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सर्वकोश
संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

Markandeya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

पृष्ठ 190, कुल 296 में से

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पृष्ठ 190

१९० * संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण *
सम्पूर्ण त्रिलोकीको क्षोभग्रस्त देख दैत्यगण
अपनी समस्त सेनाको कवच आदिसे सुसज्जित
कर, हाथोंमें हथियार ले सहसा उठकर खड़े हो
गये। उस समय महिषासुरने बड़े क्रोधमें आकर
कहा- 'आः! यह क्या हो रहा है।' फिर वह
सम्पूर्ण असुरोंसे घिरकर उस सिंहनादकी ओर
लक्ष्य करके दौड़ा और आगे पहुँचकर उसने
देवीको देखा, जो अपनी प्रभासे तीनों लोकोंको
प्रकाशित कर रही थीं ॥ ३५-३७॥ उनके चरणोंके
भारसे पृथ्वी दबी जा रही थी। माथेके मुकुटसे
आकाशमें रेखा-सी खिंच रही थी तथा वे अपने
धनुषकी टङ्कारसे सातों पातालोंको क्षुब्ध किये
देती थीं ॥ ३८ ॥ देवी अपनी हजारों भुजाओंसे
सम्पूर्ण दिशाओंको आच्छादित करके खड़ी थीं।
तदनन्तर उनके साथ दैत्योंका युद्ध छिड़ गया ॥ ३९॥
नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंके प्रहारसे सम्पूर्ण
असुर महिषासुरका सेनानायक था ॥ ४०॥ वह
देवीके साथ युद्ध करने लगा। अन्य दैत्योंकी
चतुरङ्गिणी सेना साथ लेकर चामर भी लड़ने
लगा। साठ हजार रथियोंके साथ आकर उदग्र
नामक महादैत्यने लोहा लिया ॥ ४१ ॥ एक करोड़
रथियोंको साथ लेकर महाहनु नामक दैत्य युद्ध
करने लगा। जिसके रोएँ तलवारके समान तीखे
थे, वह असिलोमा नामक महादैत्य पाँच करोड़
रथी सैनिकोंसहित युद्धमें आ डटा ॥ ४२ ॥ साठ
लाख रथियोंसे घिरा हुआ बाष्कल नामक दैत्य
भी उस युद्धभूमिमें लड़ने लगा ॥ ४३ ॥ परिवारित १
नामक राक्षस हाथीसवार और घुड़सवारोंके अनेक
दलों तथा एक करोड़ रथियोंकी सेना लेकर युद्ध
करने लगा। बिडाल नामक दैत्य पाँच अरब
रथियोंसे घिरकर लोहा लेने लगा। इनके अतिरिक्त
और भी हजारों महादैत्य रथ, हाथी और घोड़ोंकी
सेना साथ लेकर वहाँ देवीके साथ युद्ध करने
लगे। स्वयं महिषासुर उस रणभूमिमें कोटि-कोटि
सहस्र रथ, हाथी और घोड़ोंकी सेनासे घिरा हुआ
खड़ा था। वे दैत्य देवीके साथ तोमर, भिन्दिपाल,
शक्ति, मूसल, खड्ग, परशु और पट्टिश आदि
अस्त्र-शस्त्रोंका प्रहार करते हुए युद्ध कर रहे थे।
कुछ दैत्योंने उनपर शक्तिका प्रहार किया, कुछ
लोगोंने पाश फेंके ॥ ४४-४८ ॥ तथा कुछ दूसरे
दैत्योंने खड्गप्रहार करके देवीको मार डालनेका
उद्योग किया। देवीने भी क्रोधमें भरकर खेल-
खेलमें ही अपने अस्त्र-शस्त्रोंकी वर्षा करके
दैत्योंके वे समस्त अस्त्र-शस्त्र काट डाले। उनके
मुखपर परिश्रम या थकावटका रंचमात्र भी चिह्न
नहीं था, देवता और ऋषि उनकी स्तुति करते थे
और वे भगवती परमेश्वरी दैत्योंके शरीरोंपर
दिशाएँ उद्भासित होने लगीं। चिक्षुर नामक महान्
अस्त्र-शस्त्रोंकी वर्षा करती रहीं।
१. परितो वारयति शत्रूनिति व्युत्पत्तिः।