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मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)

Muhurta Chintamani of Daivajna Rama with Commentary

दैवज्ञ राम (टीकाकार: पं. केदारदत्त जोशी) द्वारा

DevanagariHindipublished207 पृष्ठ

शुभाशुभप्रकरण २५
उतने ही पल सूर्योदय से पूर्व, वारप्रवृत्ति होती है। उदाहरण—कुरुक्षेत्र से
लखनऊ ४८ योजन पूर्व है। इन योजनों का चतुर्थांश १२ इन्हीं ४८ में
घटाया तो शेष ३६ पल हुए। उक्त योजन मध्यरेखा से पूर्व होने के कारण इन
३६ पलों को १५ दण्ड में घटाया तो १४ दण्ड २४ पल शेष रहे। ये दंड-पल
इष्ट दिनमानार्द्ध १७।२ दण्डादि से न्यून होने के कारण, इन दोनों में जो
अन्तर है अर्थात् २ दण्ड ३८ पल, सूर्योदय होने के पश्चात् लखनऊ में वारप्रवृत्ति
जाननी चाहिए ॥ ५४ ॥
कालहोरा
वारादेर्घटिका द्विघ्नाः स्वाक्षहृच्छेषवर्जिताः ।
सैकास्तष्टा नगैः कालहोरेशा दिनपात् क्रमात् ॥ ५५ ॥
अन्वयः—वारादेः घटिकाः द्विघ्नाः, स्वाक्षहृच्छेषवर्जिताः, सैकाः, नगै तष्टाः, दिन-
पात् कमात् कालहोरेशाः (भवन्ति) ॥ ५५ ॥
वारप्रवृत्तिकाल से लेकर इष्टकालपर्यन्त जितने दण्डादि हों उनको दो
से गुणा करके दो जगह रखे। एक स्थान में पाँच का भाग देकर जो शेष
रहे उसे दूसरे स्थान में घटावे। जो शेष रहे उसमें एक और जोड़ दे तब
सात का भाग देने से जो शेष रहे वह दिवस के स्वामी के क्रम से कालहोरेश
होगा। उदाहरण—यदि रविवार को वारप्रवृत्ति से लेकर इष्टकाल पर्यन्त ६
दण्ड हों, २ से गुणा तो १२ हुए। इनको दो स्थानों में रखकर एक स्थान में
५ का भाग दिया, २ शेष रहे, उन्हें दूसरे स्थान में घटाया तो १० शेष रहे।
एक जोड़ा तो ११ हुए। उनमें ७ का भाग दिया तो ४ शेष रहे। रविवार से
गिना तो चौथा बुध हुआ यही उस काल में कालहोरेश हुआ ॥ ५५ ॥
कालहोरा का प्रयोजन
वारे प्रोक्तं कालहोरासु तस्य धिष्ण्ये प्रोक्तं स्वामितिथ्यंशकेऽस्य ।
कुर्याद्दिक्शूलादि चिन्त्यं क्षणेषु नैवोल्लङ्घ्यः पारिघश्चापिदण्डः ॥ ५६ ॥
अन्वयः—वारे प्रोक्तं (कर्म) तस्य (वारस्य) कालहोरासु कुर्यात् । (तथा)
धिष्ण्ये प्रोक्तं अस्य स्वामितिथ्यंशके (मुहूर्ते) कुर्यात् । क्षणेषु (मुहूर्तेषु) दिक्शूलादि
(अवश्यं) चिन्त्यम् । पारिघः दण्डः अपि नैव उल्लंघ्यः ॥ ५६ ॥
जो कार्य जिस वार में विहित है वह आवश्यक हो तो उसके कालहोरा
में करने को महर्षियों ने कहा है, और जो कार्य जिस नक्षत्र में विहित है वह

(Water)
21. Uttarashadha: विश्वे (Vishvedevah)
22. Abhijit: विधि (Vidhi/Brahma)

Now let's look at the words in L26:
Word 1: शक्राग्नी (shakraagnii)
Word 2: खलु (khalu)
Word 3: मित्र (mitra)
Word 4: शक्र (shakra)
Word 5: निऋतिः or निरृतिः or निर्ऋतिः?
In the print: न (na) with choti-i = नि, then ऋ with reph? or र्ऋ?
Look at it: न िर ् ऋ त ी ः -> निर्ऋतीः or निरृतीः?
Wait, it has न, with ि, then ऋ with reph above it: र्ऋ! So निर्ऋतीः.
Wait, what about the next word?
Is it "तोयानि"?
Look at the characters:
त् + ो = तो!
य + ा = या!
न + ि = नि!
"तोयानि"!
Wait, why did I think "क्षीराणि"?
Ah, because the scan at first glance looked like that, but looking closely:
त् with ो = तो
य with ा = या
न with ि = नि
It is definitely "तोयानि"!
Let's look at the meter:
शक्राग्नी (---)
खलुमि (vv

नक्षत्रप्रकरण २७
अन्वयः—नासत्यान्तकवह्निधातृशशभृद्रुद्रादितिज्योरगाः, पितरः, भगः, अर्यमरवी,
त्वष्टा, समीरः, शक्राग्नी, मित्रः, शक्रः निर्ऋतिः, तोयानि, विश्वे, विधिः, गोविन्दः,
वसुतोयपाजचरणाहिर्बुध्न्यपूषाभिधाः (एते) क्रमात् ऋक्षेशाः (ज्ञेयाः) ॥ १ ॥
अश्विनी नक्षत्र के स्वामी अश्विनीकुमार, भरणी के यमराज, कृत्तिका
के अग्नि, रोहिणी के ब्रह्मा, मृगशिरा के चन्द्रमा, आर्द्रा के रुद्र, पुनर्वसु
के अदिति, पुष्य के बृहस्पति, आश्लेषा के सर्प, मघा के पितर, पूर्वाफाल्गुनी
के भग देवता अर्थात् सूर्यविशेष, उत्तराफाल्गुनी के अर्यमा अर्थात् सूर्य-
विशेष, हस्त के सूर्य, चित्रा के विश्वकर्मा, स्वाती के वायु, विशाखा के
इन्द्र और अग्नि, अनुराधा के मित्र अर्थात् सूर्यविशेष, ज्येष्ठा के इन्द्र, मूल के
के राक्षस, पूर्वाषाढ़ के जल, उत्तराषाढ़ के विश्वेदेव, अभिजित् के ब्रह्मा,
श्रवण के विष्णु, धनिष्ठा के वसु, शतभिष के वरुण, पूर्वाभाद्रपद के अजचरण
अर्थात् रुद्रविशेष, उत्तराभाद्रपद के अहिर्बुध्न्य अर्थात् रुद्रविशेष, रेवती के
पूषा अर्थात् सूर्यविशेष स्वामी हैं ॥ १ ॥
नक्षत्र-स्वामियों का चक्र

अ०अ०कु०पुन०अदितिहस्तसूर्यमूलराक्षसश०वरुण
भ०यमपुष्यबृहस्प०चित्रात्वष्टापू०जलपू०अजच०
कृ०अग्निअश्ले०सर्पस्वा०वायुउ०विश्वे०उ०अ० बु०
रो०ब्रह्मामघापितर.वि०इन्द्र अ०अ०विधिरे०पूषा
मृ०चन्द्रमापू०भगअनु०मित्रश्र०विष्णु××
आ०रुद्रउ०अर्यमाज्ये०इन्द्रध०वसु××

नक्षत्रों की संज्ञा
उत्तरात्रयरोहिण्यो भास्करश्च ध्रु

२८ मुहूर्त्तचिन्तामणि
स्वात्यादित्ये श्रुतेस्त्रीणि चन्द्रश्चापि चरं चलम् ।
तस्मिन् गजादिकारोहो वाटिकागमनादिकम् ॥ ३ ॥
अन्वयः—स्वात्यादित्ये श्रुतेः त्रीणि (तथा) चन्द्रः चरं, चलं च (संज्ञं ज्ञेयम्)
तस्मिन् गजादिकारोहो वाटिका-गमनादिकम् (शुभं भवति) ॥ ३ ॥
स्वाती, पुनर्वसु, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिष ये पाँच नक्षत्र और सोमवार
इनकी चर और चल संज्ञा है। इनमें हाथी, घोड़े आदि पर चढ़ना, बगीचा
लगाना, यात्रा करना, और आदि शब्द से लघुसंज्ञक नक्षत्रों का भी
कार्य करना शुभ है ॥ ३ ॥
पूर्वात्रयं याम्यमघे उग्रं क्रूरं कुजस्तथा।
तस्मिन् घाताग्निशाठ्यानि विषशस्त्रादि सिद्ध्यति ॥ ४ ॥
अन्वयः—पूर्वात्रयं याम्यमघे तथा कुजः, उग्रं क्रूरं (च ज्ञेयम्) तस्मिन् घाताग्निशाठ
यानि, विषशस्त्रादि सिद्ध्यति ॥ ४ ॥
पूर्वाफाल्गुनी, पूर्वाषाढ़, पूर्वाभाद्रपद, भरणी, मघा, ये पाँच नक्षत्र और
मंगल दिन, इनकी क्रूर और उग्र संज्ञा है । इनमें मारण, अग्नि का कार्य,
शठता का कार्य, विष का कार्य, हथियार का कार्य और आदि शब्द से
दारुणसंज्ञक नक्षत्रों का कार्य, ये सब सिद्ध होते हैं ॥ ४ ॥
विशाखाग्नेयभे सौम्यो मिश्रं साधारणं स्मृतम् ।
तत्राग्निकार्यं मिश्रं च वृषोत्सर्गादि सिद्ध्यति ॥ ५ ॥
अन्वयः—विशाखाग्नेयभे, (तथा) सौम्यः [बुधः], मिश्रं (तथा) साधारणं स्मृतम्।
तत्र अग्निकार्यं, मिश्रं च वृषोत्सर्गादि सिद्ध्यति ॥ ५ ॥
विशाखा, कृत्तिका, ये दो नक्षत्र और बुध दिन, इनकी मिश्र और
साधारण संज्ञा है । इनमें अग्निहोत्र, साधारण कार्य, वृषोत्सर्ग और आदि
शब्द से उग्र भी कार्य, ये सब सिद्ध होते हैं ॥ ५ ॥
हस्ताश्विपुष्याभिजितः क्षिप्रं लघुगुरुस्तथा ।
तस्मिन्पण्यरतिज्ञानभूषाशिल्पकलादिकम् ॥ ६ ॥
अन्वयः—हस्ताश्विपुष्याभिजितः तथा गुरुः, क्षिप्रं लघु (च संज्ञं ज्ञेयम्) तस्मिन्
पण्यरतिज्ञानभूषाशिल्पकलादिक (शुभं भवति) ॥ ६ ॥
हस्त, अश्विनी, पुष्य, अभिजित्, ये चार नक्षत्र और बृहस्पति दिन,
इनकी क्षिप्र और लघु संज्ञा है। इनमें बाजार का कार्य, स्त्री-सम्भोग,
शास्त्रादि का ज्ञान, आभूषणों का बनवाना और पहिनना, चित्रकारी, गाना-

नक्षत्रप्रकरण २९
बजाना इत्यादि कला और आदि पद से चरसंज्ञक नक्षत्रों का भी कार्य, वे
सब सिद्ध होते हैं ॥ ६ ॥
मृगान्त्यचित्रामित्रर्क्षं मृदु मैत्रं भृगुस्तथा ।
तत्र गीताम्बरक्रीडामित्रकार्यं विभूषणम् ॥ ७ ॥
अन्वयः—मृगान्त्यचित्रामित्रक्षं तथा भृगुः, मृदु मैत्रं (च संज्ञं ज्ञेयम्) तत्र गीताम्बर-
क्रीडामित्रकार्यं विभूषणं (सिद्धयति) ॥ ७ ॥
मृगशिरा, रेवती, चित्रा, अनुराधा, ये चार नक्षत्र और शुक्रवार इनकी
मृदु और मैत्र संज्ञा है । इनमें गाना, वस्त्र पहिनना स्त्री के साथ क्रीड़ा, मित्र
का कार्य, आभूषण पहिनना इत्यादि कार्य सिद्ध होते हैं ॥ ७ ॥
मूलेन्द्रार्द्राहिभं सौरिस्तीक्ष्णं दारुणसंज्ञकम् ।
तत्राभिचारघातोग्रभेदाः पशुदमादिकम् ॥ ८ ॥
अन्वयः—मूलेन्द्रार्द्राहिभं तथा सौरिः, तीक्ष्णं, दारुणसंज्ञकं (च ज्ञेयम्) । तत्र
अभिचारघातोग्रभेदाः पशुदमादिकं (सिद्धयति) ॥ ८ ॥
मूल, ज्येष्ठा, आर्द्रा, आश्लेषा, ये चार नक्षत्र और शनैश्चर दिन, इनकी
तीक्ष्ण और दारुण संज्ञा है । इनमें अभिचार, मारण आदि भयानक कर्म,
भेद और हाथी-घोड़े आदि का सिखाना, ये कार्य-सिद्ध होते हैं ॥ ८ ॥
नक्षत्रों की अधोमुखादि संज्ञा
मूलाहिमिश्रोग्रमधोमुखं भवेद्धूर्ध्वास्यमार्द्वेज्यहरित्रयं ध्रुवम् ।
तिर्यङ्मुखं मैत्रकरानिलादितिज्येष्ठाशिवभानीदृशकृत्यमेषु सत् ॥ ९ ॥
अन्वयः—मूलाहिमिश्रोग्रं अधोमुखं, आर्द्वेज्यहरित्रयं ध्रुवं ऊर्ध्वास्यं, मैत्रकरानि-
लादितिज्येष्ठाशिवभानि तिर्यङ्मुखं भवेत्, एषु ईदृशकृत्यं सत् ॥ ६ ॥
मूल, आश्लेषा, मिश्रसंज्ञक और उग्रसंज्ञक की अधोमुख संज्ञा है । आर्द्रा,
पुष्य, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिष, और ध्रुवसंज्ञक नक्षत्रों की ऊर्ध्वमुख संज्ञा
है । मृदुसंज्ञक नक्षत्र, हस्त, स्वाती, पुनर्वसु, ज्येष्ठा और अश्विनी की तिर्यङ् -
मुख संज्ञा है । इन्हीं संज्ञाओं के सदृश कार्य इनमें शुभ होते हैं, अर्थात्
अधोमुख संज्ञक नक्षत्रों में कुँआ, बावली तालाब खुदवाना इत्यादि, ऊर्ध्व-
मुख नक्षत्रों में राज्याभिषेक, पट्टबन्ध, दुमहला, तिमहला आदि मकान बनवाना
और तिर्यङ्मुख नक्षत्रों में हाथी, घोड़े, बैल आदि के कृत्य और यात्रा इत्यादि
शुभ हैं ॥ ९ ॥

३० मुहूर्त्तचिन्तामणि
नवीन वस्त्र-आभूषण और चूड़ी आदि धारण करने का मुहूर्त
पौष्णध्रुवाश्विकरपञ्चकवासवेज्यादित्ये प्रवालरदशंखसुवर्णवस्त्रम्।
धार्यं विरिक्तशनिचन्द्रकुजेऽह्निरक्तं भौमे ध्रुवादितियुगे सुभगा न दध्यात् ॥१०॥
अन्वयः—पौष्णध्रुवाश्विकरपञ्चकवासवेज्यादित्ये, विरिक्तशनिचन्द्रकुजेऽह्नि, प्रवाल-
रदशंखसुवर्णवस्त्रं धार्यम्। भौमे रक्तं (वस्त्रं धार्यम्) ध्रुवादितियुगे सुभगा न
दध्यात् ॥१०॥
रेवती, तीनों उत्तरा, रोहिणी, अश्विनी, हस्त, चित्रा, स्वाती, विशाखा,
अनुराधा, धनिष्ठा, पुष्य, पुनर्वसु इन नक्षत्रों में और रिक्ता को छोड़ अन्य
तिथियों में सोमवार, मंगल, शनैश्चर को छोड़ अन्य दिनों में मूँगा, दाँत,
शंख और सुवर्ण के आभूषण तथा वस्त्र धारण करना चाहिए। मंगल के
दिन लालवस्त्र धारण करना चाहिए। तीनों उत्तरा, रोहिणी, पुनर्वसु और
पुष्य में सधवा स्त्री नवीन वस्त्र इत्यादि न धारण करे। (कोई आचार्य कहते
हैं कि शतभिषा नक्षत्र में भी सधवा स्त्री नवीन वस्त्र-आभूषण इत्यादि का
धारण और स्नान न करे। यदि ऐसा कार्य भूल से हो तो अपने पति की
पूजा करे तो दोष शान्त होता है) ॥१०॥
नवीन वस्त्र के जलने आदि का शुभाशुभ फल
वस्त्राणां नवभागकेषु च चतुष्कोणेऽमरा राक्षसा
मध्यत्र्यंशगता नरास्तु सदशे पाशे च मध्यांशयोः।
दग्धे वा स्फुटितेऽम्बरे नवतरे पङ्कादिलिप्ते न स-
द्रक्षोंशे नृसुरांशयोः शुभमसत्सर्वांशके प्रान्ततः ॥११॥
अन्वयः—वस्त्राणां नवभागकेषु चतुष्कोणे अमरा, मध्यत्र्यंशगताः राक्षसाः तु
[पुनः] मध्यांशयोः.. सदशे पाशे नराः (तत्र) रक्षोंऽशे नवतरे अम्बरे दग्धे स्फुटिते
पङ्कादिलिप्ते वा न सत्, नृसुरांशयोः शुभं, प्रान्ततः सर्वांशके असत् ॥११॥
यदि कदाचित् पहिनने के दिन नवीन वस्त्र कहीं जल जाय, अथवा फट
जाय, अथवा गोबर या कीचड़ लग जाय तो उस वस्त्र में नव भागों की
कल्पना करके चारों कोणों के भागों में देवताओं की, मध्य के तीन भागों में
राक्षसों की और दोनों छोरों के दोनों मध्य भागों में नरों की कल्पना करे।
यदि राक्षसभागों में दाहादि हो तो वस्त्र शुभ नहीं होता अर्थात् मरणकारक
होता है, और यदि देव-मनुष्यभागों में दाहादि हो तो शुभ होता है, भोग और

नक्षत्रप्रकरण ३१
पुत्र प्राप्तिकारक होता है । यदि राक्षस, देवता, मनुष्य, इन तीनों के भागों
में दाहादि हो तो वह वस्त्र शुभकारक नहीं होता । ऐसा ही विचार, शय्या,
आसन, खड़ाऊँ इत्यादि में भी करना चाहिए ॥ ११ ॥
वस्त्रनवधाचक्र
| देवता शुभ | राक्षस अशुभ | देवता शुभ |
| मनुष्य शुभ | राक्षस अशुभ | मनुष्य शुभ |
| देवता शुभ | राक्षस अशुभ | देवता शुभ |
निन्द्यकाल में भी वस्त्रधारण
विप्राज्ञया तथोद्वाहे राज्ञा प्रीत्यार्पितं च यत् ।
निन्द्येऽपि धिष्ण्ये वारादौ धार्यं वस्त्रं जगुर्बुधाः ॥ १२ ॥
अन्वयः—विप्राज्ञया, तथा उद्वाहे, राज्ञा प्रीत्यार्पित च यत् वस्त्र (तत्) धिष्ण्ये
वारादौ निन्द्येऽपि धार्यं (इति) बुधाः जगुः ॥ १२ ॥
ब्राह्मण की आज्ञा से, विवाह में और प्रीतिपूर्वक राजा के दिये हुए वस्त्र
को निंद्य भी नक्षत्र और वारादि में धारण करना चाहिए, यह पण्डित लोग
कहते हैं ॥ १२ ॥
राजदर्शन, मद्यारम्भ और गो-क्रय-विक्रय का मुहूर्त्त
राधामूलमृदुध्रुवर्क्षवरुणक्षिप्रैर्लतापादपा-
रोपोऽथो नृपदर्शनं ध्रुवमृदुक्षिप्रश्रवोवासवैः ।
तीक्ष्णोग्राम्बुपभेषु मद्यमुदितं क्षिप्रान्त्यवह्नीन्द्रभा-
दित्येन्द्राम्बुपवासवेषु हि गवां शस्तः क्रयो विक्रयः ॥ १३ ॥
अन्वयः—राधामूलमृदुध्रुवर्क्षवरुणक्षिप्रैः लतापादपारोपः, अथ ध्रुवमृदुक्षिप्रश्रवो-
वासवैः नृपदर्शनं, तीक्ष्णोग्राम्बुपभेषु मद्यं उदितम्, क्षिप्रान्त्यवह्नीन्दुभादित्येन्द्राम्बुपवासवेषु
गवां क्रयो विक्रयः शस्तो हि ॥ १३ ॥
विशाखा, मूल, मृदुसंज्ञक अर्थात् चित्रा, अनुराधा, मृगशिरा, रेवती,
ध्रुवसंज्ञक अर्थात् तीनों उत्तरा, रोहिणी, शतभिषा और क्षिप्रसंज्ञक अर्थात्
अश्विनी, पुष्य, हस्त इन चौदह नक्षत्रों में लता और वृक्ष लगाना चाहिए ।
ध्रुवसंज्ञक, मृदुसंज्ञक, क्षिप्रसंज्ञक, श्रवण, धनिष्ठा इन तेरह नक्षत्रों में राजा का

३२ मुहूर्त्तचिन्तामणि
दर्शन करना चाहिए। मूल, ज्येष्ठा, आर्द्रा, आश्लेषा, तीनों पूर्वा, मघा, भरणी,
शतभिषा, इन नक्षत्रों में मद्यारम्भ शुभ कहा गया है। अश्विनी, पुष्य, हस्त,
रेवती, विशाखा, पुनर्वसु, ज्येष्ठा, शतभिषा, धनिष्ठा इन नक्षत्रों में गो-बैल
आदि का मोल लेना और बेचना शुभ है ॥ १३ ॥
पशुओं के पालने का मुहूर्त्त
लग्ने शुभे चाष्टमशुद्धिसंयुते रक्षा पशूनां निजयोनिभे चरे ।
रिक्ताष्टमीदर्शकुजश्ववोध्रुवत्वाष्ट्रेषु यानं स्थितिवेशनं न सत् ॥ १४ ॥
अन्वयः—अष्टमशुद्धिसंयुते शुभे लग्ने, च (तथा) निजयोनिभे, चरे, पशूनां रक्षा
सत्। रिक्ताष्टमीदर्शकुजश्ववोध्रुवत्वाष्ट्रेषु पशूनां यानं, स्थितिवेशनं न सत् ॥ १४ ॥
शुभ लग्न हो, लग्न से आठवें स्थान में कोई ग्रह न हो और अपनी योनि
का नक्षत्र हो (योनि नक्षत्र विवाह प्रकरण श्लो० २५ में कहे गये हैं) तब
पशुओं को पालना चाहिए अथवा चर अर्थात् स्वाती, पुनर्वसु, श्रवण, धनिष्ठा,
शतभिष, इन नक्षत्रों में पशुओं को पालना चाहिए। चौथि, नवमी, चतुर्दशी,
अष्टमी, अमावस, मंगल दिन, श्रवण, तीनों उत्तरा, रोहिणी और चित्रा नक्षत्र
में पशुओं को घर से बाहर ले जाना, गोष्ठ में बाँधना और बाहर से घर में
लाना शुभ नहीं है ॥ १४ ॥
औषध और सूचीकर्म का मुहूर्त्त
भैषज्यं सल्लघुमृदुचरे मूलभे द्व्यङ्ग्लग्ने
शुक्रेन्दिज्ये विदि च दिवसे चापि तेषां रवेश्च ।
शुद्धे रिष्फद्युनमृतिगृहे सत्तिथौ नो जने
र्भेसूचीकर्माप्यदितिवसुभत्वाष्ट्रमित्राश्विधिष्ण्ये ॥ १५ ॥
अन्वयः—लघुमृदुचरे मूलभे शुक्रेन्दिज्ये विदि च द्व्यङ्गलग्ने, तेषां रवेश्चापि दिवसे,
रिष्फद्युनमृतिगृहे शुद्धे, सत्तिथौ, भैषज्यं सत्, जनेर्भे नो । अदितिवसुभत्वाष्ट्रमित्राश्वि-
धिष्ण्ये सूचीकर्मापि सत् ॥ १५ ॥
अश्विनी, पुष्य, हस्त, चित्रा, मृगशिरा, अनुराधा, रेवती, श्रवण, धनिष्ठा,
शतभिष, स्वाती, पुनर्वसु, मूल इन नक्षत्रों में; द्विस्वभाव लग्न में; शुक्र,
चन्द्रमा, बृहस्पति और बुध लग्न में हों; शुक्र, चन्द्रमा, बृहस्पति, बुध, वा
रविवार हो, लग्न से बारहवें, सातवें, आठवें स्थान में कोई ग्रह न हो; रिक्ता
और अमावस को छोड़ अन्य शुभ तिथियाँ हों तो औषध का सेवन करना शुभ

नक्षत्रप्रकरण ३३
है । परन्तु जन्मनक्षत्र न हो । पुनर्वसु, धनिष्ठा, चित्रा, अनुराधा, अश्विनी इन
नक्षत्रों में सिलाई के काम शुभ हैं ॥ १५ ॥
क्रय-विक्रय मुहूर्तों का परस्पर निषेध और क्रयमुहूर्त्त
क्रयर्क्षे विक्रयो नेष्टो विक्रयर्क्षे क्रयोऽपि न ।
पौष्णाम्बुपाश्विनीवातश्रवश्चित्राः क्रये शुभाः ॥ १६ ॥
अन्वयः—क्रयर्क्षे विक्रयो नेष्टः, विक्रयर्क्षे क्रयः अपि न, पौष्णाम्बुपाश्विनीजात-
श्रवश्चित्राः क्रये शुभाः ॥ १६ ॥
मोल लेने के मुहूर्त्त में बेचना शुभ नहीं है और बेचने के मुहूर्त्त में मोल
लेना शुभ नहीं है । यद्यपि मोल लेनेवाला बेचनेवाले के मुहूर्त्त में मोल नहीं
लेगा तो बेचनेवाला किस के हाथ बेचेगा, और बेचनेवाला मोल लेनेवाले के
मुहूर्त्त में बेचेगा नहीं तो मोल लेनेवाला क्या मोल लेगा । इस रीति से दोनों
कार्य नहीं हो सकते तथापि आवश्यकता के कारण किसी एक के मुहूर्त्त का
विचार न करने से दूसरे का कार्य हो सकता है, यही इसका तात्पर्य है ।
रेवती, शतभिष, अश्विनी, स्वाती, श्रवण, चित्रा ये नक्षत्र मोल लेने में शुभ
होते हैं ॥ १६ ॥
विक्रय और विपणि का मुहूर्त्त
पूर्वाद्वीशकृशानुसार्पयमभे केन्द्रद्विकोणे शुभैः
षट्त्र्यायेष्वशुभैर्विना घटतनुं सन्विक्रयः सत्तिथौ ।
रिक्ताभौमघटान्विना च विपणिर्मित्रध्रुवक्षिप्रभै-
र्लग्ने चन्द्रसिते व्ययाष्टरहितैः पापैः शुभैर्द्वचायखे ॥ १७ ॥
अन्वयः—पूर्वाद्वीशकृशानुसार्पयमभे शुभैः केन्द्रत्रिकोणे, अशुभैः षट्त्र्यायेषु
(स्थितैः) घटतनुं विना, सत्त्थिौ विक्रयः सत्, रिक्ताभौमघटान् विना, च मित्रध्रुव-
क्षिप्रभैः चन्द्रसिते लग्ने, पापैः व्ययाष्टरहितैः, शुभैः द्वचायखे, विपणिः सत् ॥ १७ ॥
तीनों पूर्वा, विशाखा, कृत्तिका, आश्लेषा और भरणी नक्षत्र में लग्न से
पहिले, चौथे, सातवें, दशवें, दूसरे, पाँचवें और नवें स्थान में शुभग्रह हों, छठें,
तीसरे, गेरहवें स्थान में अशुभ ग्रह हों ऐसे लग्न में, कुंभ को छोड़ अन्य लग्नों
में और शुभ तिथियों में किसी वस्तु का बेचना शुभ होता है । चित्रा,
अनुराधा, मृगशिरा, रेवती, रोहिणी, तीनों उत्तरा, अश्विनी, पुष्य, हस्त, इन
नक्षत्रों में, चौथि, नवमी, चतुर्दशी, मङ्गल दिन, कुम्भ लग्न को छोड़ अन्य

३४ मुहूर्तचिन्तामणि
तिथि, दिन और लग्नों में, चन्द्रमा और शुक्र के लग्न में रहते, बारहवें आठवें
स्थान में पापग्रहों के न रहते, दूसरे, गेरहवें, दशवें स्थान में शुभग्रहों के रहते
बाजार का कार्य (बेचना, मोल लेना इत्यादि) शुभ है ॥ १७ ॥
घोड़ा और हाथी के कृत्य का मुहूर्त्त
क्षिप्रान्त्यवस्विन्दुमरुज्जलेशादित्येष्वरिक्तारदिने प्रशस्तम् ।
स्याद्वाजिकृत्यं त्वथ हस्तिकृत्यं कुर्यान्मृदुक्षिप्रचरेषुविद्वान् ॥ १८ ॥
अन्वयः-क्षिप्रान्त्यवस्विन्दुमरुज्जलेशादित्येषु, अरिक्तारदिने, वाजिकृत्यं प्रशस्तं
स्यात् । अथ मृदुक्षिप्रचरेषु, विद्वान् हस्तिकार्यं कुर्यात् ॥ १८ ॥
अश्विनी, पुष्य, हस्त, रेवती, धनिष्ठा, मृगशिरा, स्वाती, शतभिष,
पुनर्वसु, इन नक्षत्रों में; चौथि, नवमी, चतुर्दशी को छोड़ अन्य तिथियों में;
मङ्गल को छोड़ अन्य दिनों में घोड़ों का कृत्य अर्थात् बेंचना, मोल लेना,
चढ़ना इत्यादि शुभ है । चित्रा, अनुराधा, मृगशिरा, रेवती, अश्विनी, पुष्य,
हस्त, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिष, पुनर्वसु, स्वाती, इन नक्षत्रों में हाथियों का
कार्य अर्थात् बेंचना, मोल लेना, चढ़ना इत्यादि शुभ है ॥ १८ ॥
भूषाघटनादि का मुहूर्त्त
स्याद्भूषाघटनं त्रिपुष्करचरक्षिप्रध्रुवे रत्नयुक्
तत्तीक्ष्णोग्रविहीनभे रविकुजे मेषालिसिंहे तनौ ।
तन्मुक्तासहितं चरध्रुवमृदुक्षिप्ने शुभे सत्तनौ
तीक्ष्णोग्राश्विमृगे द्विदैवदहने शस्त्रं शुभं घट्टितम् ॥ १९ ॥
अन्वयः-त्रिपुष्करचरक्षिप्रध्रुवे, भूषाघटन सत् स्यात् । तीक्ष्णोग्रविहीनभे, रविकुजे
(वारे) मेषालिसिंहे तनौ रत्नयुक् तत् (भूषाघटनं) सत् । चरध्रुवमृदुक्षिप्ने शुभे सत्तनौ,
मुक्तासहितं तत् (भूषाघटनं) शुभम् । तीक्ष्णोग्राश्विमृगे द्विदैवदहने शस्त्रं घट्टितं
शुभम् ॥ १६ ॥
त्रिपुष्कर योग (इसी प्रकरण में श्लोक ४९ देखो) में और श्रवण,
धनिष्ठा, शतभिष, पुनर्वसु, स्वाती, पुष्य, अश्विनी, हस्त, रोहिणी, तीनों
उत्तरा इन नक्षत्रों में आभूषण बनवाना अथवा धारण करना चाहिए । यदि
आभूषण रत्नों से युक्त हो तो मूल, ज्येष्ठा, आर्द्रा, आश्लेषा, तीनों पूर्वा,
भरणी, मघा को छोड़कर अन्य नक्षत्रों में; रविवार और मङ्गलवार में; मेष,
वृश्चिक, सिंह लग्न में बनवाना और धारण करना चाहिए । चरसंज्ञक,

नक्षत्रप्रकरण ३५
ध्रुवसंज्ञक, मृदुसंज्ञक, क्षिप्रसंज्ञक नक्षत्रों में; सोमवार और शुक्रवार में; कर्क,
वृष, तुला लग्न में, मोतीयुक्त और चाँदी के आभूषण बनवाना और धारण
करना चाहिए । मूल, ज्येष्ठा, आर्द्रा, आश्लेषा, तीनों पूर्वा, भरणी, मघा,
अश्विनी, मृगशिरा, विशाखा, कृत्तिका इन नक्षत्रों में हथियार धारण करना
और बनवाना शुभ होता है ॥१९॥
मुद्रापातन और वस्त्रक्षालन मुहूर्त्त
मुद्राणां पातनं सद्‍ध्रुवमृदुचरभक्षिप्रभैर्वीन्दुसौरे
घस्रे पूर्णाजयाख्ये न च गुरुभृगुजास्ते विलग्ने शुभैः स्यात् ।
वस्त्राणां क्षालनं सद्वसुहयदिनकृत्पञ्चकादित्यपुष्ये
नो रिक्तापर्वषष्ठीपितृदिनरविजज्ञेषु कार्यं कदापि ॥२०॥
अन्वयः—ध्रुवमृदुचरभक्षिप्रभैः, वीन्दुसौरे घस्रे, पूर्णाजयाख्ये (तिथ्ये), गुरुभृगुजास्ते
न शुभैः विलग्ने मुद्राणां पातनं सत् । वसुहयदिनकृत्पञ्चकादित्यपुष्ये, वस्त्राणां क्षालनम्
सत् स्यात् । रिक्तापर्वषष्ठीपितृदिनरविजज्ञेषु, वस्त्राणां क्षालनं कदापि नो
कार्यम् ॥२०॥
ध्रुवसंज्ञक, मृदुसंज्ञक, चरसंज्ञक, क्षिप्रसंज्ञक नक्षत्रों में; सोमवार और
शनैश्चर को छोड़ अन्य दिनों में; पञ्चमी, दशमी, पूर्णमासी, तीज, अष्टमी,
त्रयोदशी इन तिथियों में, बृहस्पति और शुक्र के अस्तकाल को छोड़कर, लग्न
में शुभ ग्रहों के रहते मुद्रापातन अर्थात् राजचिह्नयुक्त मुद्रा ढलवाना और
खजाने में जमा करना शुभ है और धनिष्ठा, अश्विनी, हस्त, चित्रा, स्वाती,
विशाखा, अनुराधा, पुनर्वसु और पुष्य नक्षत्र में; चौथ, नवमी, चतुर्दशी, पर्व
अर्थात् कृष्णपक्ष की अष्टमी, चतुर्दशी, अमावस्या, पूर्णिमा, सूर्य की संक्रान्ति
का दिन, छठि, पितृश्राद्ध का दिन, शनैश्चर और बुधवार को छोड़ अन्य
तिथियों और दिनों में पहिले पहल कपड़ा धोने के लिए धोबी को देना
शुभ है ॥२०॥
तलवार आदि के धारण और शय्या आदि के उपभोग का मुहूर्त्त
संधार्याः कुन्तवर्मेष्वसनशरकृपाणासिपुत्र्यो विरिक्ते
शुक्रेज्यार्केऽह्नि मैत्रध्रुवलघुसहितादित्यशाक्रद्विदैवे ।
स्युलंग्ने हि स्थिराख्ये शशिनि च शुभदृष्टे शुभैः केन्द्रगैः
स्याद्भोगः शय्यासनादेर्ध्रुवमृदुलघुहर्य्यन्तकादित्य इष्टः ॥२१॥

३६ मुहूर्तचिन्तामणि
अन्वयः—विरिक्ते (तिथौ) शुक्रेज्यार्केह्नि, मैत्रध्रुवलघुसहितादित्यशाक्रद्विदैवे,
स्थिराख्ये लग्नेऽपि, शशिनि शुभदृष्टे, शुभैः केन्द्रगैः, कुन्तवर्मेष्वसनशरकृपाणासिपुत्र्यः
सन्धार्याः स्युः। ध्रुवमृदुलघुहर्यन्तकादित्ये शय्यासनादेः भोगः इष्टः स्यात् ॥ २१ ॥
रिक्ता तिथियों को छोड़ अन्य तिथियों में, शुक्र, बृहस्पति और रविवार
में, मैत्रसंज्ञक, ध्रुवसंज्ञक, लघुसंज्ञकसहित पुनर्वसु, ज्येष्ठा और विशाखा
नक्षत्र में; स्थिर अर्थात् वृष, सिंह, वृश्चिक अथवा कुम्भ लग्न में चन्द्रमा के
रहते और शुभ ग्रहों से देखते तथा केन्द्र में शुभ ग्रहों के रहते बरछी, कवच,
धनुष-बाण, तलवार, छुरी आदि धारण करना चाहिए। ध्रुवसंज्ञक, मृदु-
संज्ञक, लघुसंज्ञक, श्रवण, भरणी और पुनर्वसु में शय्या और आसन आदि
का उपभोग हितकारक होता है ॥ २१ ॥
नक्षत्रों की अन्धाक्षादि संज्ञा
अन्धाक्षं वसुपुष्यधातृजलभद्धीशार्यमान्त्याभिधं
मन्दाक्षं रविविश्वमैत्रजलपाश्लेषाश्विचन्द्रं भवेत् ।
मध्याक्षं शिवपित्रजैकचरणत्वाष्ट्रेन्द्रविध्यन्तकं
स्वक्षं स्वात्यदितिश्रवोदहन बाहिर्बुध्न्यरक्षोभगम् ॥ २२ ॥
अन्वयः—वसुपुष्यधातृजलभद्धीशार्यमान्त्याभिधं अन्धाक्षं भवेत्, रविविश्वमित्रजल-
पाश्लेषाश्विचन्द्रं मन्दाक्षं भवेत्, शिवपित्रजैकचरणत्वाष्ट्रेन्द्र विध्यन्तकं मध्याक्षं भवेत्,
स्वात्यदितिश्रवोदहनबाहिर्बुध्न्यरक्षोभगम् स्वक्षं भवेत् ॥ २२ ॥
धनिष्ठा, पुष्य, रोहिणी, पूर्वाषाढ़, विशाखा, उत्तराफाल्गुनी, रेवती इन
नक्षत्रों की अन्धाक्ष संज्ञा है; हस्त, उत्तराषाढ़, अनुराधा, शतभिष, आश्लेषा,
अश्विनी, मृगशिरा इन नक्षत्रों की मन्दाक्ष संज्ञा है, आर्द्रा, मघा, पूर्वाभाद्र-
पद, चित्रा, ज्येष्ठा, अभिजित्, भरणी, इन नक्षत्रों की मध्याक्ष संज्ञा है
और स्वाती, पुनर्वसु, श्रवण, कृत्तिका, उत्तराभाद्रपद, मूल, पूर्वाफाल्गुनी,
इनकी स्वक्ष अर्थात् सुलोचन संज्ञा है ॥ २२ ॥
अन्धाक्षादि चक्र
| धनिष्ठा | पुष्य | रोहिणी | पू०षा० | विशाखा | उ०फा० | रेवती | अन्धाक्ष |
| हस्त | उ०षा० | अनुराधा | शतभिष | आश्ले० | अश्विनी | मृगशिरा | मन्दाक्ष |
| आर्द्रा | म० | पू०भा० | चित्रा | ज्येष्ठा | अभि० | भरणी | मध्याक्ष |
| स्वाती | पुनर्वसु | श्रवण | कृत्तिका | उ०भा० | मूल | पू०फा० | स्वक्ष |

नक्षत्रप्रकरण ३७
अन्धाक्षादि नक्षत्रों का फल
विनष्टार्थस्य लाभोऽन्धे शीघ्रं मन्दे प्रयत्नतः ।
स्याद्दूरे श्रवणं मध्ये श्रुत्याप्ती न सुलोचने ॥ २३ ॥
अन्वयः—अन्धे विनष्टार्थस्य शीघ्रं लाभः, मन्दे प्रयत्नः, मध्ये दूरे श्रवणं स्यात्,
सुलोचने श्रुत्याप्ती न ॥ २३ ॥
यदि अन्धाक्षसंज्ञक नक्षत्रों में कोई वस्तु चोरी जाय तो शीघ्र मिले,
मन्दाक्षसंज्ञक नक्षत्रों में बड़े उपाय से मिले, मध्याक्षसंज्ञक नक्षत्रों में
दूर में सुन पड़े मिले नहीं, और सुलोचन संज्ञक में तो कुछ भी पता
न लगे ॥ २३ ॥
धन के व्यवहार में निषिद्ध नक्षत्रादि
तीक्ष्णमिश्रध्रुवोग्रैर्यद्द्रव्यं दत्तं निवेशितम् ।
प्रयुक्तं च विनष्टं च विष्टयां पाते च नाप्यते ॥ २४ ॥
अन्वयः—तीक्ष्णमिश्रध्रुवोग्रैः, विष्टयां, पाते व यद्द्रव्यम् दत्तं, निवेशितम्, प्रयुक्तं
विनष्टं च (तत्) न आप्यते ॥ २४ ॥
तीक्ष्णसंज्ञक, मिश्रसंज्ञक, ध्रुवसंज्ञक और उग्रसंज्ञक नक्षत्रों में और
भद्रा वा व्यतीपात में जो द्रव्य किसी को दी जाय, अथवा धरोहर धरी जाय,
अथवा ऋण दिया जाय, अथवा कहीं गिर पड़े या चोरी जाय वह फिर
किसी तरह न मिले ॥ २४ ॥
जलाशय और नृत्यारम्भ का मुहूर्त्त
मित्रार्कध्रुववासवाम्बुपमघातोयान्त्यपुष्येन्दुभिः
पापैर्हीनबलैस्तनौ सुरगुरौ ज्ञे वा भृगौ खे विधौ ।
आप्ये सर्वजलाशयस्य खननं व्यम्भोमघैः सेन्द्रभै-
स्तैर्नृत्यं हिबुके शुभैस्तनुगृहे ज्ञेऽब्जे झराशौ शुभम् ॥ २५ ॥
अन्वयः—मित्रार्कध्रुववासवाम्बुपमघातोयान्त्यपुष्येन्दुभिः, पापैः हीनबलैः, तनौ सुर-
गुरौ ज्ञे वा, खे भृगौ, आप्ये विधौ, सर्वजलाशयस्य खननं शुभम् । व्यम्भोमघैः सेन्द्रभैः
तैः (पूर्वोक्तनक्षत्रैः), हिबुके शुभैः, तनुगृहे ज्ञे, झराशौ अब्जे नृत्य शुभम् ॥ २५ ॥
अनुराधा, हस्त, तीनों उत्तरा, रोहिणी, धनिष्ठा, शतभिष, मघा,
पूर्वाषाढ़, रेवती, पुष्य और मृगशिरा इन नक्षत्रों में, पापग्रहों के निर्बल
रहते, लग्न में बृहस्पति वा बुध के रहते, लग्न से दशवें स्थान में शुक्र के

३८ मुहूर्तचिन्तामणि
रहते, जल-राशियों में चन्द्रमा के रहते वापी, कूप, तड़ाग आदि जलाशयों
का खनना शुभ है। पूर्वोक्त नक्षत्रों में पूर्वाषाढ़ और मघा को छोड़कर,
ज्येष्ठा को मिलाकर अर्थात् अनुराधा, हस्त, तीनों उत्तरा, रोहिणी, धनिष्ठा,
शतभिष, रेवती, पुष्य, मृगशिरा और ज्येष्ठा इन नक्षत्रों में, लग्न से चौथे
स्थान में शुभग्रहों के रहते, शुभग्रहों से दृष्ट लग्न में बुध के रहते और मिथुन
या कन्याराशि में चन्द्रमा के रहते नाचने का आरम्भ करना शुभदायक
होता है ॥ २५ ॥
स्वामी की सेवा करने का मुहूर्त
क्षिप्रे मैत्रे वित्सितार्केज्यवारे सौम्ये लग्नेऽर्के कुजे वा खलाभे ।
योनेर्मैत्र्यां राशिपोश्चापि मैत्र्यां सेवा कार्या स्वामिनः सेवकेन ॥ २६ ॥
अन्वयः—क्षिप्रे, मैत्रे, वित्सितार्केज्यवारे, सौम्ये लग्ने, अर्के खलाभे, वा कुजे
खलाभे, योनेमैत्र्यां च, राशिपोः अपि मैत्र्यां, (तदा) सेवकेन स्वामिनः सेवा
कार्या ॥ २६ ॥
अश्विनी, पुष्य, हस्त, चित्रा, अनुराधा, मृगशिरा और रेवती, इन
नक्षत्रों में; बुध, शुक्र, रविवार, बृहस्पति इन वारों में; लग्न में शुभग्रहों
के रहते; दशवें और गेरहवें स्थान में सूर्य वा मंगल के रहते सेवक को
स्वामी की सेवा करने का प्रारम्भ करना शुभदायक होता है। परन्तु वहाँ
इतना और विचारना चाहिए कि स्वामी और सेवक के जन्मनक्षत्र की
योनियों में परस्पर मित्रता और दोनों के जन्मराशीशों की परस्पर
मित्रता हो ॥ २६ ॥
द्रव्यप्रयोग और ऋणग्रहण का मुहूर्त
स्वात्यादित्यमृदुद्विदैवगुरुभे कर्णत्रयाश्वे चरे
लग्ने धर्मसुताष्टशुद्धिसहिते द्रव्यप्रयोगः शुभः ।
नारे ग्राह्यमृणं तु संक्रमदिने वृद्धौ करेऽर्केऽह्नि यत्
तद्वंशेषु भवेदृणं न च बुधे देयं कदाचिद्धनम् ॥ २७ ॥
अन्वयः—स्वात्यादित्यमृदुद्विदैवगुरुभे, कर्णत्रयाश्वे, धर्मसुताष्टशुद्धिसहिते, चरे लग्ने,
द्रव्यप्रयोगः शुभः । आरे तु संक्रमदिने वृद्धौ, करेऽर्केऽह्नि, ऋणं न ग्राह्यं, यत् (यस्मात्)
तद्वंशेषु ऋणं भवेत् । बुधे कदाचिद्धनं न देयम् ॥ २७ ॥
स्वाती, पुनर्वसु, चित्रा, अनुराधा, मृगशिरा, रेवती, विशाखा, पुंष्य,
श्रवण, धनिष्ठा, शतभिष, और अश्विनी, इन नक्षत्रों में; चर लग्न में;

नक्षत्रप्रकरण ३९
नवें और पाँचवें स्थान में शुभग्रहों के रहते और आठवें स्थान में किसी ग्रह
के न रहते द्रव्य का प्रयोग अर्थात् ऋण आदि देना वा रोजगार में लगाना
शुभ होता है । मङ्गल के दिन, संक्रान्ति के दिन, जिस दिन वृद्धि योग हो
उस दिन, हस्त नक्षत्र में और रविवार को ऋण नहीं लेना चाहिए; क्योंकि
इन दिनों में लिया हुआ ऋण लेनेवाले के वंशभर में होता है; पुत्र-पौत्रादिकों
में से किसी का दिया नहीं चुकता । बुधवार को कोई किसी को भी अपना
धन किसी तरह से भी न दे ॥ २७ ॥
हल चलाने का मुहूर्त्त
मूलद्वीशमघाचरध्रुवमृदुक्षिप्रैर्विनाकं शनिं
पापैर्हीनबलैर्विधौ जलगृहे शुक्रे विधौ मांसले ।
लग्ने देवगुरौ हलप्रवहणं शस्तं न सिंहे घटे
कर्काजैणघटे तनौ क्षयकरं रिक्तासु षष्ठ्यां तथा ॥ २८ ॥
अन्वयः—मूलद्वीशमघाचरध्रुवमृदुक्षिप्रैः, अर्कं, शनि विना, पापैः हीनबलैः, विधौ
जललवे, शुक्रे विधौ मांसले, देवगुरौ लग्ने हलप्रवहणं शस्तम् । सिंहे घटे, कर्काजैणघटे
तनौ तथा रिक्तासु षष्ट्यां क्षयकरम् ॥ २८ ॥
मूल, विशाखा, मघा, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिष, पुनर्वसु, स्वाती, तीनों
उत्तरा, रोहिणी, चित्रा, अनुराधा, मृगशिरा, रेवती, अश्विनी, पुष्य और
हस्त इन नक्षत्रों में; शनिवार और रविवार छोड़ अन्य दिनों में; पापग्रहों
के निर्बल रहते; और जलराशि में चन्द्रमा के रहते; शुक्र के उदय रहते;
लग्न में पूर्ण चन्द्रमा वा बृहस्पति के रहते पहिले पहिल हल चलाना
शुभदायक होता है । यदि सिंह, कुम्भ, कर्क, मेष, मकर और तुला लग्न;
चौथि, नवमी, चतुर्दशी, छठि और अष्टमी तिथि हो तो क्षयकारक
होता है ॥ २८ ॥
बीजोप्तिमुहूर्त्त
एतेषु श्रुतिवारुणादितिविशाखोडूनि भौमं विना
बीजोप्तिर्गदिता शुभा त्वशुभतोऽष्टाग्नीन्दुरामेन्दवः ।
रामेन्द्रग्नियुगान्यसच्छुभकराण्युप्तौ हलेऽर्कोज्झिता-
रुद्रामाष्टनवाष्टभानि मुनिभिः प्रोक्तान्यसत्सन्ति च ॥ २९ ॥
अन्वयः—श्रुतिवारुणादितिविशाखोडूनि विना एतेषु [पूर्वोक्तनक्षत्रेषु], भौमं विना,
बीजोप्तिः शुभा गदिता । तु [पुनः] अशुभतः अष्टाग्नीन्दुरामेन्दवः रामेन्द्रग्नियुगानि

४० मुहूर्त्तचिन्तामणि
[भानि] असत्, शुभकराणि, उप्तौ प्रोक्तानि । हले अर्कोज्झिताङ्घ्रात् रामाष्टनवाष्टभानि,
असत्सन्ति, मुनिभिः प्रोक्तानि ॥ २६ ॥
श्रवण, शतभिष, पुनर्वसु और विशाखा नक्षत्र तथा मंगल दिन को
छोड़ पूर्वोक्त हलप्रवाह-मुहूर्त्त में बीज बोना शुभदायक है। जिस नक्षत्र में
राहु स्थित हो उस नक्षत्र से आठ नक्षत्र बीज बोने में अशुभ, फिर तीन
शुभ, फिर एक अशुभ, फिर तीन शुभ, फिर एक अशुभ, फिर तीन
शुभ, फिर एक अशुभ, फिर तीन शुभ, और उसके बाद चार अशुभ होते
हैं ॥ २९ ॥
राहुभात् फणिचक्र

८३१३१३१३४
अशुभशुभअशुभशुभअशुभशुभअशुभशुभअशुभ
पहिले-पहिल हल चलाने के लिए सूर्यभुक्त अर्थात् जिस नक्षत्र में सूर्य
वर्त्तमान हो उस नक्षत्र के पूर्व नक्षत्र से लेकर तीन नक्षत्र पर्यन्त अशुभ,
चौथे से लेकर गेरहवें तक शुभ, बारहवें से लेकर बीसवें तक अशुभ और
इक्कीसवें से लेकर अट्ठाइसवें तक शुभ मुनियों ने कहा है ॥ २९ ॥
सूर्यभुक्तभात् हलचक्र
३८९८
:---::---::---::---:
अशुभशुभअशुभशुभ
शिरामोक्ष व विरेकादि व धर्मक्रिया के मुहूर्त्त
त्वाष्ट्रान्मित्रकभाद्द्वयेऽम्बुपलघुश्रोत्रे शिरामोक्षणं
भौमार्कैज्यदिने विरेकवमनाद्यं स्याद्बुधार्कौ विना ।
मित्रक्षिप्रचरध्रुवे रविशुभाहे लग्नवर्गे विदो
जीवस्यापि तनौ गुरौ निगदिता धर्मक्रिया तद्बले ॥ ३० ॥
अन्वयः—त्वाष्ट्रान्मित्रकभाद्द्वयेऽम्बुपलघुश्रोत्रे, भौमार्कैज्यदिने शिरामोक्षणम्
(कार्यम्) । बुधार्कौ विना [पूर्वोक्तनक्षत्रेषु] विरेकवमनाद्यं (शुभं) स्यात् । मित्र-
क्षिप्रचरध्रुवे, रविशुभाहे, विदः जीवस्य अपि लग्नवर्गे, गुरौ तनौ, तद्बले [गुरुबले]
धर्मक्रिया (शुभा) निगदिता ॥ ३० ॥

नक्षत्रप्रकरण ४१
चित्रा, स्वाती, अनुराधा, ज्येष्ठा, रोहिणी, मृगशिरा, शतभिष, अश्विनी,
पुष्य, हस्त, अभिजित् और श्रवण नक्षत्र में; मंगल, रविवार, बृहस्पति
दिन में शिरामोक्षण अर्थात् फस्त खोलवाना शुभ होता है। बुध और
शनैश्चर को छोड़ अन्य दिनों में और इन्हीं पूर्वोक्त नक्षत्रों में विरेक-वमन
आदि शुभकारक होता है। अनुराधा, अश्विनी, पुष्य, हस्त, श्रवण, धनिष्ठा,
शतभिष, पुनर्वसु, स्वाती, तीनों उत्तरा और रोहिणी नक्षत्र में; रविवार,
सोमवार, बुध, बृहस्पति, शुक्र दिन में; बुध और बृहस्पति के लग्न वा षड्वर्ग
में; लग्न में बृहस्पति के रहते और कर्त्ता का बृहस्पति बली होने पर धर्म-
क्रिया का आरम्भ करना शुभ होता है ॥ ३० ॥
धान्यच्छेदनमुहूर्त्त
तीक्ष्णाजपादकरवह्निवसुश्रुतीन्दु-
स्वातीमघोत्तरजलान्तकतक्षपुष्ये ।
मन्दाररिक्तरहिते दिवसेऽतिशस्ता
धान्यच्छिदा निगदिता स्थिरभे विलग्ने ॥ ३१ ॥
अन्वयः- तीक्ष्णाजपादकरवह्निवसुश्रुतीन्दुस्वातीमघोत्तरजलान्तकतक्षपुष्ये, मन्दार-
रिक्तरहिते दिवसे, स्थिरभे विलग्ने धान्यच्छिदा अतिशस्ता निगदिता ॥ ३१ ॥
मूल, ज्येष्ठा, आर्द्रा, आश्लेषा, पूर्वाभाद्रपद, हस्त, कृत्तिका, धनिष्ठा,
श्रवण, मृगशिरा, स्वाती, मघा, तीनों उत्तरा, पूर्वाषाढ़, भरणी, चित्रा
और पुष्य नक्षत्र में; शनैश्चर, मंगल दिन और रिक्ता तिथि को छोड़
अन्य दिन और तिथि में और स्थिर लग्न में अनाज का काटना शुभ
होता है ॥ ३१ ॥
कणमर्दन और सस्यरोपण का मुहूर्त्त
भाग्यार्यमश्रुतिमघेन्द्रविधातृमूल-
मैत्रान्त्यभेषु कथितं कणमर्दनं सत् ।
द्वीशाजपान्त्रिऋतिधातृशतार्यमर्क्षे
सस्यस्य रोपणमिहार्किकुजौ विना सत् ॥ ३२ ॥
अन्वयः-भाग्यार्यमश्रुतिमघेन्द्रविधातृमूलमैत्रान्त्यभेषु, कणमर्दनं सत् कथितम् ।
द्वीशाजपान्त्रिऋतिधातृशतार्यमर्क्षे, आर्किकुजौ विना सस्यस्य रोपणं सत् ॥ ३२ ॥
पूर्वाफाल्गुनी, उत्तराफाल्गुनी, श्रवण, मघा, ज्येष्ठा, रोहिणी, मूल,
अनुराधा और रेवती नक्षत्र में कणमर्दन अर्थात् खरिहान में अनाज का

४२ मुहूर्त्तचिन्तामणि
पीटना अथवा माड़ना शुभ है। विशाखा, पूर्वाभाद्रपद, मूल, रोहिणी,
शतभिष और पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र में; शनैश्चर और मंगल को छोड़ अन्य
दिनों में; खेतों में धान का लगाना शुभ है ॥ ३२ ॥
धान्यस्थिति और धान्यवृद्धि का मुहूर्त्त
मिश्रोग्ररौद्रभुजगेन्द्रविभिन्नभेषु
कर्कजतौलिरहिते च तनौ शुभाहे ।
धान्यस्थितिः शुभकरी गदिता ध्रुवेज्य-
द्वीशेन्द्रदस्रचरभेषु च धान्यवृद्धिः ॥ ३३ ॥
अन्वयः-मिश्रोग्ररौद्रभुजगेन्द्रविभिन्नभेषु च (तथा) कर्कजतौलिरहिते तनौ,
शुभाहे धान्यस्थितिः शुभकरी गदिता। च [पुनः] ध्रुवेज्यद्वीशेन्द्रदस्रचरभेषु धान्यवृद्धिः
शुभकरी गदिता ॥ ३३ ॥
विशाखा, कृत्तिका, तीनों पूर्वा, भरणी, मघा, आर्द्रा, आश्लेषा और
ज्येष्ठा को छोड़ अन्य नक्षत्रों में; कर्क, मेष और तुला को छोड़ अन्य लग्नों
में; सोम, बुध, शुक्र और बृहस्पति के दिन में धान्यस्थिति अर्थात् अन्न का
रखना शुभ होता है। तीनों उत्तरा, रोहिणी, पुष्य, विशाखा, ज्येष्ठा,
अश्विनी, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिष, पुनर्वसु और स्वाती नक्षत्र में धान्यवृद्धि
अर्थात् डेढ़ी और सवाई पर अनाज देना शुभ है ॥ ३३ ॥
शान्तिक और पौष्टिक मुहूर्त्त
क्षिप्रध्रुवान्त्यचरमैत्रमघासु शस्तं
स्याच्छान्तिकं च सह मङ्गलपौष्टिकाभ्याम् ।
खेऽर्के विधौ सुखगते तनुगे गुरौ नो
मौढ्यादिदुष्टसमये शुभदं निमित्ते ॥ ३४ ॥
अन्वयः-क्षिप्रध्रुवान्त्यचरमैत्रमघासु अर्के खे, विधौ सुखगते, गुरौ तनुगे मङ्गल-
पौष्टिकाभ्याम् सह शान्तिकं शस्तं स्यात् । मौढ्यादिदुष्टसमये नो शुभदं (तथा)
निमित्ते [केत्वाद्युत्पातदर्शने सति] शुभदं (स्यात्) ॥ ३४ ॥
अश्विनी, पुष्य, हस्त, तीनों उत्तरा, रोहिणी, रेवती, श्रवण, धनिष्ठा
शतभिष, पुनर्वसु, स्वाती, अनुराधा और मघा नक्षत्र में; रिक्ता, अष्टमी,
पूर्णमासी, अमावस, सूर्य-संक्रान्ति, रविवार, मङ्गल, शनैश्चर को छोड़ अन्य
तिथियों और दिवसों में; लग्न से दशवें स्थान में सूर्य, चौथे स्थान में

गणेशादि की पूजा,
Wait, is it "गणेशादि"?
"मङ्गल अर्थात् गणेशादि की पूजा," -> Yes.

पौष्टिक अर्थात् पुष्टिकामना से कोई पुरश्चरणादि और मूलशान्ति आदि
करना शुभ है । बृहस्पति, शुक्रास्तादि और केतूदयादि उत्पात के समय को
Wait, space before danda? "करना शुभ है।" - no space before danda.

छोड़कर उक्त मुहूर्त्त मिले तो बहुत उत्तम है, अन्यथा कैसा ही समय हो,
शान्त्यादि करने में कुछ दोष नहीं है ॥ ३४ ॥
होमाहुतिमुहूर्त्त
सूर्यभात्तित्रिभे चान्द्रे सूर्यविच्छुक्रपङ्गवः ।
चन्द्रारेज्यागुशिखिनो नेष्टा होमाहुतिः खले ॥ ३५ ॥
अन्वयः—सूर्यभात् त्रित्रिभे चान्द्रे [चान्द्रर्क्षे] सूर्यविच्छुकपङ्गवः चन्द्रारेज्यागुशिखिनः
Wait, does it have colon after अन्वय? "अन्वयः—" (visarga + em-dash).
Then: "(स्युः) खले होमाहुतिः नेष्टा (भवति) ॥ ३५ ॥" सूर्य जिस नक्षत्र में स्थित हो उससे तीन-तीन नक्षत्रों का एक

४४ मुहूर्त्तचिन्तामणि
नवान्नभक्षणमुहूर्त्त
नवान्नं स्याच्चरक्षिप्रमृदुभे सत्त नौ शुभम् ।
विना नन्दाविषघटीमधुपौषार्किभूमिजान् ॥ ३७ ॥
अन्वयः—चरक्षिप्रमृदुभे, सत्त नौ, नन्दाविषघटीमधुपौषार्किभूमिजान् विना नवान्नं
(शुभं) स्यात् ॥ ३७ ॥
श्रवण, धनिष्ठा, शतभिष, पुनर्वसु, स्वाती, अश्विनी, पुष्य, हस्त, चित्रा,
अनुराधा, मृगशिरा और रेवती नक्षत्र में शुभग्रहों से युक्त वा दृष्ट शुभग्रहों
के लग्न में, परीवा, छठि, एकादशी तिथि, विषघटी, पूस और चैत्रमास,
मङ्गल और शनैश्चर दिन को छोड़ अन्य तिथि, वार और मास में नवान्न-
भक्षण शुभ है ॥ ३७ ॥
नौकाघट्टनमुहूर्त्त
याम्यत्रयविशाखेन्द्रसार्पपित्र्येशभिन्नभे ।
भृग्विज्यार्कदिने नौकाघट्टनं सत्त नौ शुभम् ॥ ३८ ॥
अन्वयः—याम्यत्रयविशाखेन्द्रसार्पपित्र्येशभिन्नभे, भृग्वीज्यार्कदिने सत्त नौ नौकाघट्टनं
शुभम् ॥ ३८ ॥
भरणी, कृत्तिका, रोहिणी, विशाखा, ज्येष्ठा, आश्लेषा, मघा, आर्द्रा को
छोड़ अन्य नक्षत्रों में; शुक्र, बृहस्पति और रविवार में तथा शुभग्रहयुक्त वा
दृष्ट शुभ लग्न¹ में नाव का बनवाना शुभ होता है ॥ ३८ ॥
वीरसाधन व अभिचार का मुहूर्त्त
मूलाद्रार्भरणीपित्र्यमृगे सौम्ये घटे तनौ ।
सुखे शुक्रेऽष्टमे शुद्धे सिद्धिवीराभिचारयोः ॥ ३९ ॥
अन्वयः—मूलाद्रार्भरणीपित्र्यमृगे, घटे तनौ सौम्ये, शुक्रे सुखे, अष्टमे शुद्धे वीराभि-
चारयोः सिद्धिः (भवति) ॥ ३६ ॥
मूल, आर्द्रा, भरणी, मघा और मृगशिरा नक्षत्र में; बुधयुक्त कुम्भ लग्न
में; लग्न से चौथे स्थान में शुक्र के रहते और आठवें स्थान में किसी ग्रह के
न रहते वीरसाधन और अभिचार करना सिद्धिकारक होता है ॥ ३९ ॥
रोग शान्त होने के पश्चात् स्नान का मुहूर्त्त
व्यन्त्यादितिध्रुवमघानिलसार्पधिष्ण्ये
रिक्ते तिथौ चरतनौ विकवीन्दुवारे ।
१—विवाहप्रकरण में कहेंगे ।