संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण
Markandeya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
- मेधा ऋषिका राजा सुरथ और समाधिको भगवतीकी महिमा सुनाना * १७७
सावर्णि मनुकी उत्पत्तिके प्रसङ्गमें देवी-माहात्म्य
प्रथमोऽध्यायः
मेधा ऋषिका राजा सुरथ और समाधिको भगवतीकी महिमा बताते हुए मधु-कैटभ-वधका प्रसङ्ग सुनाना
विनियोग
[ प्रथमचरित्रस्य ब्रह्मा ऋषिः, महाकाली देवता,
गायत्री छन्दः, नन्दा शक्तिः, रक्तदन्तिका बीजम्,
अग्निस्तत्त्वम्, ऋग्वेदः स्वरूपम्, श्रीमहाकालीप्रीत्यर्थे
प्रथमचरित्रजपे विनियोगः ।
प्रथम चरित्रके ब्रह्मा ऋषि, महाकाली देवता,
गायत्री छन्द, नन्दा शक्ति, रक्तदन्तिका बीज,
अग्नि तत्त्व और ऋग्वेद स्वरूप है। श्रीमहाकाली
देवताकी प्रसन्नताके लिये प्रथम चरित्रके जपमें
विनियोग किया जाता है।
ध्यान
खड्गं चक्रगदेषुचापपरिघाञ्छूलं भुशुण्डीं शिरः
शङ्खं संदधतीं करैस्त्रिनयनां सर्वाङ्गभूषावृताम् ।
नीलाश्मद्युतिमास्यपाददशकां सेवे महाकालिकां
यामस्तौत्स्वपिते हरौ कमलजो हन्तुं मधुं कैटभम् ॥
भगवान् विष्णुके सो जानेपर मधु और
कैटभको मारनेके लिये कमलजन्मा ब्रह्माजीने
जिनका स्तवन किया था, उन महाकाली देवीका
मैं सेवन करता हूँ। वे अपने दस हाथोंमें खड्ग,
चक्र, गदा, बाण, धनुष, परिघ, शूल, भुशुण्डि,
मस्तक और शङ्ख धारण करती हैं। उनके तीन
नेत्र हैं। वे समस्त अङ्गोंमें दिव्य आभूषणोंसे
विभूषित हैं। उनके शरीरकी कान्ति नीलमणिके
समान है तथा वे दस मुख और दस पैरोंसे
युक्त हैं।]
ॐ नमश्चण्डिकायै ॥
'ॐ ऐं' मार्कण्डेय उवाच ॥ १ ॥
सावर्णिः सूर्यतनयो यो मनुः कथ्यतेऽष्टमः ।
निशामय तदुत्पत्तिं विस्तराद् गदतो मम ॥ २ ॥
महामायानुभावेन यथा मन्वन्तराधिपः ।
स बभूव महाभागः सावर्णिस्तनयो रवेः ॥ ३ ॥
स्वारोचिषेऽन्तरे पूर्वं चैत्रवंशसमुद्भवः ।
सुरथो नाम राजाभूत्समस्ते क्षितिमण्डले ॥ ४ ॥
तस्य पालयतः सम्यक् प्रजाः पुत्रानिवौरसान् ।
बभूवुः शत्रवो भूपाः कोलाविध्वंसिनस्तदा ॥ ५ ॥
तस्य तैरभवद्युद्धमतिप्रबलदण्डिनः ।
न्यूनैरपि स तैर्युद्धे कोलाविध्वंसिभिर्जितः ॥ ६ ॥
ततः स्वपुरमायातो निजदेशाधिपोऽभवत् ।
आक्रान्तः स महाभागस्तैस्तदा प्रबलारिभिः ॥ ७ ॥
मार्कण्डेयजी बोले- ॥ १ ॥ सूर्यके पुत्र सावर्णि
जो आठवें मनु कहे जाते हैं, उनकी उत्पत्तिकी
कथा विस्तारपूर्वक कहता हूँ, सुनो ॥ २ ॥ सूर्यकुमार
महाभाग सावर्णि भगवती महामायाके अनुग्रहसे
जिस प्रकार मन्वन्तरके स्वामी हुए, वही प्रसङ्ग
सुनाता हूँ ॥ ३ ॥ पूर्वकालकी बात है, स्वारोचिष
मन्वन्तरमें सुरथ नामके एक राजा थे, जो चैत्रवंशमें
उत्पन्न हुए थे। उनका समस्त भूमण्डलपर अधिकार
था ॥ ४ ॥ वे प्रजाका अपने औरस पुत्रोंकी भाँति
धर्मपूर्वक पालन करते थे; फिर भी उस समय
कोलाविध्वंसी२ नामके क्षत्रिय उनके शत्रु हो
१. ॐ चण्डीदेवीको नमस्कार है।
२. 'कोलाविध्वंसी' यह किसी विशेष कुलके क्षत्रियोंकी संज्ञा है। दक्षिणमें 'कोला' नगरी प्रसिद्ध है, वह प्राचीन
कालमें राजधानी थी। जिन क्षत्रियोंने उसपर आक्रमण करके उसको विध्वस्त किया, वे 'कोलाविध्वंसी' कहलाये।
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« संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण *
गये॥५॥ राजा सुरथकी दण्डनीति बड़ी प्रबल
थी। उनका शत्रुओंके साथ संग्राम हुआ। यद्यपि
कोलाविध्वंसी संख्यामें कम थे तो भी राजा सुरथ
युद्धमें उनसे परास्त हो गये ॥ ६ ॥ तब वे युद्धभूमिसे
अपने नगरको लौट आये और केवल अपने
देशके राजा होकर रहने लगे (समूची पृथ्वीसे
अब उनका अधिकार जाता रहा) किंतु वहाँ भी
उन प्रबल शत्रुओंने उस समय महाभाग राजा
सुरथपर आक्रमण कर दिया ॥७॥
प्रत्युवाच स तं वैश्यः प्रश्रयावनतो नृपम् ॥१९॥
राजाका बल क्षीण हो चला था; इसलिये
उनके दुष्ट, बलवान् एवं दुरात्मा मन्त्रियोंने वहाँ
उनकी राजधानीमें भी राजकीय सेना और खजानेको
वहाँसे हथिया लिया ॥ ८ ॥ सुरथका प्रभुत्व नष्ट हो
चुका था, इसलिये वे शिकार खेलनेके बहाने
घोड़ेपर सवार हो वहाँसे अकेले ही एक घने
अमात्यैर्बलिभिर्दुष्टैर्दुर्बलस्य दुरात्मभिः।
कोशो बलं चापहृतं तत्रापि स्वपुरे ततः॥८ ॥
ततो मृगयाव्याजेन हृतस्वाम्यः स भूपतिः।
एकाकी हयमारुह्य जगाम गहनं वनम् ॥ ९ ॥
स तत्राश्रममद्राक्षीद् द्विजवर्यस्य मेधसः।
प्रशान्तश्वापदाकीर्णं मुनिशिष्योपशोभितम् ॥ १० ॥
तस्थौ कंचित्स कालं च मुनिना तेन सत्कृतः।
इतश्चेतश्च विचरंस्तस्मिन्मुनिवराश्रमे ॥ ११ ॥
सोऽचिन्तयत्तदा तत्र ममत्वाकृष्टचेतनः। १
मत्पूर्वैः पालितं पूर्वं मया हीनं पुरं हि तत् ॥ १२ ॥
मद्भृत्यैस्तैरसद्वृत्तैर्धर्मतः पाल्यते न वा।
न जाने स प्रधानो मे शूरहस्ती सदामदः ॥ १३ ॥
मम वैरिवशं यातः कान् भोगानुपलप्स्यते ।
ये ममानुगता नित्यं प्रसादधनभोजनैः ॥ १४ ॥
अनुवृत्तिं ध्रुवं तेऽद्य कुर्वन्त्यन्यमहीभृताम् ।
असम्यग्व्ययशीलैस्तैः कुर्वद्भिः सततं व्ययम् ॥ १५ ॥
संचितः सोऽतिदुःखेन क्षयं कोशो गमिष्यति ।
एतच्चान्यच्च सततं चिन्तयामास पार्थिवः ॥ १६ ॥
तत्र विप्राश्रमाभ्याशे वैश्यमेकं ददर्श सः ।
स पृष्टस्तेन कस्त्वं भो हेतुश्चागमनेऽत्र कः ॥ १७ ॥
सशोक इव कस्मात्त्वं दुर्मना इव लक्ष्यसे ।
इत्याकर्ण्य वचस्तस्य भूपतेः प्रणयोदितम् ॥ १८ ॥
जङ्गलमें चले गये ॥ ९ ॥ वहाँ उन्होंने विप्रवर मेधा
मुनिका आश्रम देखा, जहाँ कितने ही हिंसक जीव
[अपनी स्वाभाविक हिंसावृत्ति छोड़कर] परम
शान्तभावसे रहते थे। मुनिके बहुत-से शिष्य उस
वनकी शोभा बढ़ा रहे थे ॥ १० ॥ वहाँ जानेपर
मुनिने उनका सत्कार किया और वे उन मुनिश्रेष्ठके
आश्रमपर इधर उधर विचरते हुए कुछ कालतक
वहाँ रहे ॥ ११ ॥ फिर ममतासे आकृष्टचित्त होकर
उस आश्रममें इस प्रकार चिन्ता करने लगे-
१. पाठान्तर-ममत्वाकृष्टमानसः ।
• मेधा ऋषिका राजा सुरथ और समाधिको भगवतीकी महिमा सुनाना • १७९
'पूर्वकालमें मेरे पूर्वजोंने जिसका पालन किया था, वही नगर आज मुझसे रहित है। पता नहीं, मेरे दुराचारी भृत्यगण उसकी धर्मपूर्वक रक्षा करते हैं या नहीं। जो सदा मदकी वर्षा करनेवाला और शूरवीर था, वह मेरा प्रधान हाथी अब शत्रुओंके अधीन होकर न जाने किन भोगोंको भोगता होगा ? जो लोग मेरी कृपा, धन और भोजन पानेसे सदा मेरे पीछे-पीछे चलते थे, वे निश्चय ही अब दूसरे राजाओंका अनुसरण करते होंगे। उन अपव्ययी लोगोंके द्वारा सदा खर्च होते रहनेके कारण अत्यन्त कष्टसे जमा किया हुआ मेरा वह खजाना खाली हो जायगा।' ये तथा और भी कई बातें राजा सुरथ निरन्तर सोचते रहते थे। एक दिन उन्होंने वहाँ विप्रवर मेधाके आश्रमके निकट एक वैश्यको देखा और उससे पूछा—'भाई! तुम कौन हो? यहाँ तुम्हारे आनेका क्या कारण है? तुम क्यों शोकग्रस्त और अनमने-से दिखायी देते हो?' राजा सुरथका यह प्रेमपूर्वक कहा हुआ वचन सुनकर वैश्यने विनीत-भावसे उन्हें प्रणाम करके कहा—॥ १२–१९ ॥
वैश्य उवाच ॥ २० ॥
समाधिर्नाम वैश्योऽहमुत्पन्नो धनिनां कुले ॥ २१ ॥
पुत्रदारैर्निरस्तश्च धनलोभादसाधुभिः ।
विहीनश्च धनैर्दारैः पुत्रैरादाय मे धनम् ॥ २२ ॥
वनमभ्यागतो दुःखी निरस्तश्चाप्तबन्धुभिः ।
सोऽहं न वेद्मि पुत्राणां कुशलाकुशलात्मिकाम् ॥ २३ ॥
प्रवृत्तिं स्वजनानां च दाराणां चात्र संस्थितः ।
किं नु तेषां गृहे क्षेममक्षेमं किं नु साम्प्रतम् ॥ २४ ॥
कथं ते किं नु सद्वृत्ता दुर्वृत्ताः किं नु मे सुताः ॥ २५ ॥
वैश्य बोला— ॥ २० ॥ राजन्! मैं धनियोंके कुलमें उत्पन्न एक वैश्य हूँ। मेरा नाम समाधि है॥ २१॥ मेरे दुष्ट स्त्री-पुत्रोंने धनके लोभसे मुझे घरसे बाहर निकाल दिया है। मैं इस समय धन, स्त्री और पुत्रसे वञ्चित हूँ। मेरे विश्वसनीय बन्धुओंने मेरा ही धन लेकर मुझे दूर कर दिया है, इसलिये दुखी होकर मैं वनमें चला आया हूँ। यहाँ रहकर मैं इस बातको नहीं जानता कि मेरे पुत्रोंकी, स्त्रीकी और स्वजनोंकी कुशल है या नहीं। इस समय घरमें वे कुशलसे रहते हैं अथवा उन्हें कोई कष्ट है ? ॥ २२—२४॥ वे मेरे पुत्र कैसे हैं? क्या वे सदाचारी हैं अथवा दुराचारी हो गये हैं ॥ २५ ॥
राजोवाच ॥ २६ ॥
यैर्निरस्तो भवाँल्लुब्धैः पुत्रदारादिभिर्धनैः ॥ २७॥
तेषु किं भवतः स्नेहमनुबध्नाति मानसम् ॥ २८ ॥
राजाने पूछा— ॥ २६ ॥ जिन लोभी स्त्री-पुत्र आदिने धनके कारण तुम्हें घरसे निकाल दिया, उनके प्रति तुम्हारे चित्तमें इतना स्नेह क्यों है? ॥ २७–२८ ॥
वैश्य उवाच ॥ २९ ॥
एवमेतद्यथा प्राह भवानस्मद्गतं वचः ॥ ३० ॥
किं करोमि न बध्नाति मम निष्ठुरतां मनः ।
यैः संत्यज्य पितृस्नेहं धनलुब्धैर्निराकृतः ॥ ३१ ॥
१८० * संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण *
पतिस्वजनहार्दं च हार्दि तेष्वेव मे मनः । राजोवाच ॥ ३९ ॥
किमेतन्नाभिजानामि जानन्नपि महामते ॥ ३२ ॥ भगवंस्त्वामहं प्रष्टुमिच्छाम्येकं वदस्व तत् ॥ ४० ॥
यत्प्रेमप्रवणं चित्तं विगुणेष्वपि बन्धुषु । दुःखाय यन्मे मनसः स्वचित्तायत्ततां बिना।
तेषां कृते मे निःश्वासो दौर्मनस्यं च जायते ॥ ३३ ॥ ममत्वं गतराज्यस्य राज्याङ्गेष्वखिलेष्वपि ॥ ४१ ॥
करोमि किं यन्न मनस्तेष्वप्रीतिषु निष्ठुरम् ॥ ३४ ॥ जानतोऽपि यथाज्ञस्य किमेतन्मुनिसत्तम।
वैश्य बोला- ॥ २९ ॥ आप मेरे विषयमें जो अयं च निकृतः १ पुत्रैर्दारैर्भृत्यैस्तथोज्झितः ॥ ४२ ॥
बात कहते हैं, वह सब ठीक है ॥ ३० ॥ किंतु क्या स्वजनेन च संत्यक्तस्तेषु हार्दी तथाप्यति ।
करूँ, मेरा मन निष्ठुरता नहीं धारण करता। एवमेष तथाहं च द्वावप्यत्यन्तदुःखितौ ॥ ४३ ॥
जिन्होंने धनके लोभमें पड़कर पिताके प्रति स्नेह, दृष्टदोषेऽपि विषये ममत्वाकृष्टमानसौ ।
पत्तिके प्रति प्रेम तथा आत्मीय जनके प्रति अनुरागको तत्किमेतन्महाभाग यन्मोहो ज्ञानिनोरपि ॥ ४४ ॥
तिलाञ्जलि दे मुझे घरसे निकाल दिया है, उन्हींके ममास्य च भवत्येषा विवेकान्धस्य मूढता ॥ ४५ ॥
प्रति मेरे हृदयमें इतना स्नेह है। महामते ! गुणहीन राजा ने कहा - ॥ ३९ ॥ भगवन् ! मैं आपसे
बन्धुओंके प्रति भी जो मेरा चित्त इस प्रकार एक बात पूछना चाहता हूँ, उसे बताइये ॥ ४० ॥
प्रेममग्न हो रहा है, यह क्या है- इस बातको मैं मेरा चित्त अपने अधीन न होनेके कारण वह बात
जानकर भी नहीं जान पाता। उनके लिये मैं लंबी मेरे मनको बहुत दुःख देती है। मुनिश्रेष्ठ ! जो
साँसें ले रहा हूँ और मेरा हृदय अत्यन्त दुःखित राज्य मेरे हाथसे चला गया है, उसमें और उसके
हो रहा है॥ ३१-३३॥ उन लोगोंमें प्रेमका सम्पूर्ण अङ्गोंमें मेरी ममता हो रही है ॥ ४१ ॥ यह
सर्वथा अभाव है तो भी उनके प्रति जो मेरा मन जानते हुए भी कि वह अब मेरा नहीं है,
निष्ठुर नहीं हो पाता, इसके लिये क्या करूँ ॥ ३४ ॥ अज्ञानीकी भाँति मुझे उसके लिये दुःख होता है;
मार्कण्डेय उवाच ॥ ३५ ॥ यह क्या है ? इधर यह वैश्य भी घरसे अपमानित
ततस्तौ सहितौ विप्र तं मुनिं समुपस्थितौ ॥ ३६॥ होकर आया है। इसके पुत्र, स्त्री और भृत्योंने
समाधिर्नाम वैश्योऽसौ स च पार्थिवसत्तमः । इसको छोड़ दिया है ॥ ४२ ॥ स्वजनोंने भी इसका
कृत्वा तु तौ यथान्यायं यथाई तेन संविदम् ॥ ३७॥ परित्याग कर दिया है, तो भी इसके हृदयमें
उपविष्टौ कथाः काश्चिच्चक्रतुर्वैश्यपार्थिवौ ॥ ३८ ॥ उनके प्रति अत्यन्त स्नेह है। इस प्रकार यह तथा
'मार्कण्डेयजी कहते हैं- ॥ ३५ ॥ ब्रह्मन् ! मैं दोनों ही बहुत दुखी हैं ॥ ४३ ॥ जिसमें प्रत्यक्ष
तदनन्तर राजाओंमें श्रेष्ठ सुरथ और वह समाधि दोष देखा गया है, उस विषयके लिये भी हमारे
नामक वैश्य दोनों साथ-साथ मेधा मुनिकी मनमें ममताजनित आकर्षण पैदा हो रहा है।
सेवामें उपस्थित हुए और उनके साथ यथायोग्य महाभाग ! हम दोनों समझदार हैं; तो भी हममें
न्यायानुकूल विनयपूर्ण बर्ताव करके बैठे। तत्पश्चात् जो मोह पैदा हुआ है, यह क्या है ? विवेकशून्य
वैश्य और राजाने कुछ वार्तालाप आरम्भ पुरुषकी भाँति मुझमें और इसमें भी यह मूढ़ता
किया ॥ ३६-३८ ॥ प्रत्यक्ष दिखायी देती है ॥ ४४-४५ ॥
१. पा०- निष्कृतः । २. पा०- तत्किमेतन् ।
मेधा ऋषिका राजा सुरथ और समाधिको भगवतीकी महिमा सुनाना <
१८१
| (चित्र) | बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति।<br>तया विसृज्यते विश्वं जगदेतच्चराचरम्॥ ५६ ॥<br>सैषा प्रसन्ना वरदा नृणां भवति मुक्तये।<br>सा विद्या परमा मुक्तेर्हेतुभूता सनातनी॥ ५७ ॥<br>संसारबन्धहेतुश्च सैव सर्वेश्वरेश्वरी॥ ५८ ॥<br>ऋषि बोले— ॥ ४६ ॥ महाभाग! विषयमार्गका ज्ञान सब जीवोंको है॥ ४७ ॥ इसी प्रकार विषय भी सबके लिये अलग-अलग हैं। कुछ प्राणी दिनमें नहीं देखते और दूसरे रातमें ही नहीं देखते॥ ४८ ॥ तथा कुछ जीव ऐसे हैं, जो दिन और रात्रिमें भी बराबर ही देखते हैं। यह ठीक है कि मनुष्य समझदार होते हैं; किंतु केवल वे ही ऐसे नहीं होते॥ ४९ ॥ पशु-पक्षी और मृग आदि सभी प्राणी समझदार होते हैं। मनुष्योंकी समझ भी वैसी ही होती है, जैसी उन मृग और पक्षियोंकी होती है॥ ५० ॥ तथा जैसी मनुष्योंकी होती है, वैसी ही उन मृग-पक्षी आदिकी होती है। यह तथा अन्य बातें भी प्रायः दोनोंमें समान ही हैं। समझ होनेपर भी इन पक्षियोंको तो देखो, ये स्वयं भूखसे पीड़ित होते हुए भी मोहवश बच्चोंकी चोंचमें कितने चावसे अन्नके दाने डाल रहे हैं! नरश्रेष्ठ! क्या तुम नहीं देखते कि ये मनुष्य समझदार होते हुए भी लोभवश अपने किये हुए उपकारका बदला पानेके लिये पुत्रोंकी अभिलाषा करते हैं? यद्यपि उन सबमें समझकी कमी नहीं है, तथापि वे संसारकी स्थिति (जन्म-मरणकी परम्परा) बनाये रखनेवाले भगवती महामायाके प्रभावद्वारा ममतामय भँवरसे युक्त मोहके गहरे गर्तमें गिराये जाते हैं। इसलिये इसमें आश्चर्य नहीं करना चाहिये। जगदीश्वर भगवान् विष्णुकी योगनिद्रारूपा जो भगवती महामाया हैं, उन्हींसे यह जगत् मोहित हो रहा है। वे भगवती महामाया |
| ऋषिरुवाच॥ ४६ ॥<br>ज्ञानमस्ति समस्तस्य जन्तोर्विषयगोचरे॥ ४७ ॥<br>विषयश्चै<sup>१</sup> महाभाग यांति<sup>२</sup> चैवं पृथक् पृथक्।<br>दिवाऽन्धाः प्राणिनः केचिद्रात्रावन्धास्तथापरे॥ ४८ ॥<br>केचिद्दिवा तथा रात्रौ प्राणिनस्तुल्यदृष्टयः।<br>ज्ञानिनो मनुजाः सत्यं किंतु ते<sup>३</sup> न हि केवलम्॥ ४९ ॥<br>यतो हि ज्ञानिनः सर्वे पशुपक्षिमृगादयः।<br>ज्ञानं च तन्मनुष्याणां यत्तेषां मृगपक्षिणाम्॥ ५० ॥<br>मनुष्याणां च यत्तेषां तुल्यमन्यत्तथोभयोः।<br>ज्ञानेऽपि सति पश्यैतान् पतङ्गाञ्छावचञ्चुषु॥ ५१ ॥<br>कणमोक्षादृतान्मोहात्पीड्यमानानपि क्षुधा।<br>मानुषा मनुजव्याघ्र साभिलाषाः सुतान् प्रति॥ ५२ ॥<br>लोभात्प्रत्युपकाराय नन्वेतान्<sup>४</sup> किं न पश्यसि।<br>तथापि ममतावर्त्ते मोहगर्ते निपातिताः॥ ५३ ॥<br>महामायाप्रभावेण संसारस्थितिकारिणौ<sup>५</sup>।<br>तन्नात्र विस्मयः कार्यों योगनिद्रा जगत्पतेः॥ ५४ ॥<br>महामाया हरेश्चैषा<sup>६</sup> तया संमोह्यते जगत्।<br>ज्ञानिनामपि चेतांसि देवी भगवती हि सा॥ ५५ ॥ |
१. पा०—याश्च। २. पा०—यान्ति। ३. पा०—किंतु ते। ४. पा०—नन्वेते। ५. पा०—रिणः। ६. पा०—चैतत्।
१८२
• संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण •
देवी ज्ञानियोंके भी चित्तको बलपूर्वक खींचकर
मोहमें डाल देती हैं। वे ही इस सम्पूर्ण चराचर
जगत्की सृष्टि करती हैं तथा वे ही प्रसन्न होनेपर
मनुष्योंको मुक्तिके लिये वरदान देती हैं। वे
ही परा विद्या, संसार-बन्धन और मोक्षकी
हेतुभूता सनातनी देवी तथा सम्पूर्ण ईश्वरोंकी भी
अधीश्वरी हैं॥ ५१-५८ ॥
राजोवाच ॥ ५९ ॥
भगवन् का हि सा देवी महामायेति यां भवान् ॥ ६० ॥
ब्रवीति कथमुत्पन्ना सा कमांस्याश्च किं द्विज।
यत्प्रभावा' च सा देवी यत्स्वरूपा यदुद्भवा ॥ ६१ ॥
तत्सर्वं श्रोतुमिच्छामि त्वत्तो ब्रह्मविदां वर ॥ ६२ ॥
राजाने पूछा - ॥ ५९॥ भगवन्! जिन्हें आप
महामाया कहते हैं, वे देवी कौन हैं? ब्रह्मन्!
उनका आविर्भाव कैसे हुआ? तथा उनके चरित्र
कौन-कौन हैं? ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ महर्षे ! उन
देवीका जैसा प्रभाव हो, जैसा स्वरूप हो और
जिस प्रकार प्रादुर्भाव हुआ हो, वह सब मैं आपके
मुखसे सुनना चाहता हूँ ॥ ६०-६२ ॥
ऋषिरुवाच ॥ ६३ ॥
नित्यैव सा जगन्मूर्तिस्तया सर्वमिदं ततम् ॥ ६४ ॥
तथापि तत्समुत्पत्तिर्बहुधा श्रूयतां मम ।
देवानां कार्यसिद्धयर्थमाविर्भवति सा यदा ॥ ६५ ॥
उत्पन्नेति तदा लोके सा नित्याप्यभिधीयते।
योगनिद्रां यदा विष्णोर्जगत्येकार्णवीकृते ॥ ६६ ॥
आस्तीर्य शेषमभजत्कल्पान्ते भगवान् प्रभुः।
तदा द्वावसुरौ घोरौ विख्यातौ मधुकैटभौ ॥ ६७ ॥
विष्णुकर्णमलोद्भूतौ हन्तुं ब्रह्माणमुद्यतौ ।
स नाभिकमले विष्णोः स्थितो ब्रह्मा प्रजापतिः ॥ ६८ ॥
दृष्ट्वा तावसुरौ चोग्रौ प्रसुप्तं च जनार्दनम् ।
तुष्टाव योगनिद्रां तामेकाग्रहृदयस्थितः ॥ ६९ ॥
विबोधनार्थाय हरेर्हरिनेत्रकृतालयाम् ।
विश्वेश्वरीं जगद्धात्रीं स्थितिसंहारकारिणीम् ॥ ७० ॥
निद्रां भगवतीं विष्णोरतुलां तेजसः प्रभुः ॥ ७१ ॥
ऋषि बोले- ॥ ६३ ॥ राजन् ! वास्तवमें तो वे
देवी नित्यस्वरूपा ही हैं। सम्पूर्ण जगत् उन्हींका रूप
है तथा उन्होंने समस्त विश्वको व्याप्त कर रखा है,
तथापि उनका प्राकट्य अनेक प्रकारसे होता है। वह
मुझसे सुनो। यद्यपि वे नित्य और अजन्मा हैं, तथापि
जब देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके लिये प्रकट
होती हैं, उस समय लोकमें उत्पन्न हुई कहलाती हैं।
कल्पके अन्तमें जब सम्पूर्ण जगत् एकार्णवमें निमग्न
हो रहा था और सबके प्रभु भगवान् विष्णु शेषनागकी
शय्या बिछाकर योगनिद्राका आश्रय ले सो रहे थे,
उस समय उनके कानोंकी मैलसे दो भयंकर असुर
उत्पन्न हुए, जो मधु और कैटभके नामसे विख्यात
थे। वे दोनों ब्रह्माजीका वध करनेको तैयार हो गये।
भगवान् विष्णुके नाभिकमलमें विराजमान प्रजापति
१. पा०-कर्म चास्याश्च। २. पा०- यत्स्वभावा। ३. किसी किसी प्रतिमें इसके बाद ही 'ब्रह्मोवाच' है तथा
'निद्रां भगवतीम्' इस श्लोकार्धके स्थानमें-'स्तौति निद्रां भगवतीं विष्णोरतुलतेजसः॥' ऐसा पाठ है।
• मेधा ऋषिका राजा सुरथ और समाधिको भगवतीकी महिमा सुनाना • १८३
| ब्रह्माजीने जब उन दोनों भयानक असुरोंको अपने पास आया और भगवान्को सोया हुआ देखा तो एकाग्रचित्त होकर उन्होंने भगवान् विष्णुको जगानेके लिये उनके नेत्रोंमें निवास करनेवाली योगनिद्राका स्तवन आरम्भ किया। जो इस विश्वकी अधीश्वरी, जगत्को धारण करनेवाली, संसारका पालन और संहार करनेवाली तथा तेजःस्वरूप भगवान् विष्णुकी अनुपम शक्ति हैं, उन्हीं भगवती निद्रादेवीकी भगवान् ब्रह्मा स्तुति करने लगे ॥६४-७१॥<br><br>ब्रह्मोवाच ॥७२॥<br>त्वं स्वाहा त्वं स्वधा त्वं हि वषट्कारः स्वरात्मिका ॥७३॥<br>सुधा त्वमक्षरे नित्ये त्रिधा मात्रात्मिका स्थिता।<br>अर्धमात्रास्थिता नित्या यानुच्चार्या विशेषतः ॥७४॥<br>त्वमेव संध्या सावित्री त्वं देवि जननी परा।<br>त्वयैतद्धार्यते विश्वं त्वयैतत्सूज्यते जगत् ॥७५॥<br>त्वयैतत्पाल्यते देवि त्वमत्स्यन्ते च सर्वदा।<br>विसृष्टौ सृष्टिरूपा त्वं स्थितिरूपा च पालने ॥७६॥<br>तथा संहृतिरूपान्ते जगतोऽस्य जगन्मये।<br>महाविद्या महामाया महामेधा महास्मृतिः ॥७७॥<br>महामोहा च भवती महादेवी महासुरी।<br>प्रकृतिस्त्वं च सर्वस्य गुणत्रयविभाविनी ॥७८॥<br>कालरात्रिर्महारात्रिर्मोहरात्रिश्च दारुणा।<br>त्वं श्रीस्त्वमीश्वरी त्वं ह्रीस्त्वं बुद्धिर्बोधलक्षणा ॥७९॥<br>लज्जा पुष्टिस्तथा तुष्टिस्त्वं शान्तिः क्षान्तिरेव च।<br>खड्गिनी शूलिनी घोरा गदिनी चक्रिणी तथा ॥८०॥<br>शङ्खिनी चापिनी बाणभुशुण्डीपरिघायुधा।<br>सौम्या सौम्यतराशेषसौम्येभ्यस्त्वतिसुन्दरी ॥८१॥<br>परापराणां परमा त्वमेव परमेश्वरी<sup>२</sup>।<br>यच्च किंचित्क्वचिद्वस्तु सदसद्वाखिलात्मिके ॥८२॥<br>तस्य सर्वस्य या शक्तिः सा त्वं किं स्तूयसे तदा<sup>३</sup>।<br>यया त्वया जगत्स्रष्टा जगत्पात्यत्ति<sup>४</sup> यो जगत् ॥८३॥ | सोऽपि निद्रावशं नीतः कस्त्वां स्तोतुमिहेश्वरः।<br>विष्णुः शरीरग्रहणमहमीशान एव च ॥८४॥<br>कारितास्ते यतोऽतस्त्वां कः स्तोतुं शक्तिमान् भवेत्।<br>सा त्वमित्थं प्रभावैः स्वैरुदारैर्देवि संस्तुता ॥८५॥<br>मोहयैतौ दुराधर्षावसुरौ मधुकैटभौ।<br>प्रबोधं च जगत्स्वामी नीयतामच्युतो लघु ॥८६॥<br>बोधश्च क्रियतामस्य हन्तुमेतौ महासुरौ ॥८७॥<br><br>ब्रह्माजीने कहा— ॥७२॥ देवि ! तुम्हीं स्वाहा, तुम्हीं स्वधा और तुम्हीं वषट्कार हो। स्वर भी तुम्हारे ही स्वरूप हैं। तुम्हीं जीवनदायिनी सुधा हो। नित्य अक्षर प्रणवमें अकार, उकार, मकार—इन तीन मात्राओंके रूपमें तुम्हीं स्थित हो तथा इन तीन मात्राओंके अतिरिक्त जो बिन्दुरूपा नित्य अर्धमात्रा है, जिसका विशेष रूपसे उच्चारण नहीं किया जा सकता, वह भी तुम्हीं हो। देवि! तुम्हीं संध्या, सावित्री तथा परम जननी हो। देवि! तुम्हीं इस विश्व ब्रह्माण्डको धारण करती हो। तुमसे ही इस जगत्की सृष्टि होती है। तुम्हींसे इसका पालन होता है और सदा तुम्हीं कल्पके अन्तमें सबको अपना ग्रास बना लेती हो। जगन्मयी देवि! इस जगत्की उत्पत्तिके समय तुम सृष्टिरूपा हो, पालन-कालमें स्थितिरूपा हो तथा कल्पान्तके समय संहार रूप धारण करनेवाली हो। तुम्हीं महाविद्या, महामाया, महामेधा, महास्मृति, महामोह-रूपा, महादेवी और महासुरी हो। तुम्हीं तीनों गुणोंको उत्पन्न करनेवाली सबकी प्रकृति हो। भयंकर कालरात्रि, महारात्रि और मोहरात्रि भी तुम्हीं हो। तुम्हीं श्री, तुम्हीं ईश्वरी, तुम्हीं ह्री और तुम्हीं बोधस्वरूपा बुद्धि हो। लज्जा, पुष्टि, तुष्टि, शान्ति और क्षमा भी तुम्हीं हो। तुम खड्गधारिणी, शूलधारिणी, घोररूपा तथा गदा, चक्र, शङ्ख और |
१. पा०—सा त्वं। २. पा०—महेश्वरी। ३. पा०—तया। ४. पा०—पातात्ति।
१८४ * संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण *
धनुष धारण करनेवाली हो। बाण, भुशुण्डी और
परिघ-ये भी तुम्हारे अस्त्र हैं। तुम सौम्य और
सौम्यतर हो- इतना ही नहीं, जितने भी सौम्य एवं
सुन्दर पदार्थ हैं, उन सबकी अपेक्षा तुम अत्यधिक
सुन्दरी हो। पर और अपर-सबसे परे रहनेवाली
परमेश्वरी तुम्हीं हो। सर्वस्वरूपे देवि! कहीं भी
सत्-असत्रूप जो कुछ वस्तुएँ हैं और उन सबकी
जो शक्ति है, वह तुम्हीं हो। ऐसी अवस्थामें तुम्हारी
स्तुति क्या हो सकती है। जो इस जगत्की सृष्टि,
पालन और संहार करते हैं, उन भगवान्को भी जब
तुमने निद्राके अधीन कर दिया है तो तुम्हारी स्तुति
करनेमें यहाँ कौन समर्थ हो सकता है। मुझको,
भगवान् शङ्करको तथा भगवान् विष्णुको भी तुमने
ही शरीर धारण कराया है; अतः तुम्हारी स्तुति
करनेकी शक्ति किसमें है। देवि! तुम तो अपने इन
उदार प्रभावोंसे ही प्रशंसित हो। ये जो दोनों दुर्धर्ष
असुर मधु और कैटभ हैं, इनको मोहमें डाल दो
और जगदीश्वर भगवान् विष्णुको शीघ्र ही जगा दो।
साथ ही इनके भीतर इन दोनों महान् असुरोंको मार
डालनेकी बुद्धि उत्पन्न कर दो ॥ ७३-८७॥
ऋषिरुवाच ॥ ८८ ॥
एवं स्तुता तदा देवी तामसी तत्र वेधसा ॥ ८९ ॥
विष्णोः प्रबोधनार्थाय विहन्तुं मधुकैटभौ।
नेत्रास्यनासिकाबाहुहृदयेभ्यस्तथोरसः ॥ ९० ॥
निर्गम्य दर्शने तस्थौ ब्रह्मणोऽव्यक्तजन्मनः।
उत्तस्थौ च जगन्नाथस्तया मुक्तो जनार्दनः ॥ ९१ ॥
एकार्णवेऽहिशयनात्ततः स ददृशे च तौ।
मधुकैटभौ दुरात्मानावतिवीर्यपराक्रमौ ॥ ९२ ॥
क्रोधरक्तेक्षणावत्तुं ब्रह्माणं जनितोद्यमौ ।
समुत्थाय ततस्ताभ्यां युयुधे भगवान् हरिः ॥ ९३ ॥
पञ्चवर्षसहस्राणि बाहुप्रहरणो विभुः।
तावप्यतिबलोन्मत्तौ महामायाविमोहितौ ॥ ९४ ॥
१. पाठ-णी हन्तुं
उक्तवन्तौ वरोऽस्मत्तो ब्रियतामिति केशवम् ॥ ९५ ॥
ऋषि कहते हैं- ॥ ८८ ॥ राजन् ! जब ब्रह्माजीने
वहाँ मधु और कैटभको मारनेके उद्देश्यसे भगवान्
विष्णुको जगानेके लिये तमोगुणकी अधिष्ठात्री
देवी योगनिद्राकी इस प्रकार स्तुति की, तब वे
भगवान्के नेत्र, मुख, नासिका, बाहु, हृदय और
वक्षःस्थलसे निकलकर अव्यक्तजन्मा ब्रह्माजीकी
दृष्टिके समक्ष खड़ी हो गयीं। योगनिद्रासे मुक्त
होनेपर जगत्के स्वामी भगवान् जनार्दन उस
एकार्णवके जलमें शेषनागकी शय्यासे जाग उठे।
फिर उन्होंने उन दोनों असुरोंको देखा। वे दुरात्मा
मधु और कैटभ अत्यन्त बलवान् तथा पराक्रमी थे
और क्रोधसे लाल आँखें किये ब्रह्माजीको खा
जानेके लिये उद्योग कर रहे थे। तब भगवान्
श्रीहरिने उठकर उन दोनोंके साथ पाँच हजार
वर्षोंतक केवल बाहुयुद्ध किया। वे दोनों भी
अत्यन्त बलके कारण उन्मत्त हो रहे थे। इधर
- मेधा ऋषिका राजा सुरथ और समाधिको भगवतीकी महिमा सुनाना * १८५
महामायाने भी उन्हें मोहमें डाल रखा था; इसलिये वे भगवान् विष्णुसे कहने लगे—'हम तुम्हारी वीरतासे संतुष्ट हैं; तुम हमलोगोंसे कोई वर माँगो'॥ ८९–९५॥
श्रीभगवानुवाच ॥ ९६ ॥
भवेतामद्य मे तुष्टौ मम वध्यावुभावपि ॥ ९७ ॥
किमन्येन वरेणात्र एतावद्धि वृतं ममे^१ ॥ ९८ ॥
श्रीभगवान् बोले— ॥ ९६ ॥ यदि तुम दोनों मुझपर प्रसन्न हो तो अब मेरे हाथसे मारे जाओ। बस, इतना-सा ही मैंने वर माँगा है। यहाँ दूसरे किसी वरसे क्या लेना है॥ ९७-९८॥
ऋषिरुवाच ॥ ९९ ॥
वञ्चिताभ्यामिति तदा सर्वमापोमयं जगत् ॥ १०० ॥
विलोक्य ताभ्यां गदितो भगवान् कमलेक्षणः^२।
आवां जहि न यत्रोर्वी सलिलेन परिप्लुता ॥ १०१ ॥
ऋषि कहते हैं— ॥ ९९ ॥ इस प्रकार धोखेमें आ जानेपर जब उन्होंने सम्पूर्ण जगत्में जल ही-जल देखा तब कमलनयन भगवान्से कहा—'जहाँ पृथ्वी जलमें डूबी हुई न हो—जहाँ सूखा स्थान हो, वहीं हमारा वध करो'॥ १००–१०१॥
ऋषिरुवाच ॥ १०२ ॥
तथेत्युक्त्वा भगवता शङ्खचक्रगदाभृता।
कृत्वा चक्रेण वै च्छिन्ने जघने शिरसी तयोः ॥ १०३ ॥
एवमेषा समुत्पन्ना ब्रह्मणा संस्तुता स्वयम्।
प्रभावमस्या देव्यास्तु भूयः शृणु वदामि ते ॥ ऐं ॐ ॥ १०४ ॥
ऋषिकहते हैं— ॥ १०२ ॥ तब 'तथास्तु' कहकर शङ्ख, चक्र और गदा धारण करनेवाले भगवान्ने उन दोनोंके मस्तक अपनी जाँघपर रखकर चक्रसे काट डाले। इस प्रकार ये देवी महामाया ब्रह्माजीकी स्तुति करनेपर स्वयं प्रकट हुई थीं। अब पुनः तुमसे उनके प्रभावका वर्णन करता हूँ, सुनो॥ १०३–१०४॥
इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे सावर्णिके मन्वन्तरे देवीमाहात्म्ये मधुकैटभवधो नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥
उवाच १४, अर्धश्लोकाः २४, श्लोकाः ६६, एवम् ॥ १०४ ॥
इस प्रकार श्रीमार्कण्डेयपुराणमें सावर्णिक मन्वन्तरकी कथाके अन्तर्गत देवीमाहात्म्यमें 'मधु-कैटभ-वध' नामक पहला अध्याय पूरा हुआ ॥ १ ॥
१. पा०- मया। २. मार्कण्डेयपुराणकी कई प्रतियोंमें यहाँ 'प्रीतो स्वस्तव युद्धेन श्लाघ्यस्त्वं मृत्युरावयोः।' इतना अधिक पाठ है।
[ 539 ] सं० मा० पु०—७
१८६ • संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण •
द्वितीयोऽध्यायः
देवताओंके तेजसे देवीका प्रादुर्भाव और महिषासुरकी सेनाका वध
विनियोग
[ ॐ मध्यमचरित्रस्य विष्णुर्ऋषिर्महालक्ष्मीर्देवता,
उष्णिक् छन्दः, शाकम्भरी शक्तिः दुर्गा बीजम्,
वायुस्तत्त्वम्, यजुर्वेदः स्वरूपम्, श्रीमहालक्ष्मीप्रीत्यर्थे
मध्यमचरित्रजपे विनियोगः ।
ॐ मध्यम चरित्रके विष्णु ऋषि, महालक्ष्मी
देवता, उष्णिक् छन्द, शाकम्भरी शक्ति, दुर्गा
बीज, वायु तत्त्व और यजुर्वेद स्वरूप है।
श्रीमहालक्ष्मीकी प्रसन्नताके लिये मध्यम चरित्रके
पाठमें इसका विनियोग है।
ध्यान
ॐ अक्षस्रक्परशुं गदेषुकुलिशं पद्मं धनुष्कुण्डिकां
दण्डं शक्तिमसिं च चर्म जलजं घण्टां सुराभाजनम्।
शूलं पाशसुदर्शने च दधतीं हस्तैः प्रवालप्रभां
सेवे सैरिभमर्दिनीमिह महालक्ष्मीं सरोजस्थिताम् ॥
मैं कमलके आसनपर बैठी हुई महिषासुरमर्दिनी
भगवती महालक्ष्मीका भजन करता हूँ, जो अपने
हाथोंमें अक्षमाला, फरसा, गदा, बाण, वज्र, पद्म,
धनुष, कुण्डिका, दण्ड, शक्ति, खड्ग, ढाल, शंख,
घण्टा, मधुपात्र, शूल, पाश और चक्र धारण
करती हैं तथा जिनके श्रीविग्रहकी कान्ति मूँगेके
समान लाल है।]
'ॐ ह्रीं' ऋषिरुवाच ॥१॥
देवासुरमभूद्युद्धं पूर्णमब्दशतं पुरा।
महिषेऽसुराणामधिपे देवानां च पुरंदरे ॥२॥
तत्रासुरैर्महावीर्यैर्देवसैन्यं पराजितम् ।
जित्वा च सकलान् देवानिन्द्रोऽभून्महिषासुरः ॥ ३॥
ततः पराजिता देवाः पद्मयोनिं प्रजापतिम् ।
पुरस्कृत्य गतास्तत्र यत्रेशगरुडध्वजौ ॥ ४॥
यथावृत्तं तयोस्तद्वन्महिषासुरचेष्टितम् ।
त्रिदशाः कथयामासुर्देवाभिभवविस्तरम् ॥ ५॥
सूर्येन्द्राग्न्यनिलेन्दूनां यमस्य वरुणस्य च।
अन्येषां चाधिकारान् स स्वयमेवाधितिष्ठति ॥ ६ ॥
स्वर्गान्निराकृताः सर्वे तेन देवगणा भुवि ।
विचरन्ति यथा मर्त्या महिषेण दुरात्मना ॥ ७॥
एतद्वः कथितं सर्वममरारिविचेष्टितम् ।
शरणं वः प्रपन्नाः स्मो वधस्तस्य विचिन्त्यताम् ॥ ८॥
ऋषि कहते हैं - ॥ १ ॥ पूर्वकालमें देवताओं
और असुरोंमें पूरे सौ वर्षोंतक घोर संग्राम
हुआ था। उसमें असुरोंका स्वामी महिषासुर था
और देवताओंके नायक इन्द्र थे। उस युद्धमें
देवताओंकी सेना महाबली असुरोंसे परास्त हो
गयी। सम्पूर्ण देवताओंको जीतकर महिषासुर
इन्द्र बन बैठा ॥ २-३ ॥ तब पराजित देवता
प्रजापति ब्रह्माजीको आगे करके उस स्थानपर
गये, जहाँ भगवान् शंकर और विष्णु विराजमान
थे ॥ ४॥ देवताओंने महिषासुरके पराक्रम तथा
अपनी पराजयका यथावत् वृत्तान्त उन दोनों
देवेश्वरोंसे विस्तारपूर्वक कह सुनाया ॥ ५॥ वे
बोले- 'भगवन् ! महिषासुर सूर्य, इन्द्र, अग्नि,
वायु, चन्द्रमा, यम, वरुण तथा अन्य देवताओंके
भी अधिकार छीनकर स्वयं ही सबका अधिष्ठाता
बना बैठा है ॥ ६॥ उस दुरात्मा महिषने समस्त
देवताओंको स्वर्गसे निकाल दिया है। अब वे
मनुष्योंकी भाँति पृथ्वीपर विचरते हैं ॥ ७॥ दैत्योंकी
यह सारी करतूत हमने आपलोगोंसे कह सुनायी।
अब हम आपकी ही शरणमें आये हैं। उसके
वधका कोई उपाय सोचिये' ॥ ८॥
- देवताओंके तेजसे देवीका प्रादुर्भाव और महिषासुरकी सेनाका वध * १८७
अन्येषां चैव देवानां सम्भवस्तेजसां शिवा ॥ १८ ॥
इस प्रकार देवताओंके वचन सुनकर भगवान्
विष्णु और शिवने दैत्योंपर बड़ा क्रोध किया।
उनकी भौंहें तन गयीं और मुँह टेढ़ा हो गया ॥ ९ ॥
तब अत्यन्त कोपमें भरे हुए चक्रपाणि श्रीविष्णुके
मुखसे एक महान् तेज प्रकट हुआ। इसी प्रकार
ब्रह्मा, शंकर तथा इन्द्र आदि अन्यान्य देवताओंके
शरीरसे भी बड़ा भारी तेज निकला। वह सब
मिलकर एक हो गया ॥ १०-११॥ महान् तेजका
वह पुञ्ज जाज्वल्यमान पर्वत सा जान पड़ा। देवताओोंने
देखा, वहाँ उसकी ज्वालाएँ सम्पूर्ण दिशाओंमें व्याप्त
हो रही थीं ॥ १२ ॥ सम्पूर्ण देवताओंके शरीरसे प्रकट
हुए उस तेजकी कहीं तुलना नहीं थी। एकत्रित
होनेपर वह एक नारीके रूपमें परिणत हो गया
और अपने प्रकाशसे तीनों लोकोंमें व्याप्त जान
इत्थं निशम्य देवानां वचांसि मधुसूदनः ।
पड़ा ॥ १३ ॥ भगवान् शंकरका जो तेज था, उससे
चकार कोपं शम्भुश्च भुकुटीकुटिलाननौ ॥ ९ ॥
उस देवीका मुख प्रकट हुआ। यमराजके तेजसे
ततोऽतिकोपपूर्णस्य चक्रिणो वदनात्ततः ।
उसके सिरमें बाल निकल आये। श्रीविष्णुभगवान्के
निष्क्रान्तं महत्तेजो ब्रह्मणः शंकरस्य च ॥ १० ॥
तेजसे उसकी भुजाएँ उत्पन्न हुईं ॥ १४॥ चन्द्रमाके
अन्येषां चैव देवानां शक्रादीनां शरीरतः ।
निर्गतं सुमहत्तेजस्तच्चैक्यं समगच्छत ॥ ११ ॥
अतीव तेजसः कूटं ज्वलन्तमिव पर्वतम् ।
ददृशुस्ते सुरास्तत्र ज्वाला व्याप्तदिगन्तरम् ॥ १२ ॥
अतुलं तत्र तत्तेजः सर्वदेवशरीरजम् ।
एकस्थं तदभून्नारी व्याप्तलोकत्रयं त्विषा ॥ १३ ॥
यदभूच्छाम्भवं तेजस्तेनाजयत तन्मुखम् ।
याम्येन चाभवन् केशा बाहवो विष्णुतेजसा ॥ १४ ॥
सौम्येन स्तनयोर्युग्मं मध्यं चैन्द्रेण चाभवत् ।
वारुणेन च जङ्घोरू नितम्बस्तेजसा भुवः ॥ १५ ॥
ब्रह्मणस्तेजसा पादौ तदङ्गुल्योऽर्कतेजसा ।
वसूनां च कराङ्गुल्यः कौबेरेण च नासिका ॥ १६ ॥
तस्यास्तु दन्ताः सम्भूताः प्राजापत्येन तेजसा ।
नयनत्रितयं जज्ञे तथा पावकतेजसा ॥ १७॥
भ्रुवौ च संध्ययोस्तेजः श्रवणावनिलस्य च ।
| १८८ | • संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण • |
|---|
| तेजसे दोनों स्तनोंका और इन्द्रके तेजसे मध्यभाग (कटिप्रदेश)-का प्रादुर्भाव हुआ। वरुणके तेजसे जङ्घा और पिंडली तथा पृथ्वीके तेजसे नितम्बभाग प्रकट हुआ ॥ १५ ॥ ब्रह्माके तेजसे दोनों चरण और सूर्यके तेजसे उनकी अंगुलियाँ हुईं। वसुओंके तेजसे हाथोंकी अंगुलियाँ और कुबेरके तेजसे नासिका प्रकट हुई ॥ १६ ॥ उस देवीके दाँत प्रजापतिके तेजसे और तीनों नेत्र अग्निके तेजसे प्रकट हुए थे ॥ १७ ॥ उसकी भौंहें संध्याके और कान वायुके तेजसे उत्पन्न हुए थे। इसी प्रकार अन्यान्य देवताओंके तेजसे भी उस कल्याणमयी देवीका आविर्भाव हुआ ॥ १८ ॥ | अददज्जलधिस्तस्यै पङ्कजं चातिशोभनम् ।<br>हिमवान् वाहनं सिंहं रत्नानि विविधानि च ॥ २९ ॥<br>ददावशून्यं सुरया पानपात्रं धनाधिपः ।<br>शेषश्च सर्वनागेशो महामणिविभूषितम् ॥ ३० ॥<br>नागहारं ददौ तस्यै धत्ते यः पृथिवीमिमाम्।<br>अन्यैरपि सुरैर्देवी भूषणैरायुधैस्तथा ॥ ३१ ॥<br>सम्मानिता ननादोच्चैः साट्टहासं मुहुर्मुहुः ।<br>तस्या नादेन घोरेण कृत्स्नमापूरितं नभः ॥ ३२ ॥<br>अमायतातिमहता प्रतिशब्दो महानभूत् ।<br>चुक्षुभुः सकला लोकाः समुद्राश्च चकम्पिरे ॥ ३३ ॥<br>चचाल वसुधा चेलुः सकलाश्च महीधराः ।<br>जयेति देवाश्च मुदा तामूचुः सिंहवाहिनीम् ॥ ३४ ॥<br>तुष्टुवुर्मुनयश्चैनां भक्तिनम्रात्ममूर्तयः । |
| ततः समस्तदेवानां तेजोरशिसमुद्भवाम् ।<br>तां विलोक्य मुदं प्रापुरामरा महिषार्दिताः ॥ १९ ॥<br>शूलं शूलाद्विनिष्कृष्य ददौ तस्यै पिनाकधृक् ।<br>चक्रं च दत्तवान् कृष्णः समुत्पाद्य स्वचक्रतः ॥ २० ॥<br>शङ्खं च वरुणः शक्तिं ददौ तस्यै हुताशनः ।<br>मारुतो दत्तवांश्चापं बाणपूर्णे तथेषुधी ॥ २१ ॥<br>वज्रमिन्द्रः समुत्पाद्य कुलिशादमराधिपः ।<br>ददौ तस्यै सहस्राक्षो घण्टामैरावताद् गजात् ॥ २२ ॥<br>कालदण्डाद्यमो दण्डं पाशं चाम्बुपतिर्ददौ ।<br>प्रजापतिश्चाक्षमालां ददौ ब्रह्मा कमण्डलुम् ॥ २३ ॥<br>समस्तरोमकूपेषु निजरश्मीन् दिवाकरः ।<br>कालश्च दत्तवान् खड्गं तस्याश्चर्म च निर्मलम् ॥ २४ ॥<br>क्षीरोदश्चामलं हारमजरे च तथाम्बरे ।<br>चूडामणिं तथा दिव्यं कुण्डले कटकानि च ॥ २५ ॥<br>अर्धचन्द्रं तथा शुभ्रं केयूरान् सर्वबाहुषु ।<br>नूपुरौ विमलौ तद्वद् ग्रैवेयकमनुत्तमम् ॥ २६ ॥<br>अङ्गुलीयकरत्नानि समस्तास्वङ्गुलीषु च।<br>विश्वकर्मा ददौ तस्यै परशुं चातिनिर्मलम् ॥ २७ ॥<br>अस्त्राण्यनेकरूपाणि तथाभेद्यं च दंशनम्।<br>अम्लानपङ्कजां मालां शिरस्युरसि चापराम् ॥ २८ ॥ | तदनन्तर समस्त देवताओंके तेजःपुञ्जसे प्रकट हुई देवीको देखकर महिषासुरके सताये हुए देवता बहुत प्रसन्न हुए ॥ १९ ॥ पिनाकधारी भगवान् शङ्करने अपने शूलसे एक शूल निकालकर उन्हें दिया; फिर भगवान् विष्णुने भी अपने चक्रसे चक्र उत्पन्न करके भगवतीको अर्पण किया ॥ २० ॥ वरुणने भी शङ्ख भेंट किया, अग्निने उन्हें शक्ति दी और वायुने धनुष तथा बाणसे भरे हुए दो तरकस प्रदान किये ॥ २१ ॥ सहस्र नेत्रोंवाले देवराज इन्द्रने अपने वज्रसे वज्र उत्पन्न करके दिया और ऐरावत हाथीसे उतारकर एक घण्टा भी प्रदान किया ॥ २२ ॥ यमराजने कालदण्डसे दण्ड, वरुणने पाश, प्रजापतिने स्फटिकाक्षकी माला तथा ब्रह्माने कमण्डलु भेंट किया ॥ २३ ॥ सूर्यने देवीके समस्त रोम-कूपोंमें अपनी किरणोंका तेज भर दिया। कालने उन्हें चमकती हुई ढाल और तलवार दी ॥ २४ ॥ क्षीरसमुद्रने उज्ज्वल हार तथा कभी जीर्ण न होनेवाले दो दिव्य वस्त्र भेंट किये। साथ |
१. कई प्रतियोंमें इसके बाद 'ततो देवा ददुस्तस्यै स्थानि स्वान्यायुधानि च। उच्चैरनद्यंश्चोद्युक्तास्ते जयैषिणः।' इतना पाठ अधिक है। २. पा०—क्ता। ३. पा०—दद्वा। ४. पा०—तस्यै धारि। ५. पा०—वाहनान्।
•देवताओंके तेजसे देवीका प्रादुर्भाव और महिषासुरकी सेनाका वध• १८९
हो उन्होंने दिव्य चूड़ामणि, दो कुण्डल, कड़े, संनद्धाखिलसैन्यास्ते समुत्तस्थुरुदायुधाः ।
उज्ज्वल अर्धचन्द्र, सब बाहुओंके लिये केयूर, आः किमेतदिति क्रोधादाभाष्य महिषासुरः ॥ ३६ ॥
दोनों चरणोंके लिये निर्मल नूपुर, गलेकी सुन्दर अभ्यधावत तं शब्दमशेषैरसुरैर्वृतः ।
हँसली और सब अँगुलियोंमें पहननेके लिये स ददर्श ततो देवीं व्याप्तलोकत्रयां त्विषा ॥ ३७॥
रत्नोंकी बनी अँगूठियाँ भी दीं। विश्वकर्माने उन्हें पादाक्रान्त्या नतभुवं किरीटोल्लिखिताम्बराम् ।
अत्यन्त निर्मल फरसा भेंट किया॥ २५-२७॥ क्षोभिताशेषपातालां धनुर्ज्यानिःस्वनेन ताम् ॥ ३८ ॥
साथ ही अनेक प्रकारके अस्त्र और अभेद्य कवच दिशो भुजसहस्रेण समन्ताद् व्याप्य संस्थिताम्।
दिये; इनके सिवा मस्तक और वक्षःस्थलपर ततः प्रववृते युद्धं तया देव्या सुरद्विषाम् ॥ ३९ ॥
धारण करनेके लिये कभी न कुम्हलानेवाले शस्त्रास्त्रैर्बहुधा मुक्तैरादीपितदिगन्तरम् ।
कमलोंकी मालाएँ दीं ॥ २८ ॥ जलधिने उन्हें सुन्दर महिषासुरसेनानीश्चिक्षुराख्यो महासुरः ॥४०॥
कमलका फूल भेंट किया। हिमालयने सवारीके युयुधे चामरश्चान्यैश्चतुरङ्गबलान्वितः ।
लिये सिंह तथा भाँति भाँतिके रत्न समर्पित रथानामयुतैः षड्भिरुदग्राख्यो महासुरः ॥४१ ॥
किये ॥ २९ ॥ धनाध्यक्ष कुबेरने मधुसे भरा पानपात्र अयुध्यतायुतानां च सहस्रेण महाहनुः ।
दिया तथा सम्पूर्ण नागोंके राजा शेषने, जो इस पञ्चाशद्भिश्श्च नियुतैरसलोमा महासुरः ॥ ४२ ॥
पृथ्वीको धारण करते हैं, उन्हें बहुमूल्य मणियोंसे अयुतानां शतैः षड्भिर्बाष्कलो युयुधे रणे ।
विभूषित नागहार भेंट दिया। इसी प्रकार अन्य गजवाजियस्रौधैरनेकैः परिवारितः ॥ ४३ ॥
देवताओंगने भी आभूषण और अस्त्र-शस्त्र देकर वृतो रथानां कोट्या च युद्धे तस्मिन्नयुध्यत ।
देवीका सम्मान किया। तत्पश्चात् उन्होंने बारंबार बिडालाख्योऽयुतानां च पञ्चाशद्भिरथायुतैः ॥४४॥
अट्टहासपूर्वक उच्चस्वरसे गर्जना की। उनके भयंकर युयुधे संयुगे तत्र रथानां परिवारितः ।
नादसे सम्पूर्ण आकाश गूँज उठा ॥ ३०-३२॥ अन्ये च तत्रायुतशो रथनागहयैर्वृताः ॥४५॥
देवीका वह अत्यन्त उच्चस्वरसे किया हुआ युयुधुः संयुगे देव्या सह तत्र महासुराः ।
सिंहनाद कहीं समा न सका, आकाश उनके कोटिकोटिसहस्रैस्तु रथानां दन्तिनां तथा ॥ ४६ ॥
सामने लघु प्रतीत होने लगा। उससे बड़े जोरकी हयानां च वृतो युद्धे तत्राभून्महिषासुरः ।
प्रतिध्वनि हुई, जिससे सम्पूर्ण विश्वमें हलचल तोमरैर्भिन्दिपालैश्च शक्तिभिर्मुसलैस्तथा ॥ ४७॥
मच गयी और समुद्र काँप उठे ॥ ३३॥ पृथ्वी युयुधुः संयुगे देव्या खड्गैः परशुट्टिशैः ।
डोलने लगी और समस्त पर्वत हिलने लगे। उस केचिच्च चिक्षिपुः शक्तीः केचित्पाशांस्तथापरे ॥ ४८ ॥
समय देवताओंने अत्यन्त प्रसन्नताके साथ सिंहवाहिनी देवीं खड्गप्रहारैस्तु ते तां हन्तुं प्रचक्रमुः ।
भवानीसे कहा-'देवि ! तुम्हारी जय हो' ॥ ३४॥ सापि देवी ततस्तानि शस्त्राण्यस्त्राणि चण्डिका ॥ ४९ ॥
साथ ही महर्षियोंने भक्तिभावसे विनम्र होकर लीलयैव प्रचिच्छेद निजशस्त्रास्त्रवर्षिणी ।
उनका स्तवन किया। अनायस्तानना देवी स्तूयमाना सुरर्षिभिः ॥५०॥
दृष्ट्वा समस्तं संक्षुब्धं त्रैलोक्यममराचयः ॥ ३५ ॥ मुमोचासुरदेहेषु शस्त्राण्यस्त्राणि चेश्वरी।
१. पा०- कैरूटदंशः। २. किसी-किसी प्रतिमें इसके बाद 'वृतः स्वालो रथानां च रणे गङ्गावतार्णवः। युयुधे
संयुगे तत्र गजकोटिः परिवारितः ॥' इतना अधिक पाठ है।
१९० * संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण *
सम्पूर्ण त्रिलोकीको क्षोभग्रस्त देख दैत्यगण
अपनी समस्त सेनाको कवच आदिसे सुसज्जित
कर, हाथोंमें हथियार ले सहसा उठकर खड़े हो
गये। उस समय महिषासुरने बड़े क्रोधमें आकर
कहा- 'आः! यह क्या हो रहा है।' फिर वह
सम्पूर्ण असुरोंसे घिरकर उस सिंहनादकी ओर
लक्ष्य करके दौड़ा और आगे पहुँचकर उसने
देवीको देखा, जो अपनी प्रभासे तीनों लोकोंको
प्रकाशित कर रही थीं ॥ ३५-३७॥ उनके चरणोंके
भारसे पृथ्वी दबी जा रही थी। माथेके मुकुटसे
आकाशमें रेखा-सी खिंच रही थी तथा वे अपने
धनुषकी टङ्कारसे सातों पातालोंको क्षुब्ध किये
देती थीं ॥ ३८ ॥ देवी अपनी हजारों भुजाओंसे
सम्पूर्ण दिशाओंको आच्छादित करके खड़ी थीं।
तदनन्तर उनके साथ दैत्योंका युद्ध छिड़ गया ॥ ३९॥
नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंके प्रहारसे सम्पूर्ण
असुर महिषासुरका सेनानायक था ॥ ४०॥ वह
देवीके साथ युद्ध करने लगा। अन्य दैत्योंकी
चतुरङ्गिणी सेना साथ लेकर चामर भी लड़ने
लगा। साठ हजार रथियोंके साथ आकर उदग्र
नामक महादैत्यने लोहा लिया ॥ ४१ ॥ एक करोड़
रथियोंको साथ लेकर महाहनु नामक दैत्य युद्ध
करने लगा। जिसके रोएँ तलवारके समान तीखे
थे, वह असिलोमा नामक महादैत्य पाँच करोड़
रथी सैनिकोंसहित युद्धमें आ डटा ॥ ४२ ॥ साठ
लाख रथियोंसे घिरा हुआ बाष्कल नामक दैत्य
भी उस युद्धभूमिमें लड़ने लगा ॥ ४३ ॥ परिवारित १
नामक राक्षस हाथीसवार और घुड़सवारोंके अनेक
दलों तथा एक करोड़ रथियोंकी सेना लेकर युद्ध
करने लगा। बिडाल नामक दैत्य पाँच अरब
रथियोंसे घिरकर लोहा लेने लगा। इनके अतिरिक्त
और भी हजारों महादैत्य रथ, हाथी और घोड़ोंकी
सेना साथ लेकर वहाँ देवीके साथ युद्ध करने
लगे। स्वयं महिषासुर उस रणभूमिमें कोटि-कोटि
सहस्र रथ, हाथी और घोड़ोंकी सेनासे घिरा हुआ
खड़ा था। वे दैत्य देवीके साथ तोमर, भिन्दिपाल,
शक्ति, मूसल, खड्ग, परशु और पट्टिश आदि
अस्त्र-शस्त्रोंका प्रहार करते हुए युद्ध कर रहे थे।
कुछ दैत्योंने उनपर शक्तिका प्रहार किया, कुछ
लोगोंने पाश फेंके ॥ ४४-४८ ॥ तथा कुछ दूसरे
दैत्योंने खड्गप्रहार करके देवीको मार डालनेका
उद्योग किया। देवीने भी क्रोधमें भरकर खेल-
खेलमें ही अपने अस्त्र-शस्त्रोंकी वर्षा करके
दैत्योंके वे समस्त अस्त्र-शस्त्र काट डाले। उनके
मुखपर परिश्रम या थकावटका रंचमात्र भी चिह्न
नहीं था, देवता और ऋषि उनकी स्तुति करते थे
और वे भगवती परमेश्वरी दैत्योंके शरीरोंपर
दिशाएँ उद्भासित होने लगीं। चिक्षुर नामक महान्
अस्त्र-शस्त्रोंकी वर्षा करती रहीं।
१. परितो वारयति शत्रूनिति व्युत्पत्तिः।
• देवताओंके तेजसे देवीका प्रादुर्भाव और महिषासुरकी सेनाका वध •
१९१
सोऽपि क्रुद्धो धुतसटो देव्या वाहनकेसरी ॥ ५१ ॥
चचारासुरसैन्येषु वनेष्विव हुताशनः ।
निःश्वासान् मुमुचे यांश्च युध्यमाना रणेऽम्बिका ॥ ५२ ॥
त एव सद्यः सम्भूता गणाः शतसहस्रशः ।
युयुधुस्ते परशुभिर्भिन्दिपालासिपट्टिशैः ॥ ५३ ॥
नाशयन्तोऽसुरगणान् देवीशक्त्युपबृंहिताः ।
अवादयन्त पटहान् गणाः शङ्खांस्तथापरे ॥ ५४ ॥
मृदङ्गांश्च तथैवान्ये तस्मिन् युद्धमहोत्सवे ।
ततो देवी त्रिशूलेन गदया शक्तितृष्टिभिः ॥ ५५ ॥
खड्गादिभिश्च शतशो निजघान महासुरान् ।
पातयामास चैवान्यान् घण्टास्वनविमोहितान् ॥ ५६ ॥
असुरान् भुवि पाशेन बद्ध्वा चान्यानकर्षयत् ।
केचिद् द्विधा कृतास्तीक्ष्णैः खड्गपातैस्तथापरे ॥ ५७ ॥
विपोथिता निपातेन गदया भुवि शेरते ।
वेमुश्च केचिद्रुधिरं मुसलेन भृशं हताः ॥ ५८ ॥
केचिन्निपतिता भूमौ भिन्नाः शूलेन वक्षसि ।
निरन्तराः शरौघेण कृताः केचिद्रणाजिरे ॥ ५९ ॥
श्येनानुकारिणः प्राणाम् मुमुचुस्त्रिदशार्दनाः ।
केषांचिद् बाहवश्छिन्नाश्छिन्नग्रीवास्तथापरे ॥ ६० ॥
शिरांसि पेतुरन्येषामन्ये मध्ये विदारिताः ।
विच्छिन्नजङ्घास्त्वपरे पेतुरुर्व्यां महासुराः ॥ ६१ ॥
एकबाह्वक्षिकरणाः केचिद्देव्या द्विधा कृताः ।
छित्नेऽपि चान्ये शिरसि पतिताः पुनरुत्थिताः ॥ ६२ ॥
कबन्धा युयुधुर्देव्या गृहीतपरमायुधाः ।
ननृतुश्चापरे तत्र युद्धे तूर्यलयाश्रिताः ॥ ६३ ॥
कवन्धाश्छिन्नशिरसः खड्गशक्त्यृष्टिपाणयः ।
तिष्ठ तिष्ठेति भाषन्तो देवीमन्ये महासुराः ॥ ६४ ॥
पातितै रथनागाश्वैरसुरैश्च वसुंधरा ।
अगम्या साभवत्तत्र यत्राभूत्स महारणः ॥ ६५ ॥
शोणितौघा महानद्यः सद्यस्तत्र प्रसुस्रुवुः ।
मध्ये चासुरसैन्यस्य वारणासुरवाजिनाम् ॥ ६६ ॥
क्षणेन तन्महासैन्यमसुराणां तथाम्बिका ।
निन्ये क्षयं यथा वह्निस्तृणदारुमहाचयम् ॥ ६७ ॥
स च सिंहो महानादमत्सृजन्धुतकेसरः ।
शरीरेभ्योऽपरारीणामसूनिव विचिन्वति ॥ ६८ ॥
देव्या गणैश्च तैस्तत्र कृतं युद्धं महासुरैः ।
यथैषां तुतुषुद्देवाः पुष्पवृष्टिमुचो दिवि ॥ ॐ ॥ ६९ ॥
देवीका वाहन वह सिंह भी क्रोधमें भरकर
गर्दैनके बालोंको हिलाता हुआ असुरोंकी सेनामें
इस प्रकार विचरने लगा, मानो वनोंमें दावानल
फैल रहा हो। रणभूमिमें दैत्योंके साथ युद्ध करती
हुई अम्बिका देवीने जितने निःश्वास छोड़े, वे
सभी तत्काल सैकड़ों-हजारों गणोंके रूपमें प्रकट
हो गये और परशु, भिन्दिपाल, खङ्ग तथा पट्टिश
आदि अस्त्रोंद्वारा असुरोंका सामना करने
लगे ॥ ४९-५३॥ देवीकी शक्तिसे बढ़े हुए वे
गण असुरोंका नाश करते हुए नगाड़ा और शङ्ख
आदि बाजे बजाने लगे ॥ ५४॥ उस संग्राम-
१. पा०-शरदृष्टिभिः। २. पा०- सेनानु०, शल्य।नु०, सेनान्युः। ३. किसी किसी प्रतिमें इसके बाद
'सर्वोपधिविलुप्ताङ्गाः संग्रामे लोभहर्षणे।' इतना पाठ अधिक है। ४. पा०-दर्पिनाः। ५. पा०-तुष्टुवुर्देवाः।
१९२
- संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण *
महोत्सवमें कितने ही गण मृदङ्ग बजा रहे थे।
तदनन्तर देवीने त्रिशूलसे, गदासे, शक्तिकी वर्षासे
और खड्ग आदिसे सैकड़ों महादैत्योंका संहार कर
डाला। कितनोंको घंटेके भयङ्कर नादसे मूच्छित
करके मार गिराया ॥ ५५-५६ ॥ बहुतेरे दैत्योंको
पाशसे बाँधकर धरतीपर घसीटा; कितने ही दैत्य
उनकी तीखी तलवारकी मारसे दो-दो टुकड़े हो
गये ॥ ५७ ॥ कितने ही गदाकी चोटसे घायल हो
धरतीपर सो गये। कितने ही मूसलकी मारसे
अत्यन्त आहत होकर रक्त वमन करने लगे। कुछ
दैत्य शूलसे छाती फट जानेके कारण पृथ्वीपर ढेर
हो गये। उस रणाङ्गणमें बाणसमूहोंकी वृष्टिसे
कितने ही असुरोंकी कमर टूट गयी ॥ ५८-५९ ॥
बाजकी तरह झपटनेवाले देवीभक्त दैत्यगण
अपने प्राणोंसे हाथ धोने लगे। किन्हींकी बाँहें
छिन्न-भिन्न हो गयीं, कितनोंकी गर्दन कट गयीं।
कितने ही दैत्योंके मस्तक कट-कटकर गिरने
लगे। कुछ लोगोंके शरीर मध्यभागमें ही विदीर्ण
हो गये। कितने ही महादैत्य जाँघें कट जानेसे
पृथ्वीपर गिर पड़े। कितनोंको ही देवीने एक
बाँह, एक पैर और एक नेत्रवाले करके दो
टुकड़ोंमें चीर डाला। कितने ही दैत्य मस्तक कट
जानेपर भी गिरकर फिर उठ जाते और केवल
धड़के ही रूपमें अच्छे-अच्छे हथियार हाथमें ले
देवीके साथ युद्ध करने लगते थे। दूसरे कबन्ध
युद्धके बाजोंकी लयपर नाचते थे ॥ ६०-६३॥
कितने ही बिना सिरके धड़ हाथोंमें खड्ग, शक्ति
और ऋष्टि लिये दौड़ते थे तथा दूसरे-दूसरे
महादैत्य 'ठहरो ! ठहरो !!' यह कहते हुए देवीको
युद्धके लिये ललकारते थे। जहाँ वह घोर संग्राम
हुआ था, वहाँकी धरती देवीके गिराये हुए रथ,
हाथी, घोड़े और असुरोंकी लाशोंसे ऐसी पट गयी
थी कि वहाँ चलना-फिरना असम्भव हो गया
था ॥ ६४-६५ ॥ दैत्योंकी सेनामें हाथी, घोड़े और
असुरोंके शरीरोंसे इतनी अधिक मात्रामें रक्तपात
हुआ था कि थोड़ी ही देरमें वहाँ खूनकी बड़ी-
बड़ी नदियाँ बहने लगीं ॥ ६६ ॥ जगदम्बाने असुरोंकी
विशाल सेनाको क्षणभरमें नष्ट कर दिया-ठीक
उसी तरह, जैसे तृण और काठके भारी ढेरको आग
कुछ ही क्षणोंमें भस्म कर देती है ॥ ६७ ॥ और वह
सिंह भी गर्दनके बालोंको हिला-हिलाकर जोर-
जोरसे गर्जना करता हुआ दैत्योंके शरीरोंसे मानो
उनके प्राण चूसे लेता था ॥ ६८ ॥ वहाँ देवीके
गणोंने भी उन महादैत्योंके साथ ऐसा युद्ध किया,
जिससे देवतागण उनपर आकाशसे फूल बरसाने
लगे और उन सबसे बहुत सन्तुष्ट हुए ॥ ६९ ॥
इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे सावर्णिके मन्वन्तरे देवीमाहात्म्ये महिषासुरसैन्यवधो नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥
उवाच १, श्लोकाः ६८, एवम् ६९, एवमादितः ॥ १७३ ॥
इस प्रकार श्रीमार्कण्डेयपुराणमें सावर्णिक मन्वन्तरकी कथाके अन्तर्गत देवी-माहात्म्यमें
'महिषासुरकी सेनाका वध' नामक दूसरा अध्याय पूरा हुआ ॥ २ ॥
- सेनापतियोंसहित महिषासुरका वध * १९३
तृतीयोऽध्यायः
सेनापतियोंसहित महिषासुरका वध
ध्यान
( ॐ उद्यद्भानुसहस्रकान्तिमरुणक्षौमां शिरोमालिकां
रक्तालिप्तपयोधरां जपवटीं विद्यामभीतिं वरम्।
हस्ताब्जैर्दधतीं त्रिनेत्रविलसद्वक्त्रारविन्दश्रियं
देवीं बद्धहिमांशुरात्ममुकुटां वन्डेऽरविन्दस्थिताम्॥
जगदम्बाके श्रीअङ्गोंकी कान्ति उदयकालके
सहस्रों सूर्योंके समान है। वे लाल रंगकी रेशमी
साड़ी पहने हुए हैं। उनके गलेमें मुण्डमाला शोभा
पा रही है। दोनों स्तनोंपर रक्तचन्दनका लेप लगा
है। वे अपने कर-कमलोंमें जपमालिका, विद्या,
अभय तथा वर-मुद्राएँ धारण किये हुए हैं। तीन
नेत्रोंसे सुशोभित मुखारविन्दकी बड़ी शोभा हो
रही है। उनके मस्तकपर चन्द्रमाके साथ ही
रत्नमय मुकुट बँधा है तथा वे कमलके आसनपर
विराजमान हैं। ऐसी देवीको मैं भक्तिपूर्वक प्रणाम
करता हूँ।)
तस्याः खड्गो भुजं प्राप्य पफाल नृपनन्दन।
ततो जग्राह शूलं स कोपादरुणलोचनः ॥ ८ ॥
चिक्षेप च ततस्तत्तु भद्रकाल्यां महासुरः।
जाज्वल्यमानं तेजोभी रविविम्बमिवाम्बरात् ॥ ९ ॥
दृष्ट्वा तदापतच्छूलं देवी शूलममुञ्चत।
तच्छूलं१ शतधा तेन नीतं स च महासुरः ॥ १० ॥
ऋषि कहते हैं- ॥ १ ॥ दैत्योंकी सेनाको इस
प्रकार तहस-नहस होते देख महादैत्य सेनापति
चिक्षुर क्रोधमें भरकर अम्बिका देवीसे युद्ध
करनेको आगे बढ़ा ॥ २ ॥ वह असुर रणभूमिमें
देवीके ऊपर इस प्रकार बाणोंकी वर्षा करने लगा,
जैसे बादल मेरुगिरिके शिखरपर पानीकी धार
बरसा रहा हो ॥ ३ ॥ तब देवीने अपने बाणोंसे
उसके बाण-समूहको अनायास ही काटकर उसके
घोड़ों और सारथिको भी मार डाला ॥ ४ ॥ साथ
ही उसके धनुष तथा अत्यन्त ऊँची ध्वजाको भी
तत्काल काट गिराया। धनुष कट जानेपर उसके
अङ्गोंको अपने बाणोंसे बींध डाला ॥ ५ ॥ धनुष,
रथ, घोड़े और सारथिके नष्ट हो जानेपर वह
असुर ढाल और तलवार लेकर देवीकी ओर
दौड़ा ॥ ६ ॥ उसने तीखी धारवाली तलवारसे सिंहके
मस्तकपर चोट करके देवीकी भी बायीं भुजामें
बड़े वेगसे प्रहार किया ॥७॥ राजन्! देवीकी
बाँहपर पहुँचते ही वह तलवार टूट गयी, फिर तो
क्रोधसे लाल आँखें करके उस राक्षसने शूल
हाथमें लिया ॥८॥ और उसे उस महादैत्यने
भगवती भद्रकालीके ऊपर चलाया। वह शूल
आकाशसे गिरते हुए सूर्यमण्डलकी भाँति अपने
तेजसे प्रज्वलित हो उठा ॥ ९॥ उस शूलको अपनी
ऋषिरुवाच ॥ १ ॥
'ॐ' निहन्यमानं तत्सैन्यमवलोक्य महासुरः।
सेनानीश्चिक्षुरः कोपाद्ययौ योद्धुमथाम्बिकाम् ॥ २ ॥
स देवीं शरवर्षेण ववर्ष समरेऽसुरः।
यथा मेरुगिरेः शृङ्गं तोयवर्षेण तोयदः ॥ ३ ॥
तस्यच्छित्त्वा ततो देवी लीलयैव शरोत्करान्।
जघान तुरगान् बाणैर्यन्तारं चैव वाजिनाम् ॥ ४ ॥
चिच्छेद च धनुः सद्यो ध्वजं चातिसमुच्छ्रितम्।
विव्याध चैव गात्रेषु छिन्नधन्वानमाशुगैः ॥ ५ ॥
सच्छिन्नधन्वा विरथो हताश्वो हतसारथिः।
अभ्यधावत तां देवीं खड्गचर्मधरोऽसुरः ॥ ६ ॥
सिंहमाहत्य खड्गेन तीक्ष्णधारेण मूर्धनि।
आजघान भुजे सव्ये देवीमप्यतिवेगवान् ॥ ७ ॥
१. पा०-तेन तच्छतधा नीतं।
| १९४ | * संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण * |
|---|
ओर आते देख देवीने भी शूलका प्रहार किया। उससे राक्षसके शूलके सैकड़ों टुकड़े हो गये,
साथ ही महादैत्य चिक्षुरकी भी धज्जियाँ उड़ गयीं। वह प्राणोंसे हाथ धो बैठा॥ १०॥
इते तस्मिन्महावीर्ये महिषस्य चमूपतौ।
आजगाम गजारूढश्चामरस्त्रिदशार्दनः ॥ ११॥
सोऽपि शक्तिं मुमोचाथ देव्यास्तामम्बिका द्रुतम्।
हुंकाराभिहतां भूमौ पातयामास निष्प्रभाम् ॥ १२ ॥
भग्नां शक्तिं निपतितां दृष्ट्वा क्रोधसमन्वितः।
चिक्षेप चामरः शूलं बाणैस्तदपि साच्छिनत् ॥ १३॥
ततः सिंहः समुत्पत्य गजकुम्भान्तरे स्थितः।
बाहुयुद्धेन युयुधे तेनोच्चैस्त्रिदशारिणा ॥ १४॥
युद्ध्यमानौ ततस्तौ तु तस्मान्नागान्महीं गतौ।
युयुधातेऽतिसंरब्धौ प्रहारैरतिदारुणैः ॥ १५॥
ततो वेगात्खमुत्पत्य निपत्य च मृगारिणा।
करप्रहारेण शिरश्चामरस्य पृथक्कृतम् ॥ १६ ॥
उदग्रश्च रणे देव्या शिलावृक्षादिभिर्हतः।
दन्तमुष्टितलैश्चैव करालश्च निपातितः ॥ १७॥
देवी क्रुद्धा गदापातैश्चूर्णयामास चोद्धतम्।
वाष्कलं भिन्दिपालेन बाणैस्तामं तथान्धकम् ॥ १८ ॥
उग्रास्यमुग्रवीर्यं च तथैव च महाहनुम्।
त्रिनेत्रा च त्रिशूलेन जघान परमेश्वरी ॥ १९॥
बिडालस्यासिना कायात्पातयामास वै शिरः।
दुर्धरं दुर्मुखं चोभौ शरैर्निन्ये यमक्षयम् ॥ २०॥
महिषासुरके सेनापति उस महापराक्रमी चिक्षुरके मारे जानेपर देवताओंको पीड़ा देनेवाला चामर हाथीपर चढ़कर आया। उसने भी देवीके ऊपर शक्तिका प्रहार किया, किन्तु जगदम्बाने उसे अपने हुंकारसे ही आहत एवं निष्प्रभ करके तत्काल पृथ्वीपर गिरा दिया॥ ११-१२॥ शक्तिको टूटकर गिरी हुई देख चामरको बड़ा क्रोध हुआ। अब उसने शूल चलाया, किन्तु देवीने उसे भी अपने बाणोंद्वारा काट डाला ॥ १३॥ इतनेमें ही देवीका सिंह उछलकर हाथीके मस्तकपर चढ़ बैठा और उस दैत्यके साथ खूब जोर लगाकर बाहुयुद्ध करने लगा ॥ १४॥ वे दोनों लड़ते-लड़ते हाथीसे पृथ्वीपर आ गये और अत्यन्त क्रोधमें भरकर एक दूसरेपर बड़े भयंकर प्रहार करते हुए लड़ने लगे ॥ १५॥ तदनन्तर सिंह बड़े वेगसे आकाशकी ओर उछला और उधरसे गिरते समय उसने पंजोंकी मारसे चामरका
१. इसके बाद किसी-किसी प्रतिमें—
'कालं च कालदण्डेन कालरात्रिर्महाहवे। उग्रदर्शननृत्यैः खड्गपातैरताडयत्॥
अरेर्गात्रात्समादाय मान्त्रान्कण्ठे समालभत्। ततोऽपरे रणेऽनेकाः सिंहेन देव्या च नानाखेडाकृतास्तथा॥'
—ये दो श्लोक अधिक हैं।
- सेनापतियोंसहित महिषासुरका वध * | ६९५
---|---
सिर धड़से अलग कर दिया॥ १६॥ इसी प्रकार
उदग्र भी शिला और वृक्ष आदिकी मार खाकर रणभूमिमें देवीके हाथसे मारा गया तथा कराल भी दाँतों, मुक्कों और थप्पड़ोंकी चोटसे धराशायी हो गया॥ १७॥ क्रोधमें भरी हुई देवीने गदाकी चोटसे उद्धतका कचूमर निकाल डाला। भिन्दिपालसे बाष्कलको तथा बाणोंसे ताम्र और अन्धकको मौतके घाट उतार दिया॥ १८॥ तीन नेत्रोंवाली परमेश्वरीने त्रिशूलसे उग्रास्य, उग्रवीर्य तथा महाहनु नामक दैत्यको मार डाला॥ १९॥ तलवारकी चोटसे बिडालके मस्तकको धड़से काट गिराया। दुर्धर और दुर्मुख—इन दोनोंको भी अपने बाणोंसे यमलोक भेज दिया॥ २०॥
एवं संक्षीयमाणे तु स्वसैन्ये महिषासुरः।
माहिषेण स्वरूपेण त्रासयामास तान् गणान् ॥ २१ ॥
कांश्चित्तुण्डप्रहारेण खुरक्षेपैस्तथापरान्।
लाङ्गूलताडितांश्चान्याञ्छृङ्गाभ्यां च विदारितान् ॥ २२ ॥
वेगेन कांश्चिदपरान्नादेन भ्रमणेन च।
निःश्वासपवनेनान्यान् पातयामास भूतले ॥ २३ ॥
निपात्य प्रमथानीकमभ्यधावत सोऽसुरः।
सिंहं हन्तुं महादेव्याः कोपं चक्रे ततोऽम्बिका ॥ २४॥
सोऽपि कोपान्महावीर्यः खुरक्षुण्णमहीतलः।
शृङ्गाभ्यां पर्वतानुच्चांश्चिक्षेप च ननाद च ॥ २५ ॥
वेगभ्रमणविक्षुण्णा मही तस्य व्यशीर्यत।
लाङ्गूलेनाहतश्चाब्धिः प्लावयामास सर्वतः ॥ २६ ॥
धुतशृङ्गविभिन्नाश्च खण्डं<sup>१</sup> खण्डं ययुर्घनाः।
श्वासानिलास्ताः शतशो निपेतुर्नभसोऽचलाः ॥ २७॥
इति क्रोधसमाध्मातमापतन्तं महासुरम्।
दृष्ट्वा सा चण्डिका कोपं तद्वधाय तदाकरोत् ॥ २८ ॥
सा क्षिप्त्वा तस्य वै पाशं तं बबन्ध महासुरम्।
तत्याज माहिषं रूपं सोऽपि बद्धो महामृधे ॥ २९ ॥
ततः सिंहोऽभवत्सद्यो यावत्तस्याम्बिका शिरः।
छिनत्ति तावत्पुरुषः खड्गपाणिरदृश्यत ॥ ३० ॥
तत एवाशु पुरुषं देवी चिच्छेद सायकैः।
तं खड्गचर्मणा सार्द्धं ततः सोऽभून्महागजः ॥ ३१ ॥
करेण च महासिंहं तं चकर्ष जगर्ज च।
कर्षतस्तु करं देवी खड्गेन निरकृन्तत ॥ ३२॥
ततो महासुरो भूयो माहिषं वपुरास्थितः।
तथैव क्षोभयामास त्रैलोक्यं सचराचरम् ॥ ३३॥
ततः क्रुद्धा जगन्माता चण्डिका पानमुत्तमम्।
पपौ पुनः पुनश्चैव जहासारुणलोचना ॥ ३४॥
ननर्द चासुरः सोऽपि बलवीर्यमदोद्धतः।
विषाणाभ्यां च चिक्षेप चण्डिकां प्रति भूधरान् ॥ ३५ ॥
सा च तान् प्रहितांस्तेन चूर्णयन्ती शरोत्करैः।
उवाच तं मदोद्धूतमुखरागाकुलाक्षरम् ॥ ३६ ॥
इस प्रकार अपनी सेनाका संहार होता देख
१. पा०—खण्डखण्डं।
१९६ * संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण *
महिषासुरने भैंसेका रूप धारण करके देवीके
गणोंको त्रास देना आरम्भ किया ॥ २१ ॥ किन्हींको
थूथुनसे मारकर, किन्हींके ऊपर खुरोंका प्रहार
करके, किन्हीं-किन्हींको पूँछसे चोट पहुँचाकर,
कुछको सींगोंसे विदीर्ण करके, कुछ गणोंको
वेगसे, किन्हींको सिंहनादसे, कुछको चक्कर देकर
और कितनोंको निःश्वास वायुके झोंकेसे धराशायी
कर दिया ॥ २२-२३ ॥ इस प्रकार गणोंकी सेनाको
गिराकर वह असुर महादेवीके सिंहको मारनेके
लिये झपटा। इससे जगदम्बाको बड़ा क्रोध
हुआ ॥ २४ ॥ उधर महापराक्रमी महिषासुर भी
क्रोधमें भरकर धरतीको खुरोंसे खोदने लगा तथा
अपने सींगोंसे ऊँचे-ऊँचे पर्वतोंको उठाकर फेंकने
और गर्जने लगा ॥ २५ ॥ उसके वेगसे चक्कर देनेके
कारण पृथ्वी क्षुब्ध होकर फटने लगी। उसकी
पूँछसे टकराकर समुद्र सब ओरसे धरतीको डुबोने
लगा ॥ २६ ॥ हिलते हुए सींगोंके आघातसे विदीर्ण
होकर बादलोंके टुकड़े-टुकड़े हो गये। उसके
श्वासकी प्रचण्ड वायुके वेगसे उड़े हुए सैकड़ों
पर्वत आकाशसे गिरने लगे ॥ २७॥ इस प्रकार
क्रोधमें भरे हुए उस महादैत्यको अपनी ओर आते
देख चण्डिकाने उसका वध करनेके लिये महान्
क्रोध किया ॥ २८ ॥ उन्होंने पाश फेंककर उस
महान् असुरको बाँध लिया। उस महासंग्राममें बँध
जानेपर उसने भैंसेका रूप त्याग दिया ॥ २९ ॥
और तत्काल सिंहके रूपमें वह प्रकट हो गया।
उस अवस्थामें जगदम्बा ज्यों ही उसका मस्तक
काटनेको उद्यत हुईं, त्यों ही वह खड्गधारी
पुरुषके रूपमें दिखायी देने लगा ॥ ३० ॥ तब
देवीने तुरंत ही बाणोंकी वर्षा करके ढाल और
तलवारके साथ उस पुरुषको भी बींध डाला।
इतनेमें ही वह महान् गजराजके रूपमें परिणत हो
गया ॥ ३१ ॥ तथा अपनी सूँड़से देवीके विशाल
सिंहको खींचने और गर्जने लगा। खींचते समय
देवीने तलवारसे उसकी सूँड़ काट डाली ॥ ३२ ॥
तब उस महादैत्यने पुनः भैंसेका शरीर धारण कर
लिया और पहलेकी ही भाँति चराचर प्राणियोंसहित