मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)
Muhurta Chintamani of Daivajna Rama with Commentary
दैवज्ञ राम (टीकाकार: पं. केदारदत्त जोशी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनक्षत्रप्रकरण २९
बजाना इत्यादि कला और आदि पद से चरसंज्ञक नक्षत्रों का भी कार्य, वे
सब सिद्ध होते हैं ॥ ६ ॥
मृगान्त्यचित्रामित्रर्क्षं मृदु मैत्रं भृगुस्तथा ।
तत्र गीताम्बरक्रीडामित्रकार्यं विभूषणम् ॥ ७ ॥
अन्वयः—मृगान्त्यचित्रामित्रक्षं तथा भृगुः, मृदु मैत्रं (च संज्ञं ज्ञेयम्) तत्र गीताम्बर-
क्रीडामित्रकार्यं विभूषणं (सिद्धयति) ॥ ७ ॥
मृगशिरा, रेवती, चित्रा, अनुराधा, ये चार नक्षत्र और शुक्रवार इनकी
मृदु और मैत्र संज्ञा है । इनमें गाना, वस्त्र पहिनना स्त्री के साथ क्रीड़ा, मित्र
का कार्य, आभूषण पहिनना इत्यादि कार्य सिद्ध होते हैं ॥ ७ ॥
मूलेन्द्रार्द्राहिभं सौरिस्तीक्ष्णं दारुणसंज्ञकम् ।
तत्राभिचारघातोग्रभेदाः पशुदमादिकम् ॥ ८ ॥
अन्वयः—मूलेन्द्रार्द्राहिभं तथा सौरिः, तीक्ष्णं, दारुणसंज्ञकं (च ज्ञेयम्) । तत्र
अभिचारघातोग्रभेदाः पशुदमादिकं (सिद्धयति) ॥ ८ ॥
मूल, ज्येष्ठा, आर्द्रा, आश्लेषा, ये चार नक्षत्र और शनैश्चर दिन, इनकी
तीक्ष्ण और दारुण संज्ञा है । इनमें अभिचार, मारण आदि भयानक कर्म,
भेद और हाथी-घोड़े आदि का सिखाना, ये कार्य-सिद्ध होते हैं ॥ ८ ॥
नक्षत्रों की अधोमुखादि संज्ञा
मूलाहिमिश्रोग्रमधोमुखं भवेद्धूर्ध्वास्यमार्द्वेज्यहरित्रयं ध्रुवम् ।
तिर्यङ्मुखं मैत्रकरानिलादितिज्येष्ठाशिवभानीदृशकृत्यमेषु सत् ॥ ९ ॥
अन्वयः—मूलाहिमिश्रोग्रं अधोमुखं, आर्द्वेज्यहरित्रयं ध्रुवं ऊर्ध्वास्यं, मैत्रकरानि-
लादितिज्येष्ठाशिवभानि तिर्यङ्मुखं भवेत्, एषु ईदृशकृत्यं सत् ॥ ६ ॥
मूल, आश्लेषा, मिश्रसंज्ञक और उग्रसंज्ञक की अधोमुख संज्ञा है । आर्द्रा,
पुष्य, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिष, और ध्रुवसंज्ञक नक्षत्रों की ऊर्ध्वमुख संज्ञा
है । मृदुसंज्ञक नक्षत्र, हस्त, स्वाती, पुनर्वसु, ज्येष्ठा और अश्विनी की तिर्यङ् -
मुख संज्ञा है । इन्हीं संज्ञाओं के सदृश कार्य इनमें शुभ होते हैं, अर्थात्
अधोमुख संज्ञक नक्षत्रों में कुँआ, बावली तालाब खुदवाना इत्यादि, ऊर्ध्व-
मुख नक्षत्रों में राज्याभिषेक, पट्टबन्ध, दुमहला, तिमहला आदि मकान बनवाना
और तिर्यङ्मुख नक्षत्रों में हाथी, घोड़े, बैल आदि के कृत्य और यात्रा इत्यादि
शुभ हैं ॥ ९ ॥