संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण
Markandeya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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- संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण *
महोत्सवमें कितने ही गण मृदङ्ग बजा रहे थे।
तदनन्तर देवीने त्रिशूलसे, गदासे, शक्तिकी वर्षासे
और खड्ग आदिसे सैकड़ों महादैत्योंका संहार कर
डाला। कितनोंको घंटेके भयङ्कर नादसे मूच्छित
करके मार गिराया ॥ ५५-५६ ॥ बहुतेरे दैत्योंको
पाशसे बाँधकर धरतीपर घसीटा; कितने ही दैत्य
उनकी तीखी तलवारकी मारसे दो-दो टुकड़े हो
गये ॥ ५७ ॥ कितने ही गदाकी चोटसे घायल हो
धरतीपर सो गये। कितने ही मूसलकी मारसे
अत्यन्त आहत होकर रक्त वमन करने लगे। कुछ
दैत्य शूलसे छाती फट जानेके कारण पृथ्वीपर ढेर
हो गये। उस रणाङ्गणमें बाणसमूहोंकी वृष्टिसे
कितने ही असुरोंकी कमर टूट गयी ॥ ५८-५९ ॥
बाजकी तरह झपटनेवाले देवीभक्त दैत्यगण
अपने प्राणोंसे हाथ धोने लगे। किन्हींकी बाँहें
छिन्न-भिन्न हो गयीं, कितनोंकी गर्दन कट गयीं।
कितने ही दैत्योंके मस्तक कट-कटकर गिरने
लगे। कुछ लोगोंके शरीर मध्यभागमें ही विदीर्ण
हो गये। कितने ही महादैत्य जाँघें कट जानेसे
पृथ्वीपर गिर पड़े। कितनोंको ही देवीने एक
बाँह, एक पैर और एक नेत्रवाले करके दो
टुकड़ोंमें चीर डाला। कितने ही दैत्य मस्तक कट
जानेपर भी गिरकर फिर उठ जाते और केवल
धड़के ही रूपमें अच्छे-अच्छे हथियार हाथमें ले
देवीके साथ युद्ध करने लगते थे। दूसरे कबन्ध
युद्धके बाजोंकी लयपर नाचते थे ॥ ६०-६३॥
कितने ही बिना सिरके धड़ हाथोंमें खड्ग, शक्ति
और ऋष्टि लिये दौड़ते थे तथा दूसरे-दूसरे
महादैत्य 'ठहरो ! ठहरो !!' यह कहते हुए देवीको
युद्धके लिये ललकारते थे। जहाँ वह घोर संग्राम
हुआ था, वहाँकी धरती देवीके गिराये हुए रथ,
हाथी, घोड़े और असुरोंकी लाशोंसे ऐसी पट गयी
थी कि वहाँ चलना-फिरना असम्भव हो गया
था ॥ ६४-६५ ॥ दैत्योंकी सेनामें हाथी, घोड़े और
असुरोंके शरीरोंसे इतनी अधिक मात्रामें रक्तपात
हुआ था कि थोड़ी ही देरमें वहाँ खूनकी बड़ी-
बड़ी नदियाँ बहने लगीं ॥ ६६ ॥ जगदम्बाने असुरोंकी
विशाल सेनाको क्षणभरमें नष्ट कर दिया-ठीक
उसी तरह, जैसे तृण और काठके भारी ढेरको आग
कुछ ही क्षणोंमें भस्म कर देती है ॥ ६७ ॥ और वह
सिंह भी गर्दनके बालोंको हिला-हिलाकर जोर-
जोरसे गर्जना करता हुआ दैत्योंके शरीरोंसे मानो
उनके प्राण चूसे लेता था ॥ ६८ ॥ वहाँ देवीके
गणोंने भी उन महादैत्योंके साथ ऐसा युद्ध किया,
जिससे देवतागण उनपर आकाशसे फूल बरसाने
लगे और उन सबसे बहुत सन्तुष्ट हुए ॥ ६९ ॥
इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे सावर्णिके मन्वन्तरे देवीमाहात्म्ये महिषासुरसैन्यवधो नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥
उवाच १, श्लोकाः ६८, एवम् ६९, एवमादितः ॥ १७३ ॥
इस प्रकार श्रीमार्कण्डेयपुराणमें सावर्णिक मन्वन्तरकी कथाके अन्तर्गत देवी-माहात्म्यमें
'महिषासुरकी सेनाका वध' नामक दूसरा अध्याय पूरा हुआ ॥ २ ॥