सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

Markandeya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

पृष्ठ 182, कुल 296 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 182

१८२
• संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण •
देवी ज्ञानियोंके भी चित्तको बलपूर्वक खींचकर
मोहमें डाल देती हैं। वे ही इस सम्पूर्ण चराचर
जगत्की सृष्टि करती हैं तथा वे ही प्रसन्न होनेपर
मनुष्योंको मुक्तिके लिये वरदान देती हैं। वे
ही परा विद्या, संसार-बन्धन और मोक्षकी
हेतुभूता सनातनी देवी तथा सम्पूर्ण ईश्वरोंकी भी
अधीश्वरी हैं॥ ५१-५८ ॥
राजोवाच ॥ ५९ ॥
भगवन् का हि सा देवी महामायेति यां भवान् ॥ ६० ॥
ब्रवीति कथमुत्पन्ना सा कमांस्याश्च किं द्विज।
यत्प्रभावा' च सा देवी यत्स्वरूपा यदुद्भवा ॥ ६१ ॥
तत्सर्वं श्रोतुमिच्छामि त्वत्तो ब्रह्मविदां वर ॥ ६२ ॥
राजाने पूछा - ॥ ५९॥ भगवन्! जिन्हें आप
महामाया कहते हैं, वे देवी कौन हैं? ब्रह्मन्!
उनका आविर्भाव कैसे हुआ? तथा उनके चरित्र
कौन-कौन हैं? ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ महर्षे ! उन
देवीका जैसा प्रभाव हो, जैसा स्वरूप हो और
जिस प्रकार प्रादुर्भाव हुआ हो, वह सब मैं आपके
मुखसे सुनना चाहता हूँ ॥ ६०-६२ ॥
ऋषिरुवाच ॥ ६३ ॥
नित्यैव सा जगन्मूर्तिस्तया सर्वमिदं ततम् ॥ ६४ ॥
तथापि तत्समुत्पत्तिर्बहुधा श्रूयतां मम ।
देवानां कार्यसिद्धयर्थमाविर्भवति सा यदा ॥ ६५ ॥
उत्पन्नेति तदा लोके सा नित्याप्यभिधीयते।
योगनिद्रां यदा विष्णोर्जगत्येकार्णवीकृते ॥ ६६ ॥
आस्तीर्य शेषमभजत्कल्पान्ते भगवान् प्रभुः।
तदा द्वावसुरौ घोरौ विख्यातौ मधुकैटभौ ॥ ६७ ॥
विष्णुकर्णमलोद्भूतौ हन्तुं ब्रह्माणमुद्यतौ ।
स नाभिकमले विष्णोः स्थितो ब्रह्मा प्रजापतिः ॥ ६८ ॥
दृष्ट्वा तावसुरौ चोग्रौ प्रसुप्तं च जनार्दनम् ।
तुष्टाव योगनिद्रां तामेकाग्रहृदयस्थितः ॥ ६९ ॥
विबोधनार्थाय हरेर्हरिनेत्रकृतालयाम् ।
विश्वेश्वरीं जगद्धात्रीं स्थितिसंहारकारिणीम् ॥ ७० ॥
निद्रां भगवतीं विष्णोरतुलां तेजसः प्रभुः ॥ ७१ ॥
ऋषि बोले- ॥ ६३ ॥ राजन् ! वास्तवमें तो वे
देवी नित्यस्वरूपा ही हैं। सम्पूर्ण जगत् उन्हींका रूप
है तथा उन्होंने समस्त विश्वको व्याप्त कर रखा है,
तथापि उनका प्राकट्य अनेक प्रकारसे होता है। वह
मुझसे सुनो। यद्यपि वे नित्य और अजन्मा हैं, तथापि
जब देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके लिये प्रकट
होती हैं, उस समय लोकमें उत्पन्न हुई कहलाती हैं।
कल्पके अन्तमें जब सम्पूर्ण जगत् एकार्णवमें निमग्न
हो रहा था और सबके प्रभु भगवान् विष्णु शेषनागकी
शय्या बिछाकर योगनिद्राका आश्रय ले सो रहे थे,
उस समय उनके कानोंकी मैलसे दो भयंकर असुर
उत्पन्न हुए, जो मधु और कैटभके नामसे विख्यात
थे। वे दोनों ब्रह्माजीका वध करनेको तैयार हो गये।
भगवान् विष्णुके नाभिकमलमें विराजमान प्रजापति
१. पा०-कर्म चास्याश्च। २. पा०- यत्स्वभावा। ३. किसी किसी प्रतिमें इसके बाद ही 'ब्रह्मोवाच' है तथा
'निद्रां भगवतीम्' इस श्लोकार्धके स्थानमें-'स्तौति निद्रां भगवतीं विष्णोरतुलतेजसः॥' ऐसा पाठ है।