मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)
Muhurta Chintamani of Daivajna Rama with Commentary
दैवज्ञ राम (टीकाकार: पं. केदारदत्त जोशी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनक्षत्रप्रकरण ३७
अन्धाक्षादि नक्षत्रों का फल
विनष्टार्थस्य लाभोऽन्धे शीघ्रं मन्दे प्रयत्नतः ।
स्याद्दूरे श्रवणं मध्ये श्रुत्याप्ती न सुलोचने ॥ २३ ॥
अन्वयः—अन्धे विनष्टार्थस्य शीघ्रं लाभः, मन्दे प्रयत्नः, मध्ये दूरे श्रवणं स्यात्,
सुलोचने श्रुत्याप्ती न ॥ २३ ॥
यदि अन्धाक्षसंज्ञक नक्षत्रों में कोई वस्तु चोरी जाय तो शीघ्र मिले,
मन्दाक्षसंज्ञक नक्षत्रों में बड़े उपाय से मिले, मध्याक्षसंज्ञक नक्षत्रों में
दूर में सुन पड़े मिले नहीं, और सुलोचन संज्ञक में तो कुछ भी पता
न लगे ॥ २३ ॥
धन के व्यवहार में निषिद्ध नक्षत्रादि
तीक्ष्णमिश्रध्रुवोग्रैर्यद्द्रव्यं दत्तं निवेशितम् ।
प्रयुक्तं च विनष्टं च विष्टयां पाते च नाप्यते ॥ २४ ॥
अन्वयः—तीक्ष्णमिश्रध्रुवोग्रैः, विष्टयां, पाते व यद्द्रव्यम् दत्तं, निवेशितम्, प्रयुक्तं
विनष्टं च (तत्) न आप्यते ॥ २४ ॥
तीक्ष्णसंज्ञक, मिश्रसंज्ञक, ध्रुवसंज्ञक और उग्रसंज्ञक नक्षत्रों में और
भद्रा वा व्यतीपात में जो द्रव्य किसी को दी जाय, अथवा धरोहर धरी जाय,
अथवा ऋण दिया जाय, अथवा कहीं गिर पड़े या चोरी जाय वह फिर
किसी तरह न मिले ॥ २४ ॥
जलाशय और नृत्यारम्भ का मुहूर्त्त
मित्रार्कध्रुववासवाम्बुपमघातोयान्त्यपुष्येन्दुभिः
पापैर्हीनबलैस्तनौ सुरगुरौ ज्ञे वा भृगौ खे विधौ ।
आप्ये सर्वजलाशयस्य खननं व्यम्भोमघैः सेन्द्रभै-
स्तैर्नृत्यं हिबुके शुभैस्तनुगृहे ज्ञेऽब्जे झराशौ शुभम् ॥ २५ ॥
अन्वयः—मित्रार्कध्रुववासवाम्बुपमघातोयान्त्यपुष्येन्दुभिः, पापैः हीनबलैः, तनौ सुर-
गुरौ ज्ञे वा, खे भृगौ, आप्ये विधौ, सर्वजलाशयस्य खननं शुभम् । व्यम्भोमघैः सेन्द्रभैः
तैः (पूर्वोक्तनक्षत्रैः), हिबुके शुभैः, तनुगृहे ज्ञे, झराशौ अब्जे नृत्य शुभम् ॥ २५ ॥
अनुराधा, हस्त, तीनों उत्तरा, रोहिणी, धनिष्ठा, शतभिष, मघा,
पूर्वाषाढ़, रेवती, पुष्य और मृगशिरा इन नक्षत्रों में, पापग्रहों के निर्बल
रहते, लग्न में बृहस्पति वा बुध के रहते, लग्न से दशवें स्थान में शुक्र के