मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)
Muhurta Chintamani of Daivajna Rama with Commentary
दैवज्ञ राम (टीकाकार: पं. केदारदत्त जोशी) द्वारा
पृष्ठ 47, कुल 207 में से
संदर्भ में पढ़ें३८ मुहूर्तचिन्तामणि
रहते, जल-राशियों में चन्द्रमा के रहते वापी, कूप, तड़ाग आदि जलाशयों
का खनना शुभ है। पूर्वोक्त नक्षत्रों में पूर्वाषाढ़ और मघा को छोड़कर,
ज्येष्ठा को मिलाकर अर्थात् अनुराधा, हस्त, तीनों उत्तरा, रोहिणी, धनिष्ठा,
शतभिष, रेवती, पुष्य, मृगशिरा और ज्येष्ठा इन नक्षत्रों में, लग्न से चौथे
स्थान में शुभग्रहों के रहते, शुभग्रहों से दृष्ट लग्न में बुध के रहते और मिथुन
या कन्याराशि में चन्द्रमा के रहते नाचने का आरम्भ करना शुभदायक
होता है ॥ २५ ॥
स्वामी की सेवा करने का मुहूर्त
क्षिप्रे मैत्रे वित्सितार्केज्यवारे सौम्ये लग्नेऽर्के कुजे वा खलाभे ।
योनेर्मैत्र्यां राशिपोश्चापि मैत्र्यां सेवा कार्या स्वामिनः सेवकेन ॥ २६ ॥
अन्वयः—क्षिप्रे, मैत्रे, वित्सितार्केज्यवारे, सौम्ये लग्ने, अर्के खलाभे, वा कुजे
खलाभे, योनेमैत्र्यां च, राशिपोः अपि मैत्र्यां, (तदा) सेवकेन स्वामिनः सेवा
कार्या ॥ २६ ॥
अश्विनी, पुष्य, हस्त, चित्रा, अनुराधा, मृगशिरा और रेवती, इन
नक्षत्रों में; बुध, शुक्र, रविवार, बृहस्पति इन वारों में; लग्न में शुभग्रहों
के रहते; दशवें और गेरहवें स्थान में सूर्य वा मंगल के रहते सेवक को
स्वामी की सेवा करने का प्रारम्भ करना शुभदायक होता है। परन्तु वहाँ
इतना और विचारना चाहिए कि स्वामी और सेवक के जन्मनक्षत्र की
योनियों में परस्पर मित्रता और दोनों के जन्मराशीशों की परस्पर
मित्रता हो ॥ २६ ॥
द्रव्यप्रयोग और ऋणग्रहण का मुहूर्त
स्वात्यादित्यमृदुद्विदैवगुरुभे कर्णत्रयाश्वे चरे
लग्ने धर्मसुताष्टशुद्धिसहिते द्रव्यप्रयोगः शुभः ।
नारे ग्राह्यमृणं तु संक्रमदिने वृद्धौ करेऽर्केऽह्नि यत्
तद्वंशेषु भवेदृणं न च बुधे देयं कदाचिद्धनम् ॥ २७ ॥
अन्वयः—स्वात्यादित्यमृदुद्विदैवगुरुभे, कर्णत्रयाश्वे, धर्मसुताष्टशुद्धिसहिते, चरे लग्ने,
द्रव्यप्रयोगः शुभः । आरे तु संक्रमदिने वृद्धौ, करेऽर्केऽह्नि, ऋणं न ग्राह्यं, यत् (यस्मात्)
तद्वंशेषु ऋणं भवेत् । बुधे कदाचिद्धनं न देयम् ॥ २७ ॥
स्वाती, पुनर्वसु, चित्रा, अनुराधा, मृगशिरा, रेवती, विशाखा, पुंष्य,
श्रवण, धनिष्ठा, शतभिष, और अश्विनी, इन नक्षत्रों में; चर लग्न में;