? मुझे उत्तर दो। (हाथों को
ऊपर फेंक कर) हाय रे बड़ा कष्ट है !! हे पुत्र तुम्हारे परलोक
सिधार जाने पर धैर्य निराश्रय हो गया है। विनय किस की
शरण ले ? यहां शान्ति को धारण करने में कौन समर्थ है ?
दानशीलता समाप्त हो गई। सच्चाई सचमुच नष्ट हो गई।
बेचारी करुणा आज कहां जाए । (तुम्हारे बिना) सारा संसार
ही सूना हो गया है।
मलयवती—हाय प्राणनाथ ! मुझे छोड़ कर चले गए हो ? अत्यन्त
निर्दय मलयवती ! (और) तुझे क्या देखना है जो इस समय
तक जी रही है ?
- सति सप्तमी ।
( २५२ )
शङ्खचूडः— हा कुमार ! क्वेमं प्राणेभ्योऽपि वल्लभं जनं
^1 परित्यज्य गम्यते ? तदवश्यमन्वेति त्वां शङ्खचूडः ।
गरुडः— (सोद्वेगम् ) कष्टम् ! ^2 उपरतोऽयं महात्मा । तत्
किमिदानीं करोमि ?
वृद्धा — (सास्रमूर्ध्वमवलोक्य) भगवंतो लोअपाला ! कहं पि
भगवन्तो लोकपालाः ! कथमप्य-
अमिदेण सिंचिअ पुत्तअं मे जीवावेहि ।
मृतेन सिक्त्वा पुत्रकं मे जीवयत ।
गरुडः— (सहर्षमात्मगतम्) अये ! अमृतसङ्कीर्त्तनात् साधु
स्मृतम् । मन्ये प्रमृष्टमयशः । तद्यावत् त्रिदशपतिम-
भ्यर्थ्य तद्विसृष्टेनामृतवर्षेण न केवलं जीमूतवाहनम् ,
एतानपि पूर्वभक्षितानस्थिशेषानाशीविषान् प्रत्युज्जीवयामि ।
यदि न ददात्यसौ, तदाहम्—
पक्षोत्क्षिप्ताम्बुनाथः, पटुजवपवनप्रेर्यमाणे समीरे—
नेत्राचिः ^3 प्लोषमूर्च्छाविधुरविनिपतत्सानलद्वादशार्कः ।
^4 चञ्च्वा सञ्चूर्ण्य शक्राशनिधनदगदाप्रेतलोकेशदण्डा
नन्तः संमग्नपक्षः क्षणममृतमयीं वृष्टिमभ्युत्सृजामि ॥३२॥
श्लोक नं०: ३२, अन्वयः—
पक्षोत्क्षिप्ताम्बुनाथः, पटुजवपवनप्रेर्यमाणे समीरे, नेत्राचिंप्लोष-
मूर्च्छाविधुरविनिपतन्त्सानलद्वादशार्कः, शक्राशनिधनदगदाप्रेतलोके-
शदण्डान् चञ्च्वा सञ्चूर्ण्य अन्तः क्षणं संमग्नपक्षः अमृतमयीं
वृष्टिमभ्युत्सृजामि ।
( २५३ )
शङ्खचूड़—हाय कुमार ! प्राणों से भी प्यारे इन प्रियजनों को छोड़कर
कहां जा रहे हो ? शङ्खचूड तो अवश्य ही तुम्हारे पीछे (ही)
आएगा।
गरुड़—(दुःखपूर्वक) हाय कष्ट ! यह महात्मा मर गया। तो अब क्या
करूं ?
वृद्धा—(आंसुओं के साथ, ऊपर देख कर) हे भगवान लोकपालो।
कैसे भी अमृत से सींच कर मेरे बच्चे को जीवित कर दो।
गरुड—(हर्षपूर्वक, मन ही मन) अहा, अमृत के नाम से खूब याद
आया। मेरा विचार है (अब मेरा) अपयश मिट गया ! अतः
इन्द्र से प्रार्थना कर के उन से छोड़ी गई अमृत की वर्षा से न
केवल जीमूतवाहन को ही अपितु इन पहिले से खाए गए
अस्थिमात्रावशेष साँपों को भी फिर से जिला दूंगा। यदि वह
नहीं देगा, तो मैं—
पंखों से वरुण को दूर, फेंक कर, बड़े ज़ोर की हवा से पवन देवता
को भी (तिनके की तरह) हटा कर, अपने नेत्रों की ज्वाला से
जलाने से मूर्च्छित तथा व्याकुल अग्नि के साथ बारहौं सूर्यों को
(भी) अपने २ स्थानों से गिरा कर, इन्द्र के वज्र को, कुबेर की
गदा को तथा यमराज के दण्ड को अपनी चोंच से चूर २ कर
के, अमृत के बीच क्षण भर अपने पंखों को डुबा कर मैं अमृत
की वर्षा कर दूँगा।
- अनु + इ + लट् + प्रथम पुरुष + एक वचन !
- उप + रम् + क्त + प्रथमा एक वचन।
- प्लोषः = जलाना।
- सम् + चूर्ण् + ल्यप्
( २४४ )
॰तदयं गतोऽस्मि ।
[इति साटोपं परिक्रम्य निष्क्रान्तः]
जीमूतकेतुः-वत्स शङ्खचूड ! किमद्यापि स्थीयते¹ ? समाहृत्य²
दारूणि पुत्रस्य मे विरचय चितां येन वयमप्यनेन सहैव
गच्छामः ।
वृद्धा—पुत्त संखचूडः ! लहु सजेहि । दुक्खं अम्हेहि विणा
पुत्र शङ्खचूड ! लघु सञ्जय । दुःखमस्माभिर्विना³
भादुओ दे चिट्ठदि ।
भ्राता ते तिष्ठति ।
शङ्खचूडः- (सास्रम् ) यदाज्ञापयन्ति गुरवः । नन्वग्रग एवाहं
युष्माकम् [उत्थाय चितारचनां कृत्वा] तात ! अम्ब !
सज्जीकृतेयं चिता ।
जीमूतवाहनः-कष्टं भोः कष्टं !
उष्णीषः स्फुट एष मूर्धनि विभात्यूर्णेयमन्तर्भ्रुवो-
श्चक्षुस्तामरसानुकारि, हरिणा वक्षःस्थलं स्पर्धते ।⁴
चक्राङ्कौ चरणौ, तथापि हि कथं हा वत्स ! मद्दुष्कृतै-
स्त्वं विद्याधरचक्रवर्तिपदवीमप्राप्य विश्राम्यसि ॥३३॥
श्लोक नं०: ३३, अन्वयः- (तव) मूर्धनि एष उष्णीषः स्फुटः विभाति,
भ्रुवोः अन्तः इयम् ऊर्णा; चक्षुः तामरसानुकारि; वक्षःस्थलं
हरिणा स्पर्धते; चरणौ चक्राङ्कौ; तथापि हि हा वत्स ! कथं
मद्दुष्कृतैः त्वं विद्याधर चक्रवर्तिपदवीमप्राप्य विश्राम्यसि ?
( २४५ )
तो यह मैं चला। [यह कहकर गर्व के साथ घूम कर चला जाता है]
जीमूतकेतु—बेटा शङ्खचूड ! अब क्यों ठहरे हो ? लकड़ियां लाकर मेरे
पुत्र की चिता तैयार करो जिस से हम भी इसी के साथ ही
(मर) जाएँ।
वृद्धा—पुत्र शङ्खचूड ! शीघ्र तैयार करो । हमारे बिना तुम्हारा भाई
दुःखी होगा।
शङ्खचूड—(आंसुओं के साथ) जो गुरुजनों की आज्ञा। मैं भी आप के
आगे ही जाने वाला हूँ। (उठकर, चिता बना कर) हे तात !
माता जी !! यह चिता तैयार है।
जीमूतवाहन— हाय रे, बड़ा कष्ट हो रहा है !
(तेरे) मस्तक पर यह उष्णीष (मुकुटबन्ध) का चिन्ह स्पष्ट रूप
से शोभित है, भौहों के बीच में ऊर्णा (भौरी, आवर्त, रोम
समूह) है, आंख लाल कमल के समान है, छाती हरि (शेर
अथवा विष्णु) की बराबरी करती है. दोनों पैरों में चक्र का
निशान हैं। फिर भी, (चक्रवर्ती राजा के इन सब चिन्हों से
विभूषित होने पर भी), हे पुत्र, कैसे मेरे बुरे कर्मों के कारण तुम
विद्याधरों के चक्रवर्ती का पद पाँए बिना ही विश्राम कर रहे हो
- स्था+कर्मवाच्य+लट्+प्रथम पुरुष+एक वचन ।
- सम्+आ+हृ+ल्यप् ।
- विना के योग में तृतीया ।
- दुष्कृत = पाप; बुरे कर्म।
( २४६ )
देवि, किमपरं रुद्यते ? तदुत्तिष्ठ चितायामारोहामः ।
[सर्वे उत्तिष्ठन्ति]
मलयवती-(बद्धाञ्जलिरूर्ध्वं पश्यन्ति)-भअवदि गौरि !
भगवति गौरि !
तुए आणत्तं जहा 'विज्जाहरचक्कवट्टी भट्ठा दे भविस्सदि' त्ति
त्वयाज्ञप्तं¹, यथा—विद्याधरचक्रवर्त्ती भर्त्ता ते भविष्यतीति ।
ता कहं मम मन्दसग्गाए किदे तुमं पि अलीअवादिणी संवुत्ता ?
तत्कथं मम मन्दभाग्यायाः ²कृते त्वमप्यलीकवादिनी संवृत्ता ?.
[ततः प्रविशति ससम्भ्रमा गौरी]
गौरी-महाराज जीमूतकेतो ! न खलु न खलु साहसम्-
नुष्ठातव्यम् ।
जीमूतकेतु :-अये कथममोघदर्शना गौरी ?
गौरी-(मलयवतीमुद्दिश्य)-वत्से कथमहमलीकवादिनी भवेयम् ?
(नायकमपसृत्य कमण्डलुजलेनाभ्युक्षन्ती)-
निजेन जीवितेनापि जगतामुपकारिणः ।
परितुष्टास्मि ते वत्स ! जीव जीमूतवाहन ॥३४॥
[नायकः उत्तिष्ठति]
जीमूतकेतु:-(सहर्षं) देवि दिष्ट्या वर्धसे ! प्रत्युज्जीवितो वत्सः।
श्लोक नं०: ३४, अन्वयः- हे वत्स जीमूतवाहन ! निजेन जीवितेनापि
जगतामुपकारिणः ते परितुष्टास्मि । जीव ।
( २५७ )
देवि, और अधिक क्यों रोती हो ? अतः उठो, चिता पर चढ़ें .
[सब उठते हैं]
मलयवती - (हाथ जोड़ कर, ऊपर देखती हुई) भगवती गौरी ! आप
ने आज्ञा की थी कि "विद्याधरों का चक्रवती राजा तेरा पति
होगा" १। तो क्या मुझ अभागिन के कारण आप भी झूठ
बोलने वाली हो गईं २ ?
[जल्दी से गौरी का प्रवेश]
गौरी- महाराज जीमूतकेतु ! ऐसा साहस मत कीजिए ।
जीमूतकेतु - अरे, क्या गौरी जी हैं जिन का दर्शन कभी निष्फल नहीं
गया ?
गौरी- (मलयवती से) पुत्री, मैं कैसे झूठ बोलने वाली हो सकती हूँ
(नायक के पास जा कर कमण्डलु के जल से छींटे देती हुई) -
हे पुत्र जीमूतवाहन ! अपना जीवन देकर संसार का उपकार
करने वाले तुम पर मैं प्रसन्न हूँ । जीते रहो ।
[नायक उठता है]
जीमूतकेतु - (हर्ष पूर्वक) देवि, बड़ी प्रसन्नता की बात है; तुम्हें बधाई
हो । (मेरा) बच्चा जी पड़ा ।
- प्रथम अङ्क में ।
- कृवे के योग में षष्ठी ।
( २३८ )
वृद्धा-भअवदीए पसादेण ।
[¹ भगवत्याः प्रसादेन । [उभौ गौर्याः पादयोः पतित्वा नायकमालिङ्गतः]
मलयवती-(सहर्षं)-दिट्ठिआ पच्चुज्जीविदो अज्जउत्तो ।
दिष्ट्या प्रत्युज्जीवित आर्यपुत्रः ।
[गौर्याः पादयोः पतति]
नायकः-(गौरीं दृष्ट्वा बद्धाञ्जलिः) भगवति !
अभिलाषिताधिकवरदे¹ ! प्रणिपतितजनार्त्तिहारिणि² ! शरण्ये !
चरणौ नमाम्यहं ते विद्याधर देवते ! गौरि ! ॥३५॥
[इति गौर्याः पादयोः पतति]
[सर्वे ऊर्ध्वं पश्यन्ति] ।
जीमूतकेतुः-अये ! कथममश्रा. वृष्टिः ! भगवति किमेतत् ?
गौरी-राजन् जीमूतकेतो ! जीमूतवाहनं प्रत्युज्जीवयितुमेतां-
श्वास्थिशेषानुरगपतीन् समुपजातपश्चात्तापेन पक्षिपतिना
देवलोकादियममृतवृष्टिः पातिता³। (अङ्गुल्या निर्दिश्य)-
किं न पश्यति भवान्⁴ ?—
————————————————————————————
श्लोक नं०, ३५, अन्वयः— अभिलषिताधिकवरदे ! प्रणिपतितजनार्त्ति-
हारिणि ! शरण्ये ! विद्याधरदेवते ! गौरि ! अहं चरणौ ते
नमामि ।
( २४६ )
वृद्धा- भगवती की कृपा से। [दोनों गौरी के चरणों पर गिर कर
नायक को छाती से लगाते हैं]
मलयवती - (हर्ष पूर्वक) बड़ी खुशी की बात है। प्राणनाथ जी उठे ।
[गौरी के चरणों पर गिरती है]
नायक - (गौरी को देख कर, हाथ जोड़ कर) भगवती !
इच्छा से भी अधिक वर देने वाली, भक्तजनों के कष्टों को दूर
करने वाली, शरण देने वाली, विद्याधरों की कुलदेवी, हे गौरी
मैं आप के चरणों में प्रणाम करता हूँ।
[यह कह कर गौरी के चरणों पर गिरता है]
[सब ऊपर देखते हैं]
जीमूतकेतु - अरे, यह बिना बादल के वर्षा कैसे ? भगवती, यह क्या
(बात) है ?
गौरी - हे राजन् जीमूतकेतु ! जीमूतवाहन और इन अस्थिशेष
नागराजाओं को पुनर्जीवित करने के लिए पश्चात्ताप करने वाले
गरुड़ के द्वारा स्वर्ग से यह अमृतवर्षा की गई है। (उङ्गली से
इशारा करके) क्या आप देख नहीं रहे ? -
- जो आगे गिरते हैं; जो प्रणाम करते हैं; जो झुकते हैं; भक्त ।
- शरण देने वाली; रक्षा करने वाली; जिस की शरण ली जाए।
- पत् + णिच् + क्त + स्त्री लिङ्ग + प्रथमा एक वचन ।
- भवान् का प्रयोग प्रथम पुरुष में होता है।
( २६० )
सम्प्राप्ताखण्डदेहाः स्फुटफणमणिभिर्भासुरैरुत्तमाङ्गै-
र्जिह्वाकोटिद्वयेन क्षितिममृतरसास्वादलोभाल्लिहन्तः
सम्प्रत्याबद्धवेगा मलयगिरिसरिद्वारिपूरा इवामि
वक्रैः प्रस्थानमार्गैर्विषधरपतयस्तोयराशि विशन्ति ॥३६॥
(नायकमुद्दिश्य) वत्स जीमूतवाहन ! न त्वं जीवितदान-
मात्रस्यैव योग्यः। तदयमपरस्ते प्रसादः-
हंसांसाहतहेमपङ्कजरजः सम्पर्कपङ्कोज्झितै-
रुत्पन्नैर्मम मानसादुपनतैस्तोयैर्महापावनैः ।
स्वेच्छानिर्मितरत्नकुम्भनिहितैरेषाभिषिच्य स्वयं
त्वां विद्याधरचक्रवर्तिनमहं प्रीत्या करोमि क्षणात् ॥३७॥
श्लोक नं०: ३६, अन्वयः-
सम्प्राप्ताखंडदेहः, स्फुटफणमणिभिर्भासुरैरुत्तमाङ्गैः, अमृतरसा-
स्वादलोभात् जिह्वाकोटिद्वयेन क्षितिं लिहन्तः, अमी विषधरपतयः
सम्प्रति मलयगिरिसरिद्वारिपूरा इव आबद्धवेगाः वक्रैः प्रस्थानमार्गैः
तोयराशिं विशन्ति ।
श्लोक नं० ३७, अन्वयः-
हंसांसाहतहेमपङ्कजरजःसम्पर्कपङ्कोज्झितैः, मम मानसात् उत्पन्नैः,
स्वेच्छानिर्मितरत्नकुम्भनिहितैः उपनतैः महापावनैः तोयैः एषा
अहं स्वयं त्वाम् अभिषिच्य प्रीत्या क्षणात् विद्याधरचक्रवर्तिनं
करोमि ।
( २६९ )
(अमृत के प्रभाव से) अपनी पूर्ण देह प्राप्त किए हुए, साफ़ फण की
मणियों से जिनके मस्तक चमक रहे हैं, अमृत के रस के लोभ
के कारण अपनी जिह्वा की दोनों नोकों से पृथ्वी को चाटते
हुए ये नागराज अब मलय पर्वत से बहने वाली नदी के जल-
प्रवाह की भ्रान्ति प्रचल वेग से टेढ़े मेढ़े मार्गों से समुद्र में प्रवेश
कर रहे हैं।
(नायक से) वत्स जीमूतवाहन ! तुम केवल जीवन दान के ही
योग्य नहीं हो। अतः यह तुम्हारे लिए दूसरा वरदान है-
हंसों के कन्धों से हिलाए गए स्वर्ण कमलों के पराग के
सम्पर्क से उत्पन्न हुए पङ्क से रहित, मेरे मानस (मन) से
पैदा हुए, अपनी इच्छा से रचे रत्नों के घड़ों में रखे हुए
स्वेच्छा प्राप्त, परम पवित्र जल से यह मैं स्वयं तुम्हारा
अभिषेक करके प्रेम से शीघ्र ही विद्याधरों का चक्रवर्त्ती राज
बनाती हूँ ।
१. सांपों की नदी के जलप्रवाह से तुलना की गई है क्योंकि वे भी
सफेद हैं और टेढ़े मेढ़े रास्तों से होकर समुद्र में प्रवेश कर र
हैं।
२. उपनतैः = प्राप्तैः; समुद्भूतैः; आनीतैः ;
( २६२ )
अपि च,
अग्रेसरी भवतु काञ्चनचक्रमेतदेष द्विपश्च धवलो दशनैश्चतुर्भिः ।
श्यामो हरिर्मलयवत्यपि चेत्यमूनि रत्नानि ते समवलोकय
चक्रवर्तिन् ! ॥३८॥
अपि च, आलोक्यन्ताममी मत्प्रचोदिताः शारदशशाङ्कनिर्मल-
बालव्यजनहस्ताश्चलच्चूडामणिमरीचिरचितेन्द्रचाप-
पंक्तयो भक्त्यावनतपूर्वकायाः प्रणमन्ति मतङ्गदेवादयो
विद्याधरपतयः । तदुच्यतां, किं ते भूयः प्रियमुपकरोमि ?
नायकः— (जानुभ्यां स्थित्वा) अतः परमपि प्रियमस्ति ?
त्रातोऽयं शङ्खचूडः पतगपतिमुखाद्वैनतेयो विनीत-
स्तेन प्राग्भक्षिता ये विषधरपतयो जीवितास्तेऽपि सर्वे ।
मत्प्राणाप्त्या विमुक्ता न गुरुभिरसवश्चक्रवर्त्तित्वमाप्तं,
साक्षात् त्वं देवि ! दृष्टा प्रियमपरमतः किं पुनः प्रार्थ्यते यत् ॥३९॥
श्लोक नं०: ३८, अन्वयः—
एतत् काञ्चनचक्रम् अग्रेसरीभवतु; चतुर्भिः दशनैः एष धवलो
द्विपश्च; श्यामो हरिः; मलयवत्यपि च, इति अमूनि ते रत्नानि
चक्रवर्तिन् ! समवलोकय ।
श्लोक नं०: ३९, अन्वयः—
पतगपतिमुखात् अयं शङ्खचूडः त्रातः; वैनतेयः विनीतः; तेन
प्राग्भक्षिता ये विषधरपतयः तेऽपि सर्वे जीविताः; मत्प्राणाप्त्या
गुरुभिः असवः न विमुक्ताः; चक्रवर्तित्वमाप्तम्; देवि त्वं साक्षात्
दृष्टा; पुनः अतः अपरं प्रियं किं यत् प्रार्थ्यते ?
( २६३ )
यह स्वर्ण चक्र तुम्हारे सम्मुख उपस्थित हो (अथवा, है); और
चार दान्तों वाला यह सफेद हाथी, काले रंग वाला घोड़ा और
मलयवती भी। ये तुम्हारे रत्न हैं। हे चक्रवर्ती (राजा) !
अच्छी तरह देख लो। और भी, देखो मेरे द्वारा प्रेरित, शरत्
कालीन चन्द्रमा के समान निर्मल छोटे २ चँवर हाथों में लिए
हुए, चञ्चल चूड़ामणि की किरणों से इन्द्रधनुष की पंक्तियां सी
बनाते हुए, भक्ति भाव से सिर झुकाए हुए, ये मतङ्गदेव आदि
विद्याधरों के राजालोग तुम्हें प्रणाम कर रहे हैं।
तो कहो इस से अधिक और तुम्हारा क्या उपकार करूँ ?
नायक- (घुटनों के बल बैठ कर) क्या इस से भी अधिक कोई प्रिय
वस्तु है ?
गरुड़ के मुख से यह शङ्खचूड बचा लिया गया है; गरुड़ विनीत
हो गया है; उस के द्वारा पहिले खाए गए जो नागराज थे वे
भी सब पुनर्जीवित हो गए हैं; मेरे फिर से प्राण धारण करने से
माता पिता ने प्राण नहीं त्यागे; चक्रवर्ती पद भी मिल गया;
(और) देवी, आप के साक्षात् दर्शन हो गए। फिर इस से बढ़
कर अधिक प्रिय वस्तु कौनसी हो सकती है जिस के लिए
प्रार्थना की जाए ?
- हरिः = घोड़ा।
- विनता का पुत्र, गरुड़।
( २६४ )
तथापीदमस्तु - [भरत वाक्यम्] -
वृष्टिं हृष्टशिखण्डिताण्डवभृतो मुञ्चन्तु काले घनाः,
कुर्वन्तु प्रतिरूढसन्ततहरिच्छस्योत्तरीयां क्षितिम् ।
चिन्वानाः सुकृतानि वीतविपदो निर्मत्सरैर्मानसै—
मोदन्तां घनबद्धबान्धवसुहृद्गोष्ठीप्रमोदाः प्रजाः ॥४०॥
अपि च—
शिवमस्तु सर्वजगतां परहितनिरता भवन्तु भूतगणाः ।
दोषाः प्रयान्तु नाशं सर्वत्र सुखी भवतु लोकः ॥४१॥
[इति निष्क्रान्ताः सर्वे]
॥ इति पञ्चमोऽङ्कः ॥
॥ इति नागानन्दम् ॥
श्लोक नं०: ४०, अन्वयः —
हृष्टशिखण्डिताण्डवभृतो घनः काले वृष्टिं मुञ्चन्तु; प्रतिरूढ-
सन्ततहरिच्छस्योत्तरीयां क्षितिं कुर्वन्तु; प्रजाः वीतविपदः
निर्मत्सरैः मानसैः सुकृतानि चिन्वानाः घनबद्धबान्धवसुहृद्गोष्ठी-
प्रमोदाः मोदन्ताम् ॥
श्लोक नं०: ४१, अन्वयः —
सर्वजगतां शिवमस्तु; भूतगणाः परहितनिरता भवन्तु; दोषाः
नाशं प्रयान्तु; लोकः सर्वत्र सुखी भवतु ॥
( २६५ )
फिर भी यह हो— (भरतवाक्य)—
प्रसन्न हुए मोरों को नचाते हुए वादल समय पर वर्षा करें और
पृथ्वी को उगे हुए घने हरे धानों की चादर से ढक दें। [तथा
प्रजा के लोग विपत्तियों से मुक्त हो ईर्ष्या-रहित मनों से पुण्य
सञ्चय करते हुए बन्धुओं तथा मित्रों के साथ घनी गोष्ठियों में
आनन्द मनाते हुए प्रसन्न रहें।
और भी—
सारे विश्व का कल्याण हो। सब प्राणी दूसरों के हित करने में
लगे रहें। सब दोष न हों। (और) लोग सर्वत्र सुखी हों।
[सब का प्रस्थान]
॥ पाँचवां अङ्क समाप्त ॥
॥ नागानन्द (नाटक) समाप्त ॥
- चि+शानच्+प्रथमा बहुवचन ।
“परिशिष्ट”
I भौगोलिक तथा ऐतिहासिक उल्लेख
प्रथम अंक:-
१. अनङ्ग=कामदेव ! जब देवताओं को यह पता लगा कि राक्षस
तारक से बचाने में पार्वती का पुत्र ही सहायक हो सकता है
और पार्वती शिवजी को छोड़ और किसी से विवाह नहीं करेगी
तो कामदेव ने कहा कि मैं प्रयत्न करता हूँ कि शिवजी पार्वती से
शादी करने पर राज़ी हो जाएँ । शिवजी उस समय तपस्या में
लीन थे । कामदेव द्वारा तपस्या भङ्ग होने से शिवजी अति क्रुद्ध
हुए और उनके तृतीय नेत्र से ऐसी अग्नि निकली जिसने
कामदेव के शरीर को जला कर राख कर दिया । फिर कामदेव
की पत्नी रति के अनुनय विनय करने पर शिवजी ने कामदेव
को जिला तो दिया परन्तु शरीर नहीं दिया। अतएव उसे अनङ्ग
अर्थात् अङ्गरहित कहते हैं ।
२. बुद्ध=जिस को अन्तर्ज्ञान प्राप्त हो गया हो । बौद्धमत के प्रवर्तक
शाक्यमुनि को बुद्ध कहते हैं क्योंकि उन्हें परम ज्ञान की प्राप्ति
हो गई थी ! उन का जन्मनाम सिद्धार्थ था । वे कपिलवस्तु में
उत्पन्न हुए थे और ५४३ पूर्वैसा उनका देहान्त हुआ । उनके
पिता शाक्यराज शुद्धोदन थे और उनकी माता का नाम था
माया देवी । उन का विवाह राजकुमारी यशोधरा से हुआ था !
उस से उनके राहुल नामी एक पुत्र भी हुआ था । पुराणों में
बुद्ध को विष्णु का नवाँ अवतार भी माना है !
(२६८)
( २६६ )
३. जिन = विजयी। बुद्ध को जिन भी कहते हैं क्योंकि उन्हों ने जीवन
इन्धनों पर विजय प्राप्त की थी। मार की अप्सराओं की
चेष्टाओं का उन पर कोई प्रभाव नहीं हुआ था और वे पूर्ण रूप
से शान्त रहे थे।
४. इन्द्रोत्सव = देवराज इन्द्र के उपलक्ष में मनाया जाने वाला
महोत्सव। इस को इन्द्रध्वज महोत्सव भी कहते हैं। रघुवंश में
भी इस का उल्लेख मिलता है। वर्षा की यथेष्ट प्राप्ति के लिए
राजालोग भाद्रशुक्लद्वादशी को इन्द्र के झण्डे का जलूस
निकालते थे। कहते हैं सर्व प्रथम संस्कृत नाटक इसी अवसर पर
अभिनीत हुआ था।
५. मतङ्ग = यह जीमूतवाहन का प्रतिपक्षी है। जब जीमूतवाहन वन
में माता पिता की सेवा के लिए गया हुआ था तो उस की
अनुपस्थिति में मतङ्ग ने उसके राज्य को आत्मसात् कर लिया।
परन्तु जब गौरी ने जीमूतवाहन को विद्याधरोंका सम्राट्
नियुक्त कर दिया तो मतङ्ग भी आकर उनके आगे नतमस्तक
हुआ।
६. मलयपर्वत = दक्षिण भारत में एक पर्वत श्रेणी है। इस में चन्दन
वृक्षों का बाहुल्य है। कवि लोग प्रायः ऐसा वर्णन करते हैं कि
दक्षिण की ओर से आने वाली वायु इन चन्दनवृक्षों की सुगन्धि
को लेकर आती है।
७. शशभृत् = चन्द्रमा ! कहते हैं कि चन्द्रमा के बीच जो कलङ्क सा
है वह आकार में खरगोश से मिलता जुलता है। अतएव चन्द्र
को शशभृत् अथवा शशाङ्क (खरगोश के चिन्ह वाला) कहते हैं।
( २७० )
द्वितीय अंक:-
८. कुसुमायुध=कामदेव । फूल ही जिस के हथियार हैं । कहते हैं
कामदेव फूलों के तीरों का प्रयोग करता है । पांच प्रकार के
पुष्प उसके बाण बताये हैं— अरविन्द, अशोक, आम्र पुष्प
नवमल्लिका तथा नीलोत्पल ।
९. गान्धर्व विवाह=विवाह आठ प्रकार के बताए हैं:— ब्राह्म;
दैव; आर्ष; प्राजापत्य; आसुर; गान्धर्व; राक्षस तथा पैशाच ।
गान्धर्व रूप में विवाह बिना किसी आडम्बर तथा संस्कारों के
निश्चित हो जाता हैं । वर तथा वधू ज्यों ही मिलते हैं देखते
ही प्रेमासक्त हो जाते हैं और वहीं विवाह बन्धन में बन्धे
जाते हैं ।
तृतीय अंक:-
१०. बलदेव=श्री कृष्ण के बड़े भाई । वसुदेव तथा देवकी की
सातवीं सन्तान । जब यह गर्भ में थे तो देवकी का गर्भ रोहिणी
में डाल दिया गया था ताकि कंस इन्हें न मार सके ।
श्री कृष्ण तथा बलराम दोनों का पालन पोषण गोकुल में नन्द
के घर हुआ था इन को आसव (शराब) का बहुत शौक था
और इस के प्रभाव से कई विस्मय जनके कार्य किया करते थे ।
इन का हथियार प्रायः हल होता था; अतएव इन्हें हलायुध
भी कहते हैं । इन का विवाह रेवती के साथ हुआ था ।
कामदेव=प्रेम के देवता । श्री कृष्ण तथा रुक्मणि के पुत्र । रति
पति । वसन्त के घनिष्ट मित्र । अनिरुद्ध के पिता । इन के
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हथियार तीरकमान हैं--- तीर फूलों के (देखो ऊपर नं०: ८)
और कमान की डोरी भँवरों की पंक्ति। अधिक विस्तार के
लिए देखिए ऊपर टिप्पण (१)
१२. पितामह = दादा = पिता के पिता। प्रायः ब्रह्मा को पितामह
कहते हैं क्योंकि वे दस प्रजापतियों के पिता हैं, जिन से कि
सारी सृष्टि की उत्पत्ति हुई।
चतुर्थ अंक: —
१३. वैनतेय = विनता का पुत्र, गरुड़। विनता के दो पुत्र थे।
दूसरा, अरुण, सूर्य का सारथि है। इन के पिता का नाम कश्यप
था। गरुड़ पक्षियों का राजा कहलाता है। वह सांपों का शत्रु
है। गरुड़ विष्णु की सवारी है। कहते हैं एक बार विनता तथा
सांपों की माता कद्रु में झगड़ा हो गया कि इन्द्र के घोड़े का रंग
क्या है। इसमें विनता को हार हुई और शर्त के अनुसार उसे
कद्रु की दासी बन कर रहना पड़ा। उसे मुक्त कराने के लिए
गरुड़ इन्द्र से लड़ कर अमृत लाया। विनता तो मुक्त हो गई
परन्तु अमृत को इन्द्र सांपों से छीन ले गया।
१४. विश्वामित्र = वस्तुतः विश्वामित्र एक क्षत्रिय राजा थे। वे
गाधि के पुत्र थे उनकी राजधानी कान्यकुब्ज थी। एक दिन
शिकार खेलते खेलते वे वसिष्ठ जी के आश्रम में पहुंचे। वहां
उन्हों ने कामधेनु देखी। उसे पाने के लिए उन्हों ने अमित
धन सम्पत्ति देने को कहा, परन्तु वसिष्ठ जी ने उसे स्वीकार
नहीं किया। विश्वामित्र बलात् ले जाना चाहते थे, परन्तु
मुँह की खाई। इस पराजय से वे बहुत खिसियाना हुए।