मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)
Muhurta Chintamani of Daivajna Rama with Commentary
दैवज्ञ राम (टीकाकार: पं. केदारदत्त जोशी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३२ मुहूर्त्तचिन्तामणि
दर्शन करना चाहिए। मूल, ज्येष्ठा, आर्द्रा, आश्लेषा, तीनों पूर्वा, मघा, भरणी,
शतभिषा, इन नक्षत्रों में मद्यारम्भ शुभ कहा गया है। अश्विनी, पुष्य, हस्त,
रेवती, विशाखा, पुनर्वसु, ज्येष्ठा, शतभिषा, धनिष्ठा इन नक्षत्रों में गो-बैल
आदि का मोल लेना और बेचना शुभ है ॥ १३ ॥
पशुओं के पालने का मुहूर्त्त
लग्ने शुभे चाष्टमशुद्धिसंयुते रक्षा पशूनां निजयोनिभे चरे ।
रिक्ताष्टमीदर्शकुजश्ववोध्रुवत्वाष्ट्रेषु यानं स्थितिवेशनं न सत् ॥ १४ ॥
अन्वयः—अष्टमशुद्धिसंयुते शुभे लग्ने, च (तथा) निजयोनिभे, चरे, पशूनां रक्षा
सत्। रिक्ताष्टमीदर्शकुजश्ववोध्रुवत्वाष्ट्रेषु पशूनां यानं, स्थितिवेशनं न सत् ॥ १४ ॥
शुभ लग्न हो, लग्न से आठवें स्थान में कोई ग्रह न हो और अपनी योनि
का नक्षत्र हो (योनि नक्षत्र विवाह प्रकरण श्लो० २५ में कहे गये हैं) तब
पशुओं को पालना चाहिए अथवा चर अर्थात् स्वाती, पुनर्वसु, श्रवण, धनिष्ठा,
शतभिष, इन नक्षत्रों में पशुओं को पालना चाहिए। चौथि, नवमी, चतुर्दशी,
अष्टमी, अमावस, मंगल दिन, श्रवण, तीनों उत्तरा, रोहिणी और चित्रा नक्षत्र
में पशुओं को घर से बाहर ले जाना, गोष्ठ में बाँधना और बाहर से घर में
लाना शुभ नहीं है ॥ १४ ॥
औषध और सूचीकर्म का मुहूर्त्त
भैषज्यं सल्लघुमृदुचरे मूलभे द्व्यङ्ग्लग्ने
शुक्रेन्दिज्ये विदि च दिवसे चापि तेषां रवेश्च ।
शुद्धे रिष्फद्युनमृतिगृहे सत्तिथौ नो जने
र्भेसूचीकर्माप्यदितिवसुभत्वाष्ट्रमित्राश्विधिष्ण्ये ॥ १५ ॥
अन्वयः—लघुमृदुचरे मूलभे शुक्रेन्दिज्ये विदि च द्व्यङ्गलग्ने, तेषां रवेश्चापि दिवसे,
रिष्फद्युनमृतिगृहे शुद्धे, सत्तिथौ, भैषज्यं सत्, जनेर्भे नो । अदितिवसुभत्वाष्ट्रमित्राश्वि-
धिष्ण्ये सूचीकर्मापि सत् ॥ १५ ॥
अश्विनी, पुष्य, हस्त, चित्रा, मृगशिरा, अनुराधा, रेवती, श्रवण, धनिष्ठा,
शतभिष, स्वाती, पुनर्वसु, मूल इन नक्षत्रों में; द्विस्वभाव लग्न में; शुक्र,
चन्द्रमा, बृहस्पति और बुध लग्न में हों; शुक्र, चन्द्रमा, बृहस्पति, बुध, वा
रविवार हो, लग्न से बारहवें, सातवें, आठवें स्थान में कोई ग्रह न हो; रिक्ता
और अमावस को छोड़ अन्य शुभ तिथियाँ हों तो औषध का सेवन करना शुभ