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सर्वकोश
मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)

मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)

Muhurta Chintamani of Daivajna Rama with Commentary

दैवज्ञ राम (टीकाकार: पं. केदारदत्त जोशी) द्वारा

DevanagariHindipublished207 पृष्ठ

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पृष्ठ 44

नक्षत्रप्रकरण ३५
ध्रुवसंज्ञक, मृदुसंज्ञक, क्षिप्रसंज्ञक नक्षत्रों में; सोमवार और शुक्रवार में; कर्क,
वृष, तुला लग्न में, मोतीयुक्त और चाँदी के आभूषण बनवाना और धारण
करना चाहिए । मूल, ज्येष्ठा, आर्द्रा, आश्लेषा, तीनों पूर्वा, भरणी, मघा,
अश्विनी, मृगशिरा, विशाखा, कृत्तिका इन नक्षत्रों में हथियार धारण करना
और बनवाना शुभ होता है ॥१९॥
मुद्रापातन और वस्त्रक्षालन मुहूर्त्त
मुद्राणां पातनं सद्‍ध्रुवमृदुचरभक्षिप्रभैर्वीन्दुसौरे
घस्रे पूर्णाजयाख्ये न च गुरुभृगुजास्ते विलग्ने शुभैः स्यात् ।
वस्त्राणां क्षालनं सद्वसुहयदिनकृत्पञ्चकादित्यपुष्ये
नो रिक्तापर्वषष्ठीपितृदिनरविजज्ञेषु कार्यं कदापि ॥२०॥
अन्वयः—ध्रुवमृदुचरभक्षिप्रभैः, वीन्दुसौरे घस्रे, पूर्णाजयाख्ये (तिथ्ये), गुरुभृगुजास्ते
न शुभैः विलग्ने मुद्राणां पातनं सत् । वसुहयदिनकृत्पञ्चकादित्यपुष्ये, वस्त्राणां क्षालनम्
सत् स्यात् । रिक्तापर्वषष्ठीपितृदिनरविजज्ञेषु, वस्त्राणां क्षालनं कदापि नो
कार्यम् ॥२०॥
ध्रुवसंज्ञक, मृदुसंज्ञक, चरसंज्ञक, क्षिप्रसंज्ञक नक्षत्रों में; सोमवार और
शनैश्चर को छोड़ अन्य दिनों में; पञ्चमी, दशमी, पूर्णमासी, तीज, अष्टमी,
त्रयोदशी इन तिथियों में, बृहस्पति और शुक्र के अस्तकाल को छोड़कर, लग्न
में शुभ ग्रहों के रहते मुद्रापातन अर्थात् राजचिह्नयुक्त मुद्रा ढलवाना और
खजाने में जमा करना शुभ है और धनिष्ठा, अश्विनी, हस्त, चित्रा, स्वाती,
विशाखा, अनुराधा, पुनर्वसु और पुष्य नक्षत्र में; चौथ, नवमी, चतुर्दशी, पर्व
अर्थात् कृष्णपक्ष की अष्टमी, चतुर्दशी, अमावस्या, पूर्णिमा, सूर्य की संक्रान्ति
का दिन, छठि, पितृश्राद्ध का दिन, शनैश्चर और बुधवार को छोड़ अन्य
तिथियों और दिनों में पहिले पहल कपड़ा धोने के लिए धोबी को देना
शुभ है ॥२०॥
तलवार आदि के धारण और शय्या आदि के उपभोग का मुहूर्त्त
संधार्याः कुन्तवर्मेष्वसनशरकृपाणासिपुत्र्यो विरिक्ते
शुक्रेज्यार्केऽह्नि मैत्रध्रुवलघुसहितादित्यशाक्रद्विदैवे ।
स्युलंग्ने हि स्थिराख्ये शशिनि च शुभदृष्टे शुभैः केन्द्रगैः
स्याद्भोगः शय्यासनादेर्ध्रुवमृदुलघुहर्य्यन्तकादित्य इष्टः ॥२१॥