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संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

Markandeya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

३. दत्तात्रेय-चरित्र, कार्तवीर्यार्जुन व अलर्क-संवाद

५० * संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण *


अभिलाषा क्यों करेंगे? अतः मेरा जो कुछ भी पुण्य है, उसके द्वारा ये यातनामें पड़े हुए पापी जीव नरकसे छुटकारा पा जायें।

इन्द्र बोले—राजन्! इस उदारताके कारण तुमने और भी ऊँचा स्थान प्राप्त कर लिया। देखो, ये पापी जीव भी नरकसे मुक्त हो गये।

पुत्र कहता है—पिताजी! तदनन्तर राजा विपश्चित्‌के ऊपर फूलोंकी वर्षा होने लगी और स्वयं भगवान् विष्णु उन्हें विमानमें बिठाकर दिव्यधाममें ले गये।* उस समय मैं तथा और भी जितने पापी जीव थे, वे सब नरकयातनासे छूटकर अपने-अपने कर्मफलके अनुसार भिन्न-भिन्न योनियोंमें चले गये। द्विजश्रेष्ठ! इस प्रकार मैंने इन नरकोंका वर्णन किया; साथ ही पूर्वकालमें मैंने जैसा अनुभव किया था, उसके अनुसार जिस-जिस पापके कारण मनुष्य जिस-जिस योनिमें जाता है, वह सब भी बतला दिया।


दत्तात्रेयजीके जन्म-प्रसङ्गमें एक पतिव्रता ब्राह्मणी तथा अनसूयाजीका चरित्र

पिता बोले—बेटा! तुमने अत्यन्त हेय संसारके व्यवस्थित स्वरूपका वर्णन किया, जो घटी-यन्त्रकी भाँति निरन्तर आवागमनशील और प्रवाहरूपसे अविनाशी है। इस प्रकार मैंने इसके स्वरूपको भलीभाँति समझ लिया है। ऐसी स्थितिमें अब मुझे क्या करना चाहिये? यह बताओ।

पुत्र (सुमति) ने कहा—पिताजी! यदि आप शङ्का छोड़कर मेरे वचनोंमें पूर्ण श्रद्धा रखते हैं तो मेरी राय यह है कि आप गृहस्थाश्रमका परित्याग करके वानप्रस्थके नियमोंका पालन


* यमपुरुष उवाच—एष धर्मश्च शक्रश्च त्वां नेतुं समुपागतौ। अवस्थानमदन्तव्यं तस्मात् पार्थिव गम्यताम्॥
धर्म उवाच—नयामि त्वामहं स्वर्गं त्वया सम्यगुपासितः। विमानमेतदारुह्य मा विलम्बस्व गम्यताम्॥
राजोवाच—नरके मानवा धर्म पीड्यन्तेऽत्र सहस्रशः। त्राहीति चार्त्ताः क्रन्दन्ति तन्मतो न व्रजाम्यहम्॥
यदि जानसि धर्म त्वं त्वां वा शक्र शचीपते। मम यावत्प्रमाणं तु शुभं तद्वक्तुमर्हथः॥
धर्म उवाच—अब्बिन्दवो यथाभ्रोंत्था यथा वा दिवि तारकाः। यथा वा वर्षतो धारा गङ्गायां सिकता यथा॥
असंख्येया महाराज यथा विन्द्याटव्यां तृणाम्। तथा तथापि पुण्यस्य संख्या नैवोपपद्यते॥
अनुकम्पामिमाञ्चाद्य भारूढेऽसि कुर्वतः। तदेव राजशार्दूल संख्येयानुपगतं तव॥
तद् गच्छ त्वं नृपश्रेष्ठ तद्भौङ्क्तुममरालयम्। एतेऽपि पापं नरके शमयन्तु स्वकर्मजम्॥
राजोवाच—कथं स्पृहां करिष्यन्ति मदङ्गेभ्यो मुदिता मानवाः। यदि मत्संनिधावेषामनुकल्पो नोपजायते॥
तस्माद् यत् सुकृतं किञ्चिन्ममास्ति त्रिदशाधिप। तेन मुञ्चन्तु नरकात् पापिनो यातनां गताः॥
इन्द्र उवाच—एवमुच्चैस्तरं स्थानं त्वयावाप्तं महोदय। एतांश्च नरकात् पश्य विमुक्तान् पापकारिणः॥
पुत्र उवाच—अथोऽपतत् पुष्पवृष्टिस्तस्योपरि महीपतेः। विमानं चारुरोहैनं स्वलोकं नयत हरिः॥
(अ० १५। ६६—६८, ७०—७८)

  • दत्तात्रेयजीके जन्म-प्रसङ्गमें एक पतिव्रता ब्राह्मणी तथा अनसूयाजीका चरित्र * ५१

कीजिये। वानप्रस्थ आश्रमके कर्तव्यका भलीभाँति अनुष्ठान करके फिर आहवनीय आदि अग्नियोंका संग्रह भी छोड़ दीजिये और आत्मा (बुद्धि) को आत्मामें लगाकर द्वन्द्वरहित एवं परिग्रहशून्य हो जाइये। एकान्तमें रहते हुए अपने मनको वशमें कीजिये और आलस्य छोड़कर भिक्षु (संन्यासी)-का जीवन व्यतीत कीजिये। संन्यासाश्रममें योगपरायण होकर बाह्य विषयोंके सम्पर्कसे अलग हो जाइये। इससे आपको उस योगकी प्राप्ति होगी, जो दुःख-संयोगको दूर करनेकी ओषधि, मोक्षका साधन, तुलनारहित, अनिर्वचनीय एवं असङ्ग है और जिसका संयोग प्राप्त होनेपर आपको फिर संसारी जीवोंके सम्पर्कमें नहीं आना पड़ेगा।

**पिता बोले—**बेटा! अब तुम मुझे मोक्षके साधनभूत उस उत्तम योगका उपदेश दो, जिससे मैं फिर संसारी जीवोंके सम्पर्कमें आकर ऐसा दुःख न उठाऊँ। यद्यपि आत्मा स्वभावतः सब प्रकारके योगसे रहित है तो भी जिस योगमें आसक्त होनेपर मेरे आत्माका सांसारिक बन्धनोंसे योग न हो, उसी योगको इस समय मुझे बताओ। संसाररूपी सूर्यके प्रचण्ड तापकी पीड़ासे मेरे शरीर और मन दोनों सूख रहे हैं। तुम ब्रह्मज्ञानरूपी जलकी शीतलतासे युक्त अपने वचनरूपी सलिलसे इन्हें सींच दो। मुझे अविद्यारूपी काले नागने डस लिया है। मैं उसके विषसे पीड़ित होकर मर रहा हूँ। तुम अपने वचनामृतसे मुझे पुनः जीवित कर दो। मैं स्त्री-पुत्र, घर-द्वार, खेती-बारीकी ममतारूपी बेड़ीमें जकड़ा जाकर कष्ट पा रहा हूँ; तुम प्रिय एवं उत्तम भावसे युक्त विज्ञानद्वारा इस बन्धनको खोलकर मुझे शीघ्र मुक्त करो।

**पुत्रने कहा—**पिताजी! पूर्वकालमें परम बुद्धिमान् दत्तात्रेयजीने राजा अलर्कको उनके पूछनेपर जिस योगका भलीभाँति विस्तारपूर्वक उपदेश किया था, वही आपको बता रहा हूँ; सुनिये।

**पिता बोले—**दत्तात्रेयजी किसके पुत्र थे? उन्होंने किस प्रकार योगका उपदेश किया था और महाभाग अलर्क कौन थे, जिन्होंने योगके विषयमें प्रश्न किया था?

**पुत्रने कहा—**प्रतिष्ठानपुरमें एक कौशिक नामक ब्राह्मण था। वह पूर्वजन्ममें किये हुए पापोंके कारण कोढ़के रोगसे व्याकुल रहने लगा। ऐसे घृणित रोगसे युक्त होनेपर भी उसे उसकी पत्नी देवताकी भाँति पूजती थी। वह अपने पतिके पैरोंमें तेल मलती, उसका शरीर दबाती, अपने हाथसे उसे नहलाती, कपड़े पहनाती और भोजन कराती थी; इतना ही नहीं, उसके थूक, खँखार, मल-मूत्र और रक्त भी वह स्वयं ही धोकर साफ करती थी। वह एकान्तमें भी पतिकी सेवा करती और उसे मीठी वाणीसे प्रसन्न रखती थी। इस प्रकार अत्यन्त विनीत भावसे वह सदा अपने स्वामीकी पूजा किया करती तो भी अधिक क्रोधी स्वभावका होनेके कारण वह निष्ठुर प्रायः अपनी पत्नीको फटकारता ही रहता था। इतनेपर भी वह उसके पैरों पड़ती और उसे देवताके समान समझती थी। यद्यपि उसका शरीर अत्यन्त घृणाके योग्य था तो भी वह साध्वी उसे सबसे श्रेष्ठ मानती थी। कौशिकसे चला-फिरा नहीं जाता था तो भी एक दिन उसने अपनी पत्नीसे कहा—'धर्मज्ञे! उस दिन मैंने घरपर बैठे-बैठे ही सड़कपर जिस वेश्याको जाते देखा था, उसके घरमें आज मुझे ले चलो। मुझे उससे मिला दो। वही मेरे हृदयमें बसी हुई है। जबसे मैंने उसे देखा है, तबसे वह मेरे मनसे दूर नहीं होती। यदि वह आज मेरा आलिङ्गन नहीं करेगी तो कल तुम मुझे मरा हुआ देखोगी। मनुष्योंके लिये कामदेव प्रायः टेढ़ा होता है। उस वेश्याको बहुत लोग चाहते हैं और मुझमें उसके पासतक जानेकी शक्ति नहीं है; इसलिये आज मुझे बड़ा सङ्कट प्रतीत होता है।'

अपने कामातुर स्वामीका यह वचन सुनकर

५२* संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण *

उत्तम कुलमें उत्पन्न हुई इस परम सौभाग्यशालिनी पतिव्रता पत्नीने अपनी कमर खूब कस ली और अधिक शुल्क लेकर पतिको कंधेपर चढ़ा लिया। फिर धीरे-धीरे वेश्याके घरकी ओर प्रस्थान किया। रात्रिका समय था, आकाश मेघोंसे आच्छन्न हो रहा था। केवल बिजलीके चमकनेसे मार्ग दिखायी दे जाता था। ऐसी वेलामें वह ब्राह्मणी अपने पतिका अभीष्ट साधन करनेके लिये राजमार्गसे जा रही थी। मार्गमें सूली थी, जिसके ऊपर चोर न होते हुए भी चोरके सन्देहसे माण्डव्य नामक ब्राह्मणको चढ़ा दिया गया था। वे दुःखसे आतुर हो रहे थे। कौशिक पत्नीके कंधेपर बैठा था, उस अन्धकारमें देख न सकनेके कारण उसने अपने पैरोंसे छूकर सूलीको हिला दिया। इससे कुपित होकर माण्डव्यने कहा—'जिसने पैरसे हिलाकर मुझे इस कष्टकी दशामें पहुँचा दिया और मुझे अत्यन्त दुखी कर दिया, वह पापात्मा नराधम सूर्योदय होनेपर विवश हो निस्सन्देह अपने प्राणोंसे हाथ धो बैठेगा। सूर्यका दर्शन होते ही उसका विनाश हो जायगा।' इस अत्यन्त दारुण शापको सुनकर उसकी पत्नी व्यथित होकर बोली—'अब सूर्यका उदय ही नहीं होगा।'* तदनन्तर सूर्योदय न होनेके कारण चराचर रात ही रहने लगी। कितने ही दिनोंके बराबर समय रातभरमें ही बीत गया। इससे देवताओंको बड़ा भय हुआ। वे सोचने लगे—स्वाध्याय, वषट्कार, स्वधा (श्राद्ध) तथा स्वाहा (यज्ञ)-से रहित होकर यह सारा जगत् नष्ट हुए बिना कैसे रह सकता है। दिन-रातकी व्यवस्था हुए बिना मास और ऋतुका भी लोप हो जायगा। उनके लोप होनेसे दक्षिणायन और उत्तरायणका भी ज्ञान नहीं होगा। अयनका ज्ञान हुए बिना वर्ष कैसे हो सकता है, और वर्षके बिना कालका ज्ञान होना असम्भव है। पतिव्रताके वचनसे सूर्यका उदय ही नहीं होता; उसके बिना स्नान, दान आदि क्रियाएँ बंद हो गयीं। अग्निहोत्र और यज्ञका अभाव भी दृष्टिगोचर होने लगा है। होमके बिना हमलोगोंकी तृप्ति नहीं होती। जब मनुष्य यज्ञका यथोचित भाग देकर हमें तृप्त करते हैं, तब हम खेतोंकी उपजके लिये वर्षा करके मनुष्योंपर अनुग्रह करते हैं। नया अन्न पैदा होनेपर मनुष्य फिर हमारे लिये यज्ञ करते हैं और हमलोग यज्ञादिद्वारा पूजित होनेपर उन्हें मनोवाञ्छित भोग प्रदान करते हैं। हम नीचेकी ओर वर्षा करते हैं और मनुष्य ऊपरकी ओर। हम जलकी वर्षासे मनुष्योंको और मनुष्य हविष्यकी वर्षासे हमलोगोंको तृप्त करते हैं। जो दुरात्मा लोभवश हमारा यज्ञभाग स्वयं खा लेते हैं, उन अपकारी पापियोंके नाशके लिये हम जल, सूर्य, अग्नि, वायु तथा पृथ्वीको भी दूषित कर देते हैं। उन दूषित वस्तुओंका उपयोग करनेसे उन कुकर्मियोंको मृत्युके लिये भयङ्कर महामारी आदि रोग उत्पन्न हो जाते हैं।


* तस्य भार्या ततः श्रुत्वा तं शापमतिदारुणम् । प्रोवाच व्यथिता सूर्यो नैवोदेष्यत्युदर्धितः । (१६ । ३१)

  • दत्तात्रेयजीके जन्म प्रसङ्गमें एक पतिव्रता ब्राह्मणी तथा अनसूयाजीका चरित्र * ५३

जो हमें तृप्त करके शेष अन्न अपने उपभोगमें लाते हैं, उन महात्माओंको हम पुण्यलोक प्रदान करते हैं। किन्तु इस समय प्रभातकाल हुए बिना इन मनुष्योंके लिये वह सब पुण्यकर्म असम्भव हो रहा है। अब दिनकी सृष्टि कैसे हो ?' इस प्रकार सब देवता आपसमें बात करने लगे। यज्ञोंके विनाशकी आशङ्कासे वहाँ एकत्रित हुए देवताओंके वचन सुनकर प्रजापति ब्रह्माजीने कहा—'पतिव्रताके माहात्म्यसे इस समय सूर्यका उदय नहीं हो रहा है और सूर्योदय न होनेसे मनुष्यों तथा तुम देवताओंकी भी हानि है; अतः तुमलोग महर्षि अत्रिकी पतिव्रता पत्नी तपस्विनी अनसूयाके पास जाओ और सूर्योदयकी कामनासे उन्हें प्रसन्न करो।'*

तब देवताओंने जाकर अनसूयाजीको प्रसन्न किया। वे बोलीं—'तुम क्या चाहते हो, बतलाओ।' देवताओंने याचना की कि 'पूर्ववत् दिन होने लगे।'

अनसूयाने कहा—देवताओ! पतिव्रताका महत्त्व किसी प्रकार कम नहीं हो सकता; इसलिये मैं उस साध्वीको मनाकर दिनकी सृष्टि करूँगी। मुझे ऐसा उपाय करना है, जिससे फिर पहलेकी ही भाँति दिन-रातकी व्यवस्था चलती रहे और उस पतिव्रताके पतिका भी नाश न हो।†

सूतने कहा—देवताओंसे यों कहकर अनसूया देवी उस ब्राह्मणीके घर गयीं और उसके कुशल पूछनेपर उन्होंने अपनी, अपने स्वामीकी तथा अपने धर्मकी कुशल बतायी।

अनसूया बोलीं—कल्याणी! तुम अपने स्वामीके मुखका दर्शन करके प्रसन्न तो रहती हो न? पतिको सम्पूर्ण देवताओंसे बड़ा मानती हो न? पतिकी सेवासे ही मुझे महान् फलकी प्राप्ति हुई है तथा सम्पूर्ण कामनाओं एवं फलोंकी प्राप्तिके साथ ही मेरे सारे विघ्न भी दूर हो गये।‡ साध्वी! मनुष्यको पाँच ऋण सदा ही चुकाने चाहिये। अपने वर्णधर्मके अनुसार धनका संग्रह करना आवश्यक है। उसके प्राप्त होनेपर शास्त्रविधिके अनुसार उसका सत्पात्रको दान करना चाहिये। सत्य, सरलता, तपस्या, दान और दयासे सदा युक्त रहना चाहिये। राग-द्वेषका परित्याग करके शास्त्रोक्त कर्मोंका अपनी शक्तिके अनुसार प्रतिदिन श्रद्धापूर्वक अनुष्ठान करना चाहिये। ऐसा करनेसे मनुष्य अपने वर्णके लिये विहित उत्तम लोकोंको प्राप्त होता है। पतिव्रते! इस प्रकार महान् क्लेश उठानेपर पुरुषोंको प्राजापत्य आदि लोकोंकी प्राप्ति होती है; परन्तु स्त्रियाँ केवल पतिकी सेवा करनेमात्रसे पुरुषोंके दुःख सहकर उपार्जित किये हुए पुण्यका आधा भाग प्राप्त कर लेती हैं। स्त्रियोंके लिये अलग यज्ञ, श्राद्ध या उपवासका विधान नहीं है। वे पतिकी सेवामात्रसे ही उन अभीष्ट लोकोंको प्राप्त कर लेती हैं। अतः महाभागे! तुम्हें सदा पतिकी सेवामें अपना मन लगाना चाहिये; क्योंकि स्त्रीके लिये पति ही परम गति है। पति जो देवताओं, पितरों तथा अतिथियोंकी


* पतिव्रताया माहात्म्यान्नोदेच्छति दिवाकरः। तस्य चानुदयाद्धानिर्मर्त्यानां भवतां तथा ॥
तस्मात् पतिव्रतामग्रेऽनसूयां तपस्विनीम्। प्रसादयत वै पत्नीं भानोरुदयकाम्यया ॥ (१६। ४८-४९)

अनसूयोवाच
† पतिव्रताया माहात्म्यं न हीयेत कथं त्विति। सान्त्वयित्वाऽथ तां साध्वीमहं सृक्ष्याम्यहं सुराः ॥
यथा पुनरहोरात्रसंस्थानमुपजायते। यथा च तस्याः स्वपतिर्न साध्व्या नाशमेष्यति ॥ (१६। ५१-५२)

‡ कञ्चिन्नन्दसि कल्याणि! स्वभर्तुर्मुखदर्शनात्। काञ्चित्सर्वाधिकंदेवेभ्यो मन्यसेऽभ्यधिकं पतिम् ॥
भर्तृशुश्रूषयाद्येव मया प्राप्तं महत् फलम्। सर्वकामफलावाप्त्या प्रत्यूहाः परिनिर्जिताः ॥ (१६। ५४-५५)

५४ * संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण *


सत्कारपूर्वक पूजा करता है, उसके भी पुण्यका आधा भाग स्त्री अनन्यचित्तसे पतिकी सेवा करनेमात्रसे प्राप्त कर लेती है।*

अनसूयाजीका वचन सुनकर पतिव्रता ब्राह्मणीने बड़े आदरके साथ उनका पूजन किया और इस प्रकार कहा—'स्वभावतः सबका कल्याण करनेवाली देवी! स्वयं आप यहाँ पधारकर पतिकी सेवामें मेरी पुनः श्रद्धा बढ़ा रही हैं। इससे मैं धन्य हो गयी। यह आपका मुझपर बहुत बड़ा अनुग्रह है। इसीसे देवताओंने भी आज मुझपर कृपादृष्टि की है। मैं जानती हूँ कि स्त्रियोंके लिये पतिके समान दूसरी कोई गति नहीं है। पतिमें किया हुआ प्रेम इहलोक और परलोकमें भी उपकार करनेवाला होता है। यशस्विनि! पतिके प्रसादसे ही नारी इस लोक और परलोकमें भी सुख पाती है; क्योंकि पति ही नारीका देवता है। महाभागे! आज आप मेरे घरपर पधारी हैं। मुझसे अथवा मेरे इन पतिदेवसे आपको जो भी कार्य हो, उसे बतानेकी कृपा करें।†

अनसूयोवाच
एते देवाः सहेन्द्रेण मामुपागम्य दुःखिताः।
त्वद्वाक्यापास्तसत्कर्मदिननक्तनिरूपणाः ॥
याचन्तेऽहर्निशासंस्थां यथावदविखण्डिताम्।
अहं तदर्थमायाता शृणु चैतद्वचो मम॥
दिनाभावात् समस्तानाम्भावो यागकर्मणाम्।
तदभावात् सुराः पुष्टिं नोपयान्ति तपस्विनि॥
अह्नश्चैव समुच्छेदादुच्छेदः सर्वकर्मणाम्।
तदुच्छेदादनावृष्ट्या जगदुच्छेदमेष्यति॥
तत्त्वमिच्छसि चेदेतज्जगदुद्धर्तुमापदः।
प्रसीद साध्वि लोकानां पूर्ववद्वर्त्ततां रविः॥


अनसूया बोलीं—देवि! तुम्हारे वचनसे दिन-रातकी व्यवस्थाका लोप हो जानेके कारण शुभ कर्मोंका अनुष्ठान बंद हो गया है; इसलिये ये इन्द्र आदि देवता मेरे पास दुःखी होकर आये हैं और प्रार्थना करते हैं कि दिन-रातकी व्यवस्था पहलेकी तरह अखण्डरूपसे चलती रहे। मैं उसीके लिये तुम्हारे पास आयी हूँ। मेरी यह बात सुनो। दिन न होनेसे समस्त यज्ञकर्मोंका अभाव हो गया है और यज्ञोंके अभावसे देवताओंकी पुष्टि नहीं हो पाती है; अतः तपस्विनि! दिनके नाशसे समस्त शुभ कर्मोंका नाश हो जायगा और उनके नाशसे वृष्टिमें बाधा पड़नेके कारण इस संसारका ही उच्छेद हो जायगा। अतः यदि तुम इस जगत्को आपत्तिसे बचाना चाहती हो तो सम्पूर्ण लोकोंपर दया करो, जिससे पहलेकी भाँति सूर्योदय हो।

ब्राह्मण्युवाच
माण्डव्येन महाभागे शप्तो भर्ता ममेश्वरः।
सूर्योदये विनाशं त्वं प्राप्स्यसीत्यतिमन्युना॥

ब्राह्मणीने कहा—महाभागे! माण्डव्य ऋषिने अत्यन्त क्रोधमें भरकर मेरे स्वामी—मेरे ईश्वरको शाप दिया है कि सूर्योदय होते ही तेरी मृत्यु हो जायगी।

अनसूयोवाच
यदि वा रोचते भद्रे ततस्त्वद्वचनादहम्।
करोमि पूर्ववद्देहं भर्तारं च नवं तव॥
मया हि सर्वथा स्त्रीणां माहात्म्यं वरवर्णिनि।
पतिव्रतानामाराध्यमिति सम्मान्यासि ते॥

अनसूया बोलीं—कल्याणी! यदि तुम्हारी इच्छा हो और तुम कहो तो मैं तुम्हारे पतिको पूर्ववत् शरीर एवं नयी स्वस्थ अवस्थाका कर दूँगी।


* नास्ति स्त्रीणां पृथग्यज्ञो न श्राद्धं नाप्युपोषितम्। भर्तृशुश्रूषयैवैतान् लोकांनिष्टान् ब्रजन्ति हि॥
तस्मात् साध्वि महाभागे पतिशुश्रूषणं प्रति। त्वया गतिः सदा कार्या यतो भर्त्ता परा गतिः॥
यद्देवेभ्यो यच्च पित्रागतेभ्यः कुर्याद्धनीयार्चनं शक्तिभावः। तस्यान्वद्धं केवलानन्यचित्ता नारी भुङ्क्ते भर्तृशुश्रूषयैव॥ (१६।६१-६३)
† स त्वं ब्रूहि महाभागे प्रसाद्य मम मन्दिरम्। आर्याया कस्यवा कार्ये मयाऽऽद्यैणापि वा श्रुते॥ (१६।६८)

  • दत्तात्रेयजीके जन्म-प्रसङ्गमें एक पतिव्रता ब्राह्मणी तथा अनसूयाजीका चरित्र * ५५

सुन्दरी! मुझे पतिव्रता स्त्रियोंके माहात्म्यका सर्वथा आदर करना है, इसीलिये तुम्हें मनाती हूँ।

पुत्र उवाच
तथेत्युक्ते तया सूर्यमाजुहाव तपस्विनी।
अनसूयार्घ्यमुद्यम्य दशरात्रे तदा निशि॥
ततो विवस्वान् भगवान् फुल्लपद्मारुणाकृतिः।
शैलराजानमुदयमारुरोहोरुमण्डलः ॥
समनन्तरमेवास्या भर्ता प्राणैर्व्ययुज्यत।
पपात च महीपृष्ठे पतन्तं जगृहे च सा॥

पुत्र (सुमति) कहता है—ब्राह्मणीके 'तथास्तु' कहकर स्वीकार करनेपर तपस्विनी अनसूयाने अर्घ्य हाथमें लेकर सूर्यदेवका आवाहन किया। उस समयतक दस दिनोंके बराबर रात बीत चुकी थी। तदनन्तर भगवान् सूर्य खिले हुए कमलके समान अरुण आकृति धारण किये अपने महान् मण्डलके साथ गिरिराज उदयाचलपर आरूढ़ हुए। सूर्यदेवके प्रकट होते ही ब्राह्मणीका पति प्राणहीन होकर पृथ्वीपर गिरा; किन्तु उसकी पत्नीने गिरते समय उसे पकड़ लिया।

अनसूयोवाच
न विषादस्त्वया भद्रे कर्तव्यः पश्य मे बलम्।
पतिशुश्रूषयावाप्तं तपसः किं चिरेण ते॥
यथा भर्तृसमं नान्यमपश्यं पुरुषं क्वचित्।
रूपतः शीलतो बुद्ध्या वाङ्माधुर्यादिभूषणैः॥
तेन सत्येन विप्रोऽयं व्याधिमुक्तः पुनर्युवा।
प्राप्नोतु जीवितं भार्यासहायः शरदां शतम्॥
यथा भर्तृसमं नान्यमहं पश्यामि दैवतम्।
तेन सत्येन विप्रोऽयं पुनर्जीवत्वनामयः॥
कर्मणा मनसा वाचा भर्तुराराधनं प्रति।
यथा ममोद्यमो नित्यं तथायं जीवताद् द्विजः ॥

अनसूया बोलीं—भद्रे! तुम विषाद न करना। पतिकी सेवासे जो तपोबल मुझे प्राप्त हुआ है, उसे तुम अभी देखो; विलम्बकी क्या आवश्यकता? मैंने जो रूप, शील, बुद्धि एवं मधुर भाषण आदि सद्गुणोंमें अपने पतिके समान दूसरे किसी पुरुषको कभी नहीं देखा है, उस सत्यके प्रभावसे यह ब्राह्मण रोगसे मुक्त हो फिरसे तरुण हो जाय और अपनी स्त्रीके साथ सौ वर्षोंतक जीवित रहे। यदि मैं स्वामीके समान और किसी देवताको नहीं समझती तो उस सत्यके प्रभावसे यह ब्राह्मण रोगमुक्त होकर पुनः जीवित हो जाय। यदि मन, वाणी एवं क्रियाद्वारा मेरा सारा उद्योग प्रतिदिन स्वामीकी सेवाके ही लिये होता हो तो यह ब्राह्मण जीवित हो जाय।

पुत्र उवाच
ततो विप्रः समुत्तस्थौ व्याधिमुक्तः पुनर्युवा।
स्वभाभिर्भासयन् वेश्म वृन्दारक इवाजरः॥
ततोऽपतन् पुष्पवृष्टिर्देववाद्यादिनिःस्वनः।
लेभिरे च मुदं देवा अनसूयामथाब्रुवन् ॥

पुत्र कहता है—पिताजी! अनसूयादेवीके इतना कहते ही वह ब्राह्मण अपनी प्रभासे उस भवनको प्रकाशमान करता हुआ रोगमुक्त तरुण शरीरसे जीवित हो उठा, मानो जरावस्थासे रहित देवता हो। तदनन्तर दुन्दुभि आदि देवताओंके बाजोंकी आवाजके

५६
* संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण *

साथ वहाँ फूलोंकी वर्षा होने लगी। देवताओंको बड़ा आनन्द मिला। वे अनसूयादेवीसे कहने लगे।

देवता बोले— कल्याणी! आपने देवताओंका बहुत बड़ा कार्य किया है। तपस्विनी! इससे प्रसन्न होकर देवता आपको वर देना चाहते हैं। आप कोई वर माँगें।

अनसूयाने कहा— यदि ब्रह्मा आदि देवता मुझपर प्रसन्न होकर वर देना चाहते हैं, यदि आपलोगोंने मुझे वर देनेके योग्य समझा है तो मेरी यही इच्छा है कि ब्रह्मा, विष्णु और शिव मेरे पुत्रके रूपमें प्रकट हों तथा अपने स्वामीके साथ मैं उस योगको प्राप्त करूँ, जो समस्त क्लेशोंसे मुक्ति देनेवाला है।

यह सुनकर ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदि देवताओंने 'एवमस्तु' कहा और तपस्विनी अनसूयाका सम्मान करके वे सब-के-सब अपने-अपने धामको चले गये।


दत्तात्रेयजीके जन्म और प्रभावकी कथा

पुत्र (सुमति) कहता है— तदनन्तर बहुत समय व्यतीत होनेके बाद ब्रह्माजीके द्वितीय पुत्र महर्षि अत्रिने अपनी परमसाध्वी पत्नी अनसूयाको देखा, जो ऋतुस्नान कर चुकी थीं। वे सर्वाङ्गसुन्दरी थीं। उनका रूप मनको लुभानेवाला था। उन्हें देखकर मुनिने कामयुक्त होकर मन-ही-मन उनका चिन्तन किया। उनके चिन्तन करते समय जो विकार प्रकट हुआ, उसे वेगयुक्त वायुने इधर-उधर और ऊपरकी ओर पहुँचा दिया। वह अत्रिमुनिका तेज ब्रह्मस्वरूप, शुक्लवर्ण, सोमरूप एवं व्योमग था। जब वह गिरने लगा तो उसे दसों दिशाओंने ग्रहण कर लिया। वही प्रजापति अत्रिके मानस-पुत्र चन्द्रमाके रूपमें अनसूयासे उत्पन्न हुआ, जो समस्त प्राणियोंके जीवनका आधार है। भगवान् विष्णुने सन्तुष्ट होकर अपने श्रीविग्रहसे सत्त्वमय तेजको प्रकट किया। उसीसे दत्तात्रेयजीका जन्म हुआ। भगवान् विष्णुने ही दत्तात्रेयके नामसे प्रसिद्धि प्राप्त करके अनसूयाका स्तनपान किया। वे अत्रिके द्वितीय पुत्र थे। हैहयराज कृतवीर्य बड़ा उद्दण्ड था। उसने एक बार महर्षि अत्रिका अपमान कर दिया। यह देख अत्रिके तृतीय पुत्र दुर्वासा, जो अभी माताके गर्भमें ही थे, क्रोधमें भरकर सात ही दिनोंमें माताके उदरसे बाहर निकल आये। गर्भावासजनित महान् आयास तथा पिताके अपमानजनित दुःख और अमर्षसे युक्त होकर वे हैहयराजको तत्काल भस्म कर डालनेको उद्यत हो गये थे। वे तमोगुणके उत्कर्षसे युक्त साक्षात् भगवान् रुद्रके अंश थे। इस प्रकार अनसूयाके गर्भसे ब्रह्मा, विष्णु और शिवके अंशभूत तीन पुत्र उत्पन्न हुए। चन्द्रमा ब्रह्माके अंशसे हुए थे, दत्तात्रेय श्रीविष्णुभगवान्‌के स्वरूप थे और दुर्वासाके रूपमें साक्षात् भगवान् शङ्करने ही अवतार लिया था।* देवताओंके वरदान देनेके कारण ये तीनों देवता वहाँ प्रकट हुए थे। चन्द्रमा अपनी शीतल किरणोंसे तृण, लता, वल्ली, अन्न तथा मनुष्योंका पोषण करते हैं और सदा स्वर्गमें रहते हैं; वे प्रजापतिके अंश हैं। दत्तात्रेय दुष्ट दैत्योंका संहार करके प्रजाकी रक्षा करते हैं। वे शिष्टजनोंपर अनुग्रह करनेवाले हैं। उन्हें भगवान् विष्णुका अंश जानना चाहिये। दुर्वासा अपमान करनेवालेको भस्म कर डालते हैं। वे शरीर, दृष्टि, मन और वाणीसे भी उद्धत स्वभावके हैं और रुद्रभावका आश्रय लेकर रहते हैं। इस प्रकार प्रजापति महर्षि अत्रिने स्वयं ही चन्द्रमाको प्रकट किया। श्रीविष्णुरूप दत्तात्रेयजी योगस्थ रहकर विषयोंका अनुभव


* सोमो ब्रह्मभवोऽप्येवं दत्तात्रेयोऽभवत्परः। दुर्वासाः शङ्करो जज्ञे वरदानाद्दिवौकसाम्॥ (१७।११)

  • दत्तात्रेयजीके जन्म और प्रभावकी कथा * ५७

करने लगे। दुर्वासा अपने पिता-माताको छोड़कर उन्मत्त नामक उत्तम व्रतका आश्रय ले पृथ्वीपर विचरने लगे।

कुछ काल बीतनेके पश्चात् जब राजा कृतवीर्य स्वर्गको पधारे और मन्त्रियों, पुरोहितों तथा पुरवासियोंने राजकुमार अर्जुनको राज्याभिषेकके लिये बुलाया तब उसने कहा—'मन्त्रियो! जो भविष्यमें नरकको ले जानेवाला है, वह राज्य मैं नहीं ग्रहण करूँगा। जिसके लिये प्रजाजनोंसे कर लिया जाता है, उस उद्देश्यका पालन न किया जाय तो राज्य लेना व्यर्थ है। वैश्यलोग अपने व्यापारसे होनेवाली आयका बारहवाँ भाग राजाको इसलिये देते हैं कि वे मार्गमें लुटेरोंद्वारा लूटे न जायँ। राजकीय अर्थरक्षकोंके द्वारा सुरक्षित होकर वे वाणिज्यके लिये यात्रा कर सकें। ग्वाले घी और तक्र आदिका तथा किसान अनाजका छठा भाग राजाको इसी उद्देश्यसे अर्पण करते हैं। यदि राजा वैश्योंसे सम्पूर्ण आयका अधिकांश भाग ले ले तो वह चोरका काम करता है। इससे उसके इष्ट और पूर्त कर्मोंका नाश होता है।* यदि राजाको कर देकर भी प्रजाको दूसरी वृत्तियोंका आश्रय लेना पड़े, उसकी रक्षा राजाके अतिरिक्त किन्हीं अन्य व्यक्तियोंद्वारा हो तो उस अवस्थामें कर लेनेवाले राजाको निश्चय ही नरकमें जाना पड़ता है। प्रजाकी आयका जो छठा भाग है, उसे पूर्वकालके महर्षियोंने राजाके लिये प्रजाकी रक्षाका वेतन नियत किया है। यदि चोरोंसे वह प्रजाकी रक्षा न कर सका तो इसका पाप राजाको ही होता है; इसलिये यदि मैं तपस्या करके अपनी इच्छाके अनुसार योगीका पद प्राप्त कर लूँ तो मैं पृथ्वीके पालनकी शक्तिसे युक्त एकमात्र राजा हो सकता हूँ। ऐसी दशामें अपने उत्तरदायित्वका पूर्ण निर्वाह करनेके कारण मुझे पापका भागी नहीं होना पड़ेगा।'

उसके इस निश्चयको जानकर मन्त्रियोंके मध्यमें बैठे हुए परम बुद्धिमान् वयोवृद्ध मुनिश्रेष्ठ गर्गने कहा—'राजकुमार! यदि तुम राज्यका यथावत् पालन करनेके लिये ऐसा करना चाहते हो तो मेरी बात सुनो और वैसा ही करो। महाभाग दत्तात्रेय मुनि सह्यपर्वतकी गुफामें रहते हैं। तुम उन्हींकी आराधना करो। वे तीनों लोकोंकी रक्षा करते हैं। दत्तात्रेयजी योगयुक्त, परम सौभाग्यशाली, सर्वत्र समदर्शी तथा विश्वपालक भगवान् विष्णुके अंशरूपसे इस पृथ्वीपर अवतीर्ण हुए हैं। उन्हींकी आराधना करके इन्द्रने दुरात्मा दैत्योंद्वारा छीने हुए अपने पदको प्राप्त किया तथा दैत्योंको मार भगाया।'

**अर्जुनने पूछा—**महर्षे! देवताओंने परम प्रतापी दत्तात्रेयजीकी आराधना किस प्रकार की थी? तथा दैत्योंद्वारा छीने हुए इन्द्रपदको देवराजने कैसे प्राप्त किया था?

**गर्गने कहा—**पूर्वकालमें देवताओं और दैत्योंमें बड़ा भयङ्कर युद्ध हुआ था। उस युद्धमें दैत्योंका नायक जम्भ था और देवताओंके स्वामी इन्द्र। उन्हें युद्ध करते एक दिव्य वर्ष व्यतीत हो गया। उसके बाद देवता हार गये और दैत्य विजयी हुए। विप्रचित्ति आदि दानवोंने जब देवताओंको परास्त कर दिया, तब वे युद्धसे भागने लगे, अब उनमें शत्रुओंको जीतनेका उत्साह न रह गया। फिर वे दैत्यसेनाके वधकी इच्छासे बृहस्पतिजीके पास आये और उनके तथा वालखिल्य आदि महर्षियोंके साथ बैठकर मन्त्रणा करने लगे।

**बृहस्पतिजीने कहा—**देवताओ! तुम अत्रिके तपस्वी पुत्र महात्मा दत्तात्रेयके पास जाओ और उन्हें भक्तिपूर्वक सन्तुष्ट करो। उनमें वर देनेकी शक्ति है। वे तुम्हें दैत्योंका नाश करनेके लिये वर


* पण्यानां द्वादशं भागं भूपालस्य वणिग्जनः॥
दत्त्वार्थरक्षिभिर्मार्गे रक्षितो याति दस्युतः। गोपाश्च घृततक्रादेः षड्भागं च कृषीवलाः॥
दत्त्वान्यद् भूभुजे दद्युर्यदि भागं ततोऽधिकम्। गव्यादीनामशेषेण वर्णिजो गृह्यतस्ततः॥
इष्टापूर्तविनाशाय तद्राज्ञश्चौरधर्मिणः। (१८। ३-५ १/२)
[539] सं० मा० पु०-३

५८* संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण *

देंगे। तत्पश्चात् तुम सब लोग मिलकर दैत्यों और दानवोंका वध कर सकोगे।

गर्गने कहा— उनके ऐसा कहनेपर देवगण दत्तात्रेयके आश्रमपर गये और वहाँ लक्ष्मीजीके साथ उन महात्माका दर्शन किया। सबसे पहले उन्होंने अपना कार्यसाधन करनेके लिये उन्हें प्रणाम किया, फिर स्तवन किया। भक्ष्य-भोज्य और माला आदि वस्तुएँ भेंट कीं। इस प्रकार वे आराधनामें लग गये। जब दत्तात्रेयजी चलते तो देवता भी उनके पीछे-पीछे जाते। जब वे खड़े होते तो देवता भी ठहर जाते और जब वे ऊँचे आसनपर बैठते तो देवता नीचे खड़े रहकर उनकी उपासना करते। एक दिन पैरोंपर पड़े हुए देवताओंसे दत्तात्रेयजीने पूछा—'तुमलोग क्या चाहते हो, जो मेरी इस प्रकार सेवा करते हो?'

देवता बोले— मुनिश्रेष्ठ! जम्भ आदि दानवोंने त्रिलोकीपर आक्रमण करके भूलोक, भुवर्लोक आदिपर अधिकार जमा लिया है और सम्पूर्ण यज्ञभाग भी हर लिये हैं; अतः आप हमारी रक्षाके लिये उनके वधका विचार कीजिये। आपकी कृपासे हम पुनः स्वर्गलोक प्राप्त करना चाहते हैं। जगन्नाथ! आप निष्पाप एवं निर्लेप हैं। विद्याके प्रभावसे शुद्ध हुए आपके अन्तःकरणमें ज्ञानकी किरणें फैल रही हैं।

दत्तात्रेयजीने कहा— देवताओ! यह सत्य है कि मेरे पास विद्या है और मैं समदर्शी भी हूँ; तथापि इस नारीके सङ्गसे मैं दूषित हो रहा हूँ; क्योंकि स्त्रीका निरन्तर सहयोग दोषका ही कारण होता है।

उनके ऐसा कहनेपर देवता फिर बोले—द्विजश्रेष्ठ! ये साक्षात् जगन्माता लक्ष्मी हैं। इनमें पापका लेश भी नहीं है; अतः ये कभी दूषित नहीं होतीं। जैसे सूर्यकी किरणें ब्राह्मण और चाण्डाल दोनोंपर पड़ती हैं; किन्तु अपवित्र नहीं होतीं।

देवताओंके ऐसा कहनेपर दत्तात्रेयजीने हँसकर कहा—यदि तुमलोगोंका ऐसा ही विचार है तो समस्त असुरोंको युद्धके लिये यहाँ मेरे सामने बुला लाओ, विलम्ब न करो। मेरे दृष्टिपातजनित अग्निसे उनके बल और तेज दोनों क्षीण हो जायेंगे और इस प्रकार वे सब-के-सब मेरी दृष्टिमें पड़कर नष्ट हो जायेंगे।

उनकी यह बात सुनकर देवताओंने महाबली दैत्योंको युद्धके लिये ललकारा तथा वे क्रोधमें भरकर देवताओंपर टूट पड़े। दैत्योंकी मार खाकर देवता भयसे व्याकुल हो गये और शरण पानेकी इच्छासे शीघ्र ही भागकर दत्तात्रेयजीके आश्रमपर गये। दैत्य भी देवताओंको कालके गालमें भेजनेके लिये उसी जगह जा पहुँचे। वहाँ उन्होंने महाबली महात्मा दत्तात्रेयजीको देखा। उनके वामभागमें चन्द्रमुखी लक्ष्मीजी विराजमान थीं, जो उनकी प्रिय पत्नी एवं सम्पूर्ण जगत्‌के लोगोंका कल्याण करनेवाली हैं। ये सर्वाङ्गसुन्दरी लक्ष्मी स्त्रीसमुचित सम्पूर्ण उत्तम गुणोंसे विभूषित थीं और मीठी वाणीमें भगवान्‌से वार्तालाप कर रही थीं। उन्हें सामने देखकर दैत्योंके मनमें उन्हें प्राप्त

  • दत्तात्रेयजीके जन्म और प्रभावकी कथा * ५९

करनेकी इच्छा हो गयी। वे अपने बढ़ते हुए कामके वेगको न रोक सके। अब तो उन्होंने देवताओंका पीछा छोड़ दिया और लक्ष्मीजीको हर लेनेका विचार किया। उस पापसे मोहित हो जानेके कारण उनकी सारी शक्ति क्षीण हो गयी। वे आसक्त होकर आपसमें कहने लगे—'यह स्त्री त्रिभुवनका सारभूत रत्न है। यदि यह हमारी हो जाय तो हमलोग कृतार्थ हो जायँ; इसलिये हम सब लोग मिलकर इसे पालकीपर बिठा लें और अपने घरको ले चलें।' यह विचार निश्चित हो गया।

आपसमें ऐसी बात करके वे कामपीड़ित दैत्य आसक्तिपूर्वक वहाँ गये और लक्ष्मीजीको पालकीमें बिठाकर उसे मस्तकपर ले अपने स्थानकी ओर चल दिये। तब दत्तात्रेयजीने हँसकर देवताओंसे कहा—'सौभाग्यसे लक्ष्मी दैत्योंके सिरपर चढ़ गयीं। अब तुमलोग बढ़ो। हथियार उठाकर इन दैत्योंका वध करो। अब इनसे डरनेकी आवश्यकता नहीं। मैंने इन्हें निस्तेज कर दिया है तथा परायी स्त्रीके स्पर्शसे इनका पुण्य जल गया है, जिससे ये शक्तिहीन हो चले हैं।'

तदनन्तर देवताओंने नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंसे दैत्योंको मारना आरम्भ किया। लक्ष्मी उनके सिरपर चढ़ी हुई थीं, इसलिये वे नष्ट हो गये। इसके बाद लक्ष्मीजी वहाँसे महामुनि दत्तात्रेयके पास आ गयीं। उस समय सम्पूर्ण देवता उनकी स्तुति करने लगे। दैत्योंके नाशसे उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई थी। फिर परम बुद्धिमान् दत्तात्रेयजीको प्रणाम करके देवता स्वर्गमें चले गये और पहलेकी भाँति निश्चिन्त होकर रहने लगे। राजन्! यदि तुम भी इसी प्रकार अपनी इच्छाके अनुसार अनुपम ऐश्वर्य प्राप्त करना चाहते हो तो तुरंत ही उनकी आराधनामें लग जाओ।

गर्ग मुनिकी यह बात सुनकर राजा कार्तवीर्यने दत्तात्रेयजीके आश्रमपर जा उनका भक्तिपूर्वक पूजन किया। वह उनका पैर दबाता, उनके लिये माला, चन्दन, गन्ध, जल और फल आदि सामग्री प्रस्तुत करता; भोजनके साधन जुटाता और जूठन

६० * संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण *


साफ करता था। इससे सन्तुष्ट होकर मुनिने कार्तवीर्यसे कहा—‘अरे भैया! तुम देखते हो, मेरे पास यह स्त्री बैठी हुई है। मैं इसके उपभोगसे निन्दाका पात्र हो रहा हूँ, अतः मेरी सेवा तुम्हें नहीं करनी चाहिये। मैं कुछ भी करनेमें असमर्थ हूँ। तुम अपने उपकारके लिये किसी शक्तिशाली पुरुषकी आराधना करो।’

उनके इस प्रकार कहनेपर कार्तवीर्य अर्जुनको गर्गजीकी बातका स्मरण हो आया। उसने दत्तात्रेयजीको प्रणाम करके कहा।

**अर्जुन बोला—**देव! आप अपनी मायाका आश्रय लेकर मुझे क्यों अपनी मायामें डाल रहे हैं? आप सर्वथा निष्पाप हैं। इसी प्रकार ये देवी भी सम्पूर्ण जगत्‌की जननी हैं।

अर्जुनके यों कहनेपर भगवान्‌ने सम्पूर्ण भूमण्डलको वशमें करनेवाले महाभाग कार्तवीर्यसे कहा—‘राजन्! तुमने मेरे गूढ़ रहस्यका कथन किया है, इसलिये मैं तुमपर बहुत सन्तुष्ट हूँ। तुम कोई वर माँगो।’

**कार्तवीर्यने कहा—**देव! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं तो मुझे ऐसी उत्तम ऐश्वर्यशक्ति प्रदान कीजिये, जिससे मैं प्रजाका पालन करूँ और अधर्मका भागी न बनूँ। मैं दूसरोंके मनकी बात जान लूँ और युद्धमें कोई मेरा सामना न कर सके। युद्ध करते समय मुझे एक हजार भुजाएँ प्राप्त हों; किन्तु वे इतनी हलकी हों, जिससे मेरे शरीरपर भार न पड़े। पर्वत, आकाश, जल, पृथ्वी और पातालमें मेरी अबाध गति हो। मेरा वध मेरी अपेक्षा श्रेष्ठ पुरुषके हाथसे हो। यदि कभी मैं कुमार्गमें प्रवृत्त होऊँ तो मुझे सन्मार्ग दिखानेवाला उपदेशक प्राप्त हो। मुझे श्रेष्ठ अतिथि प्राप्त हों और निरन्तर दान करते रहनेपर भी मेरा धन कभी क्षीण न हो। मेरे स्मरण करनेमात्रसे सम्पूर्ण राष्ट्रमें धनका अभाव दूर हो जाय तथा आपमें मेरी अनन्य भक्ति बनी रहे।

**दत्तात्रेयजी बोले—**तुमने जो-जो वरदान माँगे हैं, वे सब तुम्हें प्राप्त होंगे। तुम मेरे प्रसादसे चक्रवर्ती सम्राट् होओगे।

**सुमति कहते हैं—**तदनन्तर दत्तात्रेयजीको प्रणाम करके अर्जुन अपने घर गया और समस्त प्रजा एवं अमात्यवर्गके लोगोंको एकत्रित करके उसने राज्याभिषेक ग्रहण किया। उसके अभिषेकके लिये गन्धर्व, श्रेष्ठ अप्सराएँ, वसिष्ठ आदि महर्षि, मेरु आदि पर्वत, गङ्गा आदि नदियाँ और समुद्र, पाकर आदि वृक्ष, इन्द्र आदि देवता, वासुकि आदि नाग, गरुड़ आदि पक्षी तथा नगर एवं जनपदके निवासी भी आये थे। श्रीदत्तात्रेयजीकी कृपासे अभिषेककी सब सामग्री अपने-आप जुट गयी थी। फिर तो ब्रह्मा आदि देवताओंने होमके लिये अग्निको प्रज्वलित किया तथा साक्षात् नारायणस्वरूप श्रीदत्तात्रेयजी एवं अन्यान्य महर्षियोंने समुद्र और नदियोंके जलसे अर्जुनका राज्याभिषेक किया। राजसिंहासनपर आसीन होते ही हैहयनरेशने अधर्मके नाश और धर्मकी रक्षाके लिये घोषणा करायी। दत्तात्रेयजीसे उत्तम ऐश्वर्य-शक्ति पाकर वे

• अलर्कोपाख्यानका आरम्भ—नागकुमारोंके द्वारा ऋतध्वजके पूर्ववृत्तान्तका वर्णन • ६१

बड़े शक्तिशाली हो गये थे। राजाकी घोषणा इस प्रकार थी—'आजसे मुझको छोड़कर जो कोई भी शस्त्र ग्रहण करेगा अथवा दूसरोंकी हिंसामें प्रवृत्त होगा, वह लुटेरा समझा जायगा और मेरे हाथसे उसका वध होगा।'

ऐसी आज्ञाके जारी होनेपर उस राज्यमें महापराक्रमी नरश्रेष्ठ राजा अर्जुनको छोड़कर दूसरा कोई मनुष्य शस्त्र धारण नहीं करता था। स्वयं राजा ही गौओं, पशुओं, खेतों एवं द्विजातियोंकी रक्षा करते थे। तपस्वियों तथा व्यापारियोंके समुदायकी रक्षा भी वे स्वयं ही करते थे। लुटेरे, सर्प, अग्नि तथा शस्त्र आदिसे भयभीत मनुष्योंका तथा अन्य प्रकारकी आपत्तियोंमें मग्न हुए मानवोंका वे स्मरण करनेमात्रसे तत्काल उद्धार कर देते थे। उनके राज्यमें धनका अभाव कभी नहीं होता था। उन्होंने अनेक ऐसे यज्ञ किये, जिनके पूर्ण होनेपर ब्राह्मणोंको प्रचुर दक्षिणाएँ दी जाती थीं। उन्होंने कठोर तपस्या की और संग्रामोंमें भी महान् पराक्रम दिखाया। उनकी समृद्धि और बढ़ा हुआ सम्मान देखकर अङ्गिरा मुनिने कहा—'अन्य राजालोग यज्ञ, दान, तपस्या अथवा संग्राममें पराक्रम दिखानेमें राजा कार्तवीर्यकी तुलना नहीं कर सकते। राजा अर्जुनने जिस दिन दत्तात्रेयजीसे समृद्धि प्राप्त की थी, उस दिनके आनेपर वह उनके लिये यज्ञ करता था और सारी प्रजा भी राजाको परम ऐश्वर्यकी प्राप्ति हुई देख उसी दिन एकाग्रचित्तसे दत्तात्रेयजीका यजन करती थी।'

इस प्रकार चराचरगुरु भगवान् विष्णुके स्वरूपभूत महात्मा दत्तात्रेयजीकी महिमाका वर्णन किया गया। शङ्ख, चक्र, गदा एवं शार्ङ्गधनुष धारण करनेवाले अनन्त एवं अप्रमेय भगवान् विष्णुके अनेक अवतार पुराणोंमें वर्णित हैं। जो मनुष्य उनके परम स्वरूपका चिन्तन करता है, वह सुखी होता है और संसारसे उसका शीघ्र ही उद्धार हो जाता है। वे आदि-अन्तरहित भगवान् विष्णु अधर्मके नाश और धर्मके प्रचारके लिये ही संसारकी रक्षा और पालन करते हैं। अब मैं इसी प्रकार पितृभक्त राजर्षि महात्मा अलर्कके जन्मका वृत्तान्त बतलाता हूँ; क्योंकि दत्तात्रेयजीने उन्हींको योगका उपदेश दिया था।


अलर्कोपाख्यानका आरम्भ—नागकुमारोंके द्वारा ऋतध्वजके पूर्ववृत्तान्तका वर्णन

सुमति कहते हैं—पिताजी! प्राचीन कालकी बात है, शत्रुजित् नामके एक महापराक्रमी राजा राज्य करते थे, जिनके यज्ञोंमें पर्याप्त सोमरस पान करनेके कारण देवराज इन्द्र बहुत सन्तुष्ट रहते थे। उनका पुत्र भी बुद्धि, पराक्रम और लावण्यमें क्रमशः बृहस्पति, इन्द्र और अश्विनीकुमारोंकी समानता करता था। वह राजकुमार प्रतिदिन अपने समान अवस्था, बुद्धि, बल, पराक्रम और चेष्टाओंवाले अन्य राजकुमारोंसे घिरा रहता था। कभी तो उनमें शास्त्रोंका विवेचन और उनके सिद्धान्तोंका निर्णय होता था; कभी काव्यचर्चा, संगीत-श्रवण और नाटक देखने आदिमें समय व्यतीत होता था। राजकुमार जब खेलमें लगते, उस समय उन्हींकी अवस्थावाले बहुत-से ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्योंके बालक भी प्रेमवश वहाँ खेलने आ जाते थे। कुछ समय बीतनेके पश्चात् अश्वतर नामक नागके दो पुत्र नागलोकसे पृथ्वीतलपर घूमनेके लिये आये। उन्होंने ब्राह्मणके रूपमें अपनेको छिपा रखा था। वे देखनेमें बड़े सुन्दर और तरुण थे। वहाँ जो राजकुमार तथा अन्यान्य द्विज-बालक खेलते थे, उनके साथ ही वे भी भाँति-भाँतिके विनोद

६२ * संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण *


करते हुए बड़े प्रेमसे रहते थे। वे राजकुमार, वे ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्योंके पुत्र तथा वे दोनों नागराजके बालक साथ-ही-साथ स्नान, अङ्ग-सेवा, वस्त्र-धारण, चन्दनका अनुलेप और भोजन आदि कार्य करते-कराते थे। राजकुमारके प्रेमवश

नागराजके दोनों पुत्र प्रतिदिन बड़ी प्रसन्नताके साथ वहाँ आते थे। उनके साथ भाँति-भाँतिके विनोद, हास्य और वार्तालाप आदि करनेसे राजकुमारको बड़ा सुख मिलता था। वे उन्हें साथ लिये बिना भोजन, स्नान, क्रीड़ा तथा शास्त्रचर्चा आदि कुछ भी नहीं करते थे। इसी प्रकार वे दोनों नागकुमार भी उनके बिना रसातलमें लंबी साँसें खींचते हुए रात बिताते और दिन निकलते ही उनके पास पहुँच जाते थे।

इस तरह बहुत समय बीत जानेके बाद एक दिन नागराज अश्वतरने अपने दोनों बालकोंसे पूछा—'पुत्रो! तुम दोनोंका मर्त्यलोकके प्रति इतना अधिक प्रेम किस कारण है? बहुत दिनोंसे दिनके समय तुमलोग पातालमें नहीं दिखायी देते, केवल रातमें ही मैं तुम्हें देख पाता हूँ।'

पुत्रोंने कहा—'पिताजी! मर्त्यलोकमें राजा शत्रुजित्के एक पुत्र हैं, जिनका नाम ऋतध्वज है। वे बड़े ही रूपवान्, सरल, शूरवीर, मानी तथा प्रिय वचन बोलनेवाले हैं। बिना पूछे ही वार्तालाप आरम्भ करनेवाले, वक्ता, विद्वान्, मित्रभाव रखनेवाले और समस्त गुणोंके भंडार हैं। वे राजकुमार माननीय पुरुषोंको सदा आदर देते हैं। बुद्धिमान् एवं लज्जाशील हैं। विनय ही उनका आभूषण है। उनके अर्पण किये हुए उत्तम-उत्तम उपचार, प्रेम और भाँति-भाँतिके भोगोंने हमारा मन हर लिया है। उनके बिना नागलोक या भूलोकमें कहीं भी हमें सुख नहीं मिलता। पिताजी! उनके वियोगसे पाताललोककी यह शीतल रजनी भी हमारे लिये सन्तापका कारण बनती है और उनका साथ होनेसे दिनके सूर्य भी हमें आह्लाद प्रदान करते हैं।

पिताने कहा—'पुत्रो! अपने पुण्यात्मा पिताका वह बालक धन्य है, जिसके गुणोंका वर्णन तुम-जैसे गुणवान् लोग परोक्षमें भी कर रहे हो। संसारमें कुछ लोग ऐसे हैं, जो शास्त्रोंके ज्ञाता तो हैं, किन्तु उनमें शीलका अभाव है। कुछ लोग शीलवान् तो हैं, किन्तु शास्त्रज्ञानसे रहित हैं। जिस पुरुषमें शास्त्रोंका ज्ञान और उत्तम शील दोनों गुण समानरूपसे हों, मैं उसीको विशेष धन्यवादका पात्र समझता हूँ। जिसके मित्रोचित गुणोंका मित्रलोग और पराक्रमका शत्रुलोग भी सत्पुरुषोंके बीचमें वर्णन करते हों, उसी पुत्रसे पिता वास्तवमें पुत्रवान् होता है। ऋतध्वज तुमलोगोंके उपकारी मित्र हैं। क्या तुमलोगोंने भी उनके चित्तको प्रसन्न करनेके लिये कभी उनका कोई मनोरथ सिद्ध किया है? जिसके यहाँसे याचक कभी विमुख नहीं जाते और मित्रका कार्य कभी सिद्ध हुए बिना नहीं रहता, वही पुरुष धन्य है! उसीका जीवन और जन्म धन्य है! मेरे घरमें जो सुवर्ण आदि रत्न, वाहन, आसन तथा और कोई वस्तु उनके लिये रुचिकर हो, वह सब तुमलोग

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निःशङ्क होकर उन्हें दे सकते हो। जो सुहृदोंका उपकार करते, शत्रुओंको हानि पहुँचाते तथा मेघके समान सर्वत्र दानकी वर्षा करते हैं, विद्वान्लोग उनकी सदा ही उन्नति चाहते हैं।

पुत्र बोले— पिताजी! वे तो कृतकृत्य हैं, उनका कोई क्या उपकार कर सकता है? उनके घरपर आये हुए सभी याचक सदा ही पूजित होते हैं, उनकी सभी कामनाएँ पूर्ण की जाती हैं। उनके घरमें जो रत्न हैं, वे हमारे पातालमें कहाँ हैं। वैसे वाहन, आसन, यान, भूषण और वस्त्र यहाँ कहाँ उपलब्ध हो सकते हैं। उनमें जो विज्ञान है, वह और किसमें नहीं है। पिताजी! वे बड़े-बड़े विद्वानोंके भी सब प्रकारके संदेहोंका भलीभाँति निवारण करते हैं। हाँ, एक कार्य उनका अवश्य है; किन्तु वह ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव आदि सर्वसमर्थ परमेश्वरोंके सिवा हमलोगोंके लिये सर्वथा असाध्य है।

पिताने कहा— 'पुत्रो! असाध्य हो या साध्य, किन्तु मैं उस उत्तम कार्यको अवश्य सुनना चाहता हूँ; विद्वान् पुरुषोंके लिये कौन-सा कार्य असाध्य है। जो अपने मन, बुद्धि तथा इन्द्रियोंको संयममें रखकर उद्यममें लगे रहते हैं, उन मनुष्योंके लिये इस पातालमें या स्वर्गमें कोई भी ऐसी वस्तु नहीं है, जो अज्ञात, अगम्य अथवा अप्राप्य हो। चींटी धीरे-धीरे चलती है; तथापि यदि वह चलती रहे तो सहस्रों योजन दूर चली जा सकती है। इसके विपरीत गरुड़ तेज चलनेवाले होनेपर भी यदि आगे पैर न बढ़ावें तो एक पग भी नहीं जा सकते। उद्योगी मनुष्योंके लिये कुछ गम्य और अगम्य नहीं होता, उनके लिये सब एक-सा है। कहाँ यह भूमण्डल और कहाँ ध्रुवका स्थान, जिसे पृथ्वीपर होते हुए भी राजा उत्तानपादके पुत्र ध्रुवने प्राप्त कर लिया! इसलिये पुत्रो! महाभाग राजकुमारको जिस वस्तुकी आवश्यकता हो, बतलाओ, जिसे देकर तुम दोनों मित्र-ऋणसे उऋण हो सको।*

पुत्रोंने कहा— पिताजी! महात्मा ऋतध्वजने अपनी कुमारावस्थाकी एक घटना बतलायी थी, वह इस प्रकार है। राजा शत्रुजित्‌के पास पहले कभी एक श्रेष्ठ ब्राह्मण पधारे थे। उनका नाम था महर्षि गालव। वे बड़े बुद्धिमान् थे और एक श्रेष्ठ अश्व लेकर आये थे। उन्होंने राजासे कहा—'महाराज!

एक पापाचारी नीच दैत्य आकर मेरे आश्रमका विध्वंस किये देता है। वह सिंह, हाथी तथा अन्य वन-जन्तुओंका और छोटे-छोटे शरीरवाले दूसरे


* नाविज्ञातं न चागम्यं नाप्राप्यं दिवि चेह वा। उद्यतानां मनुष्याणां यतचित्तेन्द्रियात्मनाम्॥
योजनानां सहस्राणि व्रजन् याति पिपीलिका। अगच्छन् वैनतेयोऽपि पदमेकं न गच्छति॥
उद्यतानां मनुष्याणां नागम्यं न विद्यते।
क्व भूमण्डलं क्व च ध्रौव्यं स्थानं यत् प्राप्तवान् ध्रुवः। उत्तानपादनृपतेः पुत्रः सन् भुविगोचरः॥
तत् कथ्यतां महाभाग कार्यवान् येन पुत्रकौ। स भूपालसुतः साधुर्मित्रानृण्यं भवेत् तराम्॥
(अ० २०। ३७-४०)